ट्रेन ब्लॉग-गॉड और गॉडफॉदर

लोग मंदिर, मस्जिद या दरगाह जाते हैं आध्यात्मिक शांति के लिए लेकिन अगर वहां आपसे जबरन पैसे की वसूली हो तो कैसा लगेगा.
दक्षिण भारत के मंदिरों में ऐसा कम ही होता है लेकिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर में मेरा अनुभव कुछ इससे हट कर ही रहा.
हुआ यूं कि जब ट्रेन पहुंची भुवनेश्वर तो मैंने सोचा कि क्यों न पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दर्शन कर लिए जाएं.
दर्शन के लिए मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते समय कुछ पंडे आए लेकिन मैंने साफ मना कर दिया कि मुझे तो बस दर्शन करने हैं पूजा नहीं करनी.
समय था भगवान के मुफ्त दर्शन का यानी ग़रीबों के लिए जो कुछ घंटों बाद होने वाले दर्शन की फीस 25 रुपए नहीं दे सकते थे.
मैं भी हो लिया दर्शन के लिए. मंदिर के गर्भ गृह में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियों के पास अभी मैं पहुंचा ही था कि एक भारी भरकम पंडे ने मेरी गर्दन पर हाथ रखा और मेरा सर झुका दिया भगवान के चरणों में.
अगले कुछ मिनट मैं ज़बर्दस्ती भगवान के चरणों पर पड़ा रहने को मजबूर था. फिर उन्होंने झटपट कुछ मंत्र कहे. थोड़े चावल और प्रसाद दिया. फिर कड़कती आवाज़ में बोले दक्षिणा लाओ.
मैंने सौ का नोट निकाला तो बोले पांच सौ.. मैंने ना में सिर हिलाया तो बोले अच्छा तीन भगवान के लिए पचास पचास यानी डेढ़ सौ दे दो.
मैंने पैसे दिए और सोचा जान छूटी लेकिन तब तक बगल में खड़े एक और पंडे ने धर दबोचा और परिक्रमा के नाम पर एक गली में ले गए. मैं उनसे बार बार कहता रहा कि मैं परिक्रमा नहीं करना चाहता.
मात्र डेढ़ मीटर की उस अंधियारी गली में पांच से छह बार अलग अलग पंडों ने हाथ पकड़ कर धकिया कर पैसों की मांग की लेकिन अब मैं तय कर चुका था कि पैसे नहीं दूंगा.
हांफता हुआ गली से निकला और बाहर निकलने की कोशिश कर ही रहा था कि गली में ले जाने वाले पंडे ने हाथ में प्रसाद थमाया और पैसे मांगे. मैंने कहा प्रसाद नहीं चाहिए वापस लीजिए.
लेकिन वो अड़े रहे और कहने लगे भगवान नाराज़ होंगे. मजबूरन पचास रुपए देने पड़े.
किसी तरह पलटे तो गुस्से में भरी आवाज़ें सुनाई पड़ी...पता नहीं ये जोकाटा लोग कहां से आ जाते हैं जिनके पास पैसे भी नहीं होते हैं.
मैंने जैसे ही मुड़कर कुछ कहने की कोशिश की तो मुझे धकिया दिया गया यह कहते हुए... बाहर निकलो बाहर निकलो....
बाद में जोकाटा का मतलब पता चला कंजूस...
मंदिर से निकलने पर दुख हो रहा था कि भगवान तो दर्शन देना चाहते हैं लेकिन उनके ये गॉडफॉदर बने पंडे नहीं चाहते कि लोग दर्शन करें.
बाहर निकला तो मैंने मंदिर प्रशासन से बात की. प्रशासन के पीआरओ ने माना कि पंडे परेशान करते हैं और वो लोग लगातार कोशिश कर रहे हैं कि लोगों को परेशानी न हो.
मैं पहले भी पुरी के मंदिर में आ चुका हूं और कह सकता हूं कि पहले की तुलना में पंडो का प्रभाव कम हुआ है लेकिन गर्भगृह में अब भी उनकी तूती बोलती है.
