नक्सली हिंसा: सरकार और माओवादियों के अलग-अलग दावे, सच क्या है?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रमुख बातें
- गृह मंत्रालय का दावा है कि वर्ष 2018 के मुक़ाबले 2022 में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 39% की कमी आई
- माओवादियों ने माना पिछले 11 महीनों में उसके 132 लड़ाके मुठभेड़ में मारे गए
- माओवादियों का दावा-सुरक्षा बलों के 57 जवान और अधिकारी मारे गए
- माओवादियों ने ये भी दावा कियाकि उन्होंने 11 महीनों में 69 मुखबिरों को मारा है

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने स्वीकार किया है कि पिछले 11 महीनों में उसके 132 लड़ाके पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारे गए हैं.
ये मुठभेड़ छत्तीसगढ़ के अलावा, महाराष्ट्र के गडचिरौली, झारखंड, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में हुई हैं.
इस बारे में संगठन ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसकी प्रति पुलिस को भी मिली है. रिपोर्ट में संगठन की केंद्रीय कमिटी के प्रवक्ता 'अभय' के हस्ताक्षर हैं.
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक पी. सुंदरराज ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि 'रिपोर्ट सही है' और कई स्रोतों से इसकी पुष्टि पुलिस ने करवाई है.
संगठन अपनी इकाई 'पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की स्थापना की 22वीं वर्षगांठ मना रहा है और ये रिपोर्ट उसी के सिलसिले में जारी की गई है.
पीएलजीए का गठन वर्ष 2000 में हुआ था. इसके कमांडर-इन-चीफ कोटेश्वर राव रहे हैं जो पश्चिम बंगाल में हुई मुठभेड़ में मारे गए थे.

संगठन ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि पिछले 11 महीनों में उसने '200 गुरिल्ला लड़ाइयाँ' लड़ी हैं जिनमें सुरक्षा बलों के 57 जवान और अधिकारी मारे गए हैं जबकि 154 जवानों और अधिकारियों को घायल करने की बात कही गई है.
रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि पिछले 11 महीनों में संगठन ने 69 मुखबिरों को भी मार दिया है.
रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि मध्य भारत और आसपास के राज्यों, जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में छह लाख से ज़्यादा सुरक्षा बलों की तैनाती की गयी है जिनमे केंद्रीय अर्धसैनिक बल भी शामिल हैं.
भारतीय पुलिस सेवा में वरिष्ठ अधिकारी रहे के. विजय कुमार केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के तब महानिदेशक थे जब माओवादी हिंस अपने चरम पर थी.
वो आंतरिक सुरक्षा मामलों के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में भी बतौर सलाहकार काम कर चुके हैं.

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बीबीसी से बात में वो कहते हैं कि जो पत्र माओवादियों ने जारी किया है उससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि इस हिंसा में उन्हें कितना नुक़सान हुआ है. साथ ही, ये इसकी तरफ़ भी इशारा है कि माओवादी पीछे हट रहे हैं और कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं.
उनका कहना था कि रिपोर्ट में माओवादी झूठ बोल रहे हैं क्योंकि इतनी तादाद में सुरक्षा बल नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात ही नहीं हैं.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दो माह पहले जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि माओवादियों के ख़िलाफ़ कई राज्यों में एक साथ संगठित अभियान की वजह से ऐसा हो पाया है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 'छत्तीसगढ़ में, झारखंड के बॉर्डर के बूढ़ा पहाड़ और बिहार के चक्रबंधा और भीमबांध के अति दुर्गम क्षेत्रों' में सुरक्षा बलों ने प्रवेश करके माओवादियों को उनके गढ़ से 'सफलतापूर्वक निकालकर वहां सुरक्षाबलों के स्थायी कैंप स्थापित किए गए हैं.'

