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शाम तक क्या बेचें!

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|गुरुवार, 21 मई 2009, 11:28 IST

जो फटीचर लतीफ़ा मैं आपको सुना रहा हूँ. ये लतीफ़ा पाकिस्तान में पठानों पर और भारत में सरदारों पर रखकर सुनाया जाता है.

एक सरदार जी/ख़ान साहब, तेज़ गर्मी में ठेले पर फ़ालसे बेच रहे थे. एक ग्राहक आया, पूछा भाई साहब फ़ालसे क्या हिसाब बेच रहे हो. ठेले वाले ने कहा 70 रुपये किलो. ग्राहक ने कहा सब तौल दो. रेहड़ी वाले ने कहा कि सब फ़ालसे तुम ले गए तो शाम तक क्या बेचूंगा!!!

अब आप पूछेंगे यह वर्षों पुराना लतीफ़ा सुनाने का क्या मतलब है??? मतलब यह है कि मुझ जैसे सैंकड़ों पत्रकारों और राजनीतिक टीकाकारों को सोलह मई के नतीजों की वजह से भारतीय जनता से मायूसी हुई है.

हम तो पिछले दो महीने से यह सोच कर अपने क़लम के भाले और ज़ुबानों की छुरियाँ तेज़ किए बैठे थे कि हिसाब-किताब, आँकड़े और सितारों की चाल बता रही है कि किसी भी पार्टी को चुनावों में बहुमत नहीं मिलेगा.

ऐसे में सरकार बनाने के लिए राजनेताओं में ख़ूब जूता चलेगा. धौंस और घूस से काम लिया जाएगा. तब कहीं जा कर 15-20 दिन बाद एक ऐसी सरकार की शकल उभरेगी जो शायद दो ढाई साल भी न निकाल पाए. फिर मध्यावधि चुनाव होंगे और फिर हम मीडिया वालों का धँधा चमकेगा.

मगर भोले वोटरों को शायद अंदाज़ा ही नहीं कि उसने हमारे अंदाज़ों पर बर्फ़ीला पानी उंडेल कर मीडिया को कितना नुक़सान पहुँचाया है.

वोटरों की इस हरकत से अगले 15-20 दिन तक की योजना बनाने वाले चैनलों, और समाचार पत्रों से जुड़े सैंकड़ो राजनीतिक टीकाकारों, विश्लेषकों, लेखकों, ग्राफ़िक डिज़ाइनरों, हाई प्रोफ़ाइल ऐंकरों, कैमरामैनों, कैमरे के आगे खड़े होकर नए राज़ खोलने की आदत में लगे रिपोर्टरों और एक्सक्लूसिव इंटरव्यू की दौड़ में हिस्सा लेने वाले संपादकों के करोड़ों रुपये डूब गए जो उन्हें फ़ीस और आने-जाने के ख़र्चे के रुप में मिल सकते थे.

हम सबके दिल में अरमान था कि आने वाले कई दिनों तक हाथी का चीटियों के साथ, शेर का बकरी के साथ और बिल्ली का चूहे के साथ राजनीतिक तोड़-जोड़ बैठाएं. रंगीन ग्राफ़िक्स और टिप्पणियों की मदद से अपनी-अपनी मनपसंद सरकार बनाएंगे, मिटाएंगे और फिर बनाएंगे. ख़ुद भी मज़े लेंगे और देखने, सुनने और पढ़ने वालों को भी मज़ा करवाएंगे.

लेकिन 15-20 दिन तक जो सर्कस लगना था वो 16 मई की शाम तक शामियाने के बाँस के साथ गढ़ने से पहले ही लद गया.

और अब हम सब मीडियाकर्मी विश्लेषक 46 डिग्री सेल्सियस में सच्चाई के तपते सूरज तले वोट के फ़ैसले की गर्म ज़मीन पर बैठे ये सोच रहे हैं कि सारे फ़ालसे वोटर ले गया, अब शाम तक क्या बेचें!

लेकिन मायूसी की कोई बात नहीं. गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में. 2004 में भी यही हुआ था. आने दें 2014 के चुनाव. हमने भी फ़ालसे की जगह तरबूज़ और कटहल का ठेला न लगाया तो नाम बदल देना. यह वोटर ख़ुद को आख़िर समझता क्या है!!!

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 11:47 IST, 21 मई 2009 anil pande:

    बुहत ख़ूब कहा साहब आपने. भारतीय उपमाहद्वीप की बदकिस्मती यही रही है कि मज़हब ने लोगों को जोड़ा नहीं बल्कि तोड़ा है. पाकिस्तानी कलाम के मरहम हमारे जख़्मों को मौसूल ना हुए और हमारे मुल्क का इल्म आपके मुल्क से दूर रखा गया. हिंदुस्तानी अवाम तक आपका पैग़ाम पहुँच चुका है क्योंकि बीबीसी को लोग आज भी पसंद करते हैं. अब आप अपने लोगों से कह दें कि अब एक नए सूरज का उदय हो चुका है. हालात अब ऐसे ही रहेंगे. मेरा मशविरा है कि या तो पेशा बदल लें या सोच.

  • 2. 11:57 IST, 21 मई 2009 Arvind Yadav:

    बहुत कमाल का लिखते हैं ख़ान साहब. आपके सोचने और उसे काग़ज़ पर उतारने के अंदाज़ का मैं पिछले दो महीने में क़ायल हो गया हूँ. ख़ुदा करे कि 2014 में आपके तरबूज भी सुबह ही बक जाएँ.

  • 3. 11:59 IST, 21 मई 2009 Sada Shiv Tripathi:

    आपकी टिप्पणी बिल्कुल सटीक है.

  • 4. 11:59 IST, 21 मई 2009 ghanshyam tailor:

    मीडिया ने बहुत थोड़े से नमूनों के आधार पर पूरे देश के नतीजों का अनुमान लगाया था. आख़िर हर एक मतदाता को टटोला तो नहीं जा सकता है. कुछ अनुमान तो केवल हालात के आधार पर ही लगाए जाते हैं. कभी ये अनुमान सटीक तो कभी फ़ेल हो जाते हैं. इसके बाद भी इस तपती धूप में मीडिया का कवरेज कहीं अच्छा तो कहीं प्रायोजित लगा. इसके बाद भी मीडिया की भूमिका को आप कम करके न आंकें.

  • 5. 12:10 IST, 21 मई 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    वुसतउल्लाह ख़ान जी, इस बार भी टीवी चैनल वाले शार्ट-सर्किट कर नए मार्केट में सरकारी सब्ज़ी लाए हैं. मंत्रालयों के बंटबारे में भी दुकान लगा ली है. बिक भी रही है ये. पत्रकारिता का धंधा बड़ा उम्दा है. हम यहाँ घिस-घिसकर सॉफ़्टवेयर के प्रोग्राम लिखते हैं , उसके बाद भी नहीं बिकते हैं और वहाँ तो दो-तीन इंटरव्यू को हमेशा झाड़-पोंछकर पूरे दिन दिखा दिया जाता है. अब तो इसमे बीबीसी भी पीछे नहीं रहा. आप भी अभी लग जाइए नहीं तो मंदी के इस दौर में बेरोज़गार हो जाएँगे.

  • 6. 12:27 IST, 21 मई 2009 ap upadhyay:

    ख़ान साहब, बजट में बचत के नाटक के लिए कुछ बाबू कम करिए और सभी ग़ैर क़ानूनी कामों को नियमित करने और काला धन निकलवाने के लिए नया मंत्रालय बनवा दो.

  • 7. 12:34 IST, 21 मई 2009 Mohammad Ali:

    क्या ख़ूब लिखते हैं ख़ान साहब. पिछले दो महीनों में आपका हर ब्लाग शानदार रहा. ख़ुदा आपको और बीबीसी को हमेशा क़ायम रखे. मेरी भी यही दुआ है कि 2014 के चुनाव में आपको सारे तरबूज सुबह-सुबह ही बिक जाएँ ताकि जोड़तोड़ करने वालों की हैसियत एक बार फिर उनके सामने आ जाए.

  • 8. 12:35 IST, 21 मई 2009 charnjit moudgil:

    ख़ान साहब, आप बहुत अच्छा लिखते हैं.

  • 9. 12:44 IST, 21 मई 2009 jitendra:

    बहुत अच्छा ख़ान साहब.

  • 10. 13:50 IST, 21 मई 2009 arvinder singh sandhu:

    बहुत ख़ूब ख़ान साहब.

  • 11. 14:48 IST, 21 मई 2009 SHABBIR KHANNA:

    बहुत ख़ूब जनाब, कितना सच कहा है आपने. मैं उर्दू में आपको पाबंदी के साथ सुनता हूं. ये सही है कि अगर पूरा बहुमत नहीं आता तो हम हर दिन ख़बरों पर नज़र रखते. आपने बहुत ही संक्षेप में बहुत ही सही बात कही है.

  • 12. 15:07 IST, 21 मई 2009 Ajeet Singh Sachan:

    काफ़ी मज़ेदार लिखते हैं आप. ऐसा लगता है कि किसी पुराने मित्र से गुफ़्तगू हो रही है आमने-सामने बैठ कर और दूसरों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं ड्राइंग रूम डिस्कशन में. सच में दिल ख़ुश हो गया आपका ब्लॉग पढ़ कर.

  • 13. 15:31 IST, 21 मई 2009 Deepak Tiwari:

    ख़ान साहब आप एक सच्चे पत्रकार हैं. बिना किसी पक्षपात के सही पत्रकारिता. आप बीबीसी के सर्वश्रेष्ठ पत्रकार हैं. आपको तो भारतीय होना चाहिए था.

  • 14. 15:34 IST, 21 मई 2009 suwa lal jangu:

    असली तरबूज़ और ख़रबूज़े का मज़ा तो कॉंग्रेस ही ले गई और छिलके भी नसीब नहीं हुए भारतीय जनता पार्टी को. लगता है हमारा मीडिया ठीकठाक अंदाज़ नहीं लगा पाया कि तरबूज़ और ख़रबूज़े पक्के हुए हैं या कच्चे. वुसतुल्लाह ख़ान साहब, हम लोग तो हर बार की तरह इस बार भी ग़च्चा ही खा गए.

  • 15. 15:37 IST, 21 मई 2009 Rajeev Sharma:

    ख़ान साहब, क्या कहने. इसे जारी रखिएगा.

  • 16. 15:57 IST, 21 मई 2009 kaushlendra:

    क्या ही दिलचस्प बात कही है. यक़ीनन यही हालत होनी थी.

  • 17. 16:36 IST, 21 मई 2009 zulfiqarGunnauri:

    ख़ान साहब आपकी लेखनी धारदार भी है और सटीक भी. पढ़ कर अच्छा लगा. सबसे मुश्किल काम होता है अपना मज़ाक़ उड़ाना जो आपने बड़ी आसानी से किया है. मान गए गुरु जी.

  • 18. 17:21 IST, 21 मई 2009 himmat singh bhati:

    अभी तो दिन निकला है, शाम और रात अभी बाक़ी है. आपको नर्वस होने की ज़रूरत नहीं है, दुनिया में भारत एक प्रयोगशाला बना हुआ है. इसलिए हम मिलते ही रहेंगे. बहुमत के नज़दीक पहुंचने से आप घबरा गए, भारत में मलाईदारर मंत्रालयों को लेकर बहुत कुछ होगा. ममता की डफ़ली न बजे और नाच गाना न हो ऐसा हो नहीं सकता. अटल जी के समय भी हुआ था और अब भी होगा. हम आशा करते हैं कि उस समय आप को अच्छा ख़ासा मलाईदार मसाला मिलेगा.

  • 19. 18:27 IST, 21 मई 2009 samir azad kanpur:

    खूब कहा खान साहब।

  • 20. 19:07 IST, 21 मई 2009 sanjay kumar:

    ख़ान साहब, आपको उर्दू पर सुनना अपने आप में एक सुखद अनुभव है. आपका ये ब्लॉग भारतीय उप-महाद्वीप की सच्चाई को बयान करता है. जिस तरह आपने मीडिया की ख़ुराक की चर्चा की वह क़ाबिले-तारीफ़ है. जैसा कि हम सब लोग जानते हैं इस उप-महाद्वीप में बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी क्रिकेट के बाद राजनीति ही खाते, पीते और सोते हैं., ऐसे में चुनाव जैसा सबसे ताज़ा माल हाथों हाथ बिक जाता है और इसे बेचने में न्यूज़ चैनल सबसे आगे रहते हैं. ऐसे में इस बार का लोक सभा चुनाव वाक़ई भारतीय मीडिया और इस उप-महाद्वीप की मीडिया के लिए काफ़ी उत्साहवर्धक नहीं रहा. सभी सोच रहे थे कि किसी को बहुमत नहीं मिलेगा लेकिन कांग्रेस ने सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सभी को चौंका दिया. इससे सभी पार्टियों की उम्मीदें भी ध्वस्त हो गईं और कई पार्टियां अपने दांत तेज़ करती ही रह गईं और कांग्रेस ने अपनी सरकार बनाने के लिए किसी को पूछा तक नहीं.

  • 21. 22:33 IST, 21 मई 2009 ashutosh:

    ये तो होना ही चाहिए था क्योंकि आजकल टीवी के पत्रकारों को ऐसा लगता है कि बस सारे देश के बारे में वही जानते हैं और उनकी प्रतिक्रिया निर्णायक मानी जाती है. लेकिन इस वर्ष के वोट ने बता दिया कि जनाब ये अभिमान छोड़ दें. वे एसी कमरे में बैठ कर किसी क्षेत्र में लोक सभा चुनाव के रुजहान बताते थे. अच्छा हुआ कि उनका ये भ्रम टूट गया. साथ ही ये बात भी है कि मध्यम वर्ग के लिए मनोरंजन का एक अच्छा अवसर भी निकल गया. जय हो मतदाता की.

  • 22. 23:51 IST, 21 मई 2009 Suraj:

    यह एक लाजवाब लेख है. मुझे ऐसे और लेख देखने हैं क्योंकि मीडिया बिना किसी जवाबदेही के एक मदमस्त हाथी बनता जा रहा है. आप जैसे पत्रकार ही मीडिया के इरादों की ओर लोगों का ध्यान दिला सकते हैं.

  • 23. 00:31 IST, 22 मई 2009 Chandra Prakash Dhyani:

    मैंने आपका ब्लॉग पढ़ा और मेरा मानना है कि यह भारतीय राजनीति और भारतीय समाचार चैनेलों पर अब तक का सर्वश्रेष्ठ कटाक्ष है. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.

  • 24. 02:40 IST, 22 मई 2009 jamie:

    वुसतुल्लाह ख़ान आप ये तमाशा-ए-जम्हूरियत देखने हिंदोस्तां आए, इसके लिए शुक्रिया...इस दौरान आपकी क़लम ने जो भी उगला और बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर उडेला, वो हमने बड़े चाव से झेला..लेकिन बॉस अब तो वापस लौटने का वक़्त आ गया होगा ना?? सोच रहा था कि सारे फ़ालसे तो आप बेच गए, अब बीबीसी हिंदी डॉट कॉम 2014 तक क्या बेचेगा??

    वैसे लिखता तो और भी लेकिन आप देवनागरी तो पढ़ नहीं पायेंगे, सुरमा लगागे...

  • 25. 02:50 IST, 22 मई 2009 Malkiat singh Virk:

    ख़ान साहब दिल से लिखा आपने. आप के तरबूज़ 2014 में मंडी में आने से पहले ही बिक जाएँगे अगर कॉंग्रेस सरकार इस बार लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरेगी तो. चुनाव हारी पार्टियों के साथ-साथ मीडियाकर्मियों को भी आत्मचिंतन की ज़रूरत है अब.

  • 26. 03:51 IST, 22 मई 2009 Pushparaj:

    सही बात तो यह है जनाब कि भारत में अगले पाँच साल ही पत्रकारों का समय दिखाई देता है. उसके बाद यह जो छोटे-मोटे गली मोहल्ले के पत्रकार है ये दिखाई देना ही बंद हो जाएँगे. भारत अभी विकास के मार्ग पर बढ़ रहा है और अब लोग समझदार हो रहे हैं. वो दिन चले गए कि लोग ख़ाली बैठे शाम का इंतज़ार किया करते थे. तो आपको सलाह यह है कि कम से कम अपनी अगली पीढ़ी को पत्रकार मत बनने की सलाह दीजिएगा.

  • 27. 06:44 IST, 22 मई 2009 Prasad:

    वुसतुल्लाह ख़ान सहाब
    हो गया न काम ख़राब
    अब के वोटर बहुत अच्छे हैं
    सरकारों से ज़्यादा सच्चे हैं
    मीडिया से कहना
    अब के बच के रहना
    हम आपसे कह देते हैं
    2014 में न तरबूज़, नही कटहल बिकेगा
    मीडिया को कुछ और ही दिखेगा
    आप लिखते बहुत अच्छे हैं
    लगता है आप दिल के सच्चे हैं
    आपको दुआ और सलाम
    वोटरों को आशीर्वाद और प्रणाम

  • 28. 06:51 IST, 22 मई 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    वुसतुल्लाह खान साहब, पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के प्रति आपका दर्द बेकार नहीं गया है. डी एम के और तृणमूल कॉंग्रेस ने, जितना उनसे बन पड़ा है तमाशा कर ही दिया है. उधर अपने उमर अब्दुल्ला साहब भी बोल लिये हैं. लालू अमर सिंह वगैरह भी अपनी तरफ से कुछ न कुछ तो करने में लगे ही हैं. अगर सब कुछ शांति से निबट जाये तो फिर भारतीय राजनीति ही क्या हुई!

  • 29. 09:43 IST, 22 मई 2009 कल्पना पवार, अमरावती:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब. बहुत ख़ूब लिखा है आपने. वोटरों को अक्सर बेवकूफ़ समझनेवाला मीडिया (ख़सकर टीवी मीडिया) ख़ुद ही कितना बड़ा बेवकुफ़ है यह स्पष्ट हो गया. मीडिया पर आपका कटाक्ष हम समझ सकते है. लेकिन इसका हल क्या है? मीडिया वाले ज़मीन पर आकर कब सोचेंगे ताकी उन्हें सच्चाई की थोड़ी भी भनक तो लग सके.

  • 30. 11:07 IST, 22 मई 2009 vivek kumar rai:

    बहुत ही उम्दा लेख.... और आज की पत्रकारिता के लिए सटीक, क्योंकि आज पत्रकारिता का स्तर गिरता जा रहा है. पत्रकार की जगह पत्रकर्मी पैदा हो रहे हैं और अब पत्रकारिता नहीं मीडिया मज़दूरी हो रही है.

  • 31. 11:54 IST, 22 मई 2009 atul:

    ख़ान साहब, इस लोकतंत्र का विधाता मतदाता है. वह बख़ूबी जानता है कि उसे कब क्या करना है, जो देश हित में था उसे कर डाला. अब चाहे पत्रकारों की दुकान बंद हो या नेताओं के धंधे में मंदी आ जाए. अगर पत्रकार और नेता सुखी रहना चाहते हैं तो उन्हें चाहिए कि वे भी देश हित में सोचने लगें.

  • 32. 11:55 IST, 22 मई 2009 Iqbal Fazli, Asansol (WB):

    वुसतुल्लाह ख़ान का अंदाज़ व्यंगात्मक होता है. 'बात से बात' को जिन्होंने सुना है वे जानते हैं. पिछले कुछ दिनों से जबसे वह भारत भ्रमण पर हैं हिंदी में ब्लॉग पर उपलब्ध हैं. उनके कटाक्ष बहुत तीखे और दिल को छू लेने वाले होते हैं (लेकिन दिल पर ज़ख़्म नहीं करते) भाषा और हालात पर उनकी पकड़ ज़बर्दस्त है. शायद अब उनके ज़्यादा ब्लॉग हिंदी पर देखने को न मिलें क्योंकि उनका भारत भ्रमण ख़त्म होने वाला होगा.

  • 33. 14:21 IST, 22 मई 2009 Rabindra Chauhan,Tezpur,assam:

    ख़ान साहब क्या बात है कमाल की लेखनी है आपकी. लिखते रहिए. भारतेंदु और शफ़ी नक़ी जामई साहब याद आगए. गंभीर विषय पर आपने बढ़िया लिखा है. धन्यवाद

  • 34. 14:32 IST, 22 मई 2009 abhay kumar:

    क्या बात है भाई, आपका जवाब नहीं. बहुत ख़ूब लिखा.

  • 35. 15:19 IST, 22 मई 2009 Chandan Kumar Singh:

    ऐसा लगता है कि आप मीडिया वालों का ख़र्चा-पानी बंद करना देंगे.

  • 36. 15:36 IST, 22 मई 2009 दीपक शर्मा:

    माशा अल्लाह ....माशा अल्लाह! क्या ख़ूब कही आपने ,हम तो बस इतना कह सकते हैं कि ...
    आरज़ू तेरी बरक़रार रहे!
    दिल का क्या है रहा ना रहा!!

  • 37. 16:28 IST, 22 मई 2009 kamlesh kumar diwan(writer):

    आपके विचार पढ़े ,हमारे पास करने को बहुत कुछ हैं माननीय! बहुमत के संदर्भ में
    हमें विचार करना होगा कि क्या सरकार बनाने के लिए बहुमत चाहिए या आम जनजीवन
    को दुरूस्त रखने के लिए. पत्रकारिता मे कम से कम यह प्रयास होना चाहिए कि
    हमारी सरकार जन आकाँक्षाओं को प्रतिबिंबित करे, आपके पास करने को बहुत कुछ है
    माननीय ब्लॉग पर मेरे गीत अवश्य पढ़े जिनमे कुछ लोकतंत्र पर भी है.

  • 38. 05:35 IST, 23 मई 2009 SUNIL SHARMA:

    यह दुख की बात है कि मीडिया पैसा कमाने के चक्कर में पैसे बनाने की मशीन बन गया है. पत्रकार को ब्रेकिंग न्यूज़ चाहिए, वैसे ही डॉक्टर को मरीज़, वकील को मुक़दमा, पुलिस को अपराधी, अपराधी को नेता चाहिए और राजनेता को.....? भगवान असहाय जनता को इन नेताओं से बचाए.

  • 39. 07:11 IST, 23 मई 2009 raushan mohammad ishtyaquddin:

    काश के मीडिया वालों को पता चल जाए कि तर्जबूज़ों के बिकने के बाद भी वोटर के पास काफ़ी कुछ बचता है. उन्हें यह भी जानने का हक़ होना चाहिए कि सारे तर्बूज़े नेता अकेले खा गए या उसके बीज और जूस स्विस बैंक में भेज दिए गए. अगले पाँच साल में ये कहानियाँ भी काम आएंगी.

  • 40. 09:20 IST, 23 मई 2009 Rajnandan Singh:

    बनाने की कोशिश क्यों कर रहें हैं ख़ान साहब! मीडिया और मदारी का माल भी कभी कम पड़ता है क्या?

  • 41. 12:43 IST, 23 मई 2009 rajesh:

    आप की टिप्पणी लाजवाब है.

  • 42. 13:04 IST, 23 मई 2009 Javed Jamaluddin :

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब ने आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के तर्ज़े अमल को जिस अंदाज़ में पेश किया है वो दिल को छू जाने वाला है. वैसे मैं यहाँ बता देना चाहता हूँ कि 13 मई को आख़िरी चरण की पोलिंग के बाद बड़े-बड़े सर्वे पेश किया और कसम खा कर कह रहे थे कि दोनों बड़ी पार्टियों के बीच 20 सीटों का अंतर रहेगा. लेकिन हक़ीक़त हम सब ने देख लिया. अगर पाँच साल में हालात बेहतर हुए तो टीवी चैनल को बड़ी-बड़ी भविष्यवाणी करने का शायद मौक़ा नहीं मिलेगा.

  • 43. 13:06 IST, 23 मई 2009 prasann :

    ख़ान साहब का नज़रिया बेहतर है. ऐसी पत्रकारिता से जनता को बचाना देश और इल्कट्रोनिक मीडिया दोनों की सेहत के लिए ज़रूरी है.

  • 44. 17:58 IST, 23 मई 2009 प्रखर गिरी:

    आप का लेख ठीकठाक है, कोई उम्दा नहीं है, जो लोगों ने यहाँ बेवजह वाहवाही करके आपको ऊंचा कर दिया है. लिखते रहिए.

  • 45. 18:36 IST, 23 मई 2009 Tejwant:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहिब हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है.

  • 46. 19:54 IST, 23 मई 2009 sidharth :

    बहुत खूब! लिखते रहें.

  • 47. 20:26 IST, 23 मई 2009 Ranjit Singh Sidhu:

    सरदार मनमोहन सिंह किंग हैं, मेहरबानी करके इस तरह का बकवास लतीफ़ा ख़ान और सरदार पर नहीं लिखें.

  • 48. 01:44 IST, 24 मई 2009 UMESH YADAVA:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब सलाम !!
    भारत और पाकिस्तान के राजनैतिक चरित्र मिलते जुलते हैं और इन दोनों पर ही आपकी काफ़ी मज़बूत पकड़ है. आप के कटाक्ष तो लाजवाब होते हैं.

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