मन की शांति के लिए मंदिर या दरगाह जाने वाले को अपनी जेब भी बचा कर रखनी पड़े तो बताइए इस भक्ति का क्या मतलब रह जाता है...

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ब्लॉग पढ़ कर कुछ अंदाज़ हुआ देश की स्थिति का और दुख भी. इलाहाबाद की याद आई जहाँ मेरे बचपन बीता. वहाँ भी संगम में कुंभ मेले में पंडा लोग खूब लूटते हैं ग़रीब जनता को. जनता भी क्या करे मरने के बाद स्वर्ग जो जाना है, कैसे मना कर दे पंडा को.
इन पंडो से अल्लाह बचाये. एक बार मैं भी इनके चंगुल से फंसते फंसते बचा हूँ. क्या करें जब सबका बाजारीकरण हो रहा है तो फिर धर्म का व्यवसाय ही क्यों वंचित रहे. आखिर भुखे पेट आस्था का निर्वाह कब तक.
हूम्म... मामला गंभीर है. मैं भी घोर आस्तिक हूं लेकिन मैंने अपने भगवान को पंडे-पुजारियों की कैद से आज़ाद करा लिया है. मेरे भगवान 24 घंटे मेरे साथ होते है... कभी किसी मंदिर में नहीं छोड़ता उन्हें... तब भी नहीं जब किसी मित्र या रिश्तेदार के साथ मंदिर जाना पड़े.
आपकी यह आपबीती पढ़कर मुझे रघुनाथ मंदिर की याद आ गई. रघुनाथ मंदिर जम्मू में है और काफी प्रसिद्ध है. यहां मैंने भगवान राम के दर्शन करने के बाद श्रद्धा के तौर पर पचास रुपये चढ़ा दिए. इसके बाद मैं अन्य देवी-देवताओं के दर्शन के लिए बाहर निकला तो एक पंडे ने मुझे घेर लिया. मैंने भगवान हनुमान को प्रणाम किया और निकलने लगा. इतने में उस पंडे ने मेरे गले में माला डाल दी और कुछ मंत्र पढ़ने के बाद बोला सौ रुपये दीजिए. मैंने मना कर दिया. उसने कहा भगवान नाराज हो जाएंगे। मैंने कहा, कोई बात नहीं. मेरे भगवान दिल में है. तो उस पंडे ने मेरे गले से माला निकाल ली. इसके बाद जब मैं अन्य देवी के दर्शन के लिए गया तो वहां एक पंडे ने मेरे हाथ में कलेवा बांधते हुए सौ रुपए मांगे. मेरे मना करने पर उसने कलेवा उतार लिया. इसके बाद मैं सिर्फ उन देवी-देवताओं के दर्शन करने ही गया जहां मैंने दूर से देखा कि पंडे नहीं है. और जहां पंडे दिखे वहां मैं दूर से प्रणाम कर खिसक लिया. यही हाल मेरे साथ विंध्यांचल में भी हुआ था. जब तक ये लुटेरे पंडे मंदिरों से नहीं हटाए जाएंगे तब तक मंदिरों को कुछ भी होने वाला नहीं है. इतना चढ़ावा चढ़ने के बाद भी मंदिर बदहाल पड़े हुए हैं. सभी मंदिरों में श्राइन बोर्ड बना देने चाहिए, वैष्णो देवी की तरह. जहां आप आराम से प्रभु के दर्शन कर सके.
मुझे पता है कि मंदिरों में कई तरह की समस्या हैं. यह सबसे बड़ी समस्या है. सरकार को ध्यान देना चाहिए.
बिल्कुल सटीक विश्लेषण किया है आपने। मेरा अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा था। आज से लगभग चार साल पहले पुरी गई थी। मंदिर के अंदर एक पंडे ने आंखों पर कपूर लगा दिया था और एक ने हाथ पर जगन्नाथ की छड़ी मार दी थी। बाहर आते तक आंखें और हाथ लाल हो चुके थे।
दीप्ति
आपके साथ ऐसा हुआ तो आम लोगों के साथ ये पंडे कैसे सुलूक करते होंगे.
