इस विषय के अंतर्गत रखें मई 2009

खुरंट मत खुरचना !

090531061203_golden_temple226.jpgये बात है जून 2004 की....

जब मैं चंडीगढ़ से जुड़े शहर मोहाली के एक गर्ल्स हॉस्टलनुमा स्कूल में गया तो ऑपरेशन ब्लू स्टार को हवाएँ बीस बरस पीछे फेंक चुकी थीं.

इस हॉस्टलनुमा स्कूल में वे बच्चियां पल, बढ़ और पढ़ रहीं हैं जो सरकारी खातों में ख़ालिस्तानी दहशतगर्दों की औलाद और सिख समाज में शहीदों की बच्चियों के तौर पर जानी जाती हैं.

इनमें से दो बच्चियां अक्सर बात करते-करते आँसू पीने की कोशिश में रुक-रुक जाती थीं.

आज जून 2009 शुरू होने वाला है. हवाओं ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को और पांच बरस पीछे फेंक दिया है.

इस दफ़ा मैं मोहाली ना जा सका. मगर मुझे यक़ीन है कि वे दो बच्चियां जिनके नाम इस वक़्त मुझे याद नहीं आ रहे, अब अपने बच्चों के साथ किसी पुरसुकून से घर में बैठी हँस खेल रही होंगी. क्योंकि इन बच्चियों की वॉर्डन ने बताया था कि हम इन दोनो बच्चियों की अगले पांच छह महीने में बड़ी अच्छी जगहों पर शादियां करवा रहे हैं.

इसी हॉस्टल में नन्हीं सी कृपाण गले में लटकाए 14-15 बरस की प्रीत कौर ने ग़ुस्से से अपने गाल लाल करते हुए बड़े जोश से बताया था कि मैं अपने बापू के क़ातिलों को कभी नहीं भूलूंगी. मैंने शहद चखकर, क़सम खाकर ये कृपाण लटकाई है और ये तब भी मेरे गले से नहीं उतरेगी जब मैं डॉक्टर बन जाऊँगी....

मुझे यक़ीन है कि अब वो ग़ुस्से से जूझती नाज़ुक सी बच्ची या तो डॉक्टर बन चुकी होगी या फिर बनने वाली होगी. मुझे यक़ीन है कि दोनो ही सूरतो में अब प्रीत कौर के गले में लटकी नन्हीं-मुन्नी सी कृपाण स्टेथोस्कोप में बदल चुकी होगी.

मौंटी सिंह परवाना इस वक़्त दिल्ली के ख़ान मार्केट के क़रीब रेन्ट-ए-कार के काउंटर पर बैठता है. मौंटी आज 25 बरस बाद भी बड़े जोश से क़सम खाकर बताता है कि उसके बाप का संत जरनैल के जत्थे या सियासत से न लेना एक था न देना दो. वो तीन जून को गोल्डन टेम्पल में सैंकड़ों दूसरे यात्रियों की तरह फ़ौज के घेरे में फँस गया था और फिर सैंकड़ों लाशों में उसकी लाश भी शामिल हो गई.

मौंटी सिंह कहता है कि उस वक़्त मैं साढ़े छह बरस का था. मुझे याद है कि जब बाप की मौत की पुष्टि हो गई तो माँ ने मुझे पल्लू में छुपाकर ज़ोर से भींच लिया था. वो दिल्ली आना चाहती थीं मेरे मामा के पास. मगर बात टलती गई. अच्छा ही हुआ. वरना हम भी उस दिन दिल्ली में होते जिस दिन इंदिरा गाँधी को दो सरदारों ने मारा था.... आज मेरे दोनों बच्चे अपने दादा को मुझ से ज़्यादा जानते हैं.

वाहे गुरू की कृपा से धंधा भी अच्छा चल रहा है.... बस कभी-कभी बड़े ज़ोर से हौल उठता है कि ये सब न होता तो कितना अच्छा था.

पर अच्छी बात ये है कि ज़ख़्म चाहे कैसा ही हो, खुरंट आ ही जाता है... कुछ लोग अपने ज़ख़्मों का खुरंट बार-बार खुरच लेते हैं. पर हम सिख ऐसा नहीं करते..आगे बढ़ जाना ही ठीक है... खुरंट से ज़्यादा छेड़-छाड़ अच्छी नहीं होती...तकलीफ़ लंबी हो जाती है....

मौंटी मुझसे मुख़ातिब है. कहता है- आप सुनाओ... आपको फ़ुल-डे के लिए गाड़ी चाहिए या हाफ़-डे के लिए... कब तक हो यहां... पाकिस्तान कब जाओगे..... अब तो आपके देश में भी ऑपरेशन ब्लू स्टार वाला गोल्डन टेम्पल बन गया है.... है कि नहीं.

ये कैसा देवबंद है?

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मैंने पिछले हफ़्ते दो दिन उत्तर प्रदेश के क़स्बे देवबंद में गुज़ारे. वही देवबंद जिसने पिछले डेढ़ सौ वर्षों में हज़ारों बड़े-बड़े सुन्नी उलेमा पैदा किए और जिनके लाखों शागिर्द भारतीय उप-महाद्वीप और दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए हैं.

आज भी दारुल-उलूम देवबंद से हर साल लगभग चौदह सौ छात्र आलिम बन कर निकलते हैं.

देवबंद, जिसकी एक लाख से ज़्यादा जनसंख्या में मुसलमान 60 प्रतिशत हैं. वहाँ पहुँचने से पहले मेरी ये परिकल्पना थी कि ये बड़ा सूखा सा क़स्बा होगा, जहाँ उलेमा की तानाशाही होगी और उनकी ज़ुबान से निकला हुआ एक-एक शब्द इस इलाक़े की मुस्लिम आबादी के लिए अंतिम आदेश का दर्जा रखता होगा, जहाँ संगीत के बारे में गुफ़्तगू तक हराम होगी, हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को दूर-दूर से हाथ जोड़ कर गुज़र जाते होंगे, वहाँ किसी की हिम्मत नहीं होगी कि बग़ैर किसी डाँट-फटकार के बिना दाढ़ी या टख़नों से ऊँचे पाजामे के बिना वहाँ बसे रह सकें. देवबंद में मुसलमान मुहल्लों में अज़ान की आवाज़ सुनते ही दुकानों के शटर गिर जाते होंगे और सफ़ेद टोपी, कुर्ता-पाजामा पहने दाढ़ी वाले नौजवान डंडा घुमाते हुए ये सुनिश्चित कर रहे होंगे कि कौन मस्जिद की ओर नहीं जा रहा है.

इसीलिए जब मैंने सफ़ेद कपड़ों में दाढ़ी वाले कुछ नौजवानों को देवबंद के मदरसे के पास एक नाई की दुकान पर शांति से अख़बार पढ़ते देखा तो फ़्लैशबैक मुझे उस मलबे के ढेर की ओर ले गया जो कभी हज्जाम की दुकान हुआ करता था.

जब मैंने टोपी बेचने वाले एक दुकानदार के बराबर एक म्यूज़िक शॉप को देखा जिसमें बॉलीवुड मसाला और उलेमा के भाषण और उपदेश पर आधारित सीडी और कैसेट साथ साथ बिक रहे थे तो मेरा दिमाग़ उस दृश्य में अटक गया जिसमें सीडीज़ और कैसेटों के ढेर पर पेट्रोल छिड़का जा रहा है. जब मैंने बच्चियों को टेढ़ी-मेढ़ी गलियों और बाज़ार से होकर स्कूल की ओर जाते देखा तो दिल ने पूछा यहां की लड़कियों के साथ स्कूलों में किसी को बम लगाने का विचार अब तक क्यों नहीं आया.

जब मैंने बुर्क़ा पहने महिलाओं को साइकिल रिक्शे में जाते देखा तो मन ही मन पूछने लगा यहां मुहर्रम के बग़ैर महिलाएं आख़िर बाज़ार में कैसे घूम फिर सकती हैं. क्या कोई उन्हें सोटा मारने वाला नहीं.

जब मैंने बैंड बाजे वाली एक बारात को गुज़रते देखा तो इंतज़ार करता रहा कि देखें कुछ नौजवान बैंड बाजे वालों को इन ख़ुराफ़ात से मना करने के लिए कब आँखें लाल करते हुए आते हैं.

जब मुझे एक स्कूल में लंच का निमंत्रण मिला और मेज़बान ने खाने की मेज़ पर परिचय करवाते हुए कहा कि ये फ़लाँ-फ़लाँ मौलाना हैं, ये हैं क़ारी साहब, ये हैं जगदीश भाई और उनके बराबर में हैं मुफ़्ती साहब और वो जो सामने बैठे मुस्कुरा रहे हैं, हम सबके प्यारे लाल मोहन जी हैं..... तो मैंने अपने ही बाज़ू पर चिकोटी काटी कि क्या मैं देवबंद में ही हूँ?

