छत्तीसगढ़ में 121 आदिवासी दोषमुक्त क़रार, NIA कोर्ट ने किया रिहा

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ के बस्तर में यूएपीए समेत अन्य गंभीर धाराओं में जेल में बंद 121 आदिवासियों को दंतेवाड़ा की एनआईए की अदालत ने रिहा करने का फ़ैसला सुनाया है.
ये सभी आदिवासी पिछले पाँच सालों से भी अधिक समय से जेल में बंद थे. अदालत के फ़ैसले के बाद शनिवार की शाम इन आदिवासियों की रिहाई हुई.
बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी के अनुसार, जगदलपुर केंद्रीय जेल में बंद 110 और दंतेवाड़ा जेल में बंद तीन लोगों को शनिवार को रिहा किया गया. वहीं आठ लोगों पर दूसरे मामले दर्ज हैं, इसलिए उनकी रिहाई नहीं हो सकी है.
इन आदिवासियों को 24 अप्रैल 2017 को सुकमा ज़िले के बुरकापाल में हुए एक माओवादी हमले के बाद गिरफ़्तार किया गया था.
संदिग्ध माओवादियों के इस हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान मारे गए थे.
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रिहा होने वाले आदिवासियों में से एक करीगुंडम गाँव के रहने वाले मड़कम राजा ने कहा, "हमारा इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था. हमारा अपराध इतना भर था कि हम चिंतागुफा थाना के एक गाँव के रहने वाले थे."
गोंदपल्ली गाँव के रहने वाले मुरिया जनजाति के हेमला आयतु को अफ़सोस है कि उनके साथ उनके चाचा डोडी मंगलू की रिहाई नहीं हो पाई क्योंकि इस फ़ैसले के आने से पहले ही पिछले साल दो अक्टूबर को जेल में उनकी मौत हो गई.

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आदिवासियों की वकील डॉक्टर बेला भाटिया ने कहा, "2017 में मई और जून महीने में बुरकापाल और आसपास के गाँवो से 120 आदिवासियों को गिरफ़्तार किया गया था. इसके बाद एक कथित महिला नक्सली को भी इस केस में डाल दिया गया. इन 121 लोगों पर यूएपीए, छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा क़ानून समेत कई धाराएं लगाई गई थीं. इस मामले में दंतेवाड़ा में एनआईए की अदालत ने इन सभी को दोषमुक्त कर दिया है."
उन्होंने कहा कि बस्तर में किसी घटना के बाद किस तरह आदिवासियों की बिना जांच-पड़ताल के गिरफ़्तारियां होती हैं, बुरकापाल उसका एक बड़ा उदाहरण है.
बेला भाटिया ने कहा, "इस मामले में एनआईए की अदालत और हाई कोर्ट ने आदिवासियों की ज़मानत याचिका गंभीर आरोपों के कारण ख़ारिज कर दी थी. अभियुक्तों की संख्या अधिक होने के कारण उनको पेशी की तारीख़ पर कोर्ट में हाज़िर नहीं किया जाता था. पूरे पाँच साल में उनको केवल दो बार ही कोर्ट लाया गया. बेगुनाहों को अपनी बेगुनाही साबित करते-करते पाँच साल लग गए क्योंकि कार्यवाही अत्यंत धीमी गति में चल रही थी. आरोप पत्र पेश होने में ही चार साल लग गए. उसके बाद अगस्त 2021 में परीक्षण शुरू हुआ."

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मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील शालिनी गेरा ने नक्सलियों से जुड़े मामलों में निर्दोष आदिवासियों की गिरफ़्तारी और बरसों-बरस तक उनके जेल में रहने को लेकर चिंता जताई है.
उन्होंने कहा कि बस्तर में सैकड़ों आदिवासी यूएपीए के झूठे मामलों में सालों-साल क़ैद में रहते हैं और कई सालों के बाद उनकी रिहाई हो पाती है.
शालिनी गेरा ने कहा, "2015 में बस्तर सत्र न्यायालय में यूएपीए के तहत पंजीबद्ध 101 प्रकरणों का हमलोगों ने विश्लेषण किया था, उसमें से 92 में सभी अभियुक्तों को दोषमुक्त पाया गया. शेष नौ मामलों को किसी अन्य अदालत में ट्रांसफर किया गया. उन 101 मामलों में, किसी को भी दोषसिद्ध नहीं पाया गया."

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दिन दहाड़े हुआ था हमला
सुकमा ज़िले के दोरनापाल से जगरगुंडा तक सड़क निर्माण में, सुरक्षा के लिए तैनात सीआरपीएफ़ की 74वीं बटालियन और ज़िला पुलिस बल की एक टीम 24 अप्रेल 2017 को सर्च ऑपरेशन के लिए निकली हुई थी.
इसी दौरान भरी दोपहर में सड़क पर सुस्ता रहे सुरक्षाबल के जवानों पर संदिग्ध माओवादियों ने चारों तरफ़ से घेर कर हमला किया था.
इस हमले में 25 जवान मारे गए थे और 7 जवान गंभीर रूप से घायल हुए थे. हमले में एक संदिग्ध माओवादी का शव भी घटनास्थल से बरामद हुआ था.
पुलिस ने इस हमले के बाद घटनास्थल के आसपास के गाँवों से 122 आदिवासियों को गिरफ़्तार किया था. इनमें अधिकांश 19 से 30 साल की उम्र के थे.
उसके बाद से ही सभी लोग जेल में थे. इस दौरान एक व्यक्ति की मृत्यु जेल में ही हो गई.
एनआईए के विशेष न्यायाधीश ने अपने फ़ैसले में कहा, " इस प्रकरण में उपलब्ध किसी भी अभियोजन साक्षियों के द्वारा घटना के समय मौक़े पर इन अभियुक्तों की उपस्थिति और पहचान के संबंध में कोई कथन नहीं किया गया है. इन अभियुक्तों के पास से कोई घातक हथियार भी नहीं मिला था.''
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