« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

रैना कुमारी के सदक़े

पोस्ट के विषय:

وسعت اللہ خان|रविवार, 26 अप्रैल 2009, 06:21 IST

वुसतउल्लाह ख़ान से-
जो बात मुझे चालबाज़, शतरंज के खिलाड़ी, आँकड़े फ़िट करने वाले, फेर बदल के बाँस पर कर्तब दिखाने वाले क़लाबाज़, दो भाषा, दो दिमाग़, दोहरा दिल रखने वाले, दीदा घुमाने वाले, आप के हाथ की दो अंगुलियाँ ग़ायब करने वाले, मुस्कुरा कर हाथ मिलाने वाले, वफ़ा के कपड़े से सिली हुई शेरवानी पहनने वाले बेवफ़ा, दो पल्ली टोपी को उल्टा कर के सत्ता की नाव बनाने वाले नेता प्रकार के लोग और शब्दों के सौदागर और बुद्धिजीवी नहीं समझा सके वो बात आंध्र प्रदेश के एक गाँव की 90 वर्षीया रैना कुमारी ने बिना कुछ कहे समझा दिया.

आप रैना कुमारी को नहीं जानते, दो दिन पहले तक मैं भी नहीं जानता अगर मैं करनौल के क़रीब एक स्कूल में स्थित पोलिंग बूथ पर उसे बाहर निकलते हुए न देख लेता.

इंच भर मोटे शीशों वाला चश्मा दो मैले तार की मदद से उसके दोनों कानों से जुड़ा हुआ था, एक हाथ से लाठी टेकती, बग़ल में दो किलो चावल का थैला दबाए नंगे पांव तप्ती ज़मीन पर आहिस्ता आहिस्ता चलने वाली रैना कुमारी.

उसने मेरा बाज़ू पकड़ लिया, बेटा ये मुझे वोट क्यों नहीं डालने दे रहे हैं?

मैंने कहा कौन?

कहने लगी ये इलेक्शन वाले बाबू.

मैंने कहा क्यों?

रैना कुमारी ज़मीन पर बैठ गई, चावलों की थैली खोली, इसमें भारतीय चुनाव आयोग का मुड़ा-तुड़ा वोटर रजिस्ट्रेशन कार्ड निकाला और मुझे थमा दिया.

बाबू कहता है कि ये नहीं चलेगा. उसके साथ कोई राशन कार्ड वग़ैरह भी लाओ.

मैंने कहा, अम्मा मैं तो ख़ुद यहां अजनबी हूं, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ?

कहने लगी रिक्शे वाले ने यहाँ दस रूपए लेकर पहुँचाया. तू मुझे रिक्शा दिलावा दे ताकि जिनके यहाँ मैंने राशन कार्ड रखवाया है वहाँ से लाकर वोट डालूँ.

मैंने कहा अम्मां तू इस गर्मी में दोबारा क्यों आएगी? मैं रिक्शा दिलवा देता हूं, घर जाकर आराम से बैठ.

कहने लगी आउंगी तो ज़रूर, फिर जाने कब वोट पड़े, मैं रहूँ या न रहूँ.

मैंने कहा अम्मा तुझे उन्होंने क्या दिया, तू अपना हाल तो देख.

कहने लगी उनकी वो जानें, मेरी मैं जानूँ. अब मुझे रिक्शा दिलवा.

अम्मा रैना कुमारी रिक्शे में बैठ कर चली गई और मैं अगले पोलिंग स्टेशन पर जाने के लिए अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया.

प्रजातंत्र रैना कुमारी के अंदर सुरक्षित है या दिल्ली के उस गोल भवन में जहां रैना कुमारी के वोट के सदक़े इकठ्ठा होने वाले रैना कुमारी को जानते तक नहीं, पहचानना तो दूर की बात है.

ख़ुदा जानता है कि मुझे रैना कुमारी वो गाय लगी जिसने इस देश के लोकतंत्र का बोझ अपने सींगों पर उठा रखा है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 07:06 IST, 26 अप्रैल 2009 Shashi:

    मुझे रैना कुमारी की कहानी सुनकर अपने पिता की याद आ गई. 80 वर्ष की उम्र में वो भी 400 किलोमीटर दूर गाँव से पटना आकर वोट दिए थे और उन्होंने यही कहा था कि यह मेरा फ़र्ज़ और अधिकार है. अगर मैं इसका उपयोग नहीं करूँगा तो इसमें लोकतंत्र की हानि है. बीबीसी को बहुत धन्यवाद.

  • 2. 07:08 IST, 26 अप्रैल 2009 Rabindra Chauhan,Tezpur:

    ये हमारी लालफ़ीताशाही से लेकर छोटे अफ़सरों के करतब का कमाल है. रैना जैसे लाखों लाचार होकर चुनाव में शिरक़त नहीं करते मगर उनकी दृढ़ता ही लोकतंत्र की नींव है. हमारे मीडिया भी इसके लिए ज़िम्मेदार है. आपने जिस बात की ओर इशारा किया है शायद ही दूसरे मीडिया वाले उस बात को आगे ले जाएँ.

  • 3. 07:12 IST, 26 अप्रैल 2009 Chander Tolani Muscat:

    आपकी बात दिल पर लगी और दिमाग़ ने सोचने पर मजबूर किया. ऐसा बहुत कुछ हमारे आस पास रोज़ होता है जिसे हम अनदेखा कर देते हैं. अगर यही बात कोई और कहता या लिखता तो शायद उतना असर नहीं करती पर ये आपके लिखने का अंदाज़ ऐसा है कि अंदर तक और बहुत दिनों तक असर रहता है.

  • 4. 07:19 IST, 26 अप्रैल 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल :

    असल में रैना कुमारी ही हमारे जनतंत्र का आधार है. जो लोग राज्यों की राजधानियों या दिल्ली में विधान सभाओं या संसद की शोभा बढाते हैं वे तो इस रैना कुमारी का खून पीने वाली जोंकें भर हैं. आपने प्रजातंत्र की इस नींव के पत्थर को याद किया, यही बड़ी बात है. आपका अभिनन्दन करना चाहता हूँ.

  • 5. 08:18 IST, 26 अप्रैल 2009 Yogesh Jakhar:

    बीबीसी हिंदी, फिर एक बार बेहतरीन रिपोर्टिंग के लिए धन्यवाद.

  • 6. 08:22 IST, 26 अप्रैल 2009 प्रवीण कुमार चतुर्वैदी:

    रैना कुमारी के सदक़े. आँखों में आँसू आ गये. आपका ब्लाग मैं नियमित रूप से पढ़ता हूँ. लिखते रहिये. पढ़ते रहेंगे.

  • 7. 08:31 IST, 26 अप्रैल 2009 samir azad:

    इस घटना से हम युवाओं को सबक लेना चाहिए तथा देश के प्रति अपने कर्तव्य को पहचानते हुए वोट ज़रूर डालना चाहिए.

  • 8. 08:51 IST, 26 अप्रैल 2009 vivekanand jha:

    आदमी की एक-एक क्रियाएं उसका मनॊविज्ञान तय कर देती हैं वुसतुल्लाह ख़ान ने जॊ पिछला ब्लॉग लिखा 'दुश्मनी फिर कभी निकालिएगा' उसमें उन्हॊंने अपना नाम देवनागरी में लिखा था. अब उन्हॊंने ऐसा नहीं किया. ज़ाहिर है इसके पीछे उनकी कॊई निजी सॊच रही हॊगी
    उससे हमें क्या. जैसे उन्हें रैना भारतीय लॊकतंत्र सींग पर उठाए गाय दिखी. कॊई दूसरी जानवर भी तॊ दिख सकती थी. फ़िलहाल तॊ मैं उन्हें बता दूं कि भारतीय लॊकतंत्र की मूल भावनाएं कहां छिपी हैं . यह हमे कॊई पाकिस्तानी तॊ न ही बताए. गॊया वह सात जनम लेकर भी इसे समझ नहीं सकता. भारतीय मानस कॊई धर्म विशेष तॊ है नहीं कि कुरान या बाइबर उठाया और व्याख्यायित कर दिया. यह तॊ विरुद्धॊं का सामंजस्य है. इसे समझने के लिए आपकॊ भारत में जन्म लेना हॊगा.

  • 9. 08:54 IST, 26 अप्रैल 2009 MANOJ TEWARI:

    भारत में रैना कुमारी जैसे लोगों की वजह से ही लोकतंत्र सुरक्षित है. ये शर्म की बात है कि भारत का युवा पहले तो मताधिकार का इस्तेमाल नहीं करता और उसके बाद राजनेताओं को उनके काम के लिए भला बुरा कहता है. उन्हें ये समझना चाहिए कि उनके वोट से इस देश की दिशा बदल सकती है.

  • 10. 09:03 IST, 26 अप्रैल 2009 iqbal aftab:

    शायद यही लोकतंत्र की ताक़त है. हम अपने आस-पास ऐसे लोगों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है. उम्मीद है कि आपके इस ब्लॉग को पढ़कर जो लोग वोट की ताक़त को नहीं समझते हैं वोट देने जाएँगे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक होने का हमको गर्व करना चाहिए और इशको हमेशा के लिए ज़िंदा रखने के लिए वोट देना चाहिए.

  • 11. 09:14 IST, 26 अप्रैल 2009 Abdul Wahid:

    एक रैना कुमारी तो आपको दिख गयी न जाने ऐसी कितनी ही वृद्ध महिलाएँ और पुरुष हैं जिनके वोट के सदके में दिल्ली के गोल भवन की शोभा बढ़ती है.लेकिन गोल भवन में प्रवेश के बाद कौन किसे याद रखता है. बड़ा ही हृदय स्पर्शी लेख है आपका.

  • 12. 09:45 IST, 26 अप्रैल 2009 dhairya:

    यह देश का दुर्भाग्य है. रैना कुमारी की आत्मा प्रजातंत्र में लोगों का विश्वास और आस्था की तस्वीर पेश करती है और उनकी शारीरिक स्थिति देश की राजनीति की तस्वीर पेश करती है. काश, सच्ची उम्मीदों को युवा और कंचन काया मिले.

  • 13. 10:17 IST, 26 अप्रैल 2009 Piyush:

    हैलो खान साहब, इस काम के लिए बधाई, मैं बहुत खुश हूँ कि आपने भारतीय प्रजातंत्र की एक सकारात्मक दिशा को देखा. मैं इस बारे में बताना चाहूँगा कि लाखों युवा भारतीय जो भारत से बाहर रहते हैं, वोट देना चाहते हैं. लेकिन भारत की सरकार उन्हें डाक से वोट डालने की अनुमति नहीं देती. घर के प्रमुख सदस्य होने के नाते इस पीढ़ी को हमारी चुनाव प्रक्रिया में स्थान दिया जाना चाहिए.

  • 14. 10:22 IST, 26 अप्रैल 2009 Krishna Tarway:

    रैना कुमारी और आप जैसे पत्रकारों की वजह से लोकतंत्र सुरक्षित है. जो इस तरह की घटनाओं से देश की जनता को लोकतंत्र के प्रति जागते रहने की प्रयास करते रहे हैं. और पूर्ण विश्वास है कि आगे भी करते रहेंगे.

  • 15. 10:22 IST, 26 अप्रैल 2009 maneesh kumar sinha:

    हम भारतीय प्रजातांत्रिक प्रकृति के हैं. यहाँ इस तरह के उदाहरण अनेक मिल जाएंगे क्योंकि यह भारत है, पाकिस्तान नहीं.

  • 16. 10:40 IST, 26 अप्रैल 2009 Deepak Tiwari:

    खान साहब, यही हमारे प्रजातंत्र का उत्साह है.

  • 17. 10:44 IST, 26 अप्रैल 2009 Mohd Ayub Khan:

    इसे पढ़कर हमारे युवाओं को सीख लेनी चाहिए कि हम वोट ज़रूर डालेंगे और जो गोल भवन में जा कर भी रैना कुमारी जैसे मतदाताओं कोयाद रखें वहाँ उनकी बुनियादी समस्याओं को सुलझाएं और धर्म के नाम पर वोट न माँगें. वोटिंग मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है मैं इसे लेकर रहूँगा. धन्यवाद.

  • 18. 10:48 IST, 26 अप्रैल 2009 vivek kumar pandey:

    काश हमारे नेता भी इस बात को समझते. वो तो गोल भवन के अंदर आराम से सो भी जाते हैं. आपका लेख हृदयस्पर्शी है. वैसे मैंने आपके द्वारा इसकी रिपोर्टिंग बीबीसी उर्दू पर सुन चुका हूँ. बीबीसी हिंदी के लिए भी लिखते रहिए यहाँ से जाने के बाद भी. धन्यवाद.

  • 19. 10:49 IST, 26 अप्रैल 2009 pawan kanpur:

    लोकतन्त्र को अगर मजबूत करना है तो युवाओ को आगे आना ही पडेगा।

  • 20. 12:32 IST, 26 अप्रैल 2009 mahesh:

    ये बात आज के लोगों के लिए सबक की तरह है जो शायद बहुत ज़्यादा गर्मी को कारण बता कर वोट नहीं डाल रहे हैं. एक एक वोट कीमती होता है. इस बात को सभी को अपने ज़हन में डालना होगा.

  • 21. 13:25 IST, 26 अप्रैल 2009 Surender Sharma:

    दिल छू लेने वाली और प्रेमदायक कहानी के लिए बधाई, यही तो सच है आज के देश का कि असल में अपना काम करकने के लिए इतनी मुसीबतें उठाते हैं उनको कोई जानता नहीं है.

  • 22. 13:33 IST, 26 अप्रैल 2009 vikas kumar:

    रैना कुमारी एक अकेली नही हैं. इस देश मे न जाने कितनी रैना हैं जो अपनी पूरी ज़िन्दगी गरीबी से लड़ने और दो वक्त का भोजन जुटाने मे लगा देती हैं लेकिन देखने वाली बात यह है कि उन्हें आज भी अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास है. आज देश मे एक तबका ऐसा भी है जो इन रैना देवी जैसी को अव्वल दर्जे का बेवकूफ़ मानता है.

  • 23. 13:53 IST, 26 अप्रैल 2009 लक्ष्मीनारायण गुप्त:

    आपने सही कहा. जब तक रैना कुमारी जैसे लोग भारत में हैं, लोकतंत्र सुरक्षित है. मुझे आपकी स्टाइल अच्छी लगी. लिखते रहिए.

  • 24. 13:57 IST, 26 अप्रैल 2009 Naresh Sati Montreal:

    खान साहब, प्रजातंत्र कोई बोझ नहीं है. भारतीयों और रैना जैसे लोगों का प्रेम है जिसकी वजह से उन्होंने प्रजातंत्र को जीवित रखा हुआ है. मैं आपका दर्द समझ सकता हूँ. आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि काश पाकिस्तान में भी रैना कुमारी जैसे लोग होते इंशाअल्लाह एक दिन!!!

  • 25. 14:54 IST, 26 अप्रैल 2009 navin:

    इसे कहते हैं दृष्टा. लोकतंत्र में दृष्टा. लेकिन ये बातें युवाओं और नौजवानों के पल्ले क्यूँ नहीं पड़ती.... वे तो पिज़्ज़ा बर्गर टेक्नॉलॉजी की गिरफ़्त में हैं......वे बस मंदी का बहाना बनाकर घर में बैठे हैं वोट नहीं कर रहे........चुनावों को मज़ाक बना रखा है.....सीखो सीखो हमारे नेताओं-नोट के पुजारियों, टीआरीप के भूखे पत्रकारों, नौकरशाहों, कछुओं की चाल चलने वालों.... काश सभी अच्छा काम करते तो यूँ जनता द्वारा जूते पड़ने का सिलसिला तो नहीं शुरू होता.......

  • 26. 15:58 IST, 26 अप्रैल 2009 Arvind Khare:

    गज़ब, आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं. वोट के महत्व को आपने कुछ सौ शब्दों में समेट दिया है.

  • 27. 17:20 IST, 26 अप्रैल 2009 Ravi:

    जनाब वुसत साहब, इतने हाइटेक सहाफ़ी हैं आप, सो रैना जी की तस्वीर की कमी खल रही है. कृपया अगली बार ऐसी कोई शख्सियत कहीं मिले तो उनकी इजाज़त से उनकी तस्वीर उतारना नहीं भूलिएगा.

  • 28. 18:33 IST, 26 अप्रैल 2009 Abhay R. Singh:

    जो बात आपके साथ हुई और आपने महसूस की, अगर यही बाकी लोग चाहे वो राजनीति के अनैतिक लोग हों या वो लोग जिन्हें लोकतंत्र में अपनी कोई ज़िम्मेदारी नज़र नहीं आती लेकिन सवाल ज़्यादा पूछते हैं......रैना देवी के साथ साथ उन सभी को मेरा हार्दिक प्रणाम जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को ज़िंदा रखा है.

  • 29. 20:31 IST, 26 अप्रैल 2009 Anil:

    खान साहब जैसा कोई यात्री यहाँ आता है और एक जादुई वास्तविकता देखता है और हम अरबों लोगों के साथ अपने अनुभव बाँटता है. यह बहुत खुशी की बात है.

  • 30. 04:09 IST, 27 अप्रैल 2009 Ajeet Singh Sachan:

    पिछली बार आपके लेख पर मेरी प्रतिक्रिया कुछ ज़्यादा ही उग्र थी. सही बात ये है कि मैं आपके लेख को सही से समझ ही नहीं सका. उसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ. मुझे पूरा विश्वास है कि इस चुनाव के दौरान आप ऐसे और भी कई लोगों से मुलाक़ात कर पाएंगे और हम लोगों को काफ़ी कुछ सोचने के लिए छोड़ जाएंगे.~Ajeet Singh Sachan

  • 31. 04:49 IST, 27 अप्रैल 2009 chandan kumar:

    मैं हमेशा आपका कार्यक्रम 'बात से बात' सुनता हूँ. आपकी टिप्पणी हमेशा बहुत सटीक और हाज़िर जवाब होती हैं. प्रजातंत्र की सफलता के लिए नेता और जनता का बराबर योगदान और निस्वार्थ त्याग की ज़रूरत है. जैसी निस्वार्थ भावना रैना कुमारी ने दिखाई वह हर नागरिक में होनी चाहिए. इस कहानी को सुनकर उन लोगों की आँखें खुल गईं होंगी जो अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर डालते रहते हैं.

  • 32. 05:08 IST, 27 अप्रैल 2009 s l chowdhary:

    भाई वसुतुल्लाह, कुछ दिन पहले आपने हमारे चुनाव आयोग से ईर्ष्या दिखाई थी. इस घटना ने हमारे लोकतंत्र/ धर्मनिरपेक्षता की सही और असली तस्वीर पेश कर दी है. एक बार फिर धन्यवाद.

  • 33. 05:29 IST, 27 अप्रैल 2009 Awadhesh narayan Shukla:

    आदरणीय खान साहब, मैंने आपकी असली कहानी पढ़ी कि आपने इस देश में क्या देखा और महसूस किया. मैं आपकी अवलोकन क्षमता को सलाम करता हूँ. और हमारी दादीमाँ की मदद करने के लिए शुक्रिया. हमारे देश में रैना कुमारी जैसे बहुत से लोग हैं. मैं एशिया के पहले कृषि विश्वविद्यालय में काम करता हूँ. आप हमारे मेहमान हैं इसलिए मैं आपको यहाँ आमंत्रित करना चाहता हूँ कि यहाँ आकर इस महान पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय को देखें.

  • 34. 05:35 IST, 27 अप्रैल 2009 Rehan Akhtar:

    रैना कुमारी की बात सुनकर अब यकीन हो गया है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र तब तक ज़िंदा है जब तक रैना कुमारी जैसी माँएं ज़िंदा हैं और हम जैसे लोगों को अहसास दिलायेंगी जो एयरकंडीशन ऑफ़िस में बैठकर यह सोचते हैं कि यह काम मेरा नहीं है.

  • 35. 06:37 IST, 27 अप्रैल 2009 Sandeep Sharma:

    यही तो दुर्भाग्य है इस देश का. ऐसे अनुकरणीय वोटों को लेकर गोल भवन पहुँचने वाले लोग उन्हें वोट देने वालों को याद नहीं करते. पढ़कर अच्छा लगा. लिखते रहिए.

  • 36. 08:21 IST, 27 अप्रैल 2009 अशोक कुमार:

    रैना की कहानी के बूते आपने बहुत कुछ कह दिया है. समझने की ज़रूरत है.

  • 37. 11:09 IST, 02 मई 2009 satyendra Kumae:

    मेरे पास कहने के लिए शब्द नहीं हैं. जब तक रैना अम्मा जैसे लोग हैं, हमारा लोकतंत्र ज़िंदा रहेगा. इसे समझने के लिए राजनेताओं की आत्मा मर चुकी है. गंदी राजनीति से दूर हो चुके लोगों को एक बार फिर सोचने को मजबूर करती है.

  • 38. 13:20 IST, 04 मई 2009 Mohammad Ali Bahuwa:

    खान साहब आपके इस ब्लॉग को पढ़ कर यकीं आ गया कि हिंदुस्तान में अभी भी लोकतंत्र ज़िंदा है. पर पता नहीं इन सफ़ेद टोपी वालों को इस लोकतंत्र की सुध कब आएगी.....

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.