अब मैं वापस दिल्ली पहुँच चुका हूँ और मेरे सामने हिंदुस्तान और पाकिस्तान का एक बड़ा सा नक़्शा फैला हुआ है, मैं पिछले एक घंटे से इस नक़्शे में वो वाला देवबंद तलाश करने की कोशिश कर रहा हूँ जो तालेबान, सिपाहे-सहाबा और लश्करे-झंगवी जैसे संगठनों का देवबंद है.

शाम तक क्या बेचें!

जो फटीचर लतीफ़ा मैं आपको सुना रहा हूँ. ये लतीफ़ा पाकिस्तान में पठानों पर और भारत में सरदारों पर रखकर सुनाया जाता है.

एक सरदार जी/ख़ान साहब, तेज़ गर्मी में ठेले पर फ़ालसे बेच रहे थे. एक ग्राहक आया, पूछा भाई साहब फ़ालसे क्या हिसाब बेच रहे हो. ठेले वाले ने कहा 70 रुपये किलो. ग्राहक ने कहा सब तौल दो. रेहड़ी वाले ने कहा कि सब फ़ालसे तुम ले गए तो शाम तक क्या बेचूंगा!!!

अब आप पूछेंगे यह वर्षों पुराना लतीफ़ा सुनाने का क्या मतलब है??? मतलब यह है कि मुझ जैसे सैंकड़ों पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों को सोलह मई के नतीजों की वजह से भारतीय जनता से मायूसी हुई है.

हम तो पिछले दो महीने से यह सोच कर अपने क़लम के भाले और ज़ुबानों की छुरियाँ तेज़ किए बैठे थे कि हिसाब-किताब, आँकड़े और सितारों की चाल बता रही है कि किसी भी पार्टी को चुनावों में बहुमत नहीं मिलेगा.

ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनेताओं में ख़ूब जूता चलेगा. धौंस और घूस से काम लिया जाएगा. तब कहीं जा कर 15-20 दिन बाद एक ऐसी सरकार की शकल उभरेगी जो शायद दो ढाई साल भी न निकाल पाए. फिर मध्यावधि चुनाव होंगे और फिर हम मीडिया वालों का धँधा चमकेगा.

मगर भोले वोटरों को शायद अंदाज़ा ही नहीं कि उसने हमारे अंदाज़ों पर बर्फ़ीला पानी उंडेल कर मीडिया को कितना नुक़सान पहुँचाया है.

वोटरों की इस हरकत से अगले 15-20 दिन तक की योजना बनाने वाले चैनलों, और समाचार पत्रों से जुड़े सैंकड़ो राजनीतिक टीकाकारों, विश्लेषकों, लेखकों, ग्राफ़िक डिज़ाइनरों, हाई प्रोफ़ाइल ऐंकरों, कैमरामैनों, कैमरे के आगे खड़े होकर नए राज़ खोलने की आदत में लगे रिपोर्टरों और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की दौड़ में हिस्सा लेने वाले संपादकों के करोड़ों रुपये डूब गए जो उन्हें फ़ीस और आने-जाने के ख़र्चे के रुप में मिल सकते थे.

हम सबके दिल में अरमान था कि आने वाले कई दिनों तक हाथी का चीटियों के साथ, शेर का बकरी के साथ और बिल्ली का चूहे के साथ राजनीतिक तोड़-जोड़ बैठाएं. रंगीन ग्राफ़िक्स और टिप्पणियों की मदद से अपनी-अपनी मनपसंद सरकार बनाएंगे, मिटाएंगे और फिर बनाएंगे. ख़ुद भी मज़े लेंगे और देखने, सुनने और पढ़ने वालों को भी मज़ा करवाएंगे.

लेकिन 15-20 दिन तक जो सर्कस लगना था वो 16 मई की शाम तक शामियाने के बाँस के साथ गढ़ने से पहले ही लद गया.

और अब हम सब मीडियाकर्मी विश्लेषक 46 डिग्री सेल्सियस में सच्चाई के तपते सूरज तले वोट के फ़ैसले की गर्म ज़मीन पर बैठे ये सोच रहे हैं कि सारे फ़ालसे वोटर ले गया, अब शाम तक क्या बेचें!

लेकिन मायूसी की कोई बात नहीं. गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में. 2004 में भी यही हुआ था. आने दें 2014 के चुनाव. हमने भी फ़ालसे की जगह तरबूज़ और कटहल का ठेला न लगाया तो नाम बदल देना. यह वोटर ख़ुद को आख़िर समझता क्या है!!!

उफ़! तुम्हारे ये उसूल

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|मंगलवार, 19 मई 2009, 13:36

टिप्पणियाँ (31)

चुनावी नतीजों ने भारत का राजनीतिक समीकरण कुछ इस तरह बदल दिया है कि जो लोग चुनाव से पहले कांग्रेस के ख़ून के प्यासे थे, अब बग़ैर माँगे ही उसे बिना शर्त समर्थन देने के लिए परेशान घूम रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच दौड़ इस बात की थी कि समर्थन का पत्र राष्ट्रपति तक पहले कौन पहुँचाए. उधर लालू प्रसाद यादव कह रहे हैं कि कांग्रेसी नेता उनकी बेइज़्ज़ती कर रहे हैं, लेकिन वो फिर भी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का साथ देंगे.

और ये सब धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को मज़बूत करने के लिए किया जा रहा है.

उफ़! तुम्हारे ये उसूल, ये आदर्श! सांप्रदायिक ताक़तों से ये नफ़रत, और कांग्रेस से निस्वार्थ प्रेम!

दिल चाहता है कि राष्ट्रपति को समर्थन का एक पत्र मैं भी दे आऊँ. फिर ख़्याल आता है कि मेरे ख़िलाफ़ तो सीबीआई भ्रष्टाचार के किसी मामले की तफ़्तीश नहीं कर रही, तो फिर ज़रूरत क्या है?

जनादेश 2009: एक ऐतिहासिक फ़ैसला

पोस्ट के विषय:

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|रविवार, 17 मई 2009, 09:38

टिप्पणियाँ (28)

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जनादेश 2009 के आकलन से पहले मैं एक चेतावनी देना चाहता हूँ. नतीजों के आकलन में हम तथाकथित विश्लेषक कभी-कभी अति सरलीकरण कर डालते हैं या फिर अतिशयोक्तियों में उलझ जाते हैं. कोशिश करूँगा कि इस आकलन में इन त्रुटियों से बचा जाए.

मैं मानता हूँ कि 2009 के नतीजे ऐतिहासिक हैं और एक लहर का संकेत है इस जनादेश में. आप कहेंगे कि कांग्रेस 200 से ज़्यादा सीटें क्या ले आई आप इसे ऐतिहासिक और लहर इत्यादि की संज्ञा दे रहे हैं.

जी हाँ, आप 2009 का जनादेश वर्तमान के आईने में देखिए विगत के नहीं. दो दिन पूर्व तक क्या हम नहीं कर रहे थे कि जिस दल के पास 150 से ज़्यादा सीटें होंगी वह सरकार बनाने का दावा कर पाएगी. यानी 150 का अंक पुराने ज़माने का 272 था तो 200 से ज़्यादा सीटें इस माहौल में कुछ वैसी ही लहर या 'फ़ील गुड' को जन्म दे रही हैं, जो राजीव गाँधी की 405 सीटों के साथ कांग्रेसजनों को महसूस हुआ था.

ऐतिहासिक चुनाव यह इसलिए नहीं है कि कांग्रेस 200 का आँकड़ा पार कर गई.

यह चुनाव भारतीय राजनीति में इसलिए मील का पत्थर होने का दम भर सकता है क्योंकि इसमें भारतीय मतदाताओं ने राजनेताओं और राजनीतिक पंडितों, सभी के अनुमानों को धता बताते हुए जाति, धर्म और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर वोट डाला.

मतदाताओं ने राजनेताओं द्वारा बिछाई गई शतरंजी बिसात को ही जैसे उलटकर रख दिया. उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि चुनावी गणित और जीत के फ़ॉर्मूलों पर अपनी महारत समझने वाले राजनीतिज्ञों को कहीं न कहीं वह विकास, जवाबदेही, ईमानदारी और अच्छाई की कसौटी पर परखेगा और ज़रूरत पड़ने पर नकार देगा.

हो सकता है कि यह मेरे मन के कवि की नासमझ उड़ान हो पर 2009 का जनादेश शायद जाति-धर्म से ऊपर, भविष्य और विकासोन्मुख, एक नए भारत के निर्माण की ओर इशारा कर रहा है जिसमें प्रमुख भूमिका युवा ऊर्जा कि होगी न कि सत्ता के ठेकेदारों की.

