ईरान और इसराइल के बीच संघर्ष भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती है

अयातुल्लाह अली ख़ामनेई, नरेंद्र मोदी और बिन्यामिन नेतन्याहू

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    • Author, प्रियंका झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अप्रैल की पहली तारीख़ से ही ईरान और इसराइल के बीच बढ़ी तनातनी के अब मध्य पूर्व के बाहर फैलने की आशंका बढ़ गई है.

बीते सप्ताह ईरान ने इसराइल पर 300 से अधिक ड्रोन और मिसाइलों से हमले का दावा किया.

एक अप्रैल को सीरिया के दमिश्क में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमले के बाद से ही इसकी आशंका जताई जा रही थी. ईरान ने इस हमले के लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया था.

हालांकि, इसराइल ने अभी तक इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है लेकिन शुक्रवार को अमेरिका ने कहा है कि इसराइल ने ईरान पर मिसाइल से हमला किया, जिसके बाद इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

जानकारों का मानना है कि भारत के लिए ये स्थिति और परेशानी वाली हो सकती है क्योंकि ईरान और इसराइल दोनों से उसके अच्छे संबंध हैं.

साथ ही पश्चिमी एशियाई देशों में अच्छी-खासी तादाद में भारतीय भी रहते हैं. उनका मानना है कि ईरान और इसराइल का संघर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है.

भारत पर क्या होगा असर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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ईरान के हमले के बाद ही भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर के चिंता जताते हुए दोनों मुल्क़ों से कूटनीतिक रास्ते पर चलने के लिए कहा था.

भारत ने अपने नागरिकों के लिए ट्रैवल एडवाइज़री जारी की थी और इन दोनों देशों की यात्रा नहीं करने के लिए कहा था.

जानकार मानते हैं कि ईरान और इसराइल के संघर्ष के बीच भारत की सबसे बड़ी चुनौती इन देशों और पश्चिमी एशिया के अन्य देशों में रह रहे अपने लाखों नागरिकों की सुरक्षा है.

भारत सरकार ने ट्रैवल एडवाइज़री जारी कर के इसराइल और ईरान की यात्रा करने को लेकर कोई पाबंदी नहीं लगाई है लेकिन एहितायतन नागरिकों से यात्रा करने से बचने को कहा है.

इस समय इसराइल में करीब 18 हज़ार भारतीय हैं जबकि ईरान में पाँच से 10 हज़ार भारतीय रह रहे हैं.

भारत की ट्रैवल एडवाइज़री

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हमास के साथ जंग शुरू होने के बाद इसराइल में निर्माण क्षेत्र में काम करने वालों की सख़्त कमी हो गई है. इस कमी को पूरा करने के लिए भारत सरकार और इसराइल सरकार के बीच हुए समझौते के अंतर्गत उत्तर प्रदेश और हरियाणा से 10 हज़ार श्रमिक स्क्रीनिंग के बाद इसराइल भेजे जाने थे.

हरियाणा से करीब 530 श्रमिक इसराइल जा चुके हैं. लेकिन भारत सरकार की ट्रैवल एडवाइज़री के बाद बाकी बचे लोगों के इसराइल जाने की योजना अधर में लटक गई है.

इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स से जुड़े सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्ज़ुर्रहमान कहते हैं, "हमारे 90 लाख से एक करोड़ लोग पश्चिमी एशिया के देशों में रहते हैं, जो हर साल करीब 50 से 55 लाख डॉलर की राशि भारत भेजते हैं. भारत को तेल देने वाले शीर्ष देश जैसे सऊदी अरब और ईरान पश्चिमी एशिया में हैं. अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो ये निश्चित तौर पर भारत के लिए परेशानी हो सकता है."

वहीं, जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के फ़ैकल्टी मेंबर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं कि ग़ज़ा में जारी इसराइली कार्रवाई के जवाब में हूती विद्रोहियों के लाल सागर में हमले बढ़े.

इससे कारोबारी मार्ग पर असर पहले से ही दिख रहा है और अब अगर ईरान और इसराइल के बीच जंग जैसे हालात बने तो फिर भारत के लिए लंबे समय तक तटस्थता वाली नीति पर बने रहना भी मुश्किल हो सकता है.

वीडियो कैप्शन, ग़ज़ा में जंग को लेकर आईसीजे ने इसराइल से क्या कहा?

ईरान पर इसराइल के हमले की पुष्टि के बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और सोने की कीमतें बढ़ी हैं.

शुक्रवार को एशिया में कच्चे तेल की कीमतों में तीन फीसदी इजाफ़ा देखने को मिला. कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल करीब 90 डॉलर तक पहुंच गई.

वहीं सोने की कीमत नया रिकॉर्ड छूते हुए 2400 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई.

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं कि तेल के दाम बढ़ने से पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है.

आप लोकसभा चुनाव के दौर में हैं और अगर महंगाई बढ़ती है तो इसका सीधा असर आपकी चुनावी राजनीति पर पड़ता है, जो भारत नहीं चाहेगा.

वह कहते हैं कि भारत तेल के लिए अफ़्रीकी देशों का रुख कर सकता है लेकिन ये ज़रूर है कि ईरान से सस्ता तेल मिल सकता था, जो अभी नहीं मिल पाएगा.