केंद्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि ये दोनों स्थान शीर्ष माओवादी नेताओं और मिलिट्री फॉर्मेशन के गढ़ थे.
सीथ ही कड़े अभियान के बाद इन स्थानों से सुरक्षाबलों ने भारी मात्रा में हथियार, गोला बारूद, विदेशी ग्रेनेड, एरोबम और आइईडी बरामद किए जो अब तक की सबसे बड़ी सफलता है.
मंत्रालय का कहना है कि सिर्फ़ इसी साल यानी 2022 में ही माओवादियों के ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई में सुरक्षा बलों ने 'ऑपरेशन ऑक्टोपस', 'ऑपरेशन डबल बुल', 'ऑपरेशन चक्रबंधा' जैसे अभियानों में 'अप्रत्याशित सफलता' मिली है.
मंत्रालय के दस्तावेज़ बताते हैं कि इस दौरान छत्तीसगढ़ में सात माओवादी मारे गए जबकि 436 की गिरफ़्तारी हुई या उनमें से कइयों ने आत्मसमर्पण किया.
वहीं झारखंड में चार माओवादी मारे गए जबकि 120 की गिरफ़्तारी हुई. उसी तरह बिहार में 36 माओवादिओं की गिरफ़्तारी और मध्यप्रदेश में तीन माओवादियों को सुरक्षाबलों ने मार दिया.
रिपोर्ट में कहा गया, "यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इस दौरान मारे गए कई माओवादियों पर लाखों के इनाम थे. 'मिथिलेश महतो और किशन दा पर तो एक करोड़ का इनाम था.''

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गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि वर्ष 2018 के मुकाबले 2022 में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 39% की कमी आई है.
सुरक्षा बलों के मारे जाने की संख्या 26% घटी है जबकि आम नागरिकों के इस दौरान मारे जाने की घटनाओं में 44% तक की कमी आई है.
वर्ष 2018 में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में कमी आने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है. जो पाँच राज्यों के सिर्फ़ 39 जिलों तक ही सिमट कर रह गया है और इससे वर्ष 2008 में 251 जिलों प्रभावित थे.
साल 2018 की तुलना 2022 से की जाए, तो 2018 में 240 जवान मुठभेड़ में मारे गए थे जबकि वर्ष 2019 में 202, 2020 में 183, 2021 में 147 और इस साल अब तक 57 जवान और अधिकारी मारे गए हैं.

के. विजय कुमार बीबीसी से कहते हैं कि सबसे ज़्यादा सफलता किसी राज्य को नक्सली उन्मूलन में मिली है वो है आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, जहाँ नक्सल प्रभावित सिर्फ़ वही इलाके हैं जो छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे हुए हैं. उनके हिसाब से माओवादियों को सबसे ज़्यादा नुक़सान झारखंड में उठाना पड़ा है.
झारखंड के पुलिस महानिदेशक नीरज सिन्हा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि पहली बार सुरक्षा बल ऐसी जगहों पर घुस पाए जहाँ कई दशकों तक जाना मुमकिन नहीं था क्योंकि वो इलाक़े दुर्गम थे और आने-जाने का कोई साधन नहीं था.
गृह मंत्रालय का दावा है, "अगर वर्ष 2014 से पहले की तुलना करें, तो नक्सली हिंसा की घटनाओं में 77 प्रतिशत की कमी आई है.
2009 में हिंसा की घटनाएं 2258 के उच्चतम स्तर से घटकर वर्ष 2021 में 509 रह गईं हैं."
मंत्रालय ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हवाले से कहा है कि हिंसा में होने वाली मृत्यु दर में भी 85 प्रतिशत की कमी आई है जो वर्ष 2010 में ये 1005 के उच्चतम स्तर पर थी. हालांकि वर्ष 2021 में मृतकों की संख्या घटकर 147 हुई है.

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डीजीपी नीरज सिन्हा कहते हैं कि पिछले 11 महीने में झारखंड पुलिस को नक्सल विरोधी अभियान में जो सफलता मिली है वो तीन दशकों में नहीं मिली थी.
उनका कहना था कि पहली बार ऐसा हुआ है कि जब 'नक्सलियों के अभेद्य गढ़' यानी बूढ़ा पहाड़ पर अभियान चलाया जा सका.
उनका कहना था कि बड़ी संख्या में विदेशी हथियार और विस्फोटक सामग्री तो मिली ही. सबसे बड़ी चुनौती बारूदी दुरंगों की है.
साथ ही उन्होंने बताया, ''हमने बहुत सारी चीज़े बरामद की हैं इसके बावजूद बहुत बड़े इलाक़े को नक्सलियों के बारूदी सुरंगों से पाट दिया है. अभियान चल रहा है. इस अभियान का नाम 'ऑपरेशन डबल बुल' और 'ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म' रखा गया.''
''माओवादी छापामारों को भी पकड़ा है. अभी बारूदी सुरंगों को हटाने का काम चल रहा है. इसमें बड़ी मेहनत और सहस का परिचय दिया है अधिकारियों और जवानों ने."

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नक्सल विरोधी अभियान के महानिरीक्षक अमोल होमकर का कहना है कि राज्य के कोल्हान, सारंडा और सिंहभूम में भी सुरक्षा बलों को बहुत कामयाबी मिली है.
बीबीसी को झारखंड के पुलिस महानिदेशक ने बताया कि झारखंड में चल रहे अभियान ही वजह से ही माओवादियों को एक के बाद एक बड़े झटके लगते जा रहे हैं.
वो बताते हैं कि पिछले साल 21 नवंबर को माओवादियों के दूसरे सबसे बड़े नेता प्रशांत बोस उर्फ़ 'किशन दा' की गिरफ़्तारी हुई जिन पर एक करोड़ रूपए का इनाम रखा गया था.
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सबसे बड़े नेता यानी महासचिव नम्बला केशव राव उर्फ़ बसावराज के बाद प्रतिबंधित संगठन में उनका दूसरा स्थान था.
उसी तरह माओवादियों की केंद्रीय कमिटी की शीला मरांडी, प्रद्युमन शर्मा, नन्दलाल सोरेन, रमेश गंजू, बलराम उरांव और भीखन गंजू जैसे बड़े माओवादी कमांडरों की अलग-अलग स्थानों पर हुईं मुठभेड़ों के दौरान गिरफ्तारियाँ हुईं.
जबकि राधेश्याम यादव, जीवन कनडूलना और सुरेश मुंडा जैसे छापामारों के कमांडरों ने पुलिस और सुरक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. इन सभी पर भारी-भरकम इनाम घोषित किए गए थे.
आंतरिक सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री के सलाहकार रह चुके वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी के. विजय कुमार कहते हैं कि अब लड़ाई का केंद्र छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर के जिलों में सिमटा हुआ है.
यही वो इलाक़े हैं जहां माओवादी सबसे ज़्यादा मज़बूत हैं और इनसे निपटना पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है.
उनका कहना था - छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर के अलावा नारायणपुर इस वक़्त देश में नक्सली हिंसा के सबसे ज़्यादा संवेदनशील इलाक़े हैं.

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लेकिन नक्सल विरोधी अभियान की अगुआई कर रहे बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक पी सुंदरराज कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि भौगोलिक रूप से ये दुर्गम इलाक़े हैं.
बीबीसी से बात करते हुए वो बताते हैं कि किस तरह नक्सली बारूदी सुरंग बना रहे हैं और घने जंगलों का फायदा उठाते हैं. यही वो इलाक़े हैं जहां सुरक्षा बलों को सबसे ज़्यादा नुकसान का सामना करना पड़ता है.
बीबीसी से बात करते हुए उनका कहना था, "हम इन इलाकों में आगे बढ़ रहे हैं और कैंप स्थापित कर रहे हैं. ये दुर्गम इलाक़े हैं इसलिए माओवादियों की 'सप्लाई चेन' और उनके निकलने के रास्ते हमने घेर रखे हैं. इन इलाकों में ज़्यादा दिनों तक माओवादी डेरा नहीं डाल सकते. ख़ास तौर पर नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाक़े में."