सत्ता के ठेकेदारों की बात चली है तो फ़िलहाल उनकी हालत दयनीय है. एक मित्र ने कहा कि यकायक जैसे इन लोगों की दुकानें बंद हो गई हैं. जनादेश 2009 ने 'किंगमेकर्स' होने का गुमान रखने वालों को फ़िलहाल तो बेरोज़ग़ार कर दिया है.

ख़ैर, सत्ता के ठेकेदारों पर इतनी जल्दी मैं श्रद्धा-सुमन नहीं चढ़ाना चाहता. उनमें एक ख़ास तरह की 'सर्वाइवल स्किल्स', बेशर्मी और किसी का भी मन ललचाने जैसी क्षमता होती है, जिससे सत्ता चाहते हुई भी स्वयं को उनसे दूर नहीं रख पाती.

पर फिर भी पिछली दो सरकारों में कम से कम छोटे दलों और सत्ता के दलालों की तो चाँदी हो गई थी, वह सिलसिला फ़िलहाल कुछ थमता नज़र आ रहा है.

राजनीतिक टिप्पणी इन चुनाव नतीजों पर विस्तार से फिर कभी. लेकिन कुछ बातें तो तय है. राहुल का कांग्रेस में उदय और कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में पुनर्जन्म.

बीजेपी आने वाले दिनों में नेतृत्त्व के अकाल से जूझेगी पर हार के सही कारणों तक पहुँच, सकारात्मक आत्ममंथन कर पाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता. उन्हें समझना होगा कि भारतीय युवा मतदाता ने नकारात्मक और विगत में देखने वाली सोच को नकारा है.

वामदलों को भी ज़बरदस्त आत्मनिरीक्षण करना होगा और उनके पास भी कोई आसान उत्तर नहीं होंगे. क्षेत्रीय पार्टियाँ भी थोड़ा समय तो अपने ज़ख़्मों पर पर मरहम लगाने का ही काम करेंगी.

पर जैसा मैंने कहा, इन सब पर विस्तार से चर्चा फिर कभी. आज जनादेश 2009 के सही और ज़्यादा महत्त्वपूर्ण संदेश को समझने, स्वीकारने और शायद उसे सेलिब्रेट करने की ज़रूरत है.

न सिर्फ़ जाति, धर्म और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर बल्कि दलगत राजनीति से भी कहीं स्वयं को अलग रखकर.

जनादेश और राजनीतिक हलकों की हलचल

पोस्ट के विषय:

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|शनिवार, 16 मई 2009, 03:23

टिप्पणियाँ (24)

19:00 IST

कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए के पास चुनाव परिणामों के आखिरी आकड़े आने तक 250 सीटों से ज़्यादा की ताकत हो जाएगी. कुछ ऐसे निर्दलीय भी यूपीए के साथ खड़े दिखेंगे जो पहले भी सरकार के साथ रहे हैं. इस तरह आंकड़ा 260 को पार कर जाएगा. हालांकि अभी भी यह बहुमत के 272 के पाले से पहले ही रुका रहेगा.

लालू प्रसाद भी अपने गिने-चुके सांसदों के साथ यूपीए के समर्थन में खड़े होंगे. आंकड़ा अभी भी 272 से नीचे होगा पर यूपीए के मैनेजरों को यह ज़्यादा विचलित नहीं करेगा. फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी या वाममोर्चे में से किसी से भी समर्थन लेने का मन बना रही है.

कांग्रेस के पास इस नई अल्पमत सरकार के लिए एक उदाहरण भी है और वो है नरसिम्हाराव के कार्यकाल की कांग्रेस सरकार का. यह सरकार अल्पमत में रहते हुए भी अपना कार्यकाल पूरा करके गई थी क्योंकि इस सरकार का पतन सरकार के बाहर बैठे कुछ दलों के लिए लाभप्रद नहीं था.

इस संसद में भी ऐसे दल हैं ही जिनके लिए कांग्रेस की अल्पमत में ही सही, सत्तासीन सरकार का गिरना ठीक नहीं होगा क्योंकि ऐसी स्थिति में उनके लिए कांग्रेस का और प्रभावी होकर सत्ता में लौटने का ख़तरा है.

इन्हीं बातों की पृष्ठभूमि में यूपीए के मैनेजर बिन बुलाए दलों या आगे चलकर कष्टप्रद हो सकने वाली पार्टियों से फिलहाल किनारा किए हुए हैं. फिर चाहे वो वाममोर्चा हो या फिर कोई अन्य क्षेत्रीय दल.

इस चुनाव से एक और संकेत मिल रहा है. मतदाता ने नकारात्मक प्रचार में लगी भाजपा और वाममोर्चे को ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने उस कांग्रेस के लिए वोट देना ज़्यादा बेहतर पाया जिसके पास नेतृत्व के लिए 78 वर्ष का मनमोहन सिंह जैसा अनुभवी व्यक्ति भी था और देश के युवावर्ग के लिए भविष्य की तेज़तर्रार, युवा, और आशावादी पीढ़ी के लिए राहुल गांधी जैसा चेहरा भी था.

इस जनादेश ने तमाम चुनाव विश्लेषकों और राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया है, यह दिखाकर कि लोगों ने कई जगहों पर जाति, संप्रदाय और क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर वोट दिया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक लहर यूपीए के लिए तैयार की जबकि अधिकतर विश्लेषक एक बंटे हुए जनादेश की बात कह रहे थे.

13:40 IST

यह जनादेश चार स्पष्ट संकेत दे रहा है.

सबसे पहला यह कि ताज़ा जनादेश मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के पक्ष में जाता नज़र आ रहा है. हालांकि इससे भी बड़ा संकेत यह है कि देश की राजनीति में आगे का चेहरा राहुल गांधी का है.

फिलहाल कांग्रेस 272 के आंकड़े से दूर है पर लंबे अरसे के बाद लोगों को लग रहा है कि कोई पार्टी है जो इसके पास जा सकती है. लोग एक ऐसी सरकार चाहते हैं जो स्थिरता की ओर ले जाए.

तीसरा यह कि वाममोर्चे के लिए यह चुनाव केरल और पश्चिम बंगाल मे सत्ता से बाहर होने का साफ़ संकेत दे रहा है. साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में इसके खत्म होते महत्व को भी साफ़ सामने ला रहा है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की बढ़त पार्टी के लिए बहुत सकारात्मक संकेत हैं. अबतक चेन्नई के रास्ते दिल्ली की सत्ता तक आने वाली रेल शायद अगले चुनाव में लखनऊ के रास्ते सत्ता की सीढ़ी चढ़े.

11:20 IST

केरल के बाद अब पश्चिम बंगाल से भी वाम मोर्चे के लिए निराश करनेवाले रुझान आने लगे हैं. तो क्या इसे तीन दशक लंबे वाम वर्चस्व की खात्मे का संकेत माना जाए... शायद.

11:00 IST

गुजरात से जो रुझान आ रहे हैं, भाजपा के लिए वो एक अहम संकेत साबित होंगे. इन रुझानों के आधार पर कहा जा सकता है कि हिंदू हृदय सम्राट और विकासपुरुष की छवि वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हो सकते हैं.

यानी वर्ष 2014 में हम नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी पर आधारित आम चुनाव देख सकते हैं.

10:04 IST

मतगणना का ताज़ा रुझान अब यह संकेत दे रहा है कि भारत के मतदाता ने यूपीए के पक्ष में अपना जनादेश दिया है. जनादेश के ताज़े रुझानों ने कई राजनीतिक पंडितों और विश्लेषकों को ग़लत साबित कर दिया है.

ऐसा लग रहा है कि मतदाता ने क्षेत्र, जाति और संप्रदाय के दायरे से ऊपर उठकर मतदान किया है. हालांकि स्थिति अभी भी बदल सकती है पर अभी तक जितनी सीटों का रुझान मिला है, उनमें यूपीए को 50 प्रतिशत से ज़्यादा पर बढ़त मिलती नज़र आ रही है. यह जनादेश बदलेगा, इसके आसार कम दिख रहे हैं.

09:30 IST

बसपा को मिल रही शुरुआती बढ़त यह संकेत दे रही है कि उनके लिए आंकड़ा 40 का पाला छू सकता है. पर सबसे बड़ी ख़बर अबतक की यह है कि कांग्रेस को दक्षिण भारत में अच्छी बढ़त मिल रही है. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल से ऐसे ही संकेत आ रहे हैं. क्या यह ये संकेत दे रहा है कि इसबार ज़्यादा मज़बूत कांग्रेस के साथ यूपीए दोबारा सत्ता संभालेगा.

दूसरा ध्यान देनेवाला रुझान गुजरात से आ रहा है जहाँ कांग्रेस इतनी बहुत बुरी स्थिति में नहीं दिखती. नरेंद्र मोदी के लिए यह एक तकलीफ़देह ख़बर हो सकती है.