ये तो डे लाइट रॉबरी है। वो भी भगवान के नाम पर।
इस तरह युरोप में मध्यकाल में भी नहीं होता था। वहां भी स्वर्ग
के लिए प्रपत्र उन्हें ही दिए जाते थे जो खरीद सकते थे। असहाय
व गरीब व अनिच्छुक लोगों को सुशील जी की तरह सताया या लूटा नहीं जाता
था। तोगडिया जी और आरएसएस वाले सुन रहे है क्या।
ये तो डे लाइट रॉबरी है, वो भी भगवान के नाम पर.
इस तरह यूरोप में मध्यकाल में भी नहीं होता था वहां भी स्वर्ग
के लिए प्रपत्र उन्हें ही दिए जाते थे जो खरीद सकते थे असहाय
व गरीब व अनिच्छुक लोगों को सुशील जी की तरह सताया या लूटा नहीं जाता
था. तोगडिया जी और आरएसएस वाले सुन रहे है क्या.
मैं पूरी कई दफ़े जा चुका हूँ. मेरी गुज़ारिश है प्रशासन से कि इन पंडों को द्वारका के मंदिर भेजा जा कर ये सीखेंगे कि भक्तों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है.
आप ने जो देका ब्लॉग पर लिखा भी. ठीक है. बात है आपमें. मगर भारत को इन गॉडफादरों से कभी ख़तरा नहीं हो सकता. जो गॉड फादर हमारे ऊपर राज करते हैं अपना बैंक बैलेंस बढ़ा रहे हैं बिजनेस कर रहे हैं. इन गॉड फादरों के बारे में कुछ करो.
भारत में अगर आपको कोई भी काम करवाना है तो उसके लिए एक एजेंट की ज़रुरत होती है और ज़ाहिर है कि उनकी फ़ीस होती है.ये पंडे नहीं भगवान के एजेंट हैं. दर्शन के लिए फ़ीस देनी पड़ती है. आप खुशकिस्मत हैं कि कम पैसे में निपट गए. मुझे तो उसी काम के लिए हज़ारों खर्च करने पड़े. आपको क्या लगता है कि ये पैसा मंदिर प्रशासन को गया होगा.
प्रशासन इन पंडो से मुक्ति दिलाए.
सुनिये सुशील जी,
मैंने एक दिन मां से पूछा' मां,यदि हमको ईश्वर का बनाया है...तो ईश्वर को किसने बनाया?'
मां गुस्सा हो गयी' तेरी खोपड़ी ने...तेरे मुंह ने..'
मां ने गुस्से में एक सच बोला था...लेकिन आज तक नहीं समझ पायी...
आपके किस्से के पीछे का सच क्या है...शायद(बेहतर होगा कि शायद को हटा के पढ़िए)आप भी नहीं समझ सकते...ब्राह्मण होने की वजह से तो और भी नहीं...काश! आपका इतना विकास हो कि मेरी बात बुरी न लगे....
मेरे साथ बैद्यनाथ धाम और बिहार के गया में ऐसा वाकया हुआ है. विष्णु के मंदिर में बिना पैसे के प्रसाद नहीं दिया जाता है. पिछले दिनों डाकोर के श्रीनाथ मंदिर में भी पूजा करने पर ऐसा ही अनुभव हुआ.संकल्प के लिए भी लोग पैसे मांगते हैं. कम से कम भगवान के मंदिर में अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए.
बड़ी मज़ेदार बात है जरा जरा सी बात पर हिंदू धर्म और हमारी सभ्या और संस्कृति ख़तरे में डाल दी जाती है लेकिन इस अंधेरगर्दी पर किसी भक्त का ध्यान नहीं है इसलिए मैं मंदिर जाना छोड़ दिया.
