ट्रेन ब्लॉग-मुंबई से हैदराबाद
मुंबई से हैदराबाद का रास्ता क़रीब सत्रह घंटों का है और ये सत्रह घंटे भारत की वो तस्वीर दिखाते हैं जो अब तक मैं अख़बारों में कभी कभी देखता रहा था.
महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाक़ों से होती हुई ट्रेन कर्नाटक के रास्ते होते हुए जब आंध्र प्रदेश में प्रवेश करती है तो मिट्टी का रंग भूरे और सलेटी से काला होता चला जाता है.
गर्मी बढ़ती जाती है और धूप में हाथ निकालने पर जलन का अहसास होता है. लेकिन इसी तपती गर्मी में यहां के किसान कपास, ज्वार और धान उगाते हैं.
जब अनाज न पैदा हो तो मज़दूरी करते हैं और जब मज़दूरी न मिले तो आत्महत्या करने पर मज़बूर हो जाते हैं.
वाडी स्टेशन के पास जब ट्रेन रुकी तो मैं यूं ही प्लेटफ़ॉर्म पर उतर गया बस कुछ तस्वीरें उतारने.
वहीं मुझे मिले मोहन, सिद्धू और ठाकुर नायक. मोहन के मैले कुचैले कपड़े और बढ़ी हुई दाढ़ी ने मेरे कैमरे का ध्यान आकर्षित किया.
मैंने जब मोहन से बात करनी शुरु की तो उसने बताया कि वो मज़दूर है. लेकिन उसे मज़दूरी क्यों करनी पड़ी, वो कहते हैं, '' मेरे पास थोड़ी सी ज़मीन है जिसमें गेहूं उगता है लेकिन पानी की बहुत कमी है. बहुत पैदावार नहीं होती. मज़दूरी नहीं करुंगा तो भूखे मर जाऊंगा.''
ठाकुर नायक और सिद्धू की हालत भी बहुत बेहतर नहीं दिखती. दोनों ही पत्थर की खदान में काम करते हैं.
ठाकुर नायक कहते हैं, ''हम बंजारे हैं. मेरे पास थोड़ी ज़मीन है. उस पर थोड़ा बहुत उगाते हैं लेकिन उससे गुज़ारा नहीं होता. पत्थर निकालने के काम में कुछ पैसा कमा पाते हैं. मेरी बीवी भी यही काम करती है.''
जिस प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर मैं ठाकुर नायक से बात कर रहा था वो पत्थर भी ठाकुर के हाथों से निकल कर यहां आया होगा. जब मैंने ये बात पूछी तो वो बोले, ''मुझे मालूम है कि जो पत्थर हम निकालते हैं वो मंहगा होता है लेकिन उतना पैसा हमें नहीं मिलता. खदान से ट्रकों में पत्थर भरकर ले जाते हैं और उससे बड़ी इमारतों बनाई जाती हैं. हमें तो सौ डेढ़ सौ मिलते हैं इस कठिन काम के. ''
इलाक़े में पानी की कमी है इससे कोई इंकार नहीं करता है. प्लेटफॉर्म पर खड़े होने पर ही पता चलता है कि गर्मी कितनी ज़बर्दस्त है.
मोहन कहते हैं, ''यहां पानी बहुत कम है. सिर्फ़ बारिश के पानी से खेती कर पाते हैं. जो बड़े किसान हैं वो बोरिंग लगा लेते हैं लेकिन उन्हें भी बहुत फ़ायदा नहीं है. हम तो भूखे मर जाएंगे अगर मज़दूरी नहीं करेंगे.''
बातचीत के बाद मुझे लगा मानो काली मिट्टी पर सफेद कपास और अनाज उगाने वाले इन किसानों का जीवन यहां की मिट्टी की तरह स्याह हो गया है.
जब वापस ट्रेन में बैठा तो पता चला कि इस इलाक़े में भी किसानों ने आत्महत्याएं की हैं लेकिन अख़बारों में इनके बारे में छपा नहीं है.
मुंबई की चकाचौंध भरी दुनिया से निकला तो दिमाग में हैदराबाद का ख़्याल था और साथ ही ख़्याल था सूचना प्रौद्योगिकी के ज़रिए बने साइबराबाद का.
सोचा नहीं था कि इन दोनों आधुनिक शहरों के बीच भारत की सबसे दुखद तस्वीर देख सकूंगा जिसके बारे में अब तक पढ़ा ही था.
