ट्रेन ब्लॉग- गुजरात, गांधी और मोदी
ये आपकी ग़लती है कि आप गुजरात में गांधी को खोजते हैं.
साबरमती आश्रम के बाहर ऐसा सुनकर अचरज हुआ और वो भी तब जब ये बात बल्कि आश्रम के प्रमुख अमृत मोदी कह रहे हों.
वो कहते हैं, 'ये आपकी ग़लती है कि आप गुजरात में गांधी को खोजते हैं. बुद्ध जिस इलाक़े में पैदा हुए वहाँ कितने बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. जापान, चीन, श्रीलंका में आपको बौद्ध धर्म के लोग मिलेंगे लेकिन, नेपाल, बिहार और उसके आसपास कम ही मिलेंगे. गांधी को भी ऐसे ही समझिए. वो अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका में मिलेंगे जहां उनके मूल्यों की कद्र है.'
और नरेंद्र मोदी के बारे में क्या राय है अमृत जी की, 'कोई राय नहीं है नरेंद्र मोदी के बारे में. वो अपना काम करते हैं मैं अपना काम करता हूं.'
गुजरात का जवाब नहीं है. यह गांधी की भी भूमि है और नरेंद्र मोदी की भी. दोनों की नीतियां एक दूसरे के विपरीत लेकिन दोनों हीरो हैं जनमानस के.
जैसे अहमदाबाद साबरमती आश्रम के बिना पूरा नहीं होता वैसे ही यहां चुनाव से जुड़ी कोई भी बात मोदी के बिना पूरी नहीं होती है. मोदी के साथ ज़िक्र होता है हिंदू मुसलमानों के संबंधों का. हिंदू ये बात गर्व से करते हैं मुसलमान दबी ज़बान में.
हिंदू कहते हैं, 'गोधरा से पहले भी दंगे हुए थे लेकिन उसमें हिंदू मारे गए थे. गोधरा में दो दिन की छूट मिली. हिसाब बराबर हुआ. मोदी ने हमें आत्मसम्मान दिया है और अब विकास दे रहे हैं.हम बीजेपी को नहीं मोदी को वोट देते हैं.
मुसलमान कहते हैं, 'अब सबकुछ ठीक है. यहां दंगे नहीं होंगे. जब तक मोदी साहब हैं यहां शांति ही रहेगी.कुछ नहीं होगा.' ये कहते कहते वो तंज भरे लहज़े में मुस्कुराते हैं आपको बता जाते हैं कि वो असल में क्या कहना चाहते हैं.
लेकिन बच्चों को इतनी नफ़ासत कहां. जुम्मा मस्ज़िद में कुछ मुस्लिम बच्चे बीबीसी का माइक देखकर आ गए.
इन छोटे बच्चों को न तो गांधीजी से कोई लेना देना है और न ही मोदी से
वो कहते हैं, 'हम लोग जिस स्कूल में थे वहां हमें मारा जाता था क्योंकि हम मुसलमान हैं. टीचर धमकी देते थे फेल कर देंगे. पिटाई तो होती ही थी. हमारी क्लास में हिंदू बच्चे हमसे बात नहीं करते थे. हमें परेशान होकर स्कूल छोड़ना पड़ा. अब हम मोहम्मडन स्कूल में पढ़ते हैं और खुश हैं. कोई मारता पीटता नहीं है.'
नया शहर है नया ज़माना है और गुजरात में नया नेता है जिसकी पुराने से तुलना कहने पर अंग्रेज़ी की एक कहावत याद आती है each thesis has an antithesis and then synthesis...

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आपकी टिप्पणी शायद अब यह सोचने पर मजबूर करती है कि बीबीसी भी अब निष्पक्ष नहीं रहा.
गांधीजी को भारत की आज़ादी के लिए लड़ना पड़ा. तब वक्त दूसरा था. नरेंद्र मोदी गुजरात के लिए हैं. अब वक्त कुछ और है. जब भी बदलाव आते हैं तो बहुत कुछ बदलना पड़ता है. थोड़ा समझ कर.......
