ट्रेन ब्लॉग- वो रात भूलती नहीं

26 नवंबर के हमले झेलने वाला मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल अब फिर से सामान्य दिखता है.
कमाल की बात ये है कि यह टर्मिनल चरमपंथी हमले झेलने के चार घंटे बाद भी सामान्य हो गया था. रात के करीब दस बजे स्टेशन पर गोलियां चली थीं लेकिन सुबह चार बजे पहली लोकल ट्रेन अपने नियत समय पर चली थी.
स्टेशन मैनेजर अशोक कुमार तिवारी उस रात को याद करते हुए संज़ीदा हो जाते हैं. वो कहते हैं, ''मैं डिनर करने बैठा ही था कि मुझे फ़ोन आया कि स्टेशन पर गोलाबारी हो रही है. मैं तुरंत चल दिया लेकिन सुरक्षा कारणों से मुझे स्टेशन पर आने में देरी हुई. पुलिसवाले मुझे भी स्टेशन पर आने नहीं दे रहे थे.''
जब वो स्टेशन पहुंचे तो क्या चल रहा था उनके दिमाग में, तिवारी कहते हैं, ''मेरे मन में बस एक ही बात थी कि जितनी जल्दी हो सके मुझे स्थिति सामान्य करनी है ताकि ट्रेनें ठीक समय पर चल सकें.''
तो किया क्या उन्होंने, तिवारी कहते हैं, ''मेरे स्टाफ कोई भी व्यक्ति स्टेशन छोड़कर नहीं गया था. हम काम कर रहे थे. घायलों को अस्पताल भेजना था और मृतकों को भी.''
क्या वो क्षण याद हैं उन्हें, तिवारी कहते हैं कि वो रात भूलती नहीं उनसे. वो कहते हैं, ''चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था. मानो खून का तालाब बन गया हो. मैं उसी के बीच खड़ा था और उसे साफ करवाने की कोशिश कर रहा था. घायल लोग फैले हुए थे. कई लोग मारे गए. मेरे ऑफिस में गोलियों के निशान आज भी हैं.''
तो क्या उन्हें इसके दुस्वप्न भी आते थे, तिवारी कहते हैं, ''बिल्कुल आते थे. मेरे सपनों में मुझे खून का तालाब दिखता था. मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया था. मैं दो तीन घंटे से अधिक सो नहीं पाता था. फिर मैं डाक्टर के पास गया. दवाइयां ली तब आराम हुआ. क़रीब दस पंद्रह दिन मैं बहुत परेशान रहा.''
तिवारी धार्मिक व्यक्ति हैं, कृष्ण के उपासक. वो कहते हैं, ''मैं इस्कॉन का सदस्य हूं. हमें मंत्रोच्चार करना होता है 16 बार लेकिन जब मैं परेशान हुआ तो मैं और अधिक मंत्रोच्चार करता था.''
तिवारी के लिए मुंबई के हमले बड़ी घटना थी लेकिन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर उनके चार साल के कार्यकाल में कई बड़ी घटनाएं हुई हैं.
वो बताते हैं, '' 2005 में जब बाढ़ आई थी तब भी मैं यहीं था. कई दिनों तक यहां से ट्रेनें नहीं चलीं. स्टेशन के चारों ओर का हिस्सा डूब गया था. स्टेशन को मैनेज करना बहुत मुश्किल था उन दिनों. इसके अलावा 2006 के ट्रेन बम विस्फ़ोटों के दौरान भी मैं यहीं था. उस समय भी अफ़रा तफरी थी लेकिन 26/11 की तुलना किसी से नहीं हो सकती है.''
इस हादसे में मारे गए रेलवेकर्मियों को याद करते हुए तिवारी की आंखे नम हो जाती हैं. वो कहते हैं, ''इंस्पेक्टर शिंदे को मैं अच्छे से जानता था. वो शहीद हुए लेकिन आज भी मेरे मोबाइल में उनका नंबर है. मैंने वो नंबर अब भी नहीं मिटाया है. वो मुझे बहुत याद आते हैं. यहां की सफाई करने वाली भी मुझे याद आती है जो अब नहीं रही.''
अब स्टेशन सामान्य है. कुछ गोलियों के निशान और सुरक्षाकर्मियों की संख्या छोड़ दें तो सबकुछ पुराना सा है बस एक स्मारिका जुड़ गई है जिस पर उन 58 लोगों के नाम है जिनकी मौत स्टेशन पर हुई थी.
इनमें से छह रेलवेकर्मी हैं जबकि बाकी आम लोग हैं. इन 58 लोगों की सूची में 20 नाम मुसलमानों के भी हैं.

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इन 58 लोगों की सूची में 20 नाम मुसलमानों के भी हैं.
ये बात हम सभी को सोचनी होगी कि आतंकवादी की कोई जाति या धर्म नहीं होती है. उनकी गोली में हिंदू या मुस्लिम के लिखा नहीं होता. शिकार होते हैं केवल निर्दोष नागरिक.
सर पूरा लेख लिखने के बाद अंत में मरने वाले 20 लोग मुसलमान थे. ये लिखने की क्या जरुरत थी। खासकर जितना मैंने पत्रकारिता पढी है, उसमें हमें ऐसा कभी नहीं पढाया गया कि किसी ऐसी घटना में मरने वाले लोगों की जाति और धर्म का उल्लेख किया जाए.ये तो सर दंगा भड़काने वाली बात हो गयी.
मुंबई हादसा आज भी सिहरन पैदा करता है.आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता. चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान. सिख या ईसाई. शिक्षा की कमी के कारण मुस्लिम अधिक कट्टर हो जाते हैं और उन्हें बरगला लिया जाता है. आज उन्हें मौलाना आज़ाद जैसे नेता . चाहिए ताकि कट्टरता की आंधी में कोई जिन्ना उन्हें बहला न सके. ऐसा हो तो कोई मुसलमान लादेन और अज़हर महमूद जैसे लोगों के बहकावे में नहीं आएगा.
इस समस्या का कोई न कोई समाधान निकलना चाहिए. आख़िर कबतक और कितनी और घटनाओं को याद कर हम अपनी आँख नम करते रहेंगे. आज जब भी 26/11 की बात होती है, लोग ताज होटल की चर्चा करते हैं. सीएसटी के बारे में कम ही बात होती है. क्या अमीरों का ख़ून ख़ून है और ग़रीबों का पानी?
मैं कनाडा में रहता हूँ. वह रात वास्तव में 9/11 और कंधार कांड के बाद एक बड़ी त्रासदी थी. हम क़रीब सारी रात टीवी देखते रहे थे. हमें इस घटना से सदमा लगा था. हममें से कई लोगों को यह लगता था कि जहाँ से ये चरमपंथी आए हैं वहाँ अगले एक-दो दिन में हमला होगा. हम टीवी से तबतक चिपके रहे जबतक की इस कांड का अंत नहीं हो गया.
आपको अपना सोचने का तरीका बदलने की ज़रूरत है. मरने वालों में 20 मुसलमान शामिल होने का क्या मतलब है. वहाँ मरने वाला एक-एक इंसान भारतीय था. अगर मीडिया मरने वालों की धर्म के आधार पर गिनती करना बंद कर दे तो आधी समस्या का समाधान हो जाएगा. मुसलमान भारत का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है.इसलिए उन्हें अनाथ कहना बंद होना चाहिए.
हमें कसाब मामले में अभी भी यह तय करना है कि उसने हमारे देश पर हमला किया है या नहीं. हमें इसराइल से सीख लेनी चाहिए.
बार बार चरमपंथी हमले होने से पता चलता है कि हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था कैसी है, जिसकी वजह से न जाने कितने निर्दोष लोग इसके निशाने पर आ जाते हैं.
मुंबई हमलों जैसे और भी हमलों में न जाने कितने निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं. इन आतंकियों को जड़ से मिटाने के लिए सभी देशों को एक होना होगा तभी इस पर काबू पाया जा सकता है. वरना, यह कैंसर की तरह फैलता जाएगा. अफ़ग़ानिस्तान के बाद पाकिस्तान इसका जीता-जागता परिणाम है. हमें इसराइल और रूस से सीख लेनी चाहिए जो किसी भी क़ीमत पर आतंक के सामने घुटने नहीं टेकते हैं.
कैसे किसी दूसरे की मौत हमारे लिए ख़बर बन कर रह जाती है. 26/11 की घटना के बाद शायद सरकार ने सुरक्षा के लिहाज़ से समुद्री रास्ते पर निगरानी बढ़ा दी होगी. पर बाकी की जो हज़ारों रास्ते हैं उनका क्या. सुरक्षा उपाय इतना घटिया है कि शायद एक बच्चा भी अपने खिलौने की बेहतर सुरक्षा कर सकता है. वैसे भी हमारे देश में कौन सी व्यवस्था बेहतर है. अफ़सोस कि जिनको सामने आना चाहिए वो कहते हैं कि राजनीति, ना बाबा ना.