मुझे लगता था कि किसानों का दुख जानने के लिए अंदरुनी इलाक़ों में जाना पड़ता है लेकिन ऐसा नहीं है.
किसी भी शहर से बाहर निकलने के बाद आंखें खुली रखें तो हमें देश के असली अन्नदाताओं की खस्ताहाल छवि बिल्कुल साफ दिख सकती है.

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वर्ष 1996 में कनाडा आने से पहले में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (भेल) में काम किया करता था, जिस दौरान हमें भारत के दूर दराज़ इलाक़ों में जाने का अवसर मिला. आपने ग्रामीण भारत की जो तस्वीर को पेश की है उसी एहसास से हमें भी गुज़रना पड़ा था. सिर्फ़ फ़र्क़ इतना है कि हमने कभी भी किसानों की आत्महत्या के बारे में नहीं सुना था. उद्योगिक क्रांति के साथ ही ग़रीब लोग ग़रीब होते जा रहे हैं. सरकार को इनके लिए कुछ करना चाहिए. ये लोग आस लगाए हुए हैं, और एक दिन इनकी भी ज़िंदगी रंग लाएगी. हमें भारत में एक मज़बूत और ईमानदार सरकार की आवश्यकता है. हमारे प्रतिनिधि अपने रिश्तेदारों के लिए ही काम करते हैं. हम लोग नक़ल करने में मास्टर हैं और हमारे नेता पश्चिम के समाज को समझे बिना ही उनकी नीतियों की नक़ल कर रहे हैं और यही परेशानी की वजह है.
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन यह कड़वी सच्चाई है. जो लोग हमें जीवन देते हैं, वो इतनी ख़राब स्थिति में हैं. चुनाव के समय किसी भी राजनेता को उन हज़ारों किसानों की फ़िक्र नहीं है, जो भुखमरी की हालत में हैं. लेकिन वो समय ज़रूर आएगा जब वे अन्नदाताओं की शक्ति समझेंगे. क्योंकि आप पैसे से ज़िंदगी नहीं ख़रीद सकते.
ये हमारे किसानों की असली तस्वीर है. बहुत अच्छी कहानी.
सुशील जी की बात बिल्कुल सच है कि किसानों की दुःखद स्थिति देखने के लिए हमें शहर से अधिक दूर नहीं जाना पड़ता है. ये बात अब प्रकाश में भी नहीं आती. अख़बार वाले छापते नहीं क्योंकि लोग इसको पढ़ते नहीं. लोग इसको पढ़ते नहीं क्योंकि इसमें कुछ ख़ास नहीं. अगर कल को खुदकुशी को एक विकल्प की तरह देखने वाला किसान आज अख़बार में किसी की आत्महत्या की ख़बर पढ़ेगा तो उसके चेहरे पर मुस्कान तो नहीं आएगी ना? व्यक्ति उसी चीज को पढ़ता या देखता या पढ़ाना या देखना चाहता है जो एक आस पैदा करे. शायद ये पसंद ही वो कारण रही होगी जिससे फणीश्वरनाथ रेणु की लिखी कहानी 'मारे गए ग़ुलफ़ाम' पर बनी फिल्म 'तीसरी कसम' लोगों ने पसंद नहीं की.
आपने देखा और लिखा इसके लिए बहुत धन्यवाद.
असलियत और भी ज़्यादा ख़तरनाक है. किसानो के पास प्रकृति से प्रार्थना करने के अलावा कोई चारा नहीं है . मैं दोष सरकार को भी नहीं देता क्योकि जब भी कोई योजना सरकार ले के आती है तो बीच मे बैठे लोग उसे चबा जाते है. बीमा कंपनियाँ खेती के मामलो में ज़्यादा पड़ना नहीं चाहती. परन्तु सबसे ज्यादा दुखद है इन समस्याओ को नज़र अंदाज़ कर देना . हम देश की अर्थव्यवस्था को लेकर ख़ुश होते रहते है कि ये तो बहुत अच्छी चल रही है और सारा श्रेय आईटी और बीपीओ को देते रहते है लेकिन वास्तव में इनका राष्ट्रीय योगदान बहुत ही कम है या नगण्य है. लेकिन बहुत चकाचौंध होने के कारण अख़बारों, चैनलों और लोगो की जुबानों पर हमेशा चढ़े रहते है .. और मूल समस्याओं को अनदेखा कर देते है. मैं स्वयं किसान परिवार से हूँ इसलिए किसानो की हालत अच्छी तरह पता है और फ़िलहाल आईटी मे काम कर रहा हूँ इसलिए इस दुनिया को भी समझता हूँ .