हमें आज तक यह समझ नहीं आया कि अगर 85 करोड़ हिंदुओं के राष्ट्र में अगर कोई हिंदू की बात करता है तो उसे हिकारत भरी नज़र से क्यों देखा जाता है.
प्रशांत शर्मा की बात में बहुत से गुजराती हिंदुओं की झलक है. यह बहुत दुख की बात है कि 2002 के दंगों की मुश्किल से किसी हिंदू नेता ने आलोचना की होगी. ज़्यादातर नेताओं ने इसे ठीक ठहराया या इसकी सफ़ाई दी. मैं 20 साल पहले गुजरात में काम करता था लेकिन तब के हालात बदल चुके हैं. कुल मिलाकर यह देश के लिए कोई बहुत अच्छी बात नहीं है.
नेपोलियन ने कहा था कि दुनिया में दो शक्तियां हैं तलवार और स्पिरिट यानी आत्मा. लंबी दौड़ में तलवार पर आत्मा की जीत होती ही है. मोदी और उनके सहयोगी जिस हिंदुत्व की बात करते हैं वो कहता है कि सत्य की जीत हमेशा होती है. धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत में त्रिशूल पर बापू के मंत्रों की जीत ज़रुर होगी.
पचासी करोड़ हिंदू का राष्ट्र?? अविनाश कुमार, आपने कैसे सोच लिया कि भारत हिंदू राष्ट्र है? यह देश सबका है. एक मुस्लिम राष्ट्रपति था, और उसने देश को परमाणु शक्ति बनाया. आज भी ख़ान फिल्म इंडस्ट्री में टॉप पर हैं. आज भी गुजरात के दो मुस्लिम भाई भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा हैं. यह सिर्फ़ छोटे दिमाग़ वालों की सोच है कि तू हिंदू और मैं मुसलमान और यह देश मेरा और वो देश तेरा. दंगा कहीं भी हो लेकिन मरने वाले इंसान होते हैं. मानव भगवान की सबसे बेहतरीन सृजन है, लेकिन उन्हें क्या वो देखते हैं कि कितना हिंदू मरा और कितना मुसलमान, ऐसे लोगों पर शर्म आती है. इंसान की मौत पर मातम होना चाहिए नहीं की जश्न. मोदी ने दंगों के बाद अच्छा काम किया है. मगर नफ़रत की राजनीति उनके पास आज भी हैं जोकि एक ग़लत बात है. मैं समझता हूँ कि एक दिन ऐसा आएगा जब इंसान इंसान का दुश्मन ना बल्कि दोस्त बन कर रहेगा.
यह बहुत ही सतही विश्लेषण है. आप एक नारंगी की तुलना एक सेब से कैसे कर सकते हैं? दोनों नेताओं का काल भिन्न और चुनौतियाँ अलग हैं और उनका लक्ष्य भी अलग. गुजरात को जिस तरह से मीडिया में पेश किया जाता है, उससे लाखों गुणा अलग है.
