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ट्रेन ब्लॉग - चिरंजीवी या आतंकवादी

पोस्ट के विषय:

सुशील झासुशील झा|रविवार, 03 मई 2009, 08:37 IST

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क्या मेरी शक्ल आतंकवादियों जैसी है या फिर मैं चिरंजीवी जैसा दिखता हूं.

हैदराबाद में आज कुछ ऐसा हुआ कि मुझे शीशे के सामने खड़े होकर ख़ुद को देखना पड़ा कि मैं आख़िर लगता कैसा हूं.

इससे पहले कि आप मेरी तस्वीर देख कर ख़ुद तय करें आपको बता दूं कि आख़िर हुआ क्या.

दिल्ली से लेकर अब तक हफ्ते से अधिक का सफ़र बीत चुका है और जहां कहीं भी हम ठहरे होटलों की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद. बार-बार सुरक्षा जांच लेकिन किसी ने होटल के भीतर न तो कभी मुझे रोका और न ही पूछताछ की.

हैदराबाद इनसे अलग निकला. यहां पहला होटल था जिसमें सामान की तलाशी के बाद बीबीसी पत्रकारों की जामातलाशी भी ली गई.

होटल में ठहरने के दूसरे दिन मैं चारमीनार घूमने गया. कुछ तस्वीरें उतारनी थीं और लोगों से बात भी करनी थी.

चारमीनार के पास एक ईरानी होटल में बातचीत के दौरान एक व्यक्ति ने मुझसे कहा, ''आप चिरंजीवी जैसे लगते हैं. अगर आप थोड़े मोटे होते और थोड़ा सा कद होता तो बिल्कुल चिरंजीवी माफ़िक लगते हैं आप.''

मेरे 32 साल के जीवन की शायद यह सबसे अच्छी टिप्पणी थी मेरे लिए.चिरंजीवी तेलुगू सिनेमा के सुपर स्टार हैं और मैं एक दिन पहले ही उनका इंटरव्यू कर के आया था.

मुझे ख़ुशी तो हुई लेकिन ये ख़ुशी होटल पहुँचते ही काफूर हो गई.

होटल में मेरा दूसरा दिन था और रिपोर्टिंग करने के बाद मैं जब होटल में पहुंचा तो लिफ्ट के पास मुझे रोक दिया गया. गार्ड ने मुझसे सवाल करने शुरू किए.

कहां जाना है ? मैंने कहा अपने कमरे में...मैं यहीं रुका हूं. जवाब मिला...आप नहीं जा सकते..रिसेप्शन पर जाइए.
मैंने कहा, मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा रिसेप्शन पर. मैं यहीं रुका हूं. जवाब आया... तो फिर अपने रुम की चाबी दिखाइए.

मैंने चाबी दिखाई तो गार्ड झेंप गया और मुझे जाने दिया गया.

वैसे मुझे एक बार लंदन बम धमाकों के बाद भी रोका गया था जांच के लिए.जांच के बाद दी गई पुलिस की पर्ची आज भी मेरे पास है. तब मेरे बाल लंबे थे और दाढ़ी भी थी.

मैं अब कमरे में हूं और वाकई शीशे में देख कर सोच रहा हूं कि मैं कैसा दिखता हूं.

इस बार भी शायद मेरी दाढ़ी ने गड़बड़ कर दी. या फिर उस हरे-काले क़ाफिये ने जो मेरे गले में है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 11:28 IST, 03 मई 2009 Deepak Tiwari:

    निडरतापूर्वक इस पोशाक में आप पत्रकार दिख रहे हैं.

  • 2. 14:17 IST, 03 मई 2009 vivek kumar pandey:

    आप वाकई में बहुत स्मार्ट और समझदार दिख रहे हैं.