किसान भारत की जड़ है और बहुत कमज़ोर और बेहाल है. अगर देश का भविष्य सुधारना चाहते हैं तो किसानो की तरफ़ देखना होगा. उनकी समस्याएँ हल करनी होगी और देश में अधिकाधिक कृषि धन उत्पन्न करना होगा और ये काम किसी एक के भरोसे नहीं हो सकता . सरकार, उद्योगपति और आम आदमी सभी को सकारात्मक रवैया अपनाना होगा और किसानो की मदद करनी होगी. बड़े-बड़े शो रूम्स में जिनमें ज़रूरत से १० गुना ज़्यादा बिजली ख़र्च होती है, बचा कर किसानों तक पहुँचानी होगी. जितनी भी बिजली उत्पादित होती है उसका बँटवारा सही ढंग से करना होगा. बिजली की चोरी बड़े पैमाने पर रोकनी होगी. लकड़ी का उपयोग कम कर के पेड़ पौधो को कटने से बचाना होगा. फसल बीमा योजनाओं मे मूलभूत सुधार लाना होगा. नकली बीजो और खादों की धरपकड़ करनी होगी. बड़े-बड़े कारखानों मे पानी की फिजूल खर्ची रोकना होगी. किसानो के लिए तकनीकी उपलब्ध करनी होगी. फसल को बीमारियो से बचाने और उनका इलाज़ करने का इंतज़ाम करना होगा. मौसम विभाग की सूचनाये सुधारनी होंगी और उनको किसानो तक पहुचाने का सही इंतज़ाम करना होगा. मंदी और बाज़ार को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना होगा. अच्छी खेती की जमीन को खोजना होगा और ख़राब हो चुकी जमीन के किसानो को देना होगा . स्थानीय मौसम के हिसाब से पारंपरिक फसलो के अलावा नयी चीजो की खेती करनी होगी. असलियत मे कृषि विज्ञान मे सुधार लाकर उसको प्रायोगिक बनाना होगा. और भी बहुत कुछ करना होगा... लेकिन आईटी की चकाचौध .. सेंसेक्स का उतार चढाव ... राजनीति की उठापटक ... क्रिकेट के खुमार ........किसी को फुर्सत मिले तब तो
भारत में किसानों के लिए यह बुरी ख़बर है. मैं नहीं जानता कि सरकार कैसे इनकी मदद कर सकती है. लेकिन उसे इन इलाक़ों में पानी लाने की व्यवस्था करनी चाहिए.
प्रिय दोस्त. आपका सिद्धांत बहुत अच्छा है. मैं एक किसान परिवार से आता हूँ. ये समस्या भारत सरकार और राज्य सरकार से हल नहीं होगी.
मैं मजदूर मुझे देवों की बस्ती से क्या, अपने हाथों से कितनी ही बार हमने इस धरा पर
स्वर्ग बनाए है.काश सुशील जी ये सरकारी उपेक्षा के शिकार किसान टर्नड मजदूर भी अपनी
गरीबी पर रामधारी सिंह दिनकर की तरह गर्व से अपने फक्कड़पन गीत गा पाते.
आप मान लें सुशील कि भारत ग़रीबों का देश है और देश के अन्नदाता बदहाल है
और ये सरकार पूर्व एनडीए गर्वनमेंट के इंडिया शाईनिंग के नारे की तरह जय हो गीत गा रही है.
ये बीबीसी ही है जिसने वर्ष 2004 के आम चुनाव में भी तेलगाना व दक्कन में गरीब किसानों की आत्महत्याओं की कवरेज कर एनडीए गर्वनमेंट व नायडू के साइबर क्रांति की हवा निकाल दी थी.
नतीजा चुनाव परिणाम के बाद सामने आया. आज जब हम अन्य मीडिया हाउसों के बारे में
राजीतिकदलों को पैकेज देकर व बदले में धन लेकर उनको कवरेज देने की खबरें आ रही है. ऐसे में
खो रहा है दिशा का ध्यान, स्तब्ध है पवन चार ये जो पीछे है अंबूधर विशाल की तरह बीबीसी ही सरकार के खोखले दावों की बघिया उधेड़ सकती है। सलाम इस जज्बे को सुशील जी.
