छत्तीसगढ़ हमलाः माँ को मिली टीवी से ख़बर, ऐसे दी आख़िरी विदाईः ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, पंडरीपानी, कांकेर से बीबीसी हिंदी के लिए
महानदी के किनारे बसे पंडरीपानी गाँव की गलियों में सन्नाटा पसरा हुआ है. कभी-कभार आ-जा रही एकाध मोटरसाइकिल और पुलिस की गाड़ियाँ इस सन्नाटे को तोड़ती हैं.
गाँव की कुछ औरतें गली के आख़िरी मकान में घुसती हैं और फिर उस घर से सामूहिक रुदन के स्वर फैलने लग जाते हैं.
यह घर रमेश कुमार जुर्री का है. डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड के प्रधान आरक्षक, 35 साल के रमेश कुमार जुर्री, शनिवार को बीजापुर में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे.
उनका शव अभी गाँव में नहीं पहुँचा है.
घर के सामने पुलिस के तीन-चार जवान खड़े हैं. एक जवान बताते हैं, "अभी जगदलपुर में उन्हें आखिरी विदाई दी जाएगी. फिर हेलीकॉप्टर से कांकेर और वहाँ से सड़क मार्ग से पंडरीपानी. मान कर चलिए कि दो घंटे अभी और लगेंगे."
पंडरीपानी गाँव कांकेर ज़िला मुख्यालय से 35 किलोमीटर की दूरी पर है.

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लगभग 1,900 की आबादी वाले पंडरीपानी गाँव के बीचों बीच एक खुली जगह है, जहाँ सड़क की बाईं ओर एक पुलिसकर्मी की आदमकद मूर्ति लगी हुई है. पड़ोस के घर वाले बताते हैं कि यह मूर्ति तामेश्वर सिन्हा नामक पुलिस जवान की है.
9 जुलाई 2007 को सुकमा ज़िले के मरइगुड़ा में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सुरक्षाबलों के 23 जवान मारे गए थे, जिनमें ज़िला पुलिस बल के सहायक उप निरीक्षक तामेश्वर सिन्हा भी शामिल थे.
सड़क के दूसरी ओर भी एक और पुलिसकर्मी की मूर्ति लगी हुई है.
इस जगह से लगभग सौ मीटर दूर रमेश कुमार जुर्री के घर, धीरे-धीरे झुंड में लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो चुका है.

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अंतिम यात्रा की तैयारी में रमेश का परिवार
रमेश के छोटे भाई संजय जुर्री व्यस्त हैं और भाई के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे हैं. घर के सामने के ही खेत में अंतिम संस्कार के लिए गड्ढा खोदा जा रहा है.
अक्तूबर 2005 में पिता मेघनाथ जुर्री के निधन के बाद संजय गाँव में ही खेती-बाड़ी का काम देखते हैं. गाँव में लगभग नौ एकड़ खेती है. उनकी दो बहनें हैं, जिनकी पास के ही गाँवों में शादी हो चुकी है. रमेश अपनी पत्नी सुनीता और चार साल की बेटी सेजल के साथ बीजापुर में ही रहते थे.
संजय को बड़े भाई के निधन की ख़बर पड़ोस के एक लड़के ने दी.
संजय कहते हैं, "शुरू में तो यकीन ही नहीं हुआ. बाद में टीवी में समाचार देखा. हम दो भाई थे. अब अकेला हूं. भैया ही घर में सबसे बड़े थे. वही सब कुछ संभालते थे. आखिरी बार होली के दो-तीन दिन बाद फ़ोन पर बात हुई थी. बच्चे लोगों के साथ बातचीत हुई. घर के हालचाल को लेकर बात हुई. वे माँ को लेकर चिंतित रहते थे."
वे बताते हैं कि उनके भाई की शुरू से ही पुलिस में भर्ती होने की इच्छा थी. लेकिन जिस तरह से माओवाद प्रभावित इलाके में थे, उसे लेकर डर भी बना रहता था. घर वालों ने कोशिश की कि वे कोई और काम कर लें. लेकिन रमेश नहीं माने.
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माँ टीवी पर व्याकुल नज़रों से अपने बाबू को ढूंढती रहीं
रमेश की माँ सत्यवती का रो-रो कर बुरा हाल है. उन्हें घेर कर बैठी महिलाएँ बार-बार ढाढस बंधा रही हैं. कोई पंखा झल रहा है तो कोई पानी पिलाने की कोशिश कर रहा है.

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उनकी मौसी विद्या उसेंडी कांकेर में रहती हैं. वे बताती हैं कि सत्यवती जुर्री की तबीयत ख़राब रहती हैं. इसी आधार पर रमेश के तबादले के लिए वे तीन-चार दिन पहले ही जगदलपुर गई थीं और अधिकारियों को आवेदन दिया था कि वो बड़ा बेटा है, अपनी माँ का, घर का, सबकी देखरेख वही करता है, उसी पर ज़िम्मेवारी थी.
मुठभेड़ की ख़बर आने पर वे टीवी देख रही थीं. उसी समय बीजापुर में रह रहीं रमेश की पत्नी सुनीता ने उन्हें फ़ोन किया.

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विद्या कहती हैं, "बहू ने फ़ोन कर के कहा कि मौसी टीवी खोल कर देखो तो. मैं टीवी देखने लगी. वहाँ आने वाले चित्र में मैं बेटे को ढूंढ रही थी कि मेरा बाबू कहीं दिखेगा करके. लेकिन मेरा बाबू उस भीड़ में नहीं था."
यह सब कहते-बताते वे हिचकियाँ भरते हुए रोने लगती हैं. उन्हें दूसरी महिलाएँ संभालती हैं.
रिश्ते के एक चाचा बताते हैं कि रमेश के पिता बस्तर के बैलाडीला स्थित भारत सरकार के उपक्रम नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में कर्मचारी थे.

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चार साल की एक बेटी हैं रमेश की
बेहद शांत और आज्ञाकारी स्वभाव के रमेश की स्कूली शिक्षा बैलाडीला में ही हुई. बाद में उन्होंने कांकेर से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की.
इसके बाद उन्होंने आरक्षक भर्ती की परीक्षा दी और 2010 में पहले ही प्रयास में उनका चयन हो गया.
नौकरी के पाँच साल बाद उनकी शादी हुई और उनकी 4 साल की बेटी सेजल है.

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गार्ड ऑफ़ ऑनर
रमेश के घर से थोड़ी ही दूर पर स्कूल प्रांगण में गार्ड ऑफ़ ऑनर की तैयारी की गई है.
मैदान के एक छोर पर शामियाना बनाया गया है. सैकड़ों की संख्या में महिलाएँ वहाँ बैठी हुई हैं. पुरुष आसपास चहलकदमी कर रहे हैं.
ज़िले के आला अधिकारियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिस के जवान भी मौजूद हैं. आसपास के इलाके के जनप्रतिनिधि भी एक-एक कर पहुँच रहे हैं.
प्रांगण में दो-तीन गाड़ियाँ पहुँचती हैं. पुलिस के जवान बताते हैं कि गाड़ी में रमेश की पत्नी सुनीता और बेटी सेजल बीजापुर से पहुँचे हैं.
थोड़ी ही देर में कई दोपहिया वाहनों में 'जय जवान, जय किसान' का नारा लगाते नौजवानों का एक दल पहुँचता है. दोपहिया वाहनों के पीछे कुछ गाड़ियाँ हैं. साथ में एक एंबुलेंस, जिससे रमेश का शव उतारा जा रहा है.
सैकड़ों पुरुषों और महिलाओं भीड़ उठ खड़ी होती है. अब तक अनुशासित रही भीड़ के सब्र का बांध टूट जाता है. हर कोई रमेश को अंतिम बार देख लेना चाहता है.

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रोती दादी को सेजल गौर से देख रही हैं
तेज़ गूंजते नारों और फूलों की बारिश के बीच सामने एक ऊँची जगह पर ताबूत में बंद रमेश का शव रख दिया जाता है. पुलिस के जवान शोक की धुन बजाते हुए गार्ड ऑफ़ ऑनर देते हैं, जिसके बाद परिवार के एक-एक सदस्य और फिर दूसरे लोग पुष्प चक्र और फूलों की माला चढ़ा रहे हैं.
रमेश की पत्नी बार-बार पति का चेहरा देखने की ज़िद कर रही हैं. उन्हें महिला पुलिसकर्मी समझाती हैं और खुद के आँसू भी पोछती जाती हैं. चार साल की बेटी सेजल इन सबसे अनजान और मौन हैं. सेजल को उनकी दादी चिपका कर रो रही हैं और सेजल उन्हें गौर से देख रही हैं.
लगभग घंटे भर तक श्रद्धांजलि का सिलसिला चलता रहता है, फिर शव को अंतिम संस्कार के लिए जुलूस की शक़्ल में घर के सामने के खेत की ओर ले जाया जा रहा है.
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"यहाँ कुछ नहीं हो सकता... नोट कर लीजिए"
घर के सामने खड़ा पुलिस का एक जवान, अपने सेलफ़ोन पर कुछ सुन रहा है. दो-तीन दूसरे पुलिसकर्मियों की नज़रें भी सामने खेत की ओर लगी हुई हैं लेकिन वे भी सेल फ़ोन से आती आवाज़ को सुनने की कोशिश कर रहे हैं.
वॉट्सऐप पर गृहमंत्री अमित शाह की प्रेस वार्ता की क्लिप चल रही है, "मैं आज छत्तीसगढ़ और भारत की जनता को विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि ये जो घटना हुई है, इसके बाद ये लड़ाई और तीव्र करेंगे और इस लड़ाई को हम निश्चित रूप से विजय में परिवर्तित करेंगे. जो जवान शहीद हुए हैं, उनके परिजनों को भी मैं..."
सेल फ़ोन के बगल का बटन दबा कर पुलिस का जवान उसे जेब के हवाले करता है और सुनाते हुए कहता है, "यहाँ कुछ नहीं हो सकता. आप पत्रकार हैं न, नोट कर लीजिए."
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