मैं सरकार को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं मानता क्योंकि वे क्यों हमारे धर्म के मामले में हस्तक्षेप करें. लेकिन यह लोगों की ज़िम्मेदारी है कि हम पंडों और दरगाहों के ख़ादिमों को सही बात बताएँ. क्या यह सब हमारी संस्कृति के अनुरूप है...
आपने सर्वोत्तम रिपोर्ट की है सुशील जी जिस के लिए आपको साधुवाद. अब मुझको पता चला कि हमारे कामाख्या मंदिर में ही पंडे यह कारनामा नहीं करते बल्कि यह हर जगह की दास्तान है. मेरी आपसे विनती है कि इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट करें और पूरे देश के मंदिरों का अवलोकन करें. क्योंकि बीबीसी की रिपोर्ट पर प्रशासन का ध्यान ज़रूर जाएगा. ऐसा मेरा मानना है. बीबीसी ने कोल्ड ड्रिंक में कीटनाशक की मिलावट को भी एक रिपोर्ट के ज़रिए उजागर किया था.
सुशील भाई सचमुच आप जोकटा ही ठहरे. आप अपने कारोबार के लिए रेल पर सफर कर रहे हैं. वे भी तो अपना कारोबार ही कर रहे हैं. बस मान लीजिए कि आप की तन्खवाह आपकी नौकरी से मिलती है और वह दर्शन कराने की नौकरी करते हैं. जहाँ तक मंदिर प्रशासन की बात है वह कुछ नहीं कर सकते. उन्हें कमीशन चाहिए कि नहीं. हाँ मजबूरी में ही सही आप धक्कामुक्की खा कर भी गांधीवादी बने रहे, यही मात्र एक विकल्प था आपके पास. कुछ और करने को सोचते तो गर्दनिया टिकट भी खानी पड़ती आपको.
सुशील जी, आप भाग्यशाली हैं कि 150 रुपये में ही निपटारा हो गया. मैं ख़ुद लोगों को संस्कृत और कर्मकांड सिखाता हूँ लेकिन उन लोगों ने मुझे ही नहीं बख़्शा. मैंने उनसे कहा कि जो मंत्रोच्चार वे कर रहे हैं वह पूजा के मंत्र नही हैं बल्कि प्रातः श्लोक हैं और मैं उनसे बेहतर तरीक़े से यह कर सकता हूँ. वे एक गिरोह बना कर आए और पैसे मांगने लगे. मैं उस समय पवित्र गंगा के तट पर था. मैंने कहा पहले विधि विधान से पूजा संपन्न करो फिर पैसे दूँगा. उनमें से अधिकतर पंडित हैं ही नहीं. वे तो चाकूधारी और गौडफ़ादर हैं.
भारत में इस वक़्त दुनिया का सबसे धार्मिक स्वरूप नज़र आता है. मुझे यह लगता है कि यह जनता की अज्ञानता है जो इस व्यवस्था को चलने देती है. भारत एक क्रांति की कगार पर खड़ा है. इन सब बुराइयों को हटाने के लिए एक क्रांति चाहिए.
शायद हम सब जानते हैं पर करते कुछ नहीं. बस कुछ लोग मंदिर जाना छोड़ देते हैं और कुछ सरकार के माथे मंड देते हैं. मैं कभी भी किसी पंडे या भिखारी को पैसे नहीं देता. क्यों न सब यह ख़ुद करें? ख़ासकर युवा लोग? या तो कोई भगवान के नाम पर या कोई मुसीबत के डर से कुछ न कुछ दे देता है. अगर कोई आपको लूटने की कोशिश करे तो क्या करेंगे आप?
लुट जाएँगे या लुटेरे को देंगे दो हाथ?
भाई मैंने तो इन सब बातों को देख कर मंदिर जाना ही छोड़ दिया .
घर में माँ है तो फिर मंदिर जाने की भी क्या ज़रुरत है .
लोग भगवान के घर में भी चार सौबीसी करने से बाज़ नहीं आते .
