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ट्रेन ब्लॉग - मुंबई और महाराष्ट्र

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सुशील झासुशील झा|बुधवार, 29 अप्रैल 2009, 20:37 IST

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मुंबई महाराष्ट्र का आईना न तो है और न कभी हो सकता है. एक शहर एक राज्य पर कितना हावी हो सकता है ये मुंबई में आकर पता चलता है.

कितने लोग यह जानते होंगे कि महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा की सबसे अधिक 48 सीटें हैं यानी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य. लेकिन कोई ये नहीं कहता कि दिल्ली का रास्ता महाराष्ट्र से होकर भी गुज़रता है.

मुंबई से चुनाव लड़ रहे मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त,संजय निरुपम और किरीट सोमाया का नाम लोग जानते होंगे लेकिन कम लोग जानते होंगे कि शरद पवार के अलावा कौन सा बड़ा नेता महाराष्ट्र से चुनाव लड़ रहा है.
ऐसा क्यों है.
अगर लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर की मानें तो ये टेलीविज़न और अंग्रेज़ी अख़बारों की देन है. वो कहते हैं, ''जितने भी अंग्रेज़ीदां पत्रकार टेलीविज़न पर विश्लेषण करते हैं या अख़बारों में लिखते हैं उन्हें विदर्भ और मराठवाड़ा का अंतर भी नहीं पता है.वो बात रखते हैं सिर्फ़ और सिर्फ़ मुंबई शहर की. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उत्तर भारतीयों के बीच झगड़े को सबसे प्रमुखता दी जाती है लेकिन इसमें मरने वालों की संख्या एक होती है जबकि विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या सैकड़ों में होती है.''

मुझे केतकर की बातें कई स्तर पर सही लगीं. पिछले चुनावों में मैं मुंबई को छोड़कर महाराष्ट्र के कई ग्रामीण इलाक़ों में गया था और पूरे राज्य की तस्वीर पेश करने में सफल रहा था. इस बार मुंबई में हूं लेकिन यह बताने में सच में सक्षम नहीं हूँ कि महाराष्ट्र में कैसे परिणाम होंगे.

लेकिन ये बात यहीं ख़त्म नहीं होती. केतकर महाराष्ट्र की राजनीति के कई मिथकों पर से भी पर्दा उठाते हैं.

वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आतंकवाद मुंबई में कोई मुद्दा नहीं है.मैंने जब आम लोगों से बातचीत की तो मैंने भी यही महसूस किया.

तो फिर 26/11 का क्या महत्व है मुंबई के जनमानस के लिए.

केतकर के अनुसार 26/11 ने मुंबई के मध्य वर्ग और ख़ास कर उच्च मध्य वर्ग को झिंझोड़ा है और हो सकता है कि ये मध्य वर्ग मतदान में ज़्यादा हिस्सा ले लेकिन किसी रिकार्ड मतदान की उम्मीद करना सही नहीं होगा.

यही हाल उत्तर भारतीयों के मुद्दे का भी है. केतकर कहते हैं कि राज ठाकरे के लिए वैसा माहौल नहीं है जैसा बाल ठाकरे के लिए था. बाल ठाकरे ने मराठियों में 'एक समुदाय' की भावना जगाई थी जबकि राज ठाकरे 'मराठी अस्मिता' पर ज़ोर देते हैं.

हां राज ठाकरे की पार्टी शिव सेना के वोट काट कर उनका खेल ख़राब कर सकती है.

पूरी बातचीत में मुझे यही लगा कि अब तक मैं महाराष्ट्र को मुंबई के आईने से ही देखता रहा था और अब मेरी आंखें खुली हैं. दिमाग पर ज़ोर दिया तो पाया कि कुछ ऐसा ही हाल कर्नाटक का है जिसे हम बंगलौर के आईने से देखते हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:16 IST, 30 अप्रैल 2009 Jay Bharat:

    मरने वालों की संख्या एक हो या एक हज़ार, इन सब बातों के लिए राजनीतिक पार्टियाँ ज़िम्मेदार हैं, जो राष्ट्रीयता की जगह क्षेत्रियता पर राजनीतिक रोटी सेंकने की कोशिश करते हैं. एक बात स्पष्ट है ग़रीब आपस में अधिक लड़ते हैं जबकि अमीर लोग आपस में कम झगड़ते हैं और इसकी वजह साफ़ अमीर लोगों के पेट भरे हुए होते हैं. जिनके पेट नहीं भरे होते हैं उन्हें झूठी दिलासा देकर राजनीतिक पार्टियाँ अपने-अपने फ़ायदे के लिए माहौल बनाते हैं. अगर टैक्स से मिले पैसों का सही से उपयोग हो तो ग़रीब भूखे नहीं मरेंगे.

  • 2. 16:24 IST, 30 अप्रैल 2009 tejinders:

    आप की बात से सहमत हूँ. पर विदर्भ के मुद्दों को लेकर तंगदिल होना ये भी ठीक नहीं है.
    लोग जानतें हैं की विदर्भ में किसानो की आत्महत्या कोई छोटी बात नहीं है....
    फिर भी ये खबर बौनी क्यूँ है?
    पत्रकार तेजिंदर सिंह

  • 3. 17:55 IST, 30 अप्रैल 2009 भूपेंद्र :

    आपने सही कहा कि कोई भी शहर कैसे राज्य पर हावी हो जाता है। इसकी मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहर जीती जागती मिसाल है। जब कभी भी महाराष्ट्र का जिक्र आता है, मुंबई की तस्वीर जहन में उभर कर सामने आ जाती है। हमें इससे बचने की जरूरत है। हमें उन इलाकों के बारे में सोचना होगा जहां विकास की बयार अभी तक नहीं पहुंच पाई है, जैसे विदर्भ।

  • 4. 05:55 IST, 01 मई 2009 Jeetendra Kumar:

    मुंबई कभी भी भारत की किसी समस्या या किसी ख़ुशी का आईना नहीं रहा है. यहाँ लोग केवल पैसा कमाने जाते हैं और अब इस काम में भी उन्हें मुश्किल आ रही है. वजहें साफ़ हैं एक विश्व आर्थिक मंदी और दूसरा राज ठाकरे का झूठा मराठी प्रेम.

  • 5. 14:59 IST, 01 मई 2009 अश्‍वनी कुमार निगम:

    कुमार केतकर जैसे वरिष्ठ और जमीनी पत्रकार की बातों से हम सबको सहमत होना चाहिए. हमारे देश के अंग्रेजीदां पत्रकार और तथाकथित बुद्विजीवी देश और समाज की कितनी सतही जानकारी रखते हैं यहा समय-समय पर सिद्ध हुआ है. सिर्फ मुंबई का ही पूरा महाराष्ट्र समझने वाले यह सोचते है कि असली भारत महानगरों में ही बसता है जबकि सच्चाई यह है कि भारत आज भी गांवों और छोटे शहरों में रहता है.जिस तरीके से महाराष्ट्र के मराठवाड़ा,विदर्द और पश्चिमी महाराष्ठ्रा और कोंकण की न सिर्फ समस्याएं अलग हैं बल्कि समाज की बनावट और संस्कृति भी अलग है.यही हाल उत्तर प्रदेश का हैं जिसमें पूर्वांचल,अवध,बुंदेलखंड,रूहेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रहन-सहन,खानपान और मुद्दे अलग हैं कि जनता के सरोकारों और समस्याएं भी विभिन्न हैं लेकिन इस प्रदेश का विश्लेषण करते हुए भी लोग एक जैसा ही करते हैं. अच्छी बात यह है कि इन अल्पज्ञानी विशेषज्ञों से यहां की जनता कभी प्रभावित नहीं होती है और इन लोगों का विश्‍लेषण हमेशा गलत साबित होता है.आज देश को जरूरत कुमार केतकर जैसे पत्रकारों की है जो अंग्रेजी का पत्रकार होते हुए भी न सिर्फ मराठी बल्कि देशी की जनता की भाषा में राष्ट्रीय पत्रकारिता कर रहे हैं.

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