08:52 IST

मतगणना का बहुत शुरुआती रुझान सामने आ रहा है पर केरल से शुरुआती रुझानों में वाम मोर्चे को हो रहा नुकसान कांग्रेस नेतृत्ववाले यूपीए गठबंधन के लिए एक अच्छा संकेत माना जा सकता है. ताज़ा रुझान पश्चिम बंगाल और केरल में वाममोर्च को नुकसान होता दिखा रहे हैं. इसका असर तीसरे मोर्च पर पड़ता नज़र आएगा.

चौंकानेवाला रुझान मिल रहा है तमिलनाडु से जहाँ डीएमके और कांग्रेस गठबंधन को बढ़त मिलती नज़र आ रही है. हालांकि अभी बहुत जल्दी है पर क्या यह कोई संकेत देता नज़र आता है.

08:15 IST

ताज़ा रुझानों और परिणामों की प्रतीक्षा अपने चरम पर है. सबको रुझानों, नतीजों का इंतज़ार है पर इस पूरी स्थिति में जिस एक सवाल पर ज़ोरदार कयास और अटकलों का क्रम जारी है, वो है प्रधानमंत्री पद के नाम को लेकर.

देश के दोनों प्रमुख राजनीतिक गठबंधन, एनडीए और यूपीए सरकार बनाने की कवायद में आगे आगे चलने की कोशिश करते नज़र आएंगे पर भाजपा और कांग्रेस के संदर्भ में देखें तो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी इसके लिए इतने बेचैन नहीं होंगे. उनकी मंशा एक स्थाई सरकार बना पाने की होगी. दोनों ही नेता चाहेंगे कि उन्हें सत्ता की भूख में कोई जल्दबाज़ी करते हुए दल के तौर पर न देखा जाए.

कारण उसका साफ़ है. राहुल या मोदी अपनी पार्टी की कमज़ोर सरकार के आने वाले दिनों में भद्द पिटते देखने से ज़्यादा विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे.

विपक्ष में रहते हुए अगर वो अच्छा काम करते हैं तो अगले चुनावों में उन्हें एन्टी-इनकमबैंसी का लाभ मिलता है और वो अपनी पार्टी को चुनावों में विजय दिलवा सीधे प्रधानमंत्री बनते हैं.
इसके ठीक विपरीत अगर इस बार कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनती है तो प्रधानमंत्री बनते हैं मनमोहन या आडवाणी और अगले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को सत्ता में रहने का जो नुक़सान होता है वो राहुल या मोदी को उठाना पड़ेगा.

यह अलग बात है कि ऐसी सोच पार्टी में अन्य नेताओं की नहीं होगी. उन्हें तो सत्ता में रहने से मतलब है. प्रधानमंत्री तो वह इस बार बन रहे हैं न कि अगली बार.

क्या नहीं होगा, इसकी तो पड़ताल करें..

पोस्ट के विषय:

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|शुक्रवार, 15 मई 2009, 18:14

टिप्पणियाँ (13)

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चुनावी नतीजों के इंतज़ार में पत्रकारों ने जो ताने-बाने बुने हैं, जो समीकरण बनाए-बिगाड़े हैं और कितने संभावित गठबंधनों और प्रधानमंत्रियों को सत्ता की चाबी दी है, उसका हिसाब लगाना मुश्किल है. लेकिन शनिवार को मतगणना आरंभ होने के कुछ घंटों बाद कम से कम नतीजों के बारे में तो क़यास लगने बंद हो जाएंगे. पर हमारी बिरादरी का मुँह बंद करना इतना आसान नहीं है.

नतीजों के फ़ौरन बाद अटकलबाज़ी के नए दौर शुरू होंगे. कौन कहाँ जा रहा है, कौन किसे छोड़ रहा है. बनते-बिगड़ते समीकरणों का यह दौर और इसपर हमारी पैनी नज़र हमारी अगली सरकार बनने तक अवश्य टिकी रहेगी.

तो नतीजों के इंतज़ार के इन आख़िरी घंटों में आपको यह बता मैं और बोर नहीं करना चाहता कि क्या होने वाला है.

उस विषय पर तो आपको समुचित रूप से भ्रमित और गुमराह एग्ज़िट पोल, सर्वेक्षण और राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणियों ने कर ही दिया होगा.

चलिए मैं आपको यह बताने की कोशिश करता हूँ कि क्या-क्या नहीं हो सकता.

नीतीश-लालू और पासवान एक ही सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे. मायावती और मुलायम भी संग-संग नहीं बैठेंगे. भाजपा और कांग्रेस का साथ आना असंभव है और वाम दल कुछ भी हो जाए भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन नहीं करेंगे. करूणानिधि और जयललिता भी साथ-साथ नहीं जाएंगे.

वामपंथियों और ममता बनर्जी का एक मंच पर आना मुश्किल है पर आज के माहौल में असंभव नहीं है. यही बात चंद्रबाबू नायडू और कांग्रेस पर लागू होती है. नवीन पटनायक भी कांग्रेस का साथ देते नज़र आ सकते हैं.

चिरंजीवी और विजयकांत सुनहले पर्दे से बाहर निकल इस राजनीतिक दंगल में अपने प्रदर्शन को लेकर इतने चिंतित हैं जितना वो शायद ही अपनी किसी फ़िल्म की रिलीज़ से पहले हुए हों. अगर इन्हें सीट मिलती हैं तो यह किसी भी पक्ष के साथ जा सकते हैं.

एक बात और, लोग बहुत ख़रीद फ़रोख़्त, हॉर्सट्रेडिंग और किसी भी क़ीमत पर सरकार बनाने की कोशिश की बात, आपको अगले कुछ दिनों में करते नज़र आएँगे.

मुझे एक और सूरतेहाल भी नज़र आ रही है. दोनों ही प्रमुख राष्ट्रीय दलों में, जो जनता और पार्टी के आम कार्यकर्ता की नज़र में मनमोहन सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. .... यानी राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी....वह सरकार बनाने के लिए शायद उतना बेताब नहीं हों जितना उनकी पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता.

कारण उसका साफ़ है. राहुल या मोदी अपनी पार्टी की कमज़ोर सरकार के आने वाले दिनों में भद्द पिटते देखने से ज़्यादा विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे.

विपक्ष में रहते हुए अगर वो अच्छा काम करते हैं तो अगले चुनावों में उन्हें एन्टी-इनकमबैंसी का लाभ मिलता है और वो अपनी पार्टी को चुनावों में विजय दिलवा सीधे प्रधानमंत्री बनते हैं.

इसके ठीक विपरीत अगर इस बार कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनती है तो प्रधानमंत्री बनते हैं मनमोहन या आडवाणी और अगले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को सत्ता में रहने का जो नुक़सान होता है वो राहुल या मोदी को उठाना पड़ेगा.

यह अलग बात है कि ऐसी सोच पार्टी में अन्य नेताओं की नहीं होगी. उन्हें तो सत्ता में रहने से मतलब है. प्रधानमंत्री तो वह इस बार बन रहे हैं न कि अगली बार.

ट्रेन ब्लॉग- शहर कुछ कहता है

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सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 12 मई 2009, 14:33

टिप्पणियाँ (32)

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हर शहर कुछ कहता है कि इसमें कौन रहता है.

18 दिनों में आठ शहर घूमने के बाद ये तो मैं कह सकता हूँ लेकिन साथ ही ये भी कह सकता हूँ कि अब हर शहर एक जैसा दिखता है.

चाहे अहमदाबाद हो या मुंबई या फिर हैदराबाद, कोलकाता, भुवनेश्वर, पटना या फिर इलाहाबाद कुछ बातें अब हर शहर की एक जैसी हो गई हैं.

अगर आँखों पर पट्टी बाँध कर किसी शहर में उतार दिया जाए और अचानक पट्टी खोली जाए तो बिना पूछे बताना मुश्किल होगा कि आप कौन से शहर में हैं.

कारण हर शहर का मुख्य बाज़ार ब्रांडेड दुकानों से भर चुका है. वही मैकडोनाल्ड्स, वही पिज्ज़ा हट, बड़े बड़े एयरकंडीशंड मॉल्स जिसमें वही नाइकी-रीबॉक की दुकानें दर शहर में दिखती हैं.

एक तरह से ये अच्छा ही है क्योंकि जो चीज़ें जिस क़ीमत पर दिल्ली या मुंबई वाले को मिलती हों वही पटना में मिले तो बुरा क्या है लेकिन पटना की पहचान उसमें गुम होकर रह जाए तो फिर ये मुश्किल है.

लेकिन क्या ऐसा होता है. मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि अभी ऐसा हुआ नहीं है लेकिन आने वाले दिनों में शायद हो सकता है.

अगर आपको हैदराबाद की बिरयानी खानी हो या फिर चारमीनार के पास का दोसा, कोलकाता की पानी पूरी, रसगुल्ले या मछली या फिर इलाहाबाद की कचौरियां आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी लेकिन मैकडोनाल्ड का बर्गर खाना हो तो वो आपको आसानी से इन सभी जगहों पर मिल जाएगी.

