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राजनीतिक रूप से बालिग हुए राहुल

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|मंगलवार, 05 मई 2009, 18:21 IST

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जनवरी 2004 में जब प्रियंका गाँधी अपने भाई राहुल को पहली बार मीडिया और अमेठीवासियों से मिलवा रही थीं तो कई और पत्रकारों के साथ मैं भी वहाँ मौजूद था.

राहुल सबसे मिले. लेकिन उनमें काफ़ी हिचकिचाहट थी. कुछ शर्मीले और अंतरमुखी हैं भी वे. कुछ जगह वह लोगों से मुखातिब भी हुए. शायद एक-आध भाषण भी हुआ था. कुछ पक्का ध्यान नहीं पड़ता. लेकिन हम सभी पत्रकारों का निष्कर्ष लगभग एक ही था.

राहुल अपनी उम्र से भी ज्यादा छोटे और राजनीतिक पप्पू या कच्ची कौड़ी लगते थे.

इन पाँच वर्षों में कई बार राहुल को देखने-सुनने का मौक़ा मिला. सभी अनुभव से सीखते हैं. राहुल भी सीखें हैं, बदले हैं और बड़े हुए हैं.

और मंगलवार को जब राहुल दिल्ली में प्रेस कांफ़्रेस कर रहे थे तो उन्हें सुनते हुए मैं सोच रहा था कि 2009 की चुनावी मुहिम के दौरान कैसे देखते-देखते जैसे राहुल राजनीतिक रूप से बालिग हो गए हैं और मीडिया एवम् आम जनता कि नज़र में कैसे पार्टी महासचिव रहते हुए भी वह कांग्रेस के शीर्ष नेता बन गए हैं.

वर्ष 2004 का राजनीतिक पप्पू सयाना हो गया है. उसकी बातों में, पत्रकारों को उत्तर देने के तेवर और अंदाज़ में एक नया विश्वास और परिपक्वता है.

पिछले पाँच वर्षों के अपने सफ़र में राहुल ने हिचकिचाहट, अनिश्चय और राजनीतिक बातों के प्रति अपनी उदासीनता को पीछे छोड़ा है पर अपनी ताज़गी और ईमानदारी को बरक़रार रखा है.

बहुत लोगों का मानना है कि राहुल गाँधी मे एक 'सिनसेरिटी' या ईमानदारी तो है पर अपनी बहन प्रियंका जैसा करिश्माई जादुई व्यक्तित्व नहीं है.

100 लोगों के समूह के साथ बातचीत में तो राहुल का कोई सानी नहीं है पर जनसभा में एकत्रित भीड़ के साथ वह उस तरह का डायलॉग या संबंध नहीं स्थापित कर पाते जो एक 'नेचुरल' नेता या राजनीतिज्ञ कर सकता है.

अंतर शायद स्टाइल और सब्सटैंस का है. राहुल के पास सोच या सब्सटैंस तो है. उनके समर्थकों का कहना है स्टाइल भी जनसैलाब को लुभाने का और उससे सीधा रिश्ता बनाने का धीरे-धीरे आ जाएगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:51 IST, 05 मई 2009 saroj:

    संजीव जी, इस बलॉग के लिए धन्यवाद, राहुल जी अभी भी अपरिपक्व हैं, वो उनके कॉंफ़्रेंस से नज़र आ रहा था. ईमानदार तो क़तई नहीं हैं, हां नासमझ ज़्यादा हैं. मैं यहीं कह सकता हूं कि आपका राहु अभी अपरिवक्व है.

  • 2. 20:06 IST, 05 मई 2009 Nitin K Srivastava:

    बेहद ईमानदार, देख कर ही कोई कह सकता है, शांत स्वभाव उनको दूसरों से अलग करता है. ईश्वर आने वाले समय में भी उनकी ईमानदारी, गंभीरता बनाए रखे, ख़ास तौर से इस देश के ग़रीब लोगों के लिए उनकी संवेदनशीलता.

  • 3. 21:35 IST, 05 मई 2009 sujeet pandey:

    राहुल वो कमल है जो घर के पोत में खिलाया गया है. कांग्रेस के लिए राहुल बहुत बड़े नेता हैं लेकिन मुझे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जतिन प्रसाद और प्रिया दत्त वग़ैरह राहुल से ज़्यादा परिपक्व लगते हैं. लेकिन इनका कांग्रेस में क्या स्थान है सभी जानते हैं. कांग्रेस के लिए गांधी होना ही सब कुछ है.

