ट्रेन ब्लॉग- इंटरव्यू, नौकरी और इच्छापुरम

चलिए साहब आखिर मेरा भी इंटरव्यू हो गया. इंटरव्यू किसी नौकरी के लिए नहीं था बल्कि किसी पत्रकार ने मेरा इंटरव्यू किया था क्योंकि मैं चुनावों की कवरेज के लिए ट्रेन में हूं.
असल में दिल्ली से जब ट्रेन चली तभी से ट्रेन में बैठे बीबीसी पत्रकारों के इंटरव्यू हो रहे थे लेकिन ख़ास तौर पर उनके जो विदेशों से आए थे.
सबसे अधिक इंटरव्यू बीबीसी की सोमाली सर्विस के पत्रकार युसुफ दे चुके थे और वो अहमदाबाद और मुंबई में अख़बारों में छाए रहे. हैदराबाद में अंग्रेज़ी सेवा से लेकर अरबी, ईरानी, चीनी भाषा के पत्रकारों ने भी इंटरव्यू दिए.
हैदराबाद में जब हम ट्रेन पर चढ़ने लगे तो एकाएक एक टीवी पत्रकार ने मुझे भी पकड़ लिया और इंटरव्यू की मांग की. अंदर से थोड़ी खुशी हुई चलो मेरा भी इंटरव्यू हो रहा है.
पहला सवाल-बीबीसी का क्या आकलन है आंध्र प्रदेश के परिणामों के बारे में. हैदराबाद में दो दिन रहकर कोई टीवी पत्रकार ही इसका जवाब दे सकता है सो मैंने गोल-मोल सा जवाब दिया.
फिर सवाल आया. आपका सर्वेक्षण क्या कहता है. मुझे स्पष्टीकरण देना पड़ा---बीबीसी ने कोई सर्वे नहीं किया है.
तीसरा सवाल-कौन जीतेगा, नायडू या चिरंजीवी या फिर कांग्रेस. मैंने कहा- मैं स्पष्ट रुप से कुछ नहीं कह सकता.
अब मै अपने इंटरव्यू से बोर हो चुका था लेकिन साहब अपनी ही बिरादरी वाले को मना कैसे करता. फिर कुछ सवाल आए हैदराबाद के बारे में जिसके जवाब से वो संतुष्ट दिखे लेकिन मूलत मेरे जवाबों से खिसियाए हुए से लगे.
किसी तरह यह जानलेवा इंटरव्यू ख़त्म हुआ तो मैं ट्रेन में बैठा. अंग्रेज़ी ऑनलाइन के लिए ब्लॉग कर रहे सौतिक विश्वास से बातचीत होने लगी तो उनके अनुभव भी कुछ ऐसे ही थे.
वो दो दिन में कई इंटरव्यू दे चुके थे. उनका कहना था कि आजकल मीडिया में भी नौकरियों का अकाल है तो इसलिए पत्रकार इंटरव्यू के बाद उनसे बीबीसी में नौकरी के विकल्प पर भी बहुत कुछ पूछते हैं.
हां ये तो सही है नौकरियों को लेकर तनाव तो रहता ही है.लेकिन मैं इस समय नौकरी का तनाव नहीं लेना चाहता था.
खैर ट्रेन चली. रात बीती और हम काफ़ी रास्ता तय कर विशाखापट्नम पहुंचे.
पसीने वाली गर्मी में हम ट्रेन से उतरे और लोगों से बतियाने लगे. कुछ लोग बढ़ती कीमतों से परेशान थे तो कुछ लोग यूं ही राजनेताओं से नाराज़ दिखे.
पास में कुछ युवा लोग खड़े थे. मैं तुरंत उनके पास पहुंचा और सवाल दागा कि क्या सोचते हैं वो चुनावों के बारे में.
युवा वर्ग बोला,''हमने तो एक नई पार्टी को वोट दिया है जो ईमानदार है. हम पुरानी पार्टियों से परेशान हैं. उन्हीं के कारण हालात ख़राब हैं अर्थव्यवस्था के भी.''
तो बढ़ती क़ीमतें भी परेशानी है.
छात्रों में से एक सावंत बोले,'' बढ़ती क़ीमतों से मुझे कोई परेशानी नहीं है. मैं छात्र हूं.कंप्यूटर की पढ़ाई कर रहा हूं. मुझे नौकरी चाहिए. अर्थव्यवस्था ख़राब दौर में है. इतनी पढ़ाई कर के बेरोज़गारी नहीं चाहिए मुझे. नौकरी बहुत ज़रुरी है.''
अब वो मेरी दुखती रग पर भी हाथ रख चुके थे. इससे पहले कि वो और कुछ कहते मैंने देखा मेरी स्पेशल ट्रेन चलने लगी थी.