वैश्वीकरण के बाद विकास हुआ है और ये बुरी बात नहीं हो सकती है. हां ये बुरी बात होगी जब मुझे इलाहाबाद में नेतराम की कचौरियां नहीं मिलेंगी या पटना में लिट्टी चोखा के लिए दर दर भटकना पड़ेगा.

यही बात कपड़ों पर भी लागू होती है. स्थानीय कपड़ों या आभूषण मसलन हैदराबाद की चूडियां हो या फिर कोलकाता की बालूचरी साड़ी के लिए भी आपको थोड़ा प्रयास करना पड़ता है लेकिन डिजाइनर कपड़े अपने होर्डिंग बैनरों से आपको आकर्षित कर लेते हैं.

अपनी इस यात्रा में मैंने ये महसूस किया कि किसी शहर को जानने के लिए प्रयास करना पड़ता है जो शायद आज से बीस साल पहले नहीं करना पड़ता होगा क्योंकि तब न तो लोग इतने व्यस्त होंगे और न ही इतनी दुकानें होंगी.

हाँ इस प्रयास में कई और बातें पता चलने लगती हैं और लगता है हर शहर कुछ कहता है.

किसी शहर के बारे में कुछ कह जाना आसान तो नहीं है लेकिन फिर भी सोचता हूँ कह दूँ. हैदराबाद दोनों बाहें फैलाकर आपका स्वागत करता है. अहमदाबाद आपकी जाँच पड़ताल करता है. मुंबई सपने दिखाता है. भुवनेश्वर आपको साफ़ रहने पर मजबूर करता है और कोलकाता कहता है कि आओ खाना खाओ और बतियाओ जितना मन करे.

बिहार की राजधानी पटना के बारे में अपने एक साथी की टिप्पणी लिखता हूं...वो कहती हैं पटना अराजक लगता है पहली नज़र में और ये शहर आपका स्वागत नहीं करता.

और आखिर में इलाहाबाद जो दिल खोलकर आपसे मिलता है और मिलाता है.

वैश्वीकरण के बावजूद भारत के ये शहर आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं और मैं यही चाहूँगा कि मैकडोनाल्ड के बर्गर के बीच नेतराम की कचौड़ियों को जगह मिलती रहे. एलन सॉली की शर्ट के साथ बंगाल की बालूचरी साड़ी ख़रीदने में मुश्किल न हो और राडो की घड़ियों के साथ हैदराबाद में काँच की चूड़ियाँ आसानी से मिले तो किसी को कोई शिकायत नहीं होगी.

लुंगी भी जाएगी!

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وسعت اللہ خان|सोमवार, 11 मई 2009, 12:02

टिप्पणियाँ (23)

वुसतउल्लाह ख़ान से

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जैसे ही मैं हावड़ा जंक्शन की भीड़ चीरता हुआ बाहर निकला, एक सफ़ेद बालों वाला पीली टैक्सी समेत टकरा गया.

"हो आए साहब आप शांति निकेतन से?", मैं एकदम ख़ुद से एक अजनबी की इतनी बेतकल्लुफ़ी पर ठिठक गया.

लेकिन फिर उसी बेतकल्लुफ़ी पर रीझ गया. उसने मुझे सोचने का मौक़ा दिए बग़ैर कहा, वैसे तो आप किसी की भी टैक्सी में जा सकते हैं, पर यहाँ सारे खु्श्के हैं.

बात करते हैं तो मानो फावड़ा चला रहे हैं. आप हमारे साथ रहिए, आपको अच्छा लगेगा.

मैंने कहा, ठीक है, अगले आठ घंटों तक आप हमारे साथ रहेंगे. मगर लेंगे क्या, कहने लगा छह सौ नब्बे रुपए, क्योंकि सात सौ कहने से कस्टमर उछल जाता है.

मैंने पूछा, नाम क्या है, कहने लगा पवन कुमार यादव. बाइस साल पहले छपरा से आए थे, तबसे टैक्सी लाइन में हैं.

मैं अगला दरवाज़ा खोल कर पवन कुमार के बगल में बैठ गया. सफ़र के दौरान उससे पूछा, वोट किसे दिया?

कहने लगा पिछली बार डाकू को और अबकी बार चोर को...पिछले ने छह रुपए किलो चावल को 20 रुपए किलो तक पहुँचा दिया, इस बार लगता है, हमारी लुंगी भी जाएगी. कल किसी हराम... ने मोबाइल भी छीन लिया.

मैंने कहा, पवन कुमार पिछले एक महीने से मैं दिल्ली से बंगलौर और बंगलौर से कोलकाता तक सफ़र कर रहा हूँ. जनता तुम्हारी तरह नेताओं को सौ-सौ गालियाँ भी देती है पर वोट की लाइन में भी लगती है, यह क्या है.

"जनता को भी तो मज़ा लगा हुआ है. उसे अपने जैसा मूर्ख नहीं, डेढ़ अक्षर पढ़ा आदमी चाहिए जो एकदम मस्त भासन दे, भले रासन न दे. थके हारों को नौटंकी चाहिए, साहब, नौटंकी. जिसे आप जैसे विद्वान लोकतंत्र कहते हो."

मैंने कहा, पवन कुमार तुम्हें तो लोकसभा या विधान सभा में होना चाहिए. पवन कुमार यादव ज़ोर से हँसा, अगर हम विधायक बन गए तो टैक्सी कौन चलाएगा. नेता लोग तो टैक्सी तक नहीं चला सकते.

ट्रेन ब्लॉग- बिहार में कुछ अच्छा ?

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सुशील झासुशील झा|रविवार, 10 मई 2009, 10:20

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बिहार में कुछ अच्छा....सोचने में अटपटा लग सकता है लेकिन अगर खोजा जाए तो मुश्किल नहीं है यह काम.

इस राज्य के बारे में हमेशा से नकारात्मक रिपोर्टिंग होती रही है. विकास नहीं हुआ है उद्योग धंधे बंद हो गए हैं. जातिवाद है, गुंडागर्दी है. और पता नहीं क्या क्या.

ऐसी रिपोर्टिंग मैंने भी की है लेकिन इस बार जब बीबीसी की चुनावी ट्रेन से बिहार पहुंचा तो मैंने सोचा कि क्यों न इस बार बिहार के बारे में पाँच अच्छी बातें भी देखी जाएँ.

तो पहली बात-

ऐतिहासिक धरोहर और पर्यटन- पूरे भारतीय महाद्वीप में या फिर कह सकते हैं कि पूरी दुनिया में पहले लोकतांत्रिक सरकार की अवधारणा बिहार के लिच्छवी शासनकाल में शुरु हुई थी. बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति बोधगया में ही हुई थी. जैन धर्म के 24वें गुरु महावीर स्वामी का कार्यक्षेत्र भी बिहार रहा. इतना ही नहीं सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोविन्द सिंह पटना में पैदा हुए थे. दुनिया का पहला विश्वविद्यालय नालंदा बिहार में ही था. ये और बात है इतना सबकुछ होने के बावजूद बिहार को पर्यटन उद्योग से उतना मुनाफ़ा नहीं होता जितना होना चाहिए.


पानी की अधिकता- भारत में विरला ही कोई राज्य होगा जिसमें उतनी नदियाँ बहती होंगी जितनी बिहार में है. कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक,कमला-बलान,गंगा,बागमती लेकिन इसका बिहार को नुकसान ही होता है फ़ायदा नहीं. हर साल बाढ़ आती है इन नदियों में. बाढ़ इसलिए नहीं कि अधिक बारिश होती है बल्कि इसलिए कि नेपाल के साथ इस जल के प्रबंधन के लिए समझौता नहीं हो सका है. अगर इन नदियों के पानी का ढंग से प्रबंधन हो तो बिहार की कई समस्याएँ सुलझ जाएंगी.

जनसंख्या- मानव संसाधन हर देश की निधि होती है लेकिन बिहार का मानव संसाधन ज़बर्दस्त इस मायने में है कि यहां के लोग मज़दूरी भी कर सकते हैं, खेती भी कर सकते हैं और साथ ही सॉफ़्टवेयर इंजीनियर से लेकर हर उस क्षेत्र में सफल हो सकते हैं जहाँ मेहनत से आगे बढ़ा जा सकता है. राज्य से हो रहे पलायन की बात सभी करते हैं लेकिन बिहार के जो लोग पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों में काम करने जाते हैं उससे अंततः देश को ही फ़ायदा होता है.