  • 3. 14:58 IST, 03 मई 2009 Rabindra Chauhan,Tezpur,Assam:

    सुनकर अच्छा लगा कि अब बड़े होटल चौकस तो ज़रूर हुए हैं. ये मायने नहीं रखता कि कौन पत्रकार है और कौन सेलिब्रिटी है. मैं उस गार्ड को थैंक्स कहते हुए ये भी कहना चाहूँगा कि सिर्फ़ शक्ल देखकर ही तलाशी नहीं होनी चाहिए.

  • 4. 15:19 IST, 03 मई 2009 Raj:

    चिंता मत कीजिए. आप युवा भारतीय लगते हैं. सुरक्षा बलों को अपना काम करने दीजिए लेकिन उनसे सहयोग भी कीजिए.

  • 5. 15:33 IST, 03 मई 2009 SHIV KUMAR:

    वाक़ई आप पत्रकार ही लगते हैं. आपको आतंकवादी बताना ग़लत है. आपका लुक भी चिरंजीवी से मिलता-जुलता है.

  • 6. 16:01 IST, 03 मई 2009 भूपेंद्र :

    आतंकियों की तरह थोड़े बहुत नज़र तो आ रहे हैं. लेकिन अच्छा है कम से कम कुछ लोग डरेंगे तो सही. किसी ने सही ही कहा है भय बिनु होइ न प्रीति.

  • 7. 18:18 IST, 03 मई 2009 ziad:

    सुरक्षाकर्मी ग़लत नहीं हैं. अगर आपका हुलिया ऐसा हो तो.

  • 8. 18:56 IST, 03 मई 2009 Piyush:

    सुशीलजी, बंद कमरे में काला चश्मा, बढ़ी हुई दाढ़ी और मूँछें. आप आतंकवादी तो नहीं पर यूपी-बिहार के बाहुबली नेता ज़रूर दिख रहे हैं. हो सकता है सुरक्षाकर्मियों का तरीका ग़लत हो पर उद्देश्य उम्दा है. हमारी सुरक्षा के लिए उनको काम करने दीजिए.

  • 9. 19:14 IST, 03 मई 2009 Satish Ranjan:

    सुशीलजी, मेरी सलाह है कि अगर गार्ड आपको रोकता तो आपको उसे पहले ही बता देना चाहिए था कि मैं रिसेप्शन से ही आ रहा हूँ और मेरे पास यह चाबी है. उस वक्त आपको ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता. आज के समय में हमें सुरक्षा कर्मियों के साथ सहयोग करना चाहिए न कि इन परिस्थितियों का बुरा मानना चाहिए. कृपया निजी ब्लॉग लिखने के बजाय सकारात्मक पत्रकारिता पर फ़ोकस करें.

  • 10. 19:30 IST, 03 मई 2009 शशि सिंह :

    हा हा हा... सुशील भाई, न तो आप चिरंजीवी दिखते हैं न ही आतंकवादी. अलबत्ता आपके इस हुलिये के साथ आपकी फटफटिया यानी कि आपकी बुलेट की भी संगत हो जाये तो आप बिहार के रंगदार जरूर लगेंगे.

    यात्रा में हो रहे आपलोगों के ये खट्टे-मीठे अनुभव पाठकों के लिए ख़बरों की दाल में बघार का मज़ा दे रहे हैं.

  • 11. 20:53 IST, 03 मई 2009 Rajiv bishnoi:

    अब बीबीसी वैबसाइट के पास कोई मुद्दा नहीं रहा बहस करने को जो ऐसे बेतुके, फ़ालतू ब्लॉग को छापा है. पत्रकारिता का ये स्तर देख कर दुख होता है.

  • 12. 23:18 IST, 03 मई 2009 राजेंद्र सिंह:

    आप कैसे दिख रहे हैं ख़ास मायने नहीं रखता. खुशी तो इस बात की है की सभी होटल्स आजकल सतर्कता बरत रहे हैं. सुरक्षा व्यवस्था यूरोप की तरह हो जानी चाहिए. आप बिना पासपोर्ट के टिकट भी नहीं ख़रीद सकते. होटल में रुकना तो बहुत दूर की बात होगी. सुरक्षाकर्मी को धन्यवाद.

