ट्रेन ब्लॉग-बिग ब्रदर वाचिंग

जाने माने लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी किताब 1984 में एक वाक्य लिखा था....बिग ब्रदर इज़ वाचिंग जो अब किवदंती बन चुका है.
अपने उपन्यास में ऑरवेल ने एक ऐसे देश के बारे में लिखा था जहां हरेक व्यक्ति के हर काम पर सरकार नज़र रखती है. उनका इशारा सोवियत रुस की ओर था.
आगे चलकर बिग ब्रदर का मुहावरा अमरीका पर सटीक बैठने लगा.
पश्चिम बंगाल में तीन दिन रहने के बाद मेरे ज़ेहन में ये मुहावरा बार बार गूंज रहा था. इसका सबसे बड़ा कारण था राज्य में लोगों का राजनीति से अत्यधिक जुड़ाव.
ऐसे कम ही राज्य होंगे जहां का हर आदमी किसी न किसी पार्टी से संबंध रखता हो. पश्चिम बंगाल ऐसा ही राज्य है.
सुबह आपको अख़बार देने वाले हॉकर से लेकर सब्ज़ी बेचने वाला, दूध देने वाला, प्रतिदिन का सामान देने वाला हो या फिर ऑटोरिक्शा और टैक्सी वाला ये सभी किसी न किसी स्तर पर किसी पार्टी (विशेषकर वामपंथी दल)से जुड़े होते हैं.
इसका मतलब ये भी हुआ कि अगर पार्टी चाहे तो आपके बारे में छोटी से छोटी जानकारी जुटा सकती हैं.
अगर आप बंगाल में रहते हैं और घर में आपकी लड़ाई हो जाए तो पुलिस से पहले पार्टी को पता चलता है और पार्टी के लोग आकर सुलह सफाई कराते हैं.
यानी कि पार्टी कार्यकर्ताओं की एक समानांतर सरकार चलती है राज्य में.
लेकिन लोग पार्टी से जुड़ते क्यों हैं. लोग जुड़ते हैं क्योंकि इसका फ़ायदा होता है. अगर आप वामपंथी नहीं हैं तो आपको हर वो नौकरी लेने में अभूतपूर्व दिक्कतें होंगी जो राज्य सरकार के हाथ में होती हैं.
अगर आपको नौकरी मिल भी जाती है तो प्रमोशन में या छुट्टियां तक लेने में दिक्कत हो सकती है.
इतना ही नहीं जब आप पश्चिम बंगाल के किसी छोटे गांव या शहर में जाते हैं और रहने के लिए घर बनाने की कोशिश करते हैं तो उसके लिए भी आपको पार्टी कार्यकर्ताओं को चंदा देना पड़ता है.
पार्टी को पता रहता है कि शहर की किस गली में कौन से मोहल्ले में उनके समर्थक रहते हैं और कहां उनके विरोधी. तभी आज भी कोलकाता की गलियां चुनाव से पहले पार्टियों के झंडों से पटी पड़ी हैं.
बंगाल में आम जनजीवन के घोर राजनीतिकरण के बारे में मैंने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के अपने प्रवास के दौरान सुना था लेकिन मुझे विश्वास नहीं होता था कि वाम दल ऐसा करते होंगे.
कोलकाता में आम लोगों से बातचीत में मैंने जब ये महसूस किया तो कई पत्रकारों से और कुछ प्रोफेसरों से भी इस बारे में पूछा और उन्होंने भी इसकी पुष्टि की.
तो क्या मैं कोलकाता में किन लोगों से मिला, किनके साथ घूमा , कहां गया क्या रिपोर्ट की . पार्टी को ये भी पता होगा. जवाब मिला, पता नहीं होगा लेकिन वो पता करना चाहें तो कर सकते हैं.
लेकिन मुझे सबसे बेहतरीन जवाब मिला एक टैक्सी ड्राईवर से. मैंने पूछा, तुम किसी पार्टी में हो तो उसका कहना था, '' मरना है क्या. सीपीएम में जाऊंगा तो तृणमूल वाले मारेंगे. तृणमूल में जाऊंगा तो सीपीएम वाले मारेंगे. पार्टी में रहने का फ़ायदा होता है लेकिन मुसीबत भी है. चंदा दो, जूलूस निकालो. मैं ऐसे ही खुश हूं.''
आम जनजीवन में सीपीएम या वामपंथी दल कितने हावी हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोलकाता में पुलिस की गाड़ियां भी लाल रंग की हैं.
वाम दलों की विचारधारा और बुद्धिमत्ता का कोई जवाब नहीं है आम लोगों के जीवन के इस क़दर राजनीतिकरण से वाम दलों को फ़ायदा हुआ है लेकिन ऐसा राजनीतिकरण कितना सही है ये बहस का विषय है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
मैं कोलकाता से हूँ. वहाँ पर कम्युनिस्ट का दख़ल हर जगह है. मैं आपकी हर बात से सहमत हूँ. आपको ये भी जानकारी दे दूँ कि बंगाल का विधानसभा भवन भी लाल रंग का है. असल में वो एक सिस्टम है. जैसे कि लोकतंत्र के सिस्टम हैं. आप पार्टी के अंदर विरोध कर सकते हैं, पार्टी से बाहर नहीं जा सकते. वो आपकी हर बात पर नज़र रखते हैं.
यही कारण है कि कम्यूनिष्ट नजरिया पूरे भारत मे पैर नहीं फैला सका.वाम पंथ की संकीर्णता आँखें खोल देने वाली है. लेख पढ़ कर ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कम्यूनिष्ट नजरिया राजनीतिक अंडरवर्ल्ड है. इसी लिये सोमनाथ जैसे व्यक्ति को भी प्रताड़ना झेलनी पड़ी.
विचारों का सही मायनो में आंकलन उनके परिणामों को देख कर ही लगाया जा सकता है. पश्चिम बंगाल भारत में लेफ्ट के वैचारिक इम्प्लेमेंटेशन का परिणाम है
सर्वहारा वर्ग के हितैषी बने बैठे ये वाम दल अपनी रोटी गरीबी और अज्ञानता के तवे पर सेंकते हैं, अपने टारगेट वोटर को उनके हालात के लिए जिम्मेदार तत्वों के खिलाफ एक जुट होने का आहवाहन कर एक अलग ट्रैक पर चलाते हैं जो कथित क्रांति कि राह पर चलते हुए बेगुनाह लोगों के रक्त के सामान ही लाल रंग से इनके झंडे का रंग बनाये रखते हैं (नक्सलवाद के जैसे उदाहरण और भी हैं )
जो भी इनके विचारों से बाहर निकल समृधि कि ओर जाता है इनके निशाने पर आ जाता है(जैसा कि भी लेख में भी उल्लेखित है चाहे ये घर बनाने जैसा वाकया ही क्यों न हो ). चंदे जैसे विभिन्न माध्यमों के द्वारा "शोषित लोगों कि पार्टी" के द्वारा शोषण का शिकार होता होता है.
विकास इनके विनाश का मंत्र है; सिंगुर कि आह बंगाल को जीने कि राह अवश्य दिखाएगी.