कला शिल्प और विचारधारा- बिहार की कला शिल्प की शायद ही कहीं बात होती हो लेकिन ऐसा नहीं है कि कला के क्षेत्र में बिहार किसी से पीछे है. राज्य के दरभंगा क्षेत्र की मधुबनी पेंटिंग जापान तक में बेहद पसंद की जाती है. टिकुली पेंटिंग हो या फिर भागलपुर का तसर सिल्क पूरे देश में पसंद किया जाता है. थिएटर, प्रगतिवादी विचारधारा में अग्रणी यह वही राज्य है जहाँ गांधीजी ने पहला आंदोलन शुरु किया था. चंपारण से नील की खेती से जुड़ा आंदोलन. पिछले पचास साल की बात करें तो इंदिरा गांधी के शासनकाल में जब आपातकाल लगा तो जेपी आंदोलन की शुरुआत भी बिहार से हुई थी.

सुधा डेयरी- ये नाम बिहार के बाहर भले ही लोगों को नहीं पता हो लेकिन बिहार के घर घर में ये जाना पहचाना नाम है. पिछले एक दशक में राज्य सरकार का यह दुग्ध डेयरी का उपक्रम फ़ायदे में चल रहा है जो एक उपलब्धि है. इसकी तुलना मदर डेयरी से की जा सकती है.

हाँ ये बात और है कि इतनी विविधताओं के बावजूद बिहार पिछड़ा है, जिसके कई कारण हैं लेकिन इतना ज़रुर है कि बिहार में गुंडागर्दी, अपहरण, ग़रीबी और अशिक्षा के अलावा भी बहुत कुछ है जिसके बारे में बात कम की जाती है.

ट्रेन ब्लॉग-बिग ब्रदर वाचिंग

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सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 08 मई 2009, 19:04

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जाने माने लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी किताब 1984 में एक वाक्य लिखा था....बिग ब्रदर इज़ वाचिंग जो अब किवदंती बन चुका है.

अपने उपन्यास में ऑरवेल ने एक ऐसे देश के बारे में लिखा था जहां हरेक व्यक्ति के हर काम पर सरकार नज़र रखती है. उनका इशारा सोवियत रुस की ओर था.

आगे चलकर बिग ब्रदर का मुहावरा अमरीका पर सटीक बैठने लगा.

पश्चिम बंगाल में तीन दिन रहने के बाद मेरे ज़ेहन में ये मुहावरा बार बार गूंज रहा था. इसका सबसे बड़ा कारण था राज्य में लोगों का राजनीति से अत्यधिक जुड़ाव.

ऐसे कम ही राज्य होंगे जहां का हर आदमी किसी न किसी पार्टी से संबंध रखता हो. पश्चिम बंगाल ऐसा ही राज्य है.

सुबह आपको अख़बार देने वाले हॉकर से लेकर सब्ज़ी बेचने वाला, दूध देने वाला, प्रतिदिन का सामान देने वाला हो या फिर ऑटोरिक्शा और टैक्सी वाला ये सभी किसी न किसी स्तर पर किसी पार्टी (विशेषकर वामपंथी दल)से जुड़े होते हैं.

इसका मतलब ये भी हुआ कि अगर पार्टी चाहे तो आपके बारे में छोटी से छोटी जानकारी जुटा सकती हैं.

अगर आप बंगाल में रहते हैं और घर में आपकी लड़ाई हो जाए तो पुलिस से पहले पार्टी को पता चलता है और पार्टी के लोग आकर सुलह सफाई कराते हैं.

यानी कि पार्टी कार्यकर्ताओं की एक समानांतर सरकार चलती है राज्य में.

लेकिन लोग पार्टी से जुड़ते क्यों हैं. लोग जुड़ते हैं क्योंकि इसका फ़ायदा होता है. अगर आप वामपंथी नहीं हैं तो आपको हर वो नौकरी लेने में अभूतपूर्व दिक्कतें होंगी जो राज्य सरकार के हाथ में होती हैं.

अगर आपको नौकरी मिल भी जाती है तो प्रमोशन में या छुट्टियां तक लेने में दिक्कत हो सकती है.

इतना ही नहीं जब आप पश्चिम बंगाल के किसी छोटे गांव या शहर में जाते हैं और रहने के लिए घर बनाने की कोशिश करते हैं तो उसके लिए भी आपको पार्टी कार्यकर्ताओं को चंदा देना पड़ता है.

पार्टी को पता रहता है कि शहर की किस गली में कौन से मोहल्ले में उनके समर्थक रहते हैं और कहां उनके विरोधी. तभी आज भी कोलकाता की गलियां चुनाव से पहले पार्टियों के झंडों से पटी पड़ी हैं.

बंगाल में आम जनजीवन के घोर राजनीतिकरण के बारे में मैंने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के अपने प्रवास के दौरान सुना था लेकिन मुझे विश्वास नहीं होता था कि वाम दल ऐसा करते होंगे.

कोलकाता में आम लोगों से बातचीत में मैंने जब ये महसूस किया तो कई पत्रकारों से और कुछ प्रोफेसरों से भी इस बारे में पूछा और उन्होंने भी इसकी पुष्टि की.

तो क्या मैं कोलकाता में किन लोगों से मिला, किनके साथ घूमा , कहां गया क्या रिपोर्ट की . पार्टी को ये भी पता होगा. जवाब मिला, पता नहीं होगा लेकिन वो पता करना चाहें तो कर सकते हैं.

लेकिन मुझे सबसे बेहतरीन जवाब मिला एक टैक्सी ड्राईवर से. मैंने पूछा, तुम किसी पार्टी में हो तो उसका कहना था, '' मरना है क्या. सीपीएम में जाऊंगा तो तृणमूल वाले मारेंगे. तृणमूल में जाऊंगा तो सीपीएम वाले मारेंगे. पार्टी में रहने का फ़ायदा होता है लेकिन मुसीबत भी है. चंदा दो, जूलूस निकालो. मैं ऐसे ही खुश हूं.''

आम जनजीवन में सीपीएम या वामपंथी दल कितने हावी हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोलकाता में पुलिस की गाड़ियां भी लाल रंग की हैं.

वाम दलों की विचारधारा और बुद्धिमत्ता का कोई जवाब नहीं है आम लोगों के जीवन के इस क़दर राजनीतिकरण से वाम दलों को फ़ायदा हुआ है लेकिन ऐसा राजनीतिकरण कितना सही है ये बहस का विषय है.

ट्रेन ब्लॉग-गॉड और गॉडफॉदर

पोस्ट के विषय:

सुशील झासुशील झा|गुरुवार, 07 मई 2009, 04:25

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लोग मंदिर, मस्जिद या दरगाह जाते हैं आध्यात्मिक शांति के लिए लेकिन अगर वहां आपसे जबरन पैसे की वसूली हो तो कैसा लगेगा.

दक्षिण भारत के मंदिरों में ऐसा कम ही होता है लेकिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर में मेरा अनुभव कुछ इससे हट कर ही रहा.

हुआ यूं कि जब ट्रेन पहुंची भुवनेश्वर तो मैंने सोचा कि क्यों न पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दर्शन कर लिए जाएं.

दर्शन के लिए मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय कुछ पंडे आए लेकिन मैंने साफ मना कर दिया कि मुझे तो बस दर्शन करने हैं पूजा नहीं करनी.

समय था भगवान के मुफ्त दर्शन का यानी ग़रीबों के लिए जो कुछ घंटों बाद होने वाले दर्शन की फीस 25 रुपए नहीं दे सकते थे.

मैं भी हो लिया दर्शन के लिए. मंदिर के गर्भ गृह में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियों के पास अभी मैं पहुंचा ही था कि एक भारी भरकम पंडे ने मेरी गर्दन पर हाथ रखा और मेरा सर झुका दिया भगवान के चरणों में.

अगले कुछ मिनट मैं ज़बर्दस्ती भगवान के चरणों पर पड़ा रहने को मजबूर था. फिर उन्होंने झटपट कुछ मंत्र कहे. थोड़े चावल और प्रसाद दिया. फिर कड़कती आवाज़ में बोले दक्षिणा लाओ.

मैंने सौ का नोट निकाला तो बोले पांच सौ.. मैंने ना में सिर हिलाया तो बोले अच्छा तीन भगवान के लिए पचास पचास यानी डेढ़ सौ दे दो.

मैंने पैसे दिए और सोचा जान छूटी लेकिन तब तक बगल में खड़े एक और पंडे ने धर दबोचा और परिक्रमा के नाम पर एक गली में ले गए. मैं उनसे बार बार कहता रहा कि मैं परिक्रमा नहीं करना चाहता.

मात्र डेढ़ मीटर की उस अंधियारी गली में पांच से छह बार अलग अलग पंडों ने हाथ पकड़ कर धकिया कर पैसों की मांग की लेकिन अब मैं तय कर चुका था कि पैसे नहीं दूंगा.

हांफता हुआ गली से निकला और बाहर निकलने की कोशिश कर ही रहा था कि गली में ले जाने वाले पंडे ने हाथ में प्रसाद थमाया और पैसे मांगे. मैंने कहा प्रसाद नहीं चाहिए वापस लीजिए.