  • 4. 00:40 IST, 06 मई 2009 shyam sunder mishra:

    जी हाँ, अभी तक सभी कांग्रेसी यही कहते आ रहे हैं. सिर्फ़ लुभाना. श्री पप्पू भी जल्दी ही सीख जाएंगे. चलो कम से कम 39 साल की उम्र में पप्पू बालिग़ हो गए. जय हो पप्पुओं की और देश का बंटाधार.

  • 5. 01:42 IST, 06 मई 2009 Bharat:

    किस को पड़ी है? लेकिन सच तो ये है कि राहुल गांधी अपनी योग्यता की बदौलत नहीं बल्कि अपने परिवार के नाम पर राजनीति में हैं. ये अपने आप में ख़राब है. मुझे संजीव श्रीवास्तव से इसकी उम्मीद नहीं थी. हो सकता है कि बीबीसी हिंदी कांग्रेस का प्रवक्ता हो. ये ब्रितानिया के हित में है कि वह राजशाही और नक़ली राजाओं को भारत में राज करता देखे. वे उन्हें जानते हैं और ये भी जानते हैं कि उनसे कैसे निप्टा जाता है. उन्हें मालू है कि भारत को कैसे कंट्रोल में रखा जाए. जहां तक लोकतंत्र और बीबीसी की 'निष्पक्ष' रिपोर्टिंग का मामला है मुझे इस सिलसिले में विचार करना होगा.

  • 6. 02:05 IST, 06 मई 2009 N.K.Tiwari:

    ये सिर्फ़ चमचागीरी की पत्रकारिता है

  • 7. 04:03 IST, 06 मई 2009 Ashiq Husain Dubai:

    निश्चित ही राहुल को सुनना दिल को सुकून देता है. दूसरे नेताओं की तरह लफ़्फ़ाज़ी नहीं करते, ठोस बात करते हैं. हमारे बच्चे अक्सर विदेशी चैनल ही देखते हैं क्योंकि वह भारत में नहीं रहते हैं लेकिन आजकल ख़ुशी की बात है कि बच्चे राहुल और प्रियंका की वजह से देसी चैनल भी देखने लगे हैं और उनकी बात को गंभीरता से सुनते भी हैं जब्कि चुनाव की दूसरी ख़बरों पर मज़ाक़ करते हैं.

  • 8. 04:27 IST, 06 मई 2009 मोहम्मद आसिफ़ सिद्दीक़ी:

    मेरा मानना है की राहुल गाँधी का बयान भारतीय राजनीति की दृष्टि से काफ़ी नया है क्योंकि पहली बार किसी बड़े राजनीतिज्ञ ने काफ़ी इमानदारी से सच को क़बूल किया है. सीबीआई और राजनितिक परिवारवाद के विषय पर उनकी बेबाक राय सुन कर लगा क्या यह इमानदारी भारतीय राजनीती में चल पायगी?

  • 9. 05:09 IST, 06 मई 2009 RATNESH DWIVEDI:

    राहुल गांधी अपनी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां नेहरू-गांधी परिवार का उत्तराधिकारी देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है. वह लगभग 40 वर्ष के हैं और जनता से मिलने की उनकी घबराहट भी ख़त्म हो चुकी है. आपने सच कहा कि वह अब परिपक्व नेता हो चुके हैं और समय आ गया है कि वे प्रधानमंत्री का पद संभालें अगर 2009 के चुनाव में यूपीए को बहुमत मिलता हैं. 2004 से 2009 के बीच काफ़ी समय होता है. कांग्रेस और ज़्यादा दिनों तक मनमोहन सिंह पर निर्भर नहीं रह सकता. यह सच है कि राहुल को अपने अंदर करिश्मा पैदा करने के लिए और पांच साल चाहिए.

  • 10. 05:32 IST, 06 मई 2009 NARENDRA SHARMA:

    बहुत धन्यवाद, पप्पू सयाना हो गया ये तो कल के बयान से ही पता चल गया कि नीतीश और वामपंथी कांग्रेस के साथ आ जाएंगे. थोड़ी ही देर में उन दोनों के बयान न में आ गए. ख़ूब समझदार हो गया पप्पू. पहले गाली और बाद में टॉफ़ी. बहुत ख़ूब. और आप भी तो सयाने हो गए, आप बीबीसी वाले थोड़े रह गए, पूरे भारतीय पत्रकार हो गए. ख़ूब तारीफ़ लिखी, और लिखो जी. यहां कि जनता तो ....