छत्तीसगढ़ में कई नक्सली छापामारों ने आत्मसमर्पण भी किया है लेकिन बस्तर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक पी सुंदरराज कहते हैं कि बड़े नेता या कमांडर तेलंगाना में आत्मसमर्पण कर रहे हैं.
सुंदरराज कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण का पैकेज ज्यादा आकर्षक है, जो माओवादी कमांडर तेलंगाना या आंध्र के रहने वाले हैं वो वहीं जाकर आत्मसमर्पण कर रहे हैं ताकि वो अपनी जगह, अपने गाँव या शहर में पुनर्वासित हो पाएँ. गोंड आदिवासी हों या कोया आदिवासी, छत्तीसगढ़ के लोग यहीं आत्म समर्पण कर रहे हैं.
वे कहते हैं, "समर्पण इसलिए हो रहा है क्योंकि वो घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं और नए-नए कैंप जो सुरक्षा बल स्थापित कर रहे हैं उसकी वजह से उनकी मुश्किलें बढ़ रहीं हैं. इन कैंपों को 'फॉरवर्ड ऑपरेशनल बेस' कहते हैं."
दूसरी ओर, प्रतिबंधित संगठन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के प्रवक्ता अभय के बयान में कहा गया है कि पिछले साल मार्च महीने से लेकर अब तक 35 'फॉरवर्ड ऑपरेशन बेस' स्थापित किए हैं.
माओवादियों का ये भी आरोप है कि पुलिस जंगल के ग्रामीण इलाकों में ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है और उनके ज़रिये जंगलों में बम भी गिरा रही है. वो आरोप लगाते हैं कि इन नए कैम्पों से आम आदिवासियों को डराया जा रहा है.

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जहाँ तक रही बात आत्मसमर्पण की तो हाल ही में हैदराबाद में तेलंगाना पुलिस के महानिदेशक महेंद्र रेड्डी ने पत्रकारों के सामने माओवादी कमांडर उषा रानी को पेश करते हुए बताया कि उन्होंने तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था जबकि उन पर छत्तीसगढ़ की सरकार ने इनाम घोषित किया हुआ था.
उनके ख़िलाफ़ छत्तीसगढ़ में कई बड़ी वारदातों में शामिल होने के मुकदमे दर्ज हैं.
तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक महेंद्र रेड्डी ने पत्रकारों से बात करते हुए ये भी कहा कि छत्तीसगढ़ की दंडकारण्य स्पेशल एरिया कमिटी के सचिव रमन्ना, अक्किराजू हरगोपाल और्यापा नारायण जैसे कमांडरों की बीमारी से मौत हो गई है जिसकी वजह से संगठन को झटका ज़रूर लगा है और वो पहले से बहुत ज्यादा कमज़ोर भी हुआ है और उसके कैडरों का मनोबल भी गिरा है.
रेड्डी के अनुसार भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की केंद्रीय कमिटी या 'पोलितब्यूरो' के 'कम से कम 11 ऐसे बड़े नेता हैं जो तेलंगाना के रहने वाले हैं.
उनका कहना था, "इनमें से पूर्व महासचिव मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ़ 'गणपति', सत्यानारयाना रेड्डी उर्फ़ 'कोसा' और कटकम सुदर्शन उर्फ़ 'आनंद' बहुत बीमार हैं और बहुत बुरी हालत में छत्तीसगढ़ में छिपे हुए हैं. ऐसा हमें पता चला है. हम उनसे कहना चाहेंगे कि वो जल्द आत्मसमर्पण कर दें."
तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक ने दावा किया कि माओवादियों की तेलंगाना राज्य की कमिटी भी छत्तीसगढ़ से संचालित हो रही है.
उसी तरह छत्तीसगढ़ से लगे महाराष्ट्र के गडचिरौली में माओवादी कमांडर दीपक तेलतुम्बडे की भी मुठभेड़ में मौत हो गई जिसके बाद पुलिस का दावा है कि कई माओवादियों ने उनके समक्ष आत्मसमर्पण किया है.
लेकिन माओवादियों के दस्तावेज़ में दावा किया गया है कि, "सिर्फ़ गडचिरौली के इलाक़े में प्रशासन ने छह हज़ार की संख्या में मुखबिरों की नियुक्ति की है. माओवादियों पर पुलिस का हमला बड़ा दिख सकता है मगर ये राजनीतिक कमजोरी दर्शाता है क्योंकि ऐसा कोर्पोरेट घरानों और पूंजीपतियों के इशारे पर हो रहा है."
वैसे माओवादियों ने आत्मसमर्पण करने वाले अपने नेताओं और कैडरों को 'कायर' की संज्ञा दी है.
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