लेकिन वो अड़े रहे और कहने लगे भगवान नाराज़ होंगे. मजबूरन पचास रुपए देने पड़े.

किसी तरह पलटे तो गुस्से में भरी आवाज़ें सुनाई पड़ी...पता नहीं ये जोकाटा लोग कहां से आ जाते हैं जिनके पास पैसे भी नहीं होते हैं.

मैंने जैसे ही मुड़कर कुछ कहने की कोशिश की तो मुझे धकिया दिया गया यह कहते हुए... बाहर निकलो बाहर निकलो....

बाद में जोकाटा का मतलब पता चला कंजूस...

मंदिर से निकलने पर दुख हो रहा था कि भगवान तो दर्शन देना चाहते हैं लेकिन उनके ये गॉडफॉदर बने पंडे नहीं चाहते कि लोग दर्शन करें.

बाहर निकला तो मैंने मंदिर प्रशासन से बात की. प्रशासन के पीआरओ ने माना कि पंडे परेशान करते हैं और वो लोग लगातार कोशिश कर रहे हैं कि लोगों को परेशानी न हो.

मैं पहले भी पुरी के मंदिर में आ चुका हूं और कह सकता हूं कि पहले की तुलना में पंडो का प्रभाव कम हुआ है लेकिन गर्भगृह में अब भी उनकी तूती बोलती है.

मन की शांति के लिए मंदिर या दरगाह जाने वाले को अपनी जेब भी बचा कर रखनी पड़े तो बताइए इस भक्ति का क्या मतलब रह जाता है...

राजनीतिक रूप से बालिग हुए राहुल

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जनवरी 2004 में जब प्रियंका गाँधी अपने भाई राहुल को पहली बार मीडिया और अमेठीवासियों से मिलवा रही थीं तो कई और पत्रकारों के साथ मैं भी वहाँ मौजूद था.

राहुल सबसे मिले. लेकिन उनमें काफ़ी हिचकिचाहट थी. कुछ शर्मीले और अंतरमुखी हैं भी वे. कुछ जगह वह लोगों से मुखातिब भी हुए. शायद एक-आध भाषण भी हुआ था. कुछ पक्का ध्यान नहीं पड़ता. लेकिन हम सभी पत्रकारों का निष्कर्ष लगभग एक ही था.

राहुल अपनी उम्र से भी ज्यादा छोटे और राजनीतिक पप्पू या कच्ची कौड़ी लगते थे.

इन पाँच वर्षों में कई बार राहुल को देखने-सुनने का मौक़ा मिला. सभी अनुभव से सीखते हैं. राहुल भी सीखें हैं, बदले हैं और बड़े हुए हैं.

और मंगलवार को जब राहुल दिल्ली में प्रेस कांफ़्रेस कर रहे थे तो उन्हें सुनते हुए मैं सोच रहा था कि 2009 की चुनावी मुहिम के दौरान कैसे देखते-देखते जैसे राहुल राजनीतिक रूप से बालिग हो गए हैं और मीडिया एवम् आम जनता कि नज़र में कैसे पार्टी महासचिव रहते हुए भी वह कांग्रेस के शीर्ष नेता बन गए हैं.

वर्ष 2004 का राजनीतिक पप्पू सयाना हो गया है. उसकी बातों में, पत्रकारों को उत्तर देने के तेवर और अंदाज़ में एक नया विश्वास और परिपक्वता है.

पिछले पाँच वर्षों के अपने सफ़र में राहुल ने हिचकिचाहट, अनिश्चय और राजनीतिक बातों के प्रति अपनी उदासीनता को पीछे छोड़ा है पर अपनी ताज़गी और ईमानदारी को बरक़रार रखा है.

बहुत लोगों का मानना है कि राहुल गाँधी मे एक 'सिनसेरिटी' या ईमानदारी तो है पर अपनी बहन प्रियंका जैसा करिश्माई जादुई व्यक्तित्व नहीं है.

100 लोगों के समूह के साथ बातचीत में तो राहुल का कोई सानी नहीं है पर जनसभा में एकत्रित भीड़ के साथ वह उस तरह का डायलॉग या संबंध नहीं स्थापित कर पाते जो एक 'नेचुरल' नेता या राजनीतिज्ञ कर सकता है.

अंतर शायद स्टाइल और सब्सटैंस का है. राहुल के पास सोच या सब्सटैंस तो है. उनके समर्थकों का कहना है स्टाइल भी जनसैलाब को लुभाने का और उससे सीधा रिश्ता बनाने का धीरे-धीरे आ जाएगा.

ट्रेन ब्लॉग- इंटरव्यू, नौकरी और इच्छापुरम

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सुशील झासुशील झा|सोमवार, 04 मई 2009, 14:27

टिप्पणियाँ (8)

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चलिए साहब आखिर मेरा भी इंटरव्यू हो गया. इंटरव्यू किसी नौकरी के लिए नहीं था बल्कि किसी पत्रकार ने मेरा इंटरव्यू किया था क्योंकि मैं चुनावों की कवरेज के लिए ट्रेन में हूं.

असल में दिल्ली से जब ट्रेन चली तभी से ट्रेन में बैठे बीबीसी पत्रकारों के इंटरव्यू हो रहे थे लेकिन ख़ास तौर पर उनके जो विदेशों से आए थे.

सबसे अधिक इंटरव्यू बीबीसी की सोमाली सर्विस के पत्रकार युसुफ दे चुके थे और वो अहमदाबाद और मुंबई में अख़बारों में छाए रहे. हैदराबाद में अंग्रेज़ी सेवा से लेकर अरबी, ईरानी, चीनी भाषा के पत्रकारों ने भी इंटरव्यू दिए.

हैदराबाद में जब हम ट्रेन पर चढ़ने लगे तो एकाएक एक टीवी पत्रकार ने मुझे भी पकड़ लिया और इंटरव्यू की मांग की. अंदर से थोड़ी खुशी हुई चलो मेरा भी इंटरव्यू हो रहा है.

पहला सवाल-बीबीसी का क्या आकलन है आंध्र प्रदेश के परिणामों के बारे में. हैदराबाद में दो दिन रहकर कोई टीवी पत्रकार ही इसका जवाब दे सकता है सो मैंने गोल-मोल सा जवाब दिया.

फिर सवाल आया. आपका सर्वेक्षण क्या कहता है. मुझे स्पष्टीकरण देना पड़ा---बीबीसी ने कोई सर्वे नहीं किया है.

तीसरा सवाल-कौन जीतेगा, नायडू या चिरंजीवी या फिर कांग्रेस. मैंने कहा- मैं स्पष्ट रुप से कुछ नहीं कह सकता.

अब मै अपने इंटरव्यू से बोर हो चुका था लेकिन साहब अपनी ही बिरादरी वाले को मना कैसे करता. फिर कुछ सवाल आए हैदराबाद के बारे में जिसके जवाब से वो संतुष्ट दिखे लेकिन मूलत मेरे जवाबों से खिसियाए हुए से लगे.

किसी तरह यह जानलेवा इंटरव्यू ख़त्म हुआ तो मैं ट्रेन में बैठा. अंग्रेज़ी ऑनलाइन के लिए ब्लॉग कर रहे सौतिक विश्वास से बातचीत होने लगी तो उनके अनुभव भी कुछ ऐसे ही थे.

वो दो दिन में कई इंटरव्यू दे चुके थे. उनका कहना था कि आजकल मीडिया में भी नौकरियों का अकाल है तो इसलिए पत्रकार इंटरव्यू के बाद उनसे बीबीसी में नौकरी के विकल्प पर भी बहुत कुछ पूछते हैं.

हां ये तो सही है नौकरियों को लेकर तनाव तो रहता ही है.लेकिन मैं इस समय नौकरी का तनाव नहीं लेना चाहता था.

खैर ट्रेन चली. रात बीती और हम काफ़ी रास्ता तय कर विशाखापट्नम पहुंचे.

पसीने वाली गर्मी में हम ट्रेन से उतरे और लोगों से बतियाने लगे. कुछ लोग बढ़ती कीमतों से परेशान थे तो कुछ लोग यूं ही राजनेताओं से नाराज़ दिखे.

पास में कुछ युवा लोग खड़े थे. मैं तुरंत उनके पास पहुंचा और सवाल दागा कि क्या सोचते हैं वो चुनावों के बारे में.

युवा वर्ग बोला,''हमने तो एक नई पार्टी को वोट दिया है जो ईमानदार है. हम पुरानी पार्टियों से परेशान हैं. उन्हीं के कारण हालात ख़राब हैं अर्थव्यवस्था के भी.''

तो बढ़ती क़ीमतें भी परेशानी है.

छात्रों में से एक सावंत बोले,'' बढ़ती क़ीमतों से मुझे कोई परेशानी नहीं है. मैं छात्र हूं.कंप्यूटर की पढ़ाई कर रहा हूं. मुझे नौकरी चाहिए. अर्थव्यवस्था ख़राब दौर में है. इतनी पढ़ाई कर के बेरोज़गारी नहीं चाहिए मुझे. नौकरी बहुत ज़रुरी है.''