यह सच है की गुजरात गाँधी की धरती है मगर यह भी उतना ही सत्य है की ऐसे व्यकित्व किसी देश या काल की सीमा से बंधे नहीं होते. परन्तु हर समय के लिए अलग-अलग व्यक्ति की ज़रुरत होती है, और इस समय काल के लिए मोदी हैं. दंगे निश्चय ही कलंक है. पर क्या हिन्दू ही इसके लिए दोषी है. इतिहास इसकी गवाही देता है की हिन्दू कितने अत्याचार सहे पर कुछ इतिहासकर इस पन्नो को गायब ही कर देते है और आर्यों के गौमांश खाने पर पूरी किताब लिख देते है. जाति के नाम पर आरक्षण हटाने की बात करने वाले धर्म के नाम पर आरक्षण की वकालत करते है. हिन्दू देवी देवताओ की नंगी तस्वीर बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो कोई मुहम्मद साहब के साथ ऐसा क्यों नहीं करता. तसलीमा नसरीन को देश छोड़ने पर मजबूर करना कहा की बहादुरी है. राम को मिथक बताने वाले क्या यह सिद्ध कर सकते है कि मुहम्मद साहेब को कैसे अल्लाह का दूत सन्देश देता है. कोई यह सिद्ध कर सकता है कि कैसे ईशा मसीह मरने के बाद जीवित हो उठे. या कोई सिर्फ अल्लाह या गोड के अस्तित्व को साबित कर सकता है. नहीं यह कतई नहीं होई सकता है. आस्था को सिद्ध नहीं करते न ही दूसरों की आस्था को चोट पहुंचाते है. ईसाई के लिए वेटिकन सिटी, मुस्लिमो के लिए मक्का मदीना बौद्धों के लिए बोध गया सिक्खो के लिए स्वर्ण मंदिर का जो महत्व है वही महत्व हिन्दुओ के लिए राम मंदिर का है. उसे तो मुस्लमान भाइयों को बड़प्पन दिखाते हुए हिन्दुओ को सौंप देना चाहिए था. यह कहना ग़लत होगा की क्या गारंटी है कि इसके बाद दंगे रुकेंगे वैसे गारंटी ऐसे भी नहीं है इस माहौल में प्रयास तो होना ही चाहिए. हमें एक दूसरे के धर्म ,आस्था का सम्मान करना होगा. हमलोग एक साथ रह सकते है. वस्तुतः हमलोग भारत रूपी बगिये में विभिन्न रंगों सुगंधों वाले फूल है. इसी से बगिये का और फूल का अस्तित्व टिका है. आइए धर्म, जाति, क्षेत्रियता से हट कर नए भारत का निर्माण करें.
प्रशांत शर्मा जी ने ठीक कहा, उनकी राय ही मेरी राय है. कहाँ राजा भोज और कहां गंगुआ तेली.
आख़िर आप ये बात क्यों नहीं मानते कि गोधरा से पहले भी दंगे हुए पर उनमें हिंदू मारे गए थे? आप क्यों नहीं बवाल मचाते उनके बारे में? हिंदू मरे तो मरे कोई ग़म नहीं. कब तक चलेगा ये सब, ऐसी आवाज़ दबा देने से हिंदुत्त्व और मज़बूत होगा जैसे कि मोदी या वरुण के मामले में हुआ. अच्छा लगा ये पढ़कर कि जब तक गुजरात में मोदी जी हैं और दंगे नहीं होंगे. काश पूरे देश के लिए भी कोई ऐसा नेता हो.
सुशील झा ने गुजरात की असल तस्वीर लोगों को दिखाने की कोशिश की तो लोगों को परेशानी क्यों हो भाई. हम हिंदू हैं तो क्या बाक़ी लोगों को जीने का हक़ नहीं है.
मोदी और गुजरात के दंगों का ज़िक्र बीबीसी भी करने लगा. अच्छा होता यदि आप मोदी सरकार का 26 जनवरी के भूकंप के बाद का काम भी बताते. मैंने देखा है गुजरात सरकार का इस स्तर का काम कि अमरीका और चीन भी उनकी कार्यशैली को देखकर बहुत कुछ सीखने को बाध्य हुए. मगर बीबीसी तो बीबीसी है. अब सच नहीं बकवास ही होती है यहाँ भी. गणतंत्र और सूचना क्रांति की जय हो.
ये कहना सही है कि गाँधी उस समय की ज़रूरत थे और मोदी आज की ज़रूरत हैं. भय के बिना प्रीत नहीं हो सकती. लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुमत का सम्मान होना बहुत ज़रूरी है. भारत एक लोकतांत्रिक देश तो है मगर फिर भी ये हिंदुओं का है. क्या हुआ कि कुछ मुसलमानों का देश में योगदान है- उनमें से अधिकतर तो पाकिस्तान का पक्ष लेते हैं. ब्रिटेन, अमरीका और कनाडा में भी बहुत से धर्मों के लोग जाकर रहते हैं मगर फिर भी देश तो स्थानीय लोगों का ही है. इसीलिए मुझे ये कहने में संकोच नहीं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है.
गुजरात का विकास हुआ है....इसमें कोई दो मत नहीं...लेकिन विकास की आड़ में क्या- क्या गुल मोदी साहब ने खिलाए हैं ...ये भी किसी से छिपी नही है...
खैर..पहली बार आपके ब्लाग पर आया....बहुत कुछ नई-नई जानकारियां मिली...
धन्यवाद
बीबीसी की ये तुलना ग़लत है. दोनों ही अपने समय के काफ़ी अच्छे लोग हैं. एमके गाँधी अपने समय में सही थे और मोदी आधुनिक समय में सही हैं. क्या बीबीसी इस तरह चर्चिल और गॉर्डन ब्राउन की तुलना कर सकती है. ख़ैर मैंने कभी भी बीबीसी पर गाँधी या मोदी के बारे में कुछ अच्छा न देखा न सुना.
मानस भाई आपने बिल्कुल आईना दिखाया है उन लोगों को जो कथित अल्पसंख्यक होने का बहाना बनाकर झूठी सहानुभूति के ज़रिए अपने काले कारनामों पर पर्दा डाल देते हैं.
मुझको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे ही पास रे। गांधी को गुजरात में ढूंढने की जरूरत नहीं है। गांधी हर देशवासी के दिल में हैं। हां, यह बात अलग है कि कुछ लोग जानबूझकर उनके सिद्धांतों को भूल जाने में अपनी शान समझते हैं। जहां तक गुजरात की बात है तो अब सभी को हिंदू-मुस्लिम से उपर उठते हुए राज्य के विकास के बारे में बात करनी चाहिए न कि दंगों के बारे में। और मेरे हिसाब से वहां की जनता भी यही चाहती है।
आपके जैसे मीडिया वालों ने ही गुजरात और भारत की छवि ख़राब कर रखी है. कृपया इस तरह की बक़वास और झूठी कहानियाँ लिखना रोकिए जहाँ बच्चों को पीटने की बातें होती हैं. मैं ऐसे स्कूल में पढ़ा हूँ जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों ही साथ साथ बैठकर पढ़ते थे. मेरे पिता ने भी अपने कारखाने में मुसलमानों को रखा था. आपने जो तस्वीर रची है वो मैंने कहीं नहीं देखा.
ईशांत शर्मा ने शायद इतिहास नहीं पढ़ी है, भारत को दुनिया में मुस्लिम बादशाहों ने ही ज़ाहिर किया है, जबकि भारतीय राजाओं ने तो इसे छोटे-छोटे टुकरे में बाँट रखा था और एक दूसरे पर हमेशा हमला करते थे. ख़ैर उस बात को छोड़िए, यह बात सही है कि मोदी ने दंगों के बाद अच्छा काम किया है और हम उम्मीद करते हैं कि वो अच्छा काम करेंगे. क्योंकि दुनिया उम्मीद पर क़ायम है. ईशांत जी ये भी ध्यान रखें कि जब भारत से बाहर जाएंगे तो कई ये नहीं पूछेगा कि आपका मज़हब क्या है बल्कि राष्ट्रीयता पूछा जाता है.
झा साहब! आपकी इस टिप्पणी पढ़ कर ये लगता है कि आप गुजरात की खड़ी धूप में काला चश्मा लगाकर घूम रहे थे. बात चुनावी मुद्दों की करें तो ज़्यादा बेहतर होगा ना कि हिंदू या मुसलमान दंगों के बारे में क्या सोचता है. झा साहब शायद आप कभी दंगे जैसे भयावह राक्षस से रू-ब-रू नहीं हुए हैं, इसलिए आपके लिए हिंदू और मुसलमानों पर टिप्पणी करना इतना आसान है. दंगों में जिसके हाथ में तलवार होती है वो ही हिंदू है या मुसलमान बाक़ी जो अपनी जान बचा रहा है वो भारतीय है. उम्मीद है कि आगे ऐसी पत्रकारिता से पहले एक बार ज़रूर सोचें. और रही बात भारतीय मुसलमानों के लिए तो वो भी एक अच्छी ज़िंदगी और समझ की तलाश में अपने ही लोगों से जूझ रहा है. एक बार उन्हें मौक़ा दीजिए, वो भी अच्छे शैक्षिक संस्थान, अच्छी सड़क और अच्छी समझ चाहते हैं.
क्यों ना हम जनता जाग जाएँ! क्यों ना हम इस तरह के साम्प्रदायिक ब्लॉग के प्रति उदासीन हों. क्यों ना हम भारतीय बनें! क्यों ना हम हिन्दू-मुस्लिम, बिहारी-मराठी वाली भावना से कहीं ऊपर उठें! क्यों ना हम ऐसा करके हम भ्रष्ट नेताओं व मीडिया की दुकान न चलने दें!
ये बिलकुल सही बात है कि मोदी साहब ने जैसा चाहा वैसा गुजरात बनाया. अब कोई मुसलमान गुजरात टूर पर नहीं जाता. गुजरात मोदी साहब को मुबारक हो जहाँ सोहराबुद्दीन जैसे आम मुसलमान को आतंकवादी करार देकर मार दिया जाता है और मारने वालों को मेडल दिया जाता है.
देखिए भाइयों ये बीबीसी का मंच है यहां लड़िए मत. मसला यहां हिंदु व मुसिलम का नहीं है. सांप्रदायिकता का असली चेहरा आम हिंदू व मुसलमान तो बिल्कुल भी नहीं है. ये सियासी खेल है. सत्ता लेने के लिए किसी एक वर्ग में पहले दूसरे के प्रति डर भय आतंक पैदा किया जाता है, फिर एक बार दंगा कराके जनता का पोलराइजेशन एक तरफ़ किया जाता है. जिस तरह गुजरात में दंगों के बाद मोदी ने वहां अमन चैन व विकास का नारा दिया है वो भी उनकी एक रणनीति है. उन्हें मालूम है कि उन्होंने गुजरात के बहुसंख्यक वोट पर क़ब्जा कर लिया है तो अब दंगे कराने का कोई लाभ नहीं. जिन्ना या मुसिलम लीग ने जितने भी दंगे कराए उनमें धार्मिक समस्या तो बिलकुल भी नहीं थी. ये सब सियासी चालें थीं कि किस तरह आम जनता को भड़का के एक छोटा सा देश बनाकर वहीं राज किया जाए. जिन्ना को तो कुरान हदीस या उर्दू का भी इल्म नहीं था. नमाज़ तक नहीं पढ़ते थे. कैसे मुस्लिम जनता ने
उनको अपना नेता स्वीकारा. केवल चंद ज़मीनदार व अमीर मुसलमानों में हिदुओं से उनकी संपति व प्रतियोगिता में पिछड़ने का झूठा भय दिखाकर उनका समर्थन लिया. जिन्ना को सबसे ज्यादा अहमियत व उनको कायदे आजम कहने वाले भी गांधी थे. गुजरात में गांधी नहीं है इसका ये मतलब नहीं कि गांधी जी की लोकप्रियता में कमी आई है. गांधी जी मानवता प्रेम की पूंजी है उनको सिर्फ़ गुजरात में ही खोजना तो सही नहीं होगा. वो तो वैश्िवक धरोहर है और रहेंगे.
मैं समझता हूँ कि लेखक महोदय भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर भारत में दूसरे राजनीतिक नेताओं से प्रभावित हैं.
मोदी गुजरात और भारत के गौरव हैं, वो सांप्रदायिक नहीं हैं. केवल स्वार्थी और कम दिमाग़ के लोगों के साथ-साथ कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के कार्यकर्ता उन्हें ऐसा कहते हैं. मोदी आधुनिकीकरण, विकास और ईमानदारी का नाम है.
आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं कि गाँधी को गुजरात में ढूंढ़ना हमारी ग़लती है. अब मैं समझ गया, अधिक क्या बोलूं?
मैं कभी नहीं मान सकता है कि पुरा गुजरात सांप्रदायिक है, क्योंकि बेशक वहाँ भी बहुत अच्छे लोग हैं. हाँ ये जो कुछ भी आपने लिखा है ये भी सच्चाई है और ये सच शायद दर्द को बढ़ता है.
मुझे लगता है की आप अपना संयम खो चुके हैं .आप जैसे लोगों के कारण ही देश कलंकित होता है जो थोडी सी प्रसिद्दि पाने के लिए हिन्दुओं को कोसते रहते हैं . कम से कम बीबीसी से ऐसी उम्मीद नहीं थी की वो ऐसे लोगों को रिपोर्टिंग के लिए भेजेगी जो सकारत्मक पत्रकारिता की जगह हिदुओं पर आरोप लगाने में ही समय बर्बाद करते हैं और जिन्हें न इतिहास की समझ होती है न वर्तमान की.
मै रणवीर कुमार के बात से सहमत हूँ क्योंके रणवीर भाई जैसे सब भारतीयों की सोच हो जाये तो गुजरात जैसे दंगा कभी कहीं नहीं होगा और यह सही बात है गुजरात में जो कुछ भी हुआ उनमे धार्मिक समस्या बिलकुल भी नहीं थी. यह सब सियासी चालें थी कि किसी तरह आम जनता को भड़का के एक छोटा सा देश बनाके वहीँ राज किया जाये और यह सब मोदी ने इसीलिए किया क्योंकि अगर मोदी गुजरात में सांप्रदायिक दंगा नहीं करवाता तो आज तिन बार मुख्यमंत्री नहीं बन सकते थे.
आलम साहब, सोहराबुद्दीन आम मुसलमान नहीं था. वह अपराधी था, शायद आप चाहते थे कि जिस तरह केंद्र सरकार अफ़ज़ल की ख़ातिरदारी में लगी है वैसा ही कुछ राज्य सरकार भी करती।
मैं एक हिंदू हूँ लेकिन उसके पहले एक भारतीय हूँ. जिस दिन सभी धर्मों के लोग देश को सबसे ऊपर रखेंगे उस दिन सांप्रदायिक दंगे इतिहास बन जाएँगे.
बहुत सारे दोस्त कुछ ज्यादा ही भावुक हो गए हैं . इतिहास की अपनी अहमियत होती है . इतिहास को कभी भुलाया नहीं जा सकता लेकिन जो लोग इतिहास की दुहाई दे कर प्रतिशोध की बात कर रहें उन्हें जरा सोचना चाहिए कि जिस हाथ को कटना चाहते हैं वो हाथ भी अपना होगा .
कोई भी मीडिया मोदी साहब के बिना नहीं चलता. यहाँ तक कि बीबीसी भी. गाँधीजी संत थे तो मोदी भी यति हैं जैसे लक्ष्मण यति, हनुमान यति और गोरख यति हैं.
आपकी बात से घोर असहमती है. पता नहीं आप लोग कब दूराग्रह त्यागेंगे. अगर मुसलमानों के हिमायती ही हैं तो बिहार और उत्तर प्रदेश के मुसलमानों से गुजरात के मुसलमानों की तुलना करें. क्या बकवास मचा रखी है....