  • 13. 00:13 IST, 04 मई 2009 rajkumar yadav:

    इतनी सी बात और आप तमतमा गए! अरे हज़ूर ज़रा उस आम आदमी के बारे में सोचिए जो रेलवे स्टेशन, बस अड्डों पर रोज़ाना सुरक्षा के नाम पर कैसी कैसी समस्याओं से गुज़रता है.

  • 14. 00:38 IST, 04 मई 2009 Krishna Tarway:

    पूरे देश में माहौल ऐसा है सुशील जी कि पूछिए मत. पिछले महीने मैं सूरत में था. मेरी यह पहली गुजरात यात्रा थी. सूरत में मैं जगह जगह सार्वजनिक स्थलों जो कि काफ़ी आकर्षक लग रहे थे, के चित्र अपने मोबाइल कैमरे में उतार रहा था. और उसके कुछ ही महीने पहले गुजरात के कई शहरों में बम विस्फोट हुए थे. मैं डर रहा था कि चित्र उतारते हुए मुझे कहीं सूरत पुलिस पकड़ न ले लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

  • 15. 04:26 IST, 04 मई 2009 Dhananjay Nath:

    मेरी नज़र में आप सत्या फ़िल्म के चक्रवर्ती जैसे दिखते हैं.

  • 16. 05:11 IST, 04 मई 2009 alok puranik:

    बिलायूतून उल खुर्रमाखुर्रम तंजीमेउल वालेउल खुराफ़ात नामक आतंकवादी संगठन
    के पढ़े लिखे से प्रवक्ता लग रहे हैं. भगवान करे, ये आतंकवादी संगठन चिरंजीवी ना हो. साउथ में जाकर क्या नहाना छूट जाता है.

  • 17. 05:13 IST, 04 मई 2009 amaan:

    आपको पहले यह सोचना होगा कि आपको क्या लिखना है. इस ब्लॉग का कोई मतलब नहीं है.

  • 18. 05:16 IST, 04 मई 2009 bholaram:

    सुशील जी ने अपने ब्लॉग में चिरंजीवी से हुलिया मेल खाने का ज़िक्र किया है. मुझे बेदह नाराज़गी है कि लिखने वाले ने कुछ भी ब्लॉग लिख दिया और संपादकीय मंडली ने उसे छाप भी दिया. कम से कम बीबीसी को तो अछूता रहने दीजिए. मेरा विनम्र निवेदन है कि बीबीसी को मज़ाक मत बनने दीजिए.

  • 19. 07:08 IST, 04 मई 2009 Pradeep Jha:

    कृपया ऐसी बेकार सामग्री को प्रकाशित कर बीबीसी की प्रतिष्ठा को कम मत कीजिए जिसका सामाजिक या राजनीतिक महत्व की किसी रणनीति से कोई संबंध न हो.

  • 20. 07:38 IST, 04 मई 2009 Rajiv Ranjan:

    क्या बीबीसी के पास आजकल ख़बरों की कमी हो गई है? जहाँ देश को धर्म निरपेक्ष बनाने की बात होनी चाहिए, वहाँ पर हिंदू और मुसलमानों की बात हो रही है. बीबीसी अब धर्म निरपेक्ष नहीं है. पता नहीं बीबीसी को क्या हो गया है?

  • 21. 09:26 IST, 04 मई 2009 गिरीन्द्र नाथ झा:

    सुशील भाई बिंदास लग रहे हैं. बाल भी बढ़ा लीजिए और अपने ब्लैक बुलेट पर बैठ
    जाइए तब लगेंगे असली हीरो. वैसे जेएनयू में मामू के ढाबे में इस वेश में आईएगा तो कोई चेक-चाक नहीं करेगा आपको.