मैं तो बाहर से ही हाथ जोड़ लेता हूँ.
इन कथित पंडों का वर्चस्व ख़त्म किया जाए ताकि आम आदमी मंदिर में श्रद्धा से जा सके.
मेरी ईश्वर में पूरी आस्था है. वह हर कहीं मौजूद है. वह सबको शांति प्रदान करता है. लेकिन इस तरह के तत्वों के कारण मंदिरों में शांति नहीं है. यह कलियुग का प्रभाव है. एक बात और ध्यान देने योग्य है और वह है मंदिरों में साफ़-सफ़ाई. अधिकरत मंदिरों में स्वच्छता नहीं है. मुझे लगता है कि इसे ठीक करना हम सब की ज़िम्मेदारी है.
यह कोई राज़ की बात नहीं है कि ये सब एक छलावा है , जिस के नाम पर हजारों साल से आम आदमी को लूटा जा रहा है .इतनी लूट सदियों में चोरों , डाकुओं
और जेबकतरों ने नहीं मचाई होगी जितनी धरम के नाम पर एक साल में मचाई
जाती है.इस छलावे को चलाते हैं धरम के बिचौलिए.
यह सही बात है लेकिन इसका निदान ब्लॉग या लेख लिखने से नहीं होगा बल्कि ज़मीनी स्तर पर कुछ करने से ही होगा.
बीबीसी यह बताए कि यह सब उनके पत्रकारों के साथ ही क्यों होता है. और अगर हुआ तो इन महाशय ने पुलिस की मदद ली... नहीं, न. क्योंकि एक और मनघड़ंत कहानी मिल गई हिंदू धर्म के विरुद्ध. मैं तो रोज़ मंदिर जाता हूँ, मेरे साथ तो आज तक किसी ने ऐसा नहीं किया औ न ही मेरे किसी जानने वाले के साथ किया. बीबीसी का स्तर इतना गिर जाएगा, सोचा नहीं था.
आपने आज के धर्म के ठेकेदारों का बहुत सजीव चित्रण किया है.
आप के लेख को पढ़कर ये लगा आप पत्रकार तो हैं लेकिन हैं तो आखिर में इंसान हीं . आपने अपने को पीछा छुडाने के लिए पंडे को पैसा दिया और शायद आपकी जगह मैं होता तो मैं भी ऐसा हीं करता . लेकिन जब बात ज्यादा बढ़ी तो आप पुलिस के पास गए और अपनी शिकायत दर्ज करवायी . पुलिस ने भी वहां पंडो द्वारा होने वाले अत्याचार को स्वीकार किया . लेकिन उन पर पूरा कण्ट्रोल क्यों नहीं जो इस तरह की हरकतें करते हैं वहां उन्हें एंट्री न दें या सीधे जेल में दाल दें . एक भारतीय के साथ ये घटना घटती है तो भारत के परिस्थितियों के साथ इस घटना को आसानी से स्वीकार कर सकता है लेकिन जरा सा गौर करके देखें कि अगर एक विदेशी पर्यटक जिसे भारत कि संस्कृति से लगाव है भारत के अध्यात्मिक , सांस्कृतिक चीजों के बारे में पढता है और फिर नजदीक से जब इस तरह कि परिस्थिति से गुजरता है तो उसके दिल पर क्या गुजराती होगी ????????