अब वो मेरी दुखती रग पर भी हाथ रख चुके थे. इससे पहले कि वो और कुछ कहते मैंने देखा मेरी स्पेशल ट्रेन चलने लगी थी.

मैंने दौड़ कर ट्रेन पकड़ी. कुछ घंटों के बाद मेरी नज़रों से एक स्टेशन गुज़रा. नाम था इच्छापुरम....शायद यहां के लोगों की सारी इच्छाएं पूरी होती हों. सोचा यहीं उतर जाऊं लेकिन क्या करता नौकरी जो करनी थी... सो ट्रेन पर ही बैठा रह गया.

ट्रेन ब्लॉग - चिरंजीवी या आतंकवादी

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सुशील झासुशील झा|रविवार, 03 मई 2009, 08:37

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sushil416.jpg
क्या मेरी शक्ल आतंकवादियों जैसी है या फिर मैं चिरंजीवी जैसा दिखता हूं.

हैदराबाद में आज कुछ ऐसा हुआ कि मुझे शीशे के सामने खड़े होकर ख़ुद को देखना पड़ा कि मैं आख़िर लगता कैसा हूं.

इससे पहले कि आप मेरी तस्वीर देख कर ख़ुद तय करें आपको बता दूं कि आख़िर हुआ क्या.

दिल्ली से लेकर अब तक हफ्ते से अधिक का सफ़र बीत चुका है और जहां कहीं भी हम ठहरे होटलों की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद. बार-बार सुरक्षा जांच लेकिन किसी ने होटल के भीतर न तो कभी मुझे रोका और न ही पूछताछ की.

हैदराबाद इनसे अलग निकला. यहां पहला होटल था जिसमें सामान की तलाशी के बाद बीबीसी पत्रकारों की जामातलाशी भी ली गई.

होटल में ठहरने के दूसरे दिन मैं चारमीनार घूमने गया. कुछ तस्वीरें उतारनी थीं और लोगों से बात भी करनी थी.

चारमीनार के पास एक ईरानी होटल में बातचीत के दौरान एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, ''आप चिरंजीवी जैसे लगते हैं. अगर आप थोड़े मोटे होते और थोड़ा सा कद होता तो बिल्कुल चिरंजीवी माफ़िक लगते हैं आप.''

मेरे 32 साल के जीवन की शायद यह सबसे अच्छी टिप्पणी थी मेरे लिए.चिरंजीवी तेलुगू सिनेमा के सुपर स्टार हैं और मैं एक दिन पहले ही उनका इंटरव्यू कर के आया था.

मुझे ख़ुशी तो हुई लेकिन ये ख़ुशी होटल पहुँचते ही काफूर हो गई.

होटल में मेरा दूसरा दिन था और रिपोर्टिंग करने के बाद मैं जब होटल में पहुंचा तो लिफ्ट के पास मुझे रोक दिया गया. गार्ड ने मुझसे सवाल करने शुरू किए.

कहां जाना है ? मैंने कहा अपने कमरे में...मैं यहीं रुका हूं. जवाब मिला...आप नहीं जा सकते..रिसेप्शन पर जाइए.
मैंने कहा, मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा रिसेप्शन पर. मैं यहीं रुका हूं. जवाब आया... तो फिर अपने रुम की चाबी दिखाइए.

मैंने चाबी दिखाई तो गार्ड झेंप गया और मुझे जाने दिया गया.

वैसे मुझे एक बार लंदन बम धमाकों के बाद भी रोका गया था जांच के लिए.जांच के बाद दी गई पुलिस की पर्ची आज भी मेरे पास है. तब मेरे बाल लंबे थे और दाढ़ी भी थी.

मैं अब कमरे में हूं और वाकई शीशे में देख कर सोच रहा हूं कि मैं कैसा दिखता हूं.

इस बार भी शायद मेरी दाढ़ी ने गड़बड़ कर दी. या फिर उस हरे-काले क़ाफिये ने जो मेरे गले में है.

ट्रेन ब्लॉग-मुंबई से हैदराबाद

पोस्ट के विषय:

सुशील झासुशील झा|शुक्रवार, 01 मई 2009, 11:51

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land419.jpgमुंबई से हैदराबाद का रास्ता क़रीब सत्रह घंटों का है और ये सत्रह घंटे भारत की वो तस्वीर दिखाते हैं जो अब तक मैं अख़बारों में कभी कभी देखता रहा था.

महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाक़ों से होती हुई ट्रेन कर्नाटक के रास्ते होते हुए जब आंध्र प्रदेश में प्रवेश करती है तो मिट्टी का रंग भूरे और सलेटी से काला होता चला जाता है.

गर्मी बढ़ती जाती है और धूप में हाथ निकालने पर जलन का अहसास होता है. लेकिन इसी तपती गर्मी में यहां के किसान कपास, ज्वार और धान उगाते हैं.

जब अनाज न पैदा हो तो मज़दूरी करते हैं और जब मज़दूरी न मिले तो आत्महत्या करने पर मज़बूर हो जाते हैं.

वाडी स्टेशन के पास जब ट्रेन रुकी तो मैं यूं ही प्लेटफ़ॉर्म पर उतर गया बस कुछ तस्वीरें उतारने.

वहीं मुझे मिले मोहन, सिद्धू और ठाकुर नायक. मोहन के मैले कुचैले कपड़े और बढ़ी हुई दाढ़ी ने मेरे कैमरे का ध्यान आकर्षित किया.

मैंने जब मोहन से बात करनी शुरु की तो उसने बताया कि वो मज़दूर है. लेकिन उसे मज़दूरी क्यों करनी पड़ी, वो कहते हैं, '' मेरे पास थोड़ी सी ज़मीन है जिसमें गेहूं उगता है लेकिन पानी की बहुत कमी है. बहुत पैदावार नहीं होती. मज़दूरी नहीं करुंगा तो भूखे मर जाऊंगा.''


ठाकुर नायक और सिद्धू की हालत भी बहुत बेहतर नहीं दिखती. दोनों ही पत्थर की खदान में काम करते हैं.

ठाकुर नायक कहते हैं, ''हम बंजारे हैं. मेरे पास थोड़ी ज़मीन है. उस पर थोड़ा बहुत उगाते हैं लेकिन उससे गुज़ारा नहीं होता. पत्थर निकालने के काम में कुछ पैसा कमा पाते हैं. मेरी बीवी भी यही काम करती है.''

जिस प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर मैं ठाकुर नायक से बात कर रहा था वो पत्थर भी ठाकुर के हाथों से निकल कर यहां आया होगा. जब मैंने ये बात पूछी तो वो बोले, ''मुझे मालूम है कि जो पत्थर हम निकालते हैं वो मंहगा होता है लेकिन उतना पैसा हमें नहीं मिलता. खदान से ट्रकों में पत्थर भरकर ले जाते हैं और उससे बड़ी इमारतों बनाई जाती हैं. हमें तो सौ डेढ़ सौ मिलते हैं इस कठिन काम के. ''

इलाक़े में पानी की कमी है इससे कोई इंकार नहीं करता है. प्लेटफॉर्म पर खड़े होने पर ही पता चलता है कि गर्मी कितनी ज़बर्दस्त है.

मोहन कहते हैं, ''यहां पानी बहुत कम है. सिर्फ़ बारिश के पानी से खेती कर पाते हैं. जो बड़े किसान हैं वो बोरिंग लगा लेते हैं लेकिन उन्हें भी बहुत फ़ायदा नहीं है. हम तो भूखे मर जाएंगे अगर मज़दूरी नहीं करेंगे.''

बातचीत के बाद मुझे लगा मानो काली मिट्टी पर सफेद कपास और अनाज उगाने वाले इन किसानों का जीवन यहां की मिट्टी की तरह स्याह हो गया है.

जब वापस ट्रेन में बैठा तो पता चला कि इस इलाक़े में भी किसानों ने आत्महत्याएं की हैं लेकिन अख़बारों में इनके बारे में छपा नहीं है.

मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया से निकला तो दिमाग में हैदराबाद का ख़्याल था और साथ ही ख़्याल था सूचना प्रौद्योगिकी के ज़रिए बने साइबराबाद का.

सोचा नहीं था कि इन दोनों आधुनिक शहरों के बीच भारत की सबसे दुखद तस्वीर देख सकूंगा जिसके बारे में अब तक पढ़ा ही था.

मुझे लगता था कि किसानों का दुख जानने के लिए अंदरुनी इलाक़ों में जाना पड़ता है लेकिन ऐसा नहीं है.

किसी भी शहर से बाहर निकलने के बाद आंखें खुली रखें तो हमें देश के असली अन्नदाताओं की खस्ताहाल छवि बिल्कुल साफ दिख सकती है.

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