  • 11. 06:20 IST, 06 मई 2009 Dr. Rajnish Ranjan:

    जब भी मैं राहुल गांधी को समाचार चैनल पर देखता हूं मुझे भारत की युवा शक्ति के मुखरित होने का एहसास होता है. युवा शक्ति के परिपेक्ष में अगर देखा जाए तो राहुल ने देश में राजनीति की एक नई परिभाषा क़ायम की है. आज के दौर में जहां देश की आधी संख्या युवा और योग्य होने के बावजूद नौकरियों के लिए मारी मारी फिर रही है वहीं दूसरी ओर देश और राज्यों की सरकारें बूढ़े रेटायर होजाने वाले लोगों को एक्सटेंशन, फिर से नौकरी और कांट्रैक्ट के ज़रिए काम दे रही है. इससे जहां एक ओर युवाओं में असंतोष की भावना घर करती जा रही है वहीं दूसरी तरफ़ देश के युवाओं की उत्पादनशीलता में कमी आती जा रही है. मुझे उम्मीद है युवाओं की शक्ति के ज़रूरत से कम प्रयोग पर गंभीरता से सोचेंगे. संजीव जी, मैं विनोद दुआ के साथ आप का इंटरव्यू पढ़ रहा था. आपने भी ये महसूस किया होगा कि सभी महान व्यक्तित्व जवानी के ज़माने में कितने सशक्त होकर उभर रहे थे, उन्हें एक राह मिली और उन्होंने करिशमा कर दिखाया. आज हमारे देश में इस बात की ज़रूरत है कि कोई नेता/राजनेता ऐसा हो जो औरों से दो क़दम आगे की सोच रखते हों और उसे लागू करवाने का माद्दा रखते हों. मैं समझता हूं राहुल इन उम्मीदों पर खरे उतरेंगे.

  • 12. 06:56 IST, 06 मई 2009 Anoop Shrivastava:

    राहुल गांधी को देखकर ही लगता है कि उनमें कितनी नर्मी और सफ़ाई है. राजनीति में ऐसे लोगों को ही आगे आकर काम करना चाहिए. इसमें कोई शक नहीं कि वे बहुत समझदार हैं और दोस्ताना स्वभाव के मालिक हैं. राजनीति में वह मासूम नज़र आते हैं.

  • 13. 07:02 IST, 06 मई 2009 J.Roshanbhai Wakhla:

    रहुल युवा है लेकिन साथ ही वह देश की स्थिति से वाक़िफ़ हैं. वह अब नए राजनेता की तरह नहीं बोलते हालांकि यहां ऐसे भी नेता है जो अस्सी के दशक में हैं और बच्चों सी बातें करते हैं. यहां का युवा वर्ग राहुल को ऐसे नेता के रूप में देखता है जो युवाओं को ऐसा नेतृत्व प्रदान करेंगे जैसा किसी ने न किया है. राहुल के राजनीति में आने से युवा को आगे आकर देश की सेवा करने का प्रोत्साहन मिला है. बूढ़ों ने युवाओं को कभी नेतृत्व का मौक़ा नहीं दिया है. उम्मीद कि राहुल वैसे ही रहेंगे जैसे वो अंदर से हैं.

  • 14. 07:17 IST, 06 मई 2009 Amrit:

    इसमें कोई शक नहीं कि राहुल ईमानदार और गंभीर राजनेता हैं. हां, वो महत्वाकांक्षी हैं लेकिन मेरी नज़र में ये बुरी बात नहीं है. वह सच्चाई जानना चाहते हैं, समस्याओं पर विचार करते हैं और फिर अपनी राय देते हैं. उनके ताथाकथित अपरिपक्व राजनीतिक कैरियर में उनके बयान पर कोई आलोचना नहीं हुई है.

  • 15. 07:32 IST, 06 मई 2009 SAMAJ:

    जहां एक तरफ़ वरूण गांधी नफ़रत की राजनीति करते हैं वहीं राहुल गांधी सबको साथ लेकर चलने की बात करते हैं. उनमें वो सब कुछ है जो इस देश के प्रधानमंत्री में होना चाहिए.