  • 22. 09:39 IST, 04 मई 2009 sabiha:

    जिस तरह पुरानी हिन्दी फिल्मों में डाकू होने का मतलब काले कपड़े पहनना और माथे पर तिलक लगाना होता था उसी तरह आजकल दाढ़ी रखने का मतलब आतंकवादी होना है. अगर आप क्लीन शेव होते तो गार्ड आपको नहीं रोकता. हमें यह समझने की ज़रुरत है कि आतंक का कोई चेहरा नहीं होता.

  • 23. 11:12 IST, 04 मई 2009 Santosh Kumar:

    मेरी नज़र में बहुत ही बेतुका किस्सा है यह!

  • 24. 11:21 IST, 04 मई 2009 Suraj Sharma:

    ये तो आपकी ही ग़लती है. आपको भारत के वर्तमान हालात को देखकर ही व्यवहार अपनाना चाहिए. सुरक्षा कर्मी को सलाम और आपके लिए एक सलाह- आप अपने काम पर ध्यान लगाएं, न कि इस पर कि आप कैसे दिखते हैं.

  • 25. 12:20 IST, 04 मई 2009 Ramkrishna Murmu:

    मुझे एक बात समझ नहीं आती कि आजकल हम लोग सुरक्षा कर्मियों को सहयोग देने से हिचकते क्यों हैं. सुरक्षा कर्मी ने रोक कर कोई ग़लती नहीं की. ये बात आपके अंह को छू गयी है शायद ....

  • 26. 14:59 IST, 04 मई 2009 jaswinder singh:

    यहाँ अमरीका में सिक्योरिटी चैक के दौरान गार्ड उस व्यक्ति से पूछता है कि इस बैग में क्या है. अगर वह व्यक्ति मज़ाक में भी कह दे कि इसमें बम है तो उस व्यक्ति को पूरे पुलिस प्रोटोकॉल के साथ तुरंत ग़िरफ़्तार कर लिया जाता है. आप सोच ही सकते हैं कि उस व्यक्ति के साथ क्या किया जाता होगा. हम भारत को बहुत हल्के से लेते हैं. अब समय बदल गया है. गार्ड ने अपना काम सही प्रकार से किया. मैं यह नहीं कह रहा कि दाढ़ी बुरी होती है लेकिन आप ख़ुद को परेशानी में क्यों डालना चाहते हैं. मैं 1971 से बीबीसी का प्रशंसक हूँ और इसे सुनते सुनते ही बड़ा हुआ हूँ. और बीबीसी की हर बात पर मुझे गर्व होता है. बस मुझे इतना ही कहना था.

  • 27. 16:39 IST, 04 मई 2009 Akhilesh Chandra:

    सुशीलजी, उसने आपकी आवाज़ नहीं सुनी होगी..पक्का!

  • 28. 17:46 IST, 04 मई 2009 rajeev:

    इसमें गार्ड की क्या ग़लती है. वो तो अपनी ड्यूटी कर रहा है. आपका चेहरा ही ऐसा है तो कोई क्या कर सकता है. भारतीयों में यही तो समस्या है कि किसी को अपना कर्तव्य सही से निभाने नहीं देते. यहाँ तक कि आप पत्रकार भी. आप बीबीसी के पत्रकार हो गए हो तो क्या कोई लाट साहब हो गए.

  • 29. 20:46 IST, 04 मई 2009 Anmol Kumar:

    सुशील जी आप इस बात को दिल पर ना लें ! एक पत्रकार के नाते आप एक नायक भी हैं और एक आतंकवादी भी! वो ऐसे कि एक पत्रकार ही हैसियत से आप एक नायक की तरह जनमानस की आवाज़ सत्ता के गलियारों तक पहुचाते हैं और एक आतंकवादी की तरह सत्ताधारियों मे आतंक फैलाते हैं, ये एक सच है कि सत्ता में बैठे लोग पत्रकारों से बहुत आतंकित होते हैं! चलिए आपको किसी ने तो अहसास करवाया की आप पत्रकार लोग नायक और आतंकवादी दोनों होते हैं!!

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