सुभाष कुमार
तेहरान
अनिल जी इसमे हिन्दू धर्म को बदनाम करने जैसी कोई चीज नही है। नन्दनी जी आप की बात कुछ समझ मे नही आई जरा स्पष्ट करिये।
सुनील जी की बातों में सच्छाए हो सकती है| वैसे इस तरह के दृश्य कई मंदिरों , मस्जोदो या दरगाह में देखने को भी मिलती है, किंतु इसका ये अर्थ कदापी नहीं लगाना चाहिए की सभी मंदिरों में गड़बड़ है, और जब मन्दिर में हि गड़बड़ है तो वहाँ जाने की क्या जरुरत्? मन्दिर जाने का मुख्य प्रयोजन है परमात्मा की विनती करना और अपने आत्मा का परमात्मा से रिस्ता जोड़ना| और इस मार्ग में पंडे, पुजरि, मौलवी बजाय सहायता करने के बाधा डाल सकते है, लेकिंन एक सच्चा भक्त इन बाधाओं को पर कार फिर से भगवान के दर्शन को जायेगा ना की इन चुद्र विचार वाले पंडो से डर कर मन्दिर ही जाना छोड़ दे|
एक बात और है की ऐसे घटनाओं को पुलिस और मन्दिर प्रशशन के पास जरूर ले जये ताकी ऐसी घटना रुक सके|
सुशील जी , आपकी बात सही हो सकती है माना , मगर आप यदि खुद को हिन्दू मानते हैं तो ये विश्वास रखिये कि हिन्दू धर्म महान है और परिपक्वता की ओ़र चला जा रहा है.हमारा धर्म परिवर्तन शील है अर्थात जो भी कमियाँ या कुप्रथाएं हैं उन्हें हम धीरे धीरे ही सही दूर करते चले जा रहे हैं . इसलिए चिंता मत करिए, और बजाए अपने इस हिन्दू धर्म की कमियाँ निकालने के ,विश्वास रखिये कि समय आने पर ये कमी भी दूर हो जाएगी,जैसे कि होती जा रही हैं (सती प्रथा, बलि ,बाल विवाह ,इत्यादि)
इस ब्लॉग की टिप्पनिओं में व्यक्त विचारों के बाद यह लगा की हम सब एक बात पर सहमत हैं; कि जो भी हो रहा है सही नहीं है.
आस्था का व्यवसाय के साधन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है जो हमारे समाज कि कई समस्याओं(वैसे व्यक्तिगत रूप से मैं इसे समस्या न मान कर " मिस मैनेजमेंट " कहना चाहूँगा ) में से एक है .
यहाँ ध्यान देने योग्य एक बात ये है कि जो लोग भी ब्लॉग के माध्यम से अपने विचार एवं सुझावों का आदान प्रदान कर रहे हैं - "वे भी वयवस्था से प्रभावित भी हैं और इसका एक हिस्सा भी".
धर्म को उसके मताव्लाम्बिओं के आचरण से परिभाषित किया जा सकता है (its just like set of rules for the followers ). हालाकि आस्था को परिभाषित करना कठिन होगा. मगर मेरे विचार से ये समस्या व्यवस्था या सिस्टम कि है, जिसका मूल कारण अज्ञानता है (यहाँ अज्ञान से मेरा तात्पर्य वैषयिक शिक्षा से कतई नहीं है ) तथापि इस समस्या का निवारण शिक्षा के मौलिक मूल्यों (जो स्वतंत्रता और अभय में निहित है ) के द्वारा मानव चित्त का विकास कर संभव है .
एक स्वतंत्र मन जो अपने निर्णय तर्क व विवेचना के आधार पर ले सके, न कि अंधानुकरण करे. हर समस्या के समाधान को अपने स्तर विवेचित कर सही और गलत के मूल पैमानों में बैठकर ले सकता है.
जागरूक होना मात्र हम भारतवासिओं कि उन सभी "समस्याओं" का समाधान कर देगा जो कई पंचवर्षीय योजनायें नहीं कर पाई. आवश्यकता है तो मनुष्य को आधारभूत शिक्षा प्रदान कर मानव बनाने की, जब कि आज के शिक्षण संसथान कि नीतियां "पेट और जेब" के चक्रव्यूह से अपने शिक्षकों को ही नहीं निकलने देती तो वे गिने चुने लोग जो यहाँ ज्ञान प्राप्ति के लिए जाते हैं( और प्राप्त भी करते हैं ) से क्या आशा कि जाये.
समाधान हम "लूप" से बाहर आ चुके लोगों के औरों को बाहर लाने में निहित है.