भारत के लिए ये कितनी बड़ी कूटनीतिक चुनौती?

विदेश मंत्रालय का बयान

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ईरान के इसराइल पर हमले के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके चिंता ज़ाहिर की और कहा कि क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखना महत्वपूर्ण है.

भारत ने कहा कि हम संयम बरतने और तत्काल हिंसा से पीछे हटकर कूटनीति के रास्ते से हमल निकालने का आह्वान करते हैं.

जानकारों का मानना है कि भारत की ओर से दी गई प्रतिक्रिया उसकी विदेश नीति में असमंजत की स्थिति को दिखाता है.

डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा का मानना है कि ईरान पर पहले भी अमेरिकी प्रतिबंध रहे हैं लेकिन अभी स्थिति इससे अलग है. अब अगर भारत इसराइल के साथ अपने संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है तो ईरान के साथ आपके रिश्ते बहुत खराब हो सकते हैं और अगर उसने ईरान से करीबी दिखाई तो उसे इसराइल के साथ ही अमेरिका की भी नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है.

वह कहते हैं, "भारत की ओर से इस संकट पर ज़्यादा बयानबाज़ी से बचना भी एक संकेत है कि भारत में भी एक पसोपेश वाली स्थिति बनी हुई है. ये असमंजस वाली स्थिति किसी भी देश की विदेश नीति में चुनौती नहीं बल्कि संकट है. ये मेरी नज़र में भारत के लिए डिप्लोमैटिक क्राइसिस है. क्योंकि भारत की विदेश नीति इस तरह के मसलों में तटस्थता को ज़्यादा देखती है. भारत पूरी तरह से ईरान और इसराइल के बीच फंसा हुआ है."

भारत के ईरान और इसराइल से रिश्ते

इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू के साथ मोदी

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डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं कि भारत के लिए ये आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति है. उनका कहना है कि तनाव बढ़ने से भारत के लिए इस मामले में चुप्पी बनाए रखना या लंबे समय तक तटस्थ रहना मुश्किल हो सकता है.

इसराइल के साथ भारत के राजनयिक संबंधों का इतिहास बहुत लंबा नहीं है.

इसराइल 1948 में एक देश के तौर पर अस्तित्व में आया लेकिन भारत ने 1992 में उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए. हालांकि, इसके बाद से भारत के इसराइल के साथ संबंध दिनोंदिन मज़बूत होते चले गए.

अब इसराइल भारत को हथियार और तकनीकी निर्यात करने वाले शीर्ष देशों में से एक है.

इसके उलट ईरान के साथ भारत के पुराने रिश्ते हैं. ईरान भारत को तेल आपूर्ति करने वाले शीर्ष देशों में से एक था. ईरान पर उसके परमाणु कार्यक्रम की वजह से लगे अंतराष्ट्रीय प्रतिबंधों से पहले भारत को तेल निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश ईरान था.

अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों के बावजूद भारत ने ईरान के साथ संबंधों को संतुलित बनाए रखा है. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसी साल ईरान का दौरा किया था. इस दौरान चाबहार बंदरगाह पर भी चर्चा हउई थी.

मध्यस्थता कर सकता है भारत?

इसी साल जनवरी में ईरान के दौरे पर गए थे विदेश मंत्री एस जयशंकर

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चाबहार पोर्ट के निर्माण में भारत ने निवेश किया है. सामरिक दृष्टि से ये बंदरगाह भारत और ईरान दोनों के लिए महत्वपूर्ण है.

इस पोर्ट के ज़रिए ईरान को पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के असर को कम करने में मदद मिलेगी.

वहीं, भारत को अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के साथ व्यापार करने के लिए पाकिस्तान के रास्ते से होकर नहीं जाना होगा.

भारत में ईरान के राजदूत ईराज इलाही ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि भारत को ग़ज़ा में युद्ध को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के ज़रिए अपनी सक्रिया भूमिका निभानी चाहिए.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: क्या अमेरिका की कोशिश से ग़ज़ा में होगी शांति

हालांकि, ईराज इलाही ने ईरान-इसराइल के बीच मध्यस्थता का ज़िक्र नहीं किया. लेकिन अगर ऐसा मौका आए तो ये भारत के लिए आसान नहीं होगा.

डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, "ईरान और इसराइल के बीच सबसे बड़ी समस्या ये है कि ये दोनों देश विचारधारा के आधार पर चलते हैं. दोनों के बीच एकराय बनाना आसान नहीं है. जैसे ईरान का स्पष्ट मानना है कि फ़लस्तीन के मुद्दे का हल निकाले बिना इसराइल को मान्यता नहीं दी जा सकती."

"वहीं, भारत द्वि-राष्ट्र समाधान को मानता है. भारत हमास के इसराइल पर हमले को आतंकवादी अटैक मानता है, जो ईरान नहीं मानता. ऐसे में एकमत होना मुश्किल है."

हालांकि, उनका मानना है कि इतने सारे मुद्दे आपस में उलझे होते हैं, तो एक सीधा जवाब नहीं हो सकता, ख़ासकर तब जब आप जून तक पूरी तरह से चुनावी मोड में हों.

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