मैंने दौड़ कर ट्रेन पकड़ी. कुछ घंटों के बाद मेरी नज़रों से एक स्टेशन गुज़रा. नाम था इच्छापुरम....शायद यहां के लोगों की सारी इच्छाएं पूरी होती हों. सोचा यहीं उतर जाऊं लेकिन क्या करता नौकरी जो करनी थी... सो ट्रेन पर ही बैठा रह गया.

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सुशीलजी इस ब्लॉग में कई समस्याओं का ज़िक्र है. पर आपका इंटरव्यू तो किसी राजनेता से कम नहीं है और आपने भी डिप्लोमेटिक जवाब दिये हैं. आपको बताना चाहता हूँ कि मैं अभी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूँ. और मुझे भी नौकरी की चिंता सताए जा रही है.
यह ब्लॉग यथार्थ पर आधारित है और बेहतरीन लेखन है. बधाई हो.!
अब ये बात उन लोगों को कौन समझाए जो नौकरी को भी सभी इच्छाओं की पूर्ति का साधन मानते हैं! सिर्फ नौकरी करके इंसान अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकता है जैसे आपकी इच्छापुरम में उतरने की इच्छा पूरी ना हो सकी और आपकी नौकरी उसमें बाधक ही बनी! ना जाने कितने लोगों की कितनी इच्छाए अपूर्ण रह जाती है इस जालिम नौकरी के कारण!!!
एक बात बताइए, आप एक ही व्यक्ति से बार बार ब्लॉग क्यों लिखवा रहें हैं. जैसे खाने में सिर्फ़ दाल ही दाल. या केवल चावल ही चावल. कोई चटनी नहीं. कुछ मीठा नहीं. ना रायता ना सलाद. बोरियत और ऊब पैदा होने लगी है.
प्रिय सुशील बाबू, आप कह रहे हैं कि दो दिन हैदराबाद में रहकर कोई टीवी वाला ही ये बता सकता है कि क्या हो रहा है. मुझे लगता है कि एक पत्रकार ने इंटरव्यू क्या ले लिया आप तो फैल गए. पता भी किया कि दस-बीस सेकंड का एयर टाइम भी मिला या नहीं. एसी ट्रेन में बैठकर गप लड़ाते हुए 15 दिन की मौज-मस्ती को आप चुनावी कवरेज का नाम दे रहे हैं. पैर नहीं गंदा हुआ, पसीना नहीं बहा, न गांवों में गए न शहरों का मिजाज़ समझा. आप दो दिन ही हैदराबाद में रहे तो यह आपकी परेशानी है. इसको थोपिये मत. एक पान वाले, एक एक्ज़ीक्यूटिव और एक मुसाफ़िर से बात करके चुनावी कवरेज का ढोंग आप ही के यहां होता होगा. टीवी को कोसने की फ़ैशनपरस्ती से आपलोग निकलिए. मुख्यधारा के भारतीय चैनलों की तरह जनपक्षधर होने में बीबीसी को कम से कम हजार साल लगेंगे. बुरा लगेगा लेकिन बात सच्ची है. इसे स्वीकार करने के लिए जिगर चाहिए और नैतिक ईमानदारी भी.
मैंने पत्रकारिता में एक सबसे प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसी से अपना करियर शुरू किया है लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि यहाँ कोई नौकरी नहीं होनी चाहिए. यह एक ऐसा भँवर, ऐसा चक्र है जो आपकी आज़ादी की और स्वतंत्रता की क़ीमत माँगता है. और यह जो देता है वह आपके जीवन, आपके समय और आपकी बुद्धिमत्ता और मेहनत के लिहाज़ से कुछ भी नहीं होता. मैं भी उस इच्छापुरम जाना चाहता हूँ. मैं सांस्कृत्यायन बाबा की तरह भारत और दुनिया घूमना चाहता हूँ.... झा साहब, आपका भाग्य अच्छा है और कम से कम आप खुश तो लग रहे हैं मेरे नज़रिये से क्योंकि घूमना आपके काम में शामिल है. हमारे प्रजातंत्र की उम्र लंबी हो और इसका चुनाव रूपी उत्सव हमेशा ऐसे ही चलता रहे. शुभ यात्रा!
सुशीलजी, आपका प्रसंग काफ़ी रोचक है.
सुशील जी मैंने जब पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बारे में सोचा था तब यही लगता था कि लोग जैसा लिखते हैं वह उनका सिर्फ विचार न होकर क्रियातमक विचार हो (शायद वह उनको अपने जीवन में भी लागू करते होंगे). पर, यहां आकर जाना कि यहां तो स्वतंत्रता का और विचारों का पल-पल हनन होता है। आपकी यात्रा के अनुसार यहां पर कोई इच्छापुरम नहीं है।