मैं आपका का आभारी हूं कि आप भारत के अनछुए और अनदेखे पहलुओं को सामने लाए.मैं नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं लेकिन बिहार के समस्तीपुर के एक गांव का हूं. मैंने ऐसे गांव देखे हैं. मुझे लगता है कि सरकार ग्रामीणों को दोयम दर्ज़े के नागरिकों की तरह देखती है.ये एक तरह का उपनिवेशवाद है. देश में कई चैनल हैं लेकिन कोई भी गांवों की ख़बर नहीं देता है. सरकार मेट्रो शहरों तक सीमित हो चुकी है. यही कारण है कि गांवों में एक समानांतर सरकार चलती है जिसका हमारी केंद्र की सरकारों से वास्ता नहीं रहता.
सुशील जी, आपका लेख पढ़ा।
सही लिखा है आपने काली मिट्टी में काम कर रहे किसानों की जिंदगी भी स्याह हो गई है। छोटे किसानों का देशभर में यही हाल है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कर्ज माफ करने पर भी हालात बहुत ज्यादा नहीं सुधरे हैं। लेकिन अफसोस किसानों की ये स्याह जिंदगी आज राजनीति का 'हॉट केक' बन गई है।
देश के किसानों की हालत आजादी के पहले अंग्रजों ने खराब की और दूसरा उदारीकरण. आज किसानों के नाम पर लोकतंत्र के तथाकथित महापर्व पर राजनीतिक दलों के लोग बड़ी-बड़ी बातें करते दिख रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि सभी राजनीतिक दलों के एजेंडे से किसान गायब हैं.विश्व बैक, विश्व व्यापार सगठन और पूंजीपतियों के इशारों पर नीतियां बनाई जाती हैं.
किसानों का अपने आप को हितैशी बताने वाले आंध्रप्रदेश के चंद्रबाबू नायडू हों या महाराष्ट्र के शरद पवार. इन दोनों प्रदेशों में सबसे अधिक किसानों ने आत्महत्या की लेकिन यह दोनों नेता किसानों के लिए क्या किए हैं.
एक कहेंगे कि हम तो विपक्ष में हैं और दूसरे को क्रिकेट और बिजनेस से छुट्टी नहीं है. यही हालत देश के दूसरे किसान नेताओं की है.आज जरूरत है कि देश के एजेंडे पर किसानों को लाया जाए. अगर किसान बचेगा तभी देश बचेगा।
भारत विविधता से भरा देश है जहां सबकुछ हो सकता है. अगर सकारात्मक सोच रखें तो भारत में प्रतिकूल परिस्थितियां अनुकूल हो सकती हैं.किसानों की सबसे बड़ी समस्या पानी की है. कहीं अधिक तो कहीं कम. अगर राजनेता नदियों को जोड़कर गंदी राजनीति को छोड़कर किसानों के लिए काम करें तो हर चीज़ में आगे निकला जा सकात है. हमारे नेता ऐसा नही चाहते. पंजाब से कितनी नदियां समुद्र में मिलती हैं लेकिन इनका पानी मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा को भी नहीं मिलता है.
दरअसल मुंबई और हैदराबाद के बीच की दूरी भारत और इंडिया के बीच की दूरी है. बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो समस्त भारत की एक ही जैसी सम्सया है. वेदना ये है कि आज भी आम लोगों के विकास के मुद्दों पर भारतीय राजनीति शिखंडी सा व्यवहार करती है. देश के आम आदमी की समस्या चुनावी मुद्दा नहीं है. ये देश किसी तरह से जुगाड़ पर चल रहा है. यहाँ एक की समस्या किसी दूसरे का वरदान बन जाती है.
उम्दा लेख है न जाने विकास चुनावी मुद्दा कब बन पाएगा.
झा जी, यही तो असली भारत है. आप जैसे लोग इसे हाईलाइट करते रहेंगे तो सर्वांगीण विकास के रास्ते खुलेंगे और राजनीतिज्ञ इस पर ध्यान देने पर मजबूर हो जाएंगे.
आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. इस सूचना के लिए धन्यवाद!