  • 16. 08:40 IST, 06 मई 2009 Sanjay Kumar "Rahi":

    क्या संजीव जी, आपको और कोई दूसरा नेता दिखाई नहीं देता है क्या. चलिए अच्छा है इस तरह बड़ाई करने से आप को आगे चलकर कम से कम सोनिया जी या कांग्रेस पार्टी कहीं न कहीं ज़रूर फ़ायदा देगी. लगे रहो इंडिया.

  • 17. 08:50 IST, 06 मई 2009 Deepak Tiwari:

    राहुल लगभग 40 साल के हो रहे हैं. इतनी देर में बालिग़ क्यों हुए, ये कैसी महिमा है?

  • 18. 09:38 IST, 06 मई 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    राहुल जी को उनका भारत मुबारक हो और संजीव जी को उनका राहुल. भारत का नवजवान जो पढ़ा लिखा है वह कम से कम राहुल की न तो क़द्र करता है और न ही उनमें भविष्य के लिए कोई आशा देखता है. बस भोले-भाले गांव वालों को उल्लू बनाकर प्रधानमंत्री बन सकते हैं. बाक़ी न ही उनके बस की है और न ही ये पप्पू किसी काम का है.

  • 19. 09:40 IST, 06 मई 2009 Prem Kumar Sagar:

    मैं आप से पूरी तरह सहमत हूं. देश को आज विरोधाभास या तोड़ने की राजनीति चाहिए. राहुल एक रचनात्मक और सुलझे हुए व्यक्तित्व का प्रदर्शन कर रहे हैं और उनके इस रूप में मनमोहन सिंह जी का पिछले पांच साल और सोनिया गांधी के जुनून को भी ज़रूर देखा जा सकता है. मुद्दा देश के विकास का नहीं है, मुद्दा है सही की पहचान का जिसे कांग्रेस देख रही है और राहुल समझ रहे हैं. ब्लॉग के लिए शुक्रिया...

  • 20. 09:59 IST, 06 मई 2009 वसंत पवार:

    आपने जो राहुल का आकलन कीया है वह बिल्कुल ठीक नहीं है. एक तरफ़ तो आप कह रहे हैं कि 2004 में वह एकदम कच्चे लग रहे थे. और 2009 के मध्य में राहुल आपको मंझे हुए नज़र आ रहे है. भारतीय पत्रकारिता की यह सबसे बड़ी ख़ामी है कि वह जल्दी इम्प्रेस हो जाते है. शायद 2004 में भी राहुल वह सब कुछ बोल सकते थे जो आज बोल रहे है, और 2009 में भी राहुल वह बोल सकते थे जो अगले आम चुनाव में बोलेंगे. यानी वरुण जैसे नहीं लेकीन आडवाणी और मोदी पर वह आजभी उतने ही तीखे कटाक्ष मार सकते हैं. शायद वह यह धीरे धीरे करना चाहते है. सैफ़ अली ख़ान की तरह, जो आजके स्थापित कलाकार है, लेकिन शुरूवात में बिल्कुल कच्चे अभिनेता नज़र आ रहे थे. चलो, आगे देखेंगे वह क्या गुल खिलाते है. और आप क्या लिखते है.

  • 21. 16:43 IST, 06 मई 2009 vivek kumar pandey:

    गाँधी जी ने अपने बेटे को स्कॉलरशिप पर लंदन पढ़ने भेजने से मना कर दिया था लेकिन यहाँ तो पप्पू के बालिग होने का इंतज़ार हो रहा है. और आपने पप्पू के बालिग होने का प्रमाण पत्र दे दिया.

  • 22. 16:45 IST, 06 मई 2009 vinay shankar:

    पढ़ कर अच्छा लगा की राहुल परिपक्व हो रहे है. देश के लिए अच्छी खबर है. परन्तु राहुल ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे लगे की वह देश के लिए कुछ कर रहे है. न तो वह नयी सोच दिखा पाए है न ही जनता से सम्बन्ध बना पाए है. उन्हें जो साधन उपलब्ध है वह तो उसका भी इस्तेमाल नहीं कर पाए है. उन्हें तो पुरे देश का भ्रमण कर आम जनता से अपना सम्बन्ध जोड़ना चाहिए. देश के सारे विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयो का भ्रमण कर युवा को देश की राजनीति की मुख्य धारा में लाना चाहिए, जिसे की उन्ही के दल ने मुख्य धारा से अलग कर दिया है. नये चेहरों को सामने लाना होगा. आपदकाल में खुद ही मौजूद हो कर प्रबंधन करना चाहिए, ताकि जनता उनमे विश्वास करे. पर कुछ भी नहीं किया. राहुल को चाहिए कि वह आम जनता से जुड़े जो की उनके पूर्वजो ने किया था. बैठकखाने की राजनीति से बचे. खुद की पहचान बनाये.

  • 23. 19:20 IST, 06 मई 2009 Manoj kunar Choudhary:

    संजीव श्रीवास्तव का चापलूसी भरा ब्लॉग पढ़ कर बीबीसी न्यूज़ पर से भरोसा उठने लगा है. कांग्रेस के उत्तराधिकारी में कोई भी योग्यता नहीं सिर्फ़ अपने परिवार के.

  • 24. 20:07 IST, 06 मई 2009 Kamal chandra:

    वरुण गाँधी जैसे कोई युवा नेता भारतीय राजनीति में नहीं दिखते. क्या आपको नहीं लगता है कि आप राहुल में राजीव गाँधी की छवि देख रहे हैं.

  • 25. 20:49 IST, 06 मई 2009 yusuf kirmani:

    आपने यह बात बिल्कुल सही लिखी है कि प्रियंका गांधी में भीड़ के सामने भाषण देने की कला नेचुरल है. लेकिन मेरा मानना है कि आगे चलकर राहुल इस तरह की शैली विकसित कर लेंगे और इसके बाद वाला लोकसभा चुनाव जब भी होगा (वैसे जल्दी की उम्मीद है) राहुल एक बड़े नेता की हैसियत में होंगे. कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है, हालांकि मैं इसका सदस्य नहीं हूं लेकिन मेरा मानना है कि राष्ट्रीय पार्टियां जीवित रहनी चाहि. राहुल को शुभकामनाएं भी देना चाहता हूं. उनके पिता स्व. राजीव गांधी को मैंने कुछ मौकों पर बहुत नजदीक से देखा है, मेरा मानना है कि राहुल अपने पिता से राजनीति में ज्यादा बेहतर ढंग से कुछ कर सकेंगे. अभी चुनाव के नतीजे आने के बाद राहुल की भूमिका और भी ढंग से सामने आएगी.

  • 26. 00:43 IST, 07 मई 2009 uday (from Canada):

    संजीव जी एक पत्रकार के रूप में लिखें न कि राजनेता की तरह. राहुल ने युवा के लिए कुछ नहीं किया. आप उन्हें ताड़ पर चढा रहे हैं.

  • 27. 02:13 IST, 07 मई 2009 PIYUSH SRIVASTAVA:

    राहुल गाँधी निश्चित रूप से भारतीय राजनीति के केंद्र बिंदु बनेंगे. वो बहुत आगे निकल चुके हैं अब. लेकिन राजनीतिक निर्णय लेने की योग्यता हासिल करने में उन्हें वक्त लगेगा. उनकी सोच और भारतीयों के लिए प्रगति की बात करना काफ़ी सुखद है. वो धीरे धीरे भारत को समझ रहे हैं.

  • 28. 04:47 IST, 07 मई 2009 S L Chowdhary:

    मुझे लगता है कि संजीव जी आप परिपक्व हो गए हैं. बहती गंगा में हाथ कैसे धोए आपको आ गया है.

  • 29. 05:31 IST, 07 मई 2009 Yudhishthir:

    कोई बच्चा पाँच सालों तक व्यापार करता रहे और उसे समझदारी ना आएँ ये कैसे हो सकता है. लेकिन अब ये फ़ैसला जनता नहीं पत्रकार कर रहे हैं कि कौन कितना समझदार है. यह परिवार सत्ता के बिना नहीं रह सकती, यह सच है.

  • 30. 05:33 IST, 07 मई 2009 Shailesh Sharma:

    इनके नाम से बस गाँधी नाम हटा दो ये कुछ भी नहीं है. आम भारतीय युवा भी इनसे ज्यादा परिपक्व नज़र आएगा जो रोज़ ही संघर्ष करता है. ऐसा लगता है कि आप इस परिवार के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हैं. ऐसा क्यों, ये तो आप ही जानें.

  • 31. 05:57 IST, 07 मई 2009 pawan kumar arvind:

    राहुल गाँधी परिपक्व हो कर भी अभी पप्पू ही है.

  • 32. 07:39 IST, 07 मई 2009 manoj srivastava:

    रिपोर्ट अच्छी लगी लेकिन आपके राजनीतिक पप्पू को अभी देश की पाँचवी पास करने में और पाच साल लगेंगे.

  • 33. 08:11 IST, 07 मई 2009 Abdul Wahid:

    एक खानदानी पार्टी के नेता का अच्छा गुण गान किया है आपने.

  • 34. 13:17 IST, 11 मई 2009 Mohammad Ali Bahuwa:

    संजीव जी, आपका ब्लॉग पढ़कर खुशी हुई. भारत को अब युवा कंधों की ज़रूरत है जो इस लोकतंत्र को आगे बढ़ा सकें. भारतीय राजनीति में भी रिटायरमेंट होना चाहिए ताकि युवा आगे आ सकें.

  • 35. 13:17 IST, 15 मई 2009 gaurav:

    चुनाव परिणाम आने से पहले ही आपने अपने चुनाव पेज पर कांग्रेस को 201 और भाजपा को 100 सीटें दे दीं...शायद चुनाव परिणाम आने के बाद आपको ये देने का मौक़ा न मिले..

  • 36. 10:43 IST, 16 मई 2009 kamlesh kumar diwan (writer):

    संजीव श्रीवास्तव जी के विचार ब्लॉग पर पढ़े. भारत में लोकतंत्र है, कोई एक नहीं वरन् आम जनता को नेतृत्व देने वाले अनेक जननेता बालिग हुए ,और बुढा गये हैं किन्तु हम उनकी क्षमता को पहचानने मे भूल करते रहे हैं, सिलसिला चलाया है तब सभी पर लिखा जाना चाहिये ताकि लोकतंत्र की अस्मिताएँ रेखाँकित हो सकें. आज हम किसी को कुँवर, राजा, महाराज, युवराज आदि विशेषणों से संबोधित कर राजतंत्र के अवशेषों का पोषण कर रहे है, किन्तु उन बालिग मतदाताओं की आकाँक्षाओं को प्रतिबिंबित करने में समर्थ नही हो पाए हैं जो बेरोज़गार हैं, सुविधाओं के अभाव में पढ नही पाए हैं, नौकरियों से हाथ धो बैठे हैं. खेती॑.. किसानी और व्यवसाय में घाटा होने से हताश हैं. जाति.. पाँति,धर्म..सम्प्रदाय ,और ऊँच..नीच मे
    विभाजित किये जा रहे हैं. शुरूआत अच्छी की है, धन्यवाद.

  • 37. 08:13 IST, 17 मई 2009 mukesh masoom:

    राहुल वास्तव में एक युवा शक्ति के रूप में उभर रहे हैं. देश को ऐसे युवाओं की ज़रूरत है.


  • 38. 13:44 IST, 18 मई 2009 ranmat singh:

    उत्तर प्रदेश में लालू की जीत उनके मेहनत का नतीजा कम है और पब्लिक की उस प्रतिक्रिया का नतीजा ज़्यादा है जो उन्होंने सपा, बसपा और भाजपा की राजनीति से ऊब गए हैं. कांग्रेस को ज़्यादा आत्ममुग्ध होने और बदले की राजनीति करने की बजाय सकारात्मक राजनीति, विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. नहीं तो वो भी इस गुस्से का शिकार हो सकती है.

  • 39. 03:16 IST, 19 मई 2009 Mayank Jindal:

    युवा रूधिर भारतीय राजनीति की कमान सँभाले, यह एक सकारात्मक पहलू है लेकिन गरीबी, बेरोज]गारी, भूख तथा अन्य मूलभूत चीजों को जुटाने के लिए जूझते भारत के एक बड़े वर्ग के दर्द को महसूस करने के लिए बहुत तपस्या की आवश्यकता है. मखमली आराम को तजकर ज़मीनी सच में खुद को ढालने की जरूरत है. महज मीडिया द्वारा बनाए गए नेता, इस देश को ज़्यादा देर नहीं ढो सकते. लिहाज़ा राहुल को अभी से परिपक्व कह देना, शायद नासमझी होगी. हाँ अब समय आया है, जब जनता ने उन पर भरोसा जताकर उनके सिर पर ताज पहनाया है, अब उन्हें अपने आत्मसंयम, वृहद सोच और त्याग का परिचय देना है. अरबों निगाहें एक अच्छे कल की प्रतीक्षा में हैं.

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