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खुरंट मत खुरचना !

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|रविवार, 31 मई 2009, 14:54 IST

090531061203_golden_temple226.jpgये बात है जून 2004 की....

जब मैं चंडीगढ़ से जुड़े शहर मोहाली के एक गर्ल्स हॉस्टलनुमा स्कूल में गया तो ऑपरेशन ब्लू स्टार को हवाएँ बीस बरस पीछे फेंक चुकी थीं.

इस हॉस्टलनुमा स्कूल में वे बच्चियां पल, बढ़ और पढ़ रहीं हैं जो सरकारी खातों में ख़ालिस्तानी दहशतगर्दों की औलाद और सिख समाज में शहीदों की बच्चियों के तौर पर जानी जाती हैं.

इनमें से दो बच्चियां अक्सर बात करते-करते आँसू पीने की कोशिश में रुक-रुक जाती थीं.

आज जून 2009 शुरू होने वाला है. हवाओं ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को और पांच बरस पीछे फेंक दिया है.

इस दफ़ा मैं मोहाली ना जा सका. मगर मुझे यक़ीन है कि वे दो बच्चियां जिनके नाम इस वक़्त मुझे याद नहीं आ रहे, अब अपने बच्चों के साथ किसी पुरसुकून से घर में बैठी हँस खेल रही होंगी. क्योंकि इन बच्चियों की वॉर्डन ने बताया था कि हम इन दोनो बच्चियों की अगले पांच छह महीने में बड़ी अच्छी जगहों पर शादियां करवा रहे हैं.

इसी हॉस्टल में नन्हीं सी कृपाण गले में लटकाए 14-15 बरस की प्रीत कौर ने ग़ुस्से से अपने गाल लाल करते हुए बड़े जोश से बताया था कि मैं अपने बापू के क़ातिलों को कभी नहीं भूलूंगी. मैंने शहद चखकर, क़सम खाकर ये कृपाण लटकाई है और ये तब भी मेरे गले से नहीं उतरेगी जब मैं डॉक्टर बन जाऊँगी....

मुझे यक़ीन है कि अब वो ग़ुस्से से जूझती नाज़ुक सी बच्ची या तो डॉक्टर बन चुकी होगी या फिर बनने वाली होगी. मुझे यक़ीन है कि दोनो ही सूरतो में अब प्रीत कौर के गले में लटकी नन्हीं-मुन्नी सी कृपाण स्टेथोस्कोप में बदल चुकी होगी.

मौंटी सिंह परवाना इस वक़्त दिल्ली के ख़ान मार्केट के क़रीब रेन्ट-ए-कार के काउंटर पर बैठता है. मौंटी आज 25 बरस बाद भी बड़े जोश से क़सम खाकर बताता है कि उसके बाप का संत जरनैल के जत्थे या सियासत से न लेना एक था न देना दो. वो तीन जून को गोल्डन टेम्पल में सैंकड़ों दूसरे यात्रियों की तरह फ़ौज के घेरे में फँस गया था और फिर सैंकड़ों लाशों में उसकी लाश भी शामिल हो गई.

मौंटी सिंह कहता है कि उस वक़्त मैं साढ़े छह बरस का था. मुझे याद है कि जब बाप की मौत की पुष्टि हो गई तो माँ ने मुझे पल्लू में छुपाकर ज़ोर से भींच लिया था. वो दिल्ली आना चाहती थीं मेरे मामा के पास. मगर बात टलती गई. अच्छा ही हुआ. वरना हम भी उस दिन दिल्ली में होते जिस दिन इंदिरा गाँधी को दो सरदारों ने मारा था.... आज मेरे दोनों बच्चे अपने दादा को मुझ से ज़्यादा जानते हैं.

वाहे गुरू की कृपा से धंधा भी अच्छा चल रहा है.... बस कभी-कभी बड़े ज़ोर से हौल उठता है कि ये सब न होता तो कितना अच्छा था.

पर अच्छी बात ये है कि ज़ख़्म चाहे कैसा ही हो, खुरंट आ ही जाता है... कुछ लोग अपने ज़ख़्मों का खुरंट बार-बार खुरच लेते हैं. पर हम सिख ऐसा नहीं करते..आगे बढ़ जाना ही ठीक है... खुरंट से ज़्यादा छेड़-छाड़ अच्छी नहीं होती...तकलीफ़ लंबी हो जाती है....

मौंटी मुझसे मुख़ातिब है. कहता है- आप सुनाओ... आपको फ़ुल-डे के लिए गाड़ी चाहिए या हाफ़-डे के लिए... कब तक हो यहां... पाकिस्तान कब जाओगे..... अब तो आपके देश में भी ऑपरेशन ब्लू स्टार वाला गोल्डन टेम्पल बन गया है.... है कि नहीं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:58 IST, 31 मई 2009 adi:

    क्या बात कर रहे हैं जनाब. कहते हैं कि खुरचना मत और खुद ही नाखून बढ़ाते हैं.

  • 2. 15:59 IST, 31 मई 2009 praveen sharan:

    एक बात तो है खान साब......आप लिखते बहुत अच्छा हैं.

  • 3. 16:00 IST, 31 मई 2009 Deepak Tiwari:

    दुर्घटनाएँ अतीत का एक काला हिस्सा हैं... आगे बढ़ना और भविष्य के बारे में सोचना समझदार आदमी की निशानी है. .यही हम भारतीयों की विशिष्टता है.


  • 4. 16:02 IST, 31 मई 2009 jaswinder singh:

    मोन्टी के पिता जैसे कई बेगुनाह लोग शिकार बने और भिंडरावाला और सरकार दोनों की तरफ़ से बड़ी ग़लतियां हुईं. दोनो ही पक्षो को इसका अंजाम मालूम था. ज़ख़्मों को भूलकर अब आगे बढ़ने का वक़्त है और शिक्षा इसका एक सही हल है. मैं उन लोगों के दुख को समझ सकता हूँ जो इस हादसे से गुज़रे हैं लेकिन सकारात्मकता के अलावा इसका कोई दूसरा विकल्प भी तो नही है. दोनो ही पक्षों को अपनी कमियों को तलाश कर उन्हें ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए. इसमें सरकार को पहल करनी चाहिए. साथियों हमने ब्लु स्टार के बाद काफ़ी कुछ देखा अब हमारा पड़ोसी मुल्क भी ऐसी ही समस्या से जूझ रहा है, श्रीलंका ने भी वही किया जो भारत ने 1984 में किया था. अफ़ग़ानिस्तान जल रहा है.. और इस सब का अंत नज़र नही आ रहा है. हम भारतीय क़िस्मत वाले हैं क्योंकि हमारे यहाँ प्रजातंत्र है. हमने इसका अभी तक सही इस्तेमाल नहीं किया है. जातिवाद और क्षेत्रवाद को भूलकर आगे सोचना चाहिए. सिक्खों ने ये समझ लिया है. अभी भी कुछ लोग हैं जो 84 के दंगों को अपनी राजनीति चमकाने के लिए कुरेदते रहते हैं. ऐसे लोग हर जगह हैं. लोगों को ऐसे तत्वों को ढूंढ कर उनका बॉयकॉट करना चाहिए. कट्टरवाद और धार्मिक हठ एटम बम से ज़्यादा ख़तरनाक हैं.

  • 5. 16:11 IST, 31 मई 2009 himmat singh bhati:

    मुझे अफ़सोस और दुख के साथ ये लिखना पड़ रहा है कि आप के ब्लॉग को मैंने पढ़ा भी आप की तारीफ़ भी की. लेकिन जैसे एक सिख ने कहा कि खुरंट को बार बार कुरेदने से तकलीफ़ बढ़ती ही है. इसलिए मुझे लगता है कि उस बात को दोबारा करना उस ज़ख़्म पर लगे खुरंट को कुरेदने जैसा है. आप पाकिस्तान में लगी आग को बुझाने के लिए वहां की सरकार को कुछ सलाह दीजिए ताकि वहाँ शांति हो सके और वो कश्मीर का अलाप बंद करे. पाकिस्तान की जनता का दुख कम हो सके पाक सरकार को ऐसे उपाय सोचने चाहिए.

  • 6. 16:54 IST, 31 मई 2009 amardeep singh:

    आपके पास ब्लॉग में लिखने के लिए कुछ और नहीं है क्या. ये आपकी फ़ितरत है कि पाकिस्तान में रहते हुए न सिर्फ़ हिंदुस्तान की आलोचना की जाए बल्कि यहां हिंदुस्तान में रहते हुए पाकिस्तान की आलोचना की जाए. संभल जाइए आपके घर में लगी आग में आप भी जलेंगे. शर्त यह है कि जिसे आप मदरे वतन कहते हैं वहाँ से कायरों की तरह भागिए नहीं....हम अपने ज़ख्मों को मरहम के तले छिपाकर तरक्की की राह पर चलना जानते हैं........

  • 7. 17:00 IST, 31 मई 2009 anil prakash pande:

    वक्त के साथ ज़ख़्मों का भरना तो कुदरत है मगर दिल की टीस भी वक्त के साथ बढ़ती है. मासूम हिंदुस्तानियों (मेरे लिए अपने सिख भाई बहनों को इस तरह संबोधित करना ज़्यादा ठीक लगता है क्योंकि उस दिन मैं भी रोया था, दसवीं क्लास में पढ़ता था) के हत्यारे आज भी ज़िंदा हैं और सरकार ने कुछ भी नहीं किया है. जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और एचकेएल भगत का नाम आज भी ज़िंदा है, क्यों? पूरा भारत 84 के दंगों का न्याय चाहता है. जिन बच्चों का ज़िक्र आपने किया वो इस देश की बच्चियाँ हैं और देश का प्रशासन उन्हें भूल बैठा है. हमारा टैक्स ऐसे बच्चों के पुनर्वास के लिए क्यों नहीं जाता?

  • 8. 17:24 IST, 31 मई 2009 Pappu:

    खान साहब, आपने जो बात अपने टाइटल में कही है, अपने ब्लॉग में उसी बात को आप काट रहे हैं. आपने कहा कि ज़ख्म को कुरेदा न जाए लेकिन आप खुद वही कर रहे हैं. मुझे लगता है कि आपकी बात एकतरफ़ा है क्योंकि आप भारतीय नहीं हैं. आप हमेशा हमारे देश की बातों को दूसरे नज़रिए से देखते हैं.

  • 9. 17:28 IST, 31 मई 2009 Devendra Sharma:

    खान साहब, मैं आपके ब्लॉग में पाकिस्तान के बारे में भी कुछ पढ़ने का इंतज़ार कर रहा हूँ. लेकिन अब तक उस विषय में ज़्यादा कुछ नहीं देखा. क्या आप उस बारे में कुछ लिखना नहीं चाहते या आपको लिखने नहीं दिया जा रहा. यह शर्मनाक है कि आप दूसरी सभी महान बातों पर तो लिखते रहते हैं लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक क्या-क्या सहन कर रहे हैं, इस मुद्दे पर कुछ लिख सके. मज़े की बात है कि भारतीय नेता भी इस ओर से आँखें मूंदे हुए हैं. दरअसल, ऐसी बातों के बारे में बोलने को सांप्रदायिक करार दिया जाता है. किसी भी इस्लामिक देश में वास्तविक इस्लाम मौजूद नहीं है. किसी भी रूप में. फिर ऐसा क्यों है कि भारत और अमेरिका में मुस्लिम अल्पसंख्यक असली इस्लाम को अपनाते हैं?

  • 10. 17:41 IST, 31 मई 2009 N.K.Tiwari:

    बड़े मियाँ, क्या आपने यह ब्लॉग लिख कर खुरंट नहीं खरोंचा?

  • 11. 19:00 IST, 31 मई 2009 Un Known:

    सबसे पहले खान साहब को अपना ब्लॉग बंद कर देना चाहिए और भारतीय सरकार को उन्हें वापस पाकिस्तान भेज देना चाहिए. हम वह दिन नहीं भूल सकते जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर बहुत से मासूमों को मार डाला था. खान साहब को सबसे पहले पाकिस्तान की समस्याओं के बारे में सोचना चाहिए. इन्होंने अब तक मुंबई हमले और पाकिस्तानी आतंकवादियों के बारे में कुछ नहीं कहा है. मैं दुनिया के सभी धर्मों का सम्मान करता हूँ. लेकिन खान साहब को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है और हम स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में विश्वास करते हैं. मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या पाकिस्तान में इतनी स्वतंत्रता है. एक बात और. आप भारत के बारे में क्या जानते हैं और क्या आप जानते हैं कि स्वतंत्रता क्या होती है.

  • 12. 19:18 IST, 31 मई 2009 SHABBIR KHANNA:

    खान साहब, मैंने पहले भी लिखा था और अब फिर से लिख रहा हूँ कि कृपया भारत में हुई पुरानी बातों को मत उधेड़िये. यह देखिए कि आज यहाँ क्या हो रहा है. जो गुज़र गया वो गुज़र गया और जो हुआ उसके लिए हमारे बेईमान नेता ज़िम्मेदार थे.

  • 13. 19:39 IST, 31 मई 2009 mehdi baqri:

    किसी भी ज़ख्म को कुरेदने से तकलीफ़ बढ़ती है और ज़ख्म का कारण बनी घटना की याद ताज़ा हो जाती है. ...जो कि राजनीति करने और इससे फ़ायदा उठाने का एक अच्छा ज़रिया बन जाता है. ....इसलिए कोई भी राजनीतिक पार्टी या नेता ऐसे दर्द भरे ज़ख्मी लम्हों पर मरहम रख कर ज़ख्म को ख़त्म कर देने से हमेशा ज़ख्म को ज़िंदा रखने में विश्वास रखते हैं. यह हर देश जाति और धर्म का दर्द है. वरना ऐसी घटनाएँ कभी हों ही न.......

  • 14. 19:41 IST, 31 मई 2009 mukesh patel:

    बदलाव ईश्वर का ही नियम है.....

  • 15. 21:57 IST, 31 मई 2009 Deepak Verma:

    मैं सिर्फ़ नीली फ़्लैश लाइट्स और बम धमाकों की आवाज़ों को याद कर सकता हूँ क्योंकि ऑपरेशन ब्लू स्टार के वक्त मैं सिर्फ़ तीन बरस का था. और मेरा घर स्वर्ण मंदिर से बहुत नज़दीक था. मुझे नहीं पता कि भिंडरावाला क्यों स्वतंत्रता चाहते थे और क्या पंजाब भारत के बिना जी सकता है. हर अपराध के पीछे किसी और का हाथ होता है जिसे इससे कुछ फ़ायदा हो और यहाँ भी भारत का एक पड़ोसी फ़ायदा उठाने की कोशिश में था. इन ग़लत इरादों के लिए मासूम लोगों का इस्तेमाल किया गया और यह धर्म की बड़े से परदे के पीछे छिपकर यह सब करना काफ़ी आसान हो जाता है. भिंडरावाला को भी हिंदू और सिखों की एकता को तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया. सिख हिंदुओं का ही एक हिस्सा हैं. और अगर कोई यह मानता है कि वे अलग-अलग हैं तो वह चरमपंथी है.

  • 16. 01:04 IST, 01 जून 2009 ANIL MISHRA:

    इतिहास में बहुत से हादसे दबे हुए हैं जब आम आदमी ने बिना किसी वजह के बहुत सहा है. उस वक्त का समय बहुत ख़राब था जिसने बहुत से सिखों के दिलों में घाव पैदा कर दिए. लेकिन मैं मोंटी सिंह की तारीफ़ करना चाहूँगा कि वह सच्चे सिख हैं और उन जैसे अनेक लोग ज़िंदगी की सचाईयों के साथ चल रहे हैं. दरअसल, न्याय न मिलने या देर से न्याय मिलने की वजह से आम आदमी का भरोसा कानून से उठता जा रहा है. अंततया ईश्वर उनकी मदद करता है जो अपनी मदद खुद करते हैं.

  • 17. 01:42 IST, 01 जून 2009 Malkiat singh Virk:

    हमारे लिए यह एक अतीत की घटना है........मगर जिन का सब कुछ इसके साथ ही ख़त्म हो गया वो इस घटना को कैसे भूल पाएंगे....आप इस बात को याद करवा के क्या साबित करना चाहते हैं. ...अगर आपका मकसद समाज की भलाई है तो आप अतीत की काली यादों को बंद ही रहने दें. आज भी यहाँ और वहाँ पाकिस्तान में भी बहुत से ऐसे हालात हैं जो 1984 से भी ज़्यादा दर्दनाक हैं. दुआ कीजिए और लोगों को जागरूक कीजिए कि ऐसी घटनाएँ फिर न हो.....जब भी कुछ ऐसा घटित होता है, हमारे कुछ अपने ही इसके ज़िम्मेदार होते हैं.

  • 18. 03:05 IST, 01 जून 2009 surinder:

    "क्या कानून अंधा होने के साथ साथ बहरा भी हो गया है". यह कांग्रेस के लिए शर्मनाक है और भारत के लिए भी. क्या मानवाधिकार संगठन इसमें कुछ नहीं कर सकते. और विपक्ष कहाँ गया. क्या वह भी मारे गए लोगों में शामिल था. इसमें कोई शक नहीं कि मारे गए लोगों और उनके परिजनों को न्याय नहीं मिला. दशकों तक उनका गुस्सा दबा रहा और अगर यह फूटेगा तो एक ज्वालामुखी की तरह. मेरे विचार से इसका एक ही उपाय है कि दोषियों को बिना किसी का पद देखे दंडित किया जाए. तभी उन्हें न्याय मिलेगा. क्या अपराधी कानून से बढ़कर हैं????

  • 19. 04:05 IST, 01 जून 2009 Anil Talwar:

    मैं हिम्मत सिंह जी से पूरी तरह से सहमत हूँ और खान साहब से आग्रह करता हूँ कि वे पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों पर ध्यान दें और अपने ब्लॉग में बिना वजह के मुद्दों को तूल न दे. उनसे उम्मीद है कि वे अब अपने ब्लॉग में ऐसे मुद्दे नहीं उठाएंगे और लोगों की भावनाओं को समझते हुए सीमा में रहकर लिखेंगे.

  • 20. 05:37 IST, 01 जून 2009 Hiren Bhagat:

    मैं सहमत हूँ कि हम सभी को गुज़रा समय भूलकर आगे बढ़ने की ज़रूरत है. यह सही है कि यह लोगों और सरकार की ग़लती थी. उस वक्त मैं बहुत छोटा था लेकिन जब भी यह सब पढ़ता था तब मुझे लगता था कि मैं रोऊँ. ख़ैर, मैं बीबीसी से आग्रह करता हूँ कि खान साहब के लेख अपनी वेबसाइट पर न छापें. उन्हें अपने देश पाकिस्तान के बारे में लिखना चाहिए जो सिर्फ़ बीबीसी उर्दू पर प्रकाशित हो.

  • 21. 06:11 IST, 01 जून 2009 Amit Shahi:

    मुझे लगता है कि आपको अपने यहां वापस लौट जाना चाहिए, शायद आप अपने देश में ऐसी सलाह नहीं दे सकते इसलिए यहां आकर अनावश्यक बातों पर ब्लॉग लिख रहे हैं और बता रहे हैं भारतीय फौज के बारे में. आप बातों को आधी अधूरी कह कर उनका आशय मत बदलिए. आप यह लिख सकते हैं कि भारतीय जनता और फौज क्या करती और क्या सोचती है' लेकिन कभी आज तक आपने ऐसा कुछ पाकिस्तान के बारे में लिखा होगा मुझे नहीं लगता. दूसरों पर उंगली उठाने से पहले आप पाकिस्तान के बारे में लिख कर देखिएगा, वहां के मौलवियों की कट्टरता के बारे में लिखिए और उस लड़की के बