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ये कैसा देवबंद है?

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|सोमवार, 25 मई 2009, 06:58 IST

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मैंने पिछले हफ़्ते दो दिन उत्तर प्रदेश के क़स्बे देवबंद में गुज़ारे. वही देवबंद जिसने पिछले डेढ़ सौ वर्षों में हज़ारों बड़े-बड़े सुन्नी उलेमा पैदा किए और जिनके लाखों शागिर्द भारतीय उप-महाद्वीप और दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए हैं.

आज भी दारुल-उलूम देवबंद से हर साल लगभग चौदह सौ छात्र आलिम बन कर निकलते हैं.

देवबंद, जिसकी एक लाख से ज़्यादा जनसंख्या में मुसलमान 60 प्रतिशत हैं. वहाँ पहुँचने से पहले मेरी ये परिकल्पना थी कि ये बड़ा सूखा सा क़स्बा होगा, जहाँ उलेमा की तानाशाही होगी और उनकी ज़ुबान से निकला हुआ एक-एक शब्द इस इलाक़े की मुस्लिम आबादी के लिए अंतिम आदेश का दर्जा रखता होगा, जहाँ संगीत के बारे में गुफ़्तगू तक हराम होगी, हिंदू और मुसलमान एक दूसरे को दूर-दूर से हाथ जोड़ कर गुज़र जाते होंगे, वहाँ किसी की हिम्मत नहीं होगी कि बग़ैर किसी डाँट-फटकार के बिना दाढ़ी या टख़नों से ऊँचे पाजामे के बिना वहाँ बसे रह सकें. देवबंद में मुसलमान मुहल्लों में अज़ान की आवाज़ सुनते ही दुकानों के शटर गिर जाते होंगे और सफ़ेद टोपी, कुर्ता-पाजामा पहने दाढ़ी वाले नौजवान डंडा घुमाते हुए ये सुनिश्चित कर रहे होंगे कि कौन मस्जिद की ओर नहीं जा रहा है.

इसीलिए जब मैंने सफ़ेद कपड़ों में दाढ़ी वाले कुछ नौजवानों को देवबंद के मदरसे के पास एक नाई की दुकान पर शांति से अख़बार पढ़ते देखा तो फ़्लैशबैक मुझे उस मलबे के ढेर की ओर ले गया जो कभी हज्जाम की दुकान हुआ करता था.

जब मैंने टोपी बेचने वाले एक दुकानदार के बराबर एक म्यूज़िक शॉप को देखा जिसमें बॉलीवुड मसाला और उलेमा के भाषण और उपदेश पर आधारित सीडी और कैसेट साथ साथ बिक रहे थे तो मेरा दिमाग़ उस दृश्य में अटक गया जिसमें सीडीज़ और कैसेटों के ढेर पर पेट्रोल छिड़का जा रहा है. जब मैंने बच्चियों को टेढ़ी-मेढ़ी गलियों और बाज़ार से होकर स्कूल की ओर जाते देखा तो दिल ने पूछा यहां की लड़कियों के साथ स्कूलों में किसी को बम लगाने का विचार अब तक क्यों नहीं आया.

जब मैंने बुर्क़ा पहने महिलाओं को साइकिल रिक्शे में जाते देखा तो मन ही मन पूछने लगा यहां मुहर्रम के बग़ैर महिलाएं आख़िर बाज़ार में कैसे घूम फिर सकती हैं. क्या कोई उन्हें सोटा मारने वाला नहीं.

जब मैंने बैंड बाजे वाली एक बारात को गुज़रते देखा तो इंतज़ार करता रहा कि देखें कुछ नौजवान बैंड बाजे वालों को इन ख़ुराफ़ात से मना करने के लिए कब आँखें लाल करते हुए आते हैं.

जब मुझे एक स्कूल में लंच का निमंत्रण मिला और मेज़बान ने खाने की मेज़ पर परिचय करवाते हुए कहा कि ये फ़लाँ-फ़लाँ मौलाना हैं, ये हैं क़ारी साहब, ये हैं जगदीश भाई और उनके बराबर में हैं मुफ़्ती साहब और वो जो सामने बैठे मुस्कुरा रहे हैं, हम सबके प्यारे लाल मोहन जी हैं..... तो मैंने अपने ही बाज़ू पर चिकोटी काटी कि क्या मैं देवबंद में ही हूँ?

अब मैं वापस दिल्ली पहुँच चुका हूँ और मेरे सामने हिंदुस्तान और पाकिस्तान का एक बड़ा सा नक़्शा फैला हुआ है, मैं पिछले एक घंटे से इस नक़्शे में वो वाला देवबंद तलाश करने की कोशिश कर रहा हूँ जो तालेबान, सिपाहे-सहाबा और लश्करे-झंगवी जैसे संगठनों का देवबंद है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 07:24 IST, 25 मई 2009 Farhat Rehan:

    ख़ान साहब क्या ख़ूब लिखा है आपने. काश ये बात आज हर हिंदुस्तानी जान पाता कि भारत को ऐसे ही देवबंद की ज़रूरत है. जहाँ सब एक साथ रहते हैं. ख़ान साहब यही हमारी पहचान है. इतना कुछ हो जाने के बाद भी हिंदुस्तान एक है और टूटा नहीं हैं. टूट वो गए हैं जिन्होंने इसे तोड़ने की कोशिश की. ऐसे ही लिखते रहें.

  • 2. 07:29 IST, 25 मई 2009 Sachin Saroha:

    वो सर यही तो असली हिंदुस्तान है.

  • 3. 07:32 IST, 25 मई 2009 Rehan:

    वाह-वाह ख़ान साहब क्या लिखा है आपने. आपने तो सीधे-सीधे तालिबान और अल-क़ायदा को थप्पड़ मारा है. आपने बिल्कुल सही लिखा है और आपने जो देखा वो भी सच है. ख़ान साहब यही हमारी पहचान है. यही हिंदुस्तान है. हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ने फ़रमाया था कि अगर एक लड़का पढ़ता है तो सिर्फ़ वो पढ़ता है और अगर एक लड़की पढ़ती है तो पूरा घर पढ़ता है. और आज तालेबान और अल-क़ायदा इसके उल्टे कर रहे हैं. इससे तो मुसलमान और पीछे चला जाएगा, वो ये क्यों नहीं सोचते.

  • 4. 07:33 IST, 25 मई 2009 afsar abbas rizvi " ANJUM":

    जनाब वुसत साहब आपको याद रखना चाहिए कि आप पाकिस्तान में नहीं भारत में यात्रा कर रहे हैं. दूसरी बात ये है कि हमारे मुल्क में हर किसी को जीने का पूरा हक़ है और उसमें कोई दूसरा दख़लंदाज़ी नहीं करता है. ये हमारे मुल्क की ख़ास पहचान है कि यहाँ अगर कुछ गुंडे और चंद सियासतदानों को छोड़ दें तो यहाँ का माहौल ये आज भी है कि मस्जिद में अज़ान हो रही है वहीं बिल्कुल बराबर की दीवार से सटे मंदिर में पूजा अर्चना चल रही है. कभी किसी को कोई ऐतराज़ नहीं रहा और अल्लाह से यही दुआ है कि हम सब हिंदुस्तानी मज़हब से ऊपर उठकर अपने मुल्क की तरक़्क़ी के लिए मिल जुलकर काम करें.

  • 5. 07:34 IST, 25 मई 2009 AK:

    दरअसल यही हिंदुस्तान की पहचान है कि जहाँ कारी साहब और जगदीश भाई एक साथ बैठकर लंच-डिनर करते हैं. सबकी इज़्ज़त और आबरू का ख़्याल रखा जाता है.

  • 6. 07:35 IST, 25 मई 2009 Amit Prabhakar:

    वुसत भाई इसीलिए 2009 के भारत की तुलना 1999 के अफ़ग़ानिस्तान से नहीं की जा सकती.

  • 7. 07:48 IST, 25 मई 2009 Ashiq Husain Dubai:

    हम भी पिछले 18 साल से मुस्लिम देश में रह रहे हैं हमें आज तक एहसास नहीं हुआ कि हम मुस्लिम देश में रहते हैं. सभी लोग मिलजुल कर रह रहे हैं. ये तो मीडिया की देन है कि मुठ्ठी भर लोगों की शरारत को बढ़ा-चढ़ा कर इस्लाम को बदनाम करते हैं.

  • 8. 07:53 IST, 25 मई 2009 NARENDRA SHARMA:

    साहब जी, देख लो जी, मुझे भी बहुत अच्छा लगा, पूरा हिंदुस्तान ही देवबंद है जी, क्या ख़ूब लिखते हो जी, बस सबकी आंखें खोल दो.

  • 9. 07:57 IST, 25 मई 2009 uzma rizvi:

    ख़ान साहब, सलाम नमस्ते,
    सारे जहाँ से अच्छा हिंदोसिताँ हमारा, बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला. जय हिंद.

  • 10. 08:18 IST, 25 मई 2009 M.HUSSAIN:

    आपने जो देखा वही लिखा. न सिर्फ़ देवबंद बल्कि हमारा सारा देश ही ऐसा है. कछ लोग देवबंद की क्षवि को धुमिल करके देश में नफ़रत की खेती करने की गंदी कोशिश करते है.

  • 11. 08:28 IST, 25 मई 2009 rajkumar chhabra:

    वुस्तुल्लाह साहब, मेरी ये हार्दिक तमन्ना है कि आप के लेखों को पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ाया जाए और कुछ चुनी हुई रचनाएं पाठ्यक्रम में भी शामिल की जाएँ. जो नफ़रत की दीवारें स्कूल की किताबों में हैं उनकी जगह सच्चाई सामने आए. मेरी तरफ़ से आपको भारत रत्न, आम आदमी के दिल से भारत रत्न, भाई आपमें और हममें सिर्फ़ इबादत करने के तरीक़े ही अलग हैं, बाक़ी सब एक सा. सलाम-नमस्ते.

  • 12. 08:35 IST, 25 मई 2009 faisal :

    वाह जनाब वाह, आपने तो उलेमा को आईना दिखा दिया, चिराग़ तले अंधेरा है और रौशनी की बात करते हैं. उन्हें शर्म आनी चाहिए.

  • 13. 08:37 IST, 25 मई 2009 Tapesh tyagi:

    मेरे शहर के बारे में इतने अच्छे लेख के लिए धन्यवाद. मैंने अपना स्कूल देवबंद से किया जहां बहुत सारे मुस्लिम शिक्षक थे. मैं आपको अपने शहर में दावत देता लेकिन अफ़सोस कि मैं अभी भारत में नहीं हूं. ज़रा सोचें, आपको उस वक़्त कैसा लगेता जब एक हिंदू लड़का आप को दारुल-उलूम की सैर कराता और उसके सांस्कृत परिवेश के बारे में बताता. आपने देवबंद के बारे में जो लिखा वह बिल्कुल सच है. लेख के लिए धन्यवाद और मेरे शहर में जाने के लिए धन्यवाद.

  • 14. 08:43 IST, 25 मई 2009 jai singh gour:

    वुसत साहब, ऐसा सिर्फ़ भारत में होता है. हमें भारतीय होने पर गर्व है.

  • 15. 08:54 IST, 25 मई 2009 Mukesh Sakarwal:

    ख़ान साहब आपका ब्लॉग पढ़ना एक सुखद एहसास है, इसलिए नहीं कि आप भारत के भक्त हैं बल्कि इसलिए कि आप वास्तविक आलोचक है. क्या मैं आपसे ये कहने की हिम्मत कर सकता हूं कि अपने भारत भ्रमण के ख़त्म होने पर आप अपने खट्टे-मीठे अनुभव को किताब का रूप दें कि किस प्रकार भारत पाकिस्तान से सबक़ ले और पाकिस्तान भारत से, ताकि इनके सामाजिक रिश्ते बहाल हों. मैं ऐसी किताब पढ़ना पसंद करूंगा.

  • 16. 08:54 IST, 25 मई 2009 bhoopesh:

    ख़ान साहब, ये सोचकर बड़ी हैरानी होती है कि पाकिस्तान का वजूद सिर्फ़ हिन्दुस्तान के विरोध पर क़ायम है. मैं आज भी मानता हूँ कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान अलग-अलग हैं ही नहीं, वही कल्चर, वही हालत, वही वेश-भूषा. यक़ीन मानें कि अगर पाकिस्तान में कहीं विस्फोट से कुछ लोग मारे जाते हैं तो हिंदुस्तानी को भी बुरा लगता है, चाहे वो मुसलमान हो या हिन्दू क्योंकि उसी जगह आज़ादी से पहले या तो हिन्दू बसते थे या वहाँ आज भी मुसलमान भाईयों के रिश्तेदार रहते होंगे. फिर पड़ोस में अगर मातम हो तो दुसरे पड़ोसी को भी नींद तो नहीं ही आती है. मैं तो कहता हूँ कि ऐसा वक़्त ज़रूर आए जब पाकिस्तान और हिंदुस्तान फिर से एक हों, भले ही इसकी क़ीमत किसी मुसलमान को सियासत का रहनुमा बनाकर ही क्यों न अदा किया जाए. आप जैसे लोग अगर सोचें तो बस इतना कि अच्छी तालीम की वकालत करें. यक़ीन मानिए ये मज़हबी दीवारें अपने-आप गिर जाएंगी.

  • 17. 08:55 IST, 25 मई 2009 syed Azaz Ahmad:

    जी, यही है हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब.

  • 18. 08:56 IST, 25 मई 2009 shahab (aaudi arabi ):

    आपने सही लिखा, लेकिन मुसलमानों को दुनिया से ज़्यादा दीन की फ़िक्र होनी चाहिए, लड़कियों का स्कूल जाना मना नहीं है लेकिन वह स्कूल जो उन्हें सही दीनी शिक्षा दे ताकि वो अपने पूरे घर के माहौल को बदल सकें. मुझे मालूम नहीं कि वुस्तुल्लाह साहब क्या कहना चाहते हैं. सबसे पहले मुसलमानों को अपने काम ठीक करने होंगे, अगर शरिया सारी दुनिया में लागू हो जाए तो फिर अकारण कहीं विस्फोट नहीं होगा क्योंकि हमारा धर्म किसी भी तरह के ज़ुल्म न करने की और न सहने की शिक्षा देता है. मीडिया इसे सही ढंग से पेश नहीं करती.

  • 19. 08:57 IST, 25 मई 2009 Gtaneesh Kumar Chaturvedi:

    भारत में हिंदू कल्चर नहीं बल्कि हिंदुस्तानी कल्चर है. यहाँ परंपराएं मानने वाले हैं लेकिन कट्टरपन से उसके सड़ने की बदबू आती है. आपको हमारे देश को ज़रा और क़रीब से देखना बाक़ी है. कुछ कड़वी बातें भी बताएँ.

  • 20. 09:19 IST, 25 मई 2009 Munish Tyagi:

    आपने जो कुछ देवबंद में देखा यही भारत की संस्कृति है. यहाँ हम सब लोग एक साथ प्यार के साथ रहते हैं, चाहे वह हिंदू, मुस्लिम, जैन, सिख, ईसाई, यहूदी या पारसी हों.

  • 21. 09:21 IST, 25 मई 2009 Mukesh Sakarwal:

    ख़ान साहब, आपका ब्लॉग पढ़ने के बाद कबीर का ये दोहा याद आ गया.
    बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
    जो मन खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय
    बहुत बेहतर, लिखते रहिए.

  • 22. 09:31 IST, 25 मई 2009 Rajiv Bishnoi :

    ख़ान साहब, वैसे तो अबतक बीबीसी पर आपका हर लेख मुझे बहुत सटीक लगा है पर ये संदेश शायद सबसे ख़ास है. 'मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना'. इसकी एक जीवंत मिसाल है शायद आज का देवबंद. आप से गुज़ारिश है कि ये विचार आप पाकिस्तानी अवाम (ख़ास कर स्वात और आस-पास के इलाक़ों में) और मीडिया तक भी पहुंचाएं, क्यों नहीं हम दो देश भी ऐसे ही मिलजुल कर रह सकते हैं? पर डर ये है कि पाकिस्तान में कहीं आप पर ये तोहमत ना लगे कि आप भारत जा कर इस्लाम के "असल" रास्ते से बहक गये हैं.

  • 23. 09:33 IST, 25 मई 2009 vinod kumar agrawal:

    प्रतिक्रिया पढ़ने में मज़ा आ गया. मैंने कभी किसी भी लेख की प्रतिक्रिया नहीं पढ़ी थी. वाह क्या लेख है कि पूरा पढ़ने के बाद मैंने नीचे लिखी प्रतिक्रियाएं भी पढ़ डालीं. लिखने के लिए धन्यवाद.

  • 24. 09:36 IST, 25 मई 2009 इमरान अहमद :

    जनाब वुसत साहब, इसीलिए ही हमारा देश महाशक्ति के रूप में देखा जाता हैं.

  • 25. 09:37 IST, 25 मई 2009 raushan:

    प्रेम और भाईचारा दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त है, और जैसा कि पैग़म्बर मोहम्मद ने कहा कि सारी सृष्टि अल्लाह का परिवार है, तो आपस में कैसा झगड़ा.

  • 26. 09:41 IST, 25 मई 2009 Surender Sharma:

    आप शानदार हैं. मैं लगातार आप के लख पढ़ रहा हूँ. सब के सब संक्षिप्त और सरल हैं और इनके संदेश इतने अच्छे और सच्चे हैं कि इनमें कई किताबों का ज्ञान समाया हुआ है. मैं आपके लेखों को इसलिए पसंद करता हूँ कि इनमें सच्चाई पिरो दी गई है. मैं ऑस्ट्रेलिया में रहता हूँ और विश्वास रखता हूँ कि मेरी तरह बहुत सारे लोग आप के लेखों से लाभांवित हो रहे होंगे.

  • 27. 09:47 IST, 25 मई 2009 sandeep sharma:

    वुसत साहब, आपका चौंकना लाज़मी है. दरअसल मूल भावना से मनुष्य किसी से भी द्वेष नहीं रखता है. लोगों को आपस में लड़वाने का काम तो चंद मत्लबपरस्त लोग करते हैं. इस्लाम और मुसलमानों के बारे में आज जो धारणा प्रचलित है उसमें सांप्रदायिक और कट्टरपंथियों का हाथ है. पता नहीं ये लोग क्यों नहीं समझते कि लकीर का फ़क़ीर बने रहना ठीक नहीं होता. समाज में दुनिया में होने वाली घटनाओं के हिसाब से अपने आप को ढालना ही पड़ता है. और एक पते की बात, आप नाहक़ ही नक़्शे में दूसरा देवबंद ढूंढने बैठ गए, वो तो आपको मिलने से रहा क्योंकि देवबंद तो उस तहज़ीब की पैदाइश है जो इतिहास के पन्नों में गंगा-जमुनी तहज़ीब के नाम से मशहूर है और अनावृत अपनी निर्मल धारा में सबको भिगोती आ रही है. बेफ़िक्र रहिए धीरे-धीरे सब क़रीने से लाइन में आ जाएंगे. आख़िर मुठ्ठी भर कट्टरपंथी दुनिया के मुक़ाबिल कहाँ खड़े होंगे.

  • 28. 10:02 IST, 25 मई 2009 Ritesh:

    जनाब ख़ान साबह! ये हमारे देश की ख़ासियत है. 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा.'

  • 29. 10:44 IST, 25 मई 2009 anil prakash pande:

    ख़ान साहब! भारत के अधिकतर लोग ऐसे ही हैं. यहाँ राम और रहमान की इबादत एक साथ होती है. यहाँ हम अपने माता-पिता की बहुत इज़्ज़त करते हैं, मगर पड़ोसी के माँ-बाप के नफ़रत के पैमाने पर नहीं. पाकिस्तान में हिंदुस्तान को बहुत ही ग़लत तरीक़े से देखते हैं, उम्मीद है कि आपके विचार पाकिस्तन भी पढ़ेंगे.

  • 30. 10:54 IST, 25 मई 2009 Abhimanyu:

    मै भी पिछले कुछ हफ्तों से आपका हरेक लेख पढ़ रहा हूँ जो इस वेबसाइट पर आ रहा है, अच्छा लगता है कि कोई तो है जो तालिबानी इस्लाम नहीं बल्कि इंसानी इस्लाम के चश्मे से दुनिया देखता है, मेरे भी कुछ दोस्त हैं पाकिस्तान में, मैंने उनसे एक बार पूछा की आपको महात्मा गाँधी के बारे में क्या बताया जाता है, तो उन्होंने ने कहा की गाँधी के बारे में क्या कहना, वो बस हिन्दुओं के नेता थे.

    अगर आपके लिए संभव हो तो मै आपसे कहना चाहूँगा की हिंदुस्तान की यात्रा ख़त्म करके आप ज़रा यूरोप भी घूम लें. वहाँ अगर आपने अपना परिचय सही नहीं दिया तो शायद ही कोई पाकिस्तानी मिलेगा जो आपको पहली बार में बता दे की वो भी पाकिस्तान का है, नहीं तो सारे हिंदुस्तान की ही राग अलापते है, इनके रेस्तरां, दुकानें सबका इंडियन नाम होता है और तो और जैसे ही आप रेस्तराँ में जाएँगे मेन दरवाजे पे आपको गणेशजी की मूर्ति भी मिलेगी.
    मैंने तो आपको बस अभी ऊपरी बात बता दी अगर अंदर जायेंगे तो पता नहीं क्या क्या होता है, यहाँ की औरतों से शादी करना अपने आपको इंडियन बताके, लालच देना की बस शादी के बाद सीधे इंडिया घूमने चलेंगे.........
    मुझे तो ऐसा लगता है की अब कम से कम पाकिस्तान के लोगों को खुद सोचना चाहिए की ये जो हिंदुस्तान के काफिरों के लिए जो ज़हर दिल में लिए बैठे हैं उसका क्या असर हो रहा है, अपने पैर पे खुद ही कुल्हाडी मर ली!! ये ज़हर कहाँ ले जा रहा है कि अपनी पहचान भी बताने में शर्म आ रही है और फिर भी नहीं समझ रहे हैं. मुसलमान तो दूर पहले इन्सान तो बनो. मुझे तो ऐसा लगता है की अगर कहीं कोई सही मुसलमान है और जिसे अल्लाह प्यार करते हैं तो वो हिंदुस्तान में है क्योकि यहाँ का मुसलमान नमाज़ भी पढ़ता है, कृष्ण के भजन भी गाता है और गुरूद्वारे में माथा भी टेकता है और इसका जीता जागता उदाहरण है. डॉक्टर अब्दुल कलाम.

  • 31. 11:44 IST, 25 मई 2009 munazir husain ansari:

    ख़ान साहब! आपने जो ह़क़ीकत बयान की है वो आपके देश वालों को शायद अच्छी न लगे पर यह यहाँ का इस्लाम है.

  • 32. 12:12 IST, 25 मई 2009 kamlesh kumar diwan (writer):

    वुसतुल्लाह जी, देबबंद पर आपके विचार पढे ,वहाँ का मनमोहक चित्र और भी खूबसूरत दिखाई दिया. सब जगह मानवीय मूल्य हैं,जी वन के उत्कृष्ट आदर्श हैं, सतही तौर पर हमारी जो धारणाएं बनी रहती है यथार्थ का सामना होने पर वे टूटती है. हमें सभी जगहों की खोज ख़बर इसी तरह लेते रहना चाहिए.

  • 33. 12:25 IST, 25 मई 2009 ishwar adhiakri:

    पता नहीं ये लोग क्यों नहीं समझते कि लकीर का फ़क़ीर बने रहना ठीक नहीं होता. समाज में दुनिया में होने वाली घटनाओं के हिसाब से अपने आप को ढालना ही पड़ता है. और एक पते की बात, आप नाहक़ ही नक़्शे में दूसरा देवबंद ढूंढने बैठ गए, वो तो आपको मिलने से रहा क्योंकि देवबंद तो उस तहज़ीब की पैदाइश है जो इतिहास के पन्नों में गंगा-जमुनी तहज़ीब के नाम से मशहूर है और अनावृत अपनी निर्मल धारा में सबको भिगोती आ रही है. बेफ़िक्र रहिए धीरे-धीरे सब क़रीने से लाइन में आ जाएंगे. आख़िर मुठ्ठी भर कट्टरपंथी दुनिया के मुक़ाबिल कहाँ खड़े होंगे.

  • 34. 12:28 IST, 25 मई 2009 anil nakrr:

    डियर सर! इस तरह के लेख से हिंदू और मुसलमान क़रीब आएंगे और सौहार्द पैदा होगा. इस समय मुसलमानों की ये ज़िम्मेदारी है कि वो बताएं कि सभी मुसलमान कट्टर नहीं होते.

  • 35. 13:17 IST, 25 मई 2009 NEERAJ GORE:

    ये लेख दूसरे मुस्लिम देशों के लिए सबक़ है.

  • 36. 13:23 IST, 25 मई 2009 N.K.Tiwari:

    शानदार लेख के लिए बधाई. पश्चिम विज्ञान में आगे हैं तो भारत तत्व विज्ञान में. दुनिया के सिरफिरे लोगों को सिर्फ़ देवबंद ही दिशा दे सकता है और निकट भविष्य में भारत इस्लामी दुनिया का भी धर्म गुरू होगा और देवबंद बिना हिंसा और घृणा के मुसलमानों का मार्गदर्शन करेगा.

  • 37. 13:47 IST, 25 मई 2009 girish:

    यही अंतर है भारत और पाकिस्तान का.

  • 38. 13:52 IST, 25 मई 2009 Rajkumar Sharma:

    नमस्कार! यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप कैसे भारत की समृद्ध संस्कृति को संरक्षित करते हैं.

  • 39. 14:05 IST, 25 मई 2009 Fakhre:

    दरअसल यही हिंदुस्तान की पहचान है!

  • 40. 14:25 IST, 25 मई 2009 zafrulmulk:

    इस्लाम के बारे में सही जानकारी के लिए कम से कम एक बार हिंदूस्तान ज़रूर आना चाहिए. क्योंकि यहाँ की सभ्यता ऐसी है कि ये सभी को आत्मसात कर लेती है.

  • 41. 14:31 IST, 25 मई 2009 ubaid khan:

    जी जनाब आपने सही लिखा है.

  • 42. 15:00 IST, 25 मई 2009 mahesh kumar :

    जनाब वुसतुल्लाह साहब! हमारे हिंदुस्तान में आप जहाँ भी जाएं आपको एकता और भाईचारे की और भी बड़ी मिसाल देखने को मिलेगी. हम इंशाअल्लाह दुआ करते हैं कि पड़ोसी मुल्क भी हमारी तरह एकता और शांति पसंद बने.

  • 43. 19:40 IST, 25 मई 2009 ajay mahajan:

    भारतीय समाज में नफ़रत और कट्टरपन के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि असली भारतीय नफ़रत और आतंक में विश्वास नहीं करते. भारत में विविधता होने के बाद भी समाज बेरोक-टोक प्रगति के राह पर है.

  • 44. 21:01 IST, 25 मई 2009 bharat:

    वुसत भाई, कुछ सालों पहले आप जैसे किसी शख़्स से मिलने को दिल मचलता था. फिर पत्रकारिता में लिप्त फ़न्ने ख़ां और जुगाड़ सिंह को देख कर लगा कि ऐसे लोग ज़रा बाहर ही रहते होंगे. लेकिन पिछले कुछ दिनों से आपके ब्लॉग को देख कर दिल बाग़-बाग़ हो गया. शुरू के एक दो ब्लॉग को तो मैंने हल्के में ही लिया और कहा कि एकाध बार तो कोई भी ग़लती से अच्छा लिख बैठता है (मैं भी).. लेकिन जब लगातार आपके लिखे जुमले और उसके पीछे फ़लसफ़े को देखा तो वही फ़ालसा याद आ गया, जो आपके पिछले ब्लॉग में था. आप ज़रा लीक से हट कर हैं. हल्के में लेने की गुस्ताख़ी अब नहीं होगी और हां.. लिखते रहिए.

  • 45. 21:34 IST, 25 मई 2009 Praveen Kumar:

    बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छा पढ़ने को मिला अपने मुल्क के बारे में, ओर वो भी किसी पाकिस्तानी से, मज़ा आ गया. कुछ आश्चर्य तो इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैं उस इलाक़े से संबंध रखता हूँ. पर साहब ये ही है हिंदुस्तान.

  • 46. 00:23 IST, 26 मई 2009 Veer Shankar:

    जनाब, हिंदुस्तान की पहचान यहाँ की "अनेकता में एकता" वाली छवि से ही बनती है. हम हिंदुस्तानियों को सिखाया ही जाता है- "मजहब नही सिखाता, आपस में बैर करना" और यहाँ रहने वाला बच्चा-बच्चा इस बात से वाकिफ़ होता है. हाँ ये बात चाहे सारी दुनिया को पता हो,लेकिन हैं कुछ जगह, कुछ मुल्क, जहाँ लोग ये कहते और मानते हैं कि यहाँ मज़हबी शासन ही है, जैसा कि कुछ दुसरे मुल्कों में है. बस ज़रूरत इस बात कि है कि उन मुल्कों तक ये पैग़ाम पहुँचे कि हिंदुस्तान वैसा नही है जैसा वो समझते हैं, बल्कि वैसा है जैसा हम कहते हैं. और साथ ही ये भी कि दुनिया के वो मिटा देने वाले लोगों में ये गलतफहामी ना फैलाए कि यहाँ किसी को कोई मुश्किलें दे सकता है. ये वह हिंदुस्तान है जहाँ पाँचों उँगलियाँ मिलाकर मुट्ठी बनाई जाती है.

  • 47. 04:25 IST, 26 मई 2009 abu:

    आप जो महसूस किया वो आपने लिखा,,,सबसे बड़ी बात देवबंद में सबकुछ आपके सोच के विपरीत निकला,,,,ये संदेश उन मुसलमानों और हिन्दुओं तक भारतीय संस्कृति को और मज़बूती से पेश करेगा.

  • 48. 12:02 IST, 26 मई 2009 अभय कृष्ण उपाध्याय:

    वुसतुल्लाह साहब, इसे महज़ संयोग ही कहें कि आपका ब्लॉग पढ़ा और इसके ठीक पहले कुछ ऐसी घटना घटी कि यहां लिखने से अपने आपको रोक नहीं सका. किसी काम के सिलसिले में पुरानी दिल्ली के कश्मीरी गेट तक गया था. वापसी में मेट्रो स्टेशन पर राजीव चौक तक आनेवाली गाड़ी का इंतजार कर रहा था. तभी किसी शख्स को एकदम अपने चेहरे को घूरता पाया जैसे मुझमें घूसकर ही देखने की कोशिश कर रहा हो कि मैं कौन हूँ. मैं चौंका लेकिन पलभर में अनायास ही मुंह से निकल पड़ा अबे जाहिद यहां कैसे हो. और बातों का सिलसिला कुछ यूं निकला कि पंद्रह साल पहले से लेकर अभी तक की पूरी यात्रा राजीव चौक तक आते आते कर ली गई. कितने बच्चे हैं से लेकर कहाँ पढ़ते हैं और मेरी बीवी मेरे ही जितना चिकन खाती है कि नहीं ये सब भी जाहिद ने पूछ लिया. मैने बताया कि बेटा ब्राह्मण घर में पैदा होने में यही एक मुश्किल है ये खाओ ये मत खाओ और लगे हाथों उसने मुझे अपने घर ज़ाकिर नगर में चिकन खाने का निमंत्रण दे दिया. इस दिलासे के साथ कि भाभी के लिए पनीर ही बनेगी. ...और हमारा देवबंद भी तो हिंदुस्तां की सरजमी पर ही है... यहां तो कुरान की आयतें पढ़ी जाती हैं तो वहीं बाजू में कृष्ण भक्ति के गीत भी गाए जाते हैं. साहब हम तो ऐसे ही जीते हैं.

  • 49. 12:09 IST, 26 मई 2009 samir azad kanpur:

    ख़ान साहब, मेरे ख़्याल से यह लेख अब तक का सर्वश्रेष्ठ लेख है.

  • 50. 12:55 IST, 26 मई 2009 हितेश व्यास:

    ज़मीन से जुड़ी सच्चाई और भारत की एकता और अखण्डता को दर्शाता यह लेख वाकई क़ाबिल-ए-तारीफ़ है. सच बयां करते रहे और ऐसे ही लिखकर समाज को जगाते रहें.

  • 51. 13:41 IST, 26 मई 2009 सुधीर:

    सर, आपने जो भी लिखा ,निस्संदेह सच हो सकता है. परन्तु में सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ, कि ये गंगा-जमुनी संस्कृति तब तक ही चलती रहेगी जब तक कि हिन्दू यहाँ पर बहुसंख्यक हैं. जिस दिन हिन्दू इस देश में अल्पसंख्यक हो गया सारी गंगा-जमुनी संस्कृति धरी की धरी रह जाएगी और हम हिन्दुओं को मुसलमानों की दया पर रहना पडेगा ,और तो और जजिया भी चुकाना पड़ सकता है. हो सकता है कुछ लोगों को मेरी बात बुरी लगे ,किन्तु मित्रों यही सच्चाई है. नहीं तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार की इन्तहा नहीं हो रही होती.

  • 52. 14:41 IST, 26 मई 2009 मिथिलेश:

    पहली बार किसी पाकिस्तानी पत्रकार के विचारों से अवगत हुआ. वाकई अच्छा लगा. खान साहब ने जिस तरह देवबंद पर बेवाक टिप्पणी की, इससे तो पढ कर ऐसा लगा कि मुसलमान अमन, चैन और महिला शिक्षा के उतने ही पक्षधर है जितना कोई और. काश! कोई शाही इमाम को बताए.

  • 53. 16:13 IST, 26 मई 2009 AFTAB ALAM KHAN:

    बहुत दिनों के बाद कुछ अच्छा पढ़ने को मिला.

  • 54. 18:26 IST, 26 मई 2009 पीयुष:

    आपका लेख पढ़ कर अपने शहर अज़मेर शरीफ़ की तस्वीर आंखोँ के सामने तैर गई. सब कुछ ऐसा ही तो है हमारे शहर में भी जहाँ बाबा की दरगाह में अगर 20 मुसलमान आते है तो 80 हिंदू बाबा की ख़िदमत में अपनी हाज़िरी देते हैं. यहाँ हिंदू और मुसलमान साथ-साथ एक क़तार में बाबा से अपने ख़ुशहाली की दुआ माँगते हैं. सचमुच में बड़ा बेज़ोर नज़ारा होता है, क्या हिंदू क्या मुसलमान सभी ज़ायरीन एक से लगते हैं.
    ॥सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा॥

  • 55. 03:57 IST, 27 मई 2009 pandit ashok issar:

    इस दुनिया में सिर्फ़ भारत में लोग सबसे ज़्यादा खुश हैं, क्योंकि यहाँ अल्लाह, राम, ईसा मसीह और गुरुनानक के मानने वाले एक साथ अपनी मरज़ी से रहते हैं, यदि मनुष्य जीवन लेकर इस दुनिया का आनंद ना लिया तो कुत्त्ता, बिल्ली, चुहा, बनकर क्या कर लोगा. दुनिया में सबसे बड़ा पुन्य है आशीर्वाद लेना और आशीर्वाद देना.

  • 56. 06:52 IST, 27 मई 2009 के. आई. अहमद :

    जहां मुहब्बत हो, भाईचारा हो, मिल जुल कर जीने का आदर्श हो, वहीं अमन सलामती है, ये ही इस्लाम है जो की देवबंदियों ने अमल करके दिखाया है. मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दुस्तां हमारा.

  • 57. 12:02 IST, 01 जुलाई 2009 majid ali khan:

    खान साहब अस्सलाम अलैकुम, आपका ब्लॉग पढ़ा. दरअसल हिंदुस्तान में जैसा माहौल होना चाहिए वह देवबंद में है और जैसा पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान में होना चाहिए वह तालिबान बना रहे हैं. हिंदुस्तान में गैरमुस्लिम भी रहते हैं इसलिये कुछ चीजों की इजाज़त समाज में दे दी गयी है लेकिन जहां सब मुसलमान हों वहां खुराफ़ात करने का क्या मतलब. मेरी समझ में नहीं आता जो नामनिहाद मुसलमान तालिबान को गालियां देने लगते हैं उन्होंने इस्लाम पढ़ा भी है या नहीं. शर्म की बात है कि एक इस्लामी स्टेट में नशे की चीजें बेंची जाएं अगर तालिबान उन्हें किसी काम से रोकें तो उलटे ये बेचारे आधे अधूरे मुसलमान उन्हें बुरा भला कहते हैं. सही बात यह है कि ये मुसलमान वही हैं जिनके बारे में जार्ज बर्नाड शॉ ने कहा था कि इस्लाम दुनिया का सबसे अच्छा मज़हब है और मुसलमान दुनिया की सबसे बदतरीन कौम.

  • 58. 18:18 IST, 04 अगस्त 2009 manoj bhai shah:

    बड़ी ही संजीदा क़िस्म की बातें लिखते हैं आप. शुक्रिया.

  • 59. 20:35 IST, 08 अगस्त 2009 rajneesh mishra:

    मैं खुद तो कभी देवबंद नहीं गया, लेकिन ख़ान साहब की कलम से मैं भी देवबंद घूम आया. ये पता भी चल गया कि देवबंद में भी भारत के अन्य भागों की तरह ही मुस्लिम या हिंदू नहीं हिंदुस्तानियत ही रहती है.

  • 60. 16:06 IST, 10 सितम्बर 2009 javed:

    असली धर्म को सब भूल चुके हैं
    अब धर्म की बात का क्या लाभ
    असली धर्म है मेहनत से कमाना
    और ज़रूरतमंदों में बांट देना
    इसके अलावा सब ज़बानी जुगाली है मेरे भाई.

  • 61. 17:47 IST, 14 सितम्बर 2009 Anurag Gautam:

    भारत कहे, हिंदुस्तान कहे, या फिर इंडिया....
    सिर्फ नाम ही बदलते है, लोग नहीं बदलते....
    बाज़ार में कुछ लेने से पहले हम ये नहीं पूछते की बेचने वाला कौन है....
    न ही हस्पताल में खून की थैली पे ये नहीं लिखा होता, की इसे देने वाला हिन्दू था या मुसलमान....
    आज कहीं पढ़ा, कि एक आलिम ने कहा कि एक मुस्लिम औरत किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकती...
    कहते है मज़हब इजाज़त नहीं देता....
    क्या किसी भी बात की सिर्फ इस लिए मुख़ालिफ़त की जाए कि वो सरकार ने कही है, या फिर किसी न्यायालय ने कही है...
    इन चीज़ों से ऊपर उठ कर उस मां का सोचिए, जिस का बच्चा नहीं है....
    क्या उस औरत को सिर्फ इस चीज़ की सजा देना चाहते है कि वो एक मुस्लिम है....
    सोचिए.....

  • 62. 17:20 IST, 19 अक्तूबर 2009 Gajender Bisht:

    ये हमारे मुल्क की ख़ास पहचान है कि यहाँ अगर कुछ गुंडे और चंद सियासतदानों को छोड़ दें तो यहाँ का माहौल ये आज भी है कि मस्जिद में अज़ान हो रही है वहीं बिल्कुल बराबर की दीवार से सटे मंदिर में पूजा अर्चना चल रही है. कभी किसी को कोई ऐतराज़ नहीं रहा और अल्लाह से यही दुआ है कि हम सब हिंदुस्तानी मज़हब से ऊपर उठकर अपने मुल्क की तरक़्क़ी के लिए मिल जुलकर काम करें

  • 63. 17:29 IST, 19 अक्तूबर 2009 Gajender Bisht:

    मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दुस्तां हमारा.

  • 64. 15:04 IST, 18 मई 2010 Uday:

    प्रिय ख़ान साहब, अगर आप वास्तविक हिंदुस्तान की आपसी मोहब्बत देखना चाहते हैं तो कभी गाँव में आ कर देखिए. मैं एक ब्राह्मण परिवार से हूँ और हमारे घर के बग़ल में बहुत सारे मुसलमान लोग रहते हैं. कहीँ कोई फ़र्क़ नहीं है. जब मैं गाँव जाता हूँ तो सभी बड़ों के पैर छूता हूँ. ये तो हमारे कुछ गंदे नेता लोग हैं जो वोट बैंक की नीति में आपस में नफ़रत के बीज बोते हैं. और आपको बता दूँ यह कुछ नहीं कर पाएँगे क्योंकि इनसे भी बड़े राक्षस आए जिन्होंने नफ़रत फैलाने की कोशिश की लेकिन हम जैसे पहले थे वैसे ही आज हैं.
    अगर गाँव देखना है तो आइए, हम आपको भारत दिखाएँगे.

  • 65. 16:13 IST, 19 मई 2010 vikas singla:

    बहुत ही अच्छा लिखा है. बच के रहना जनाब, कहीं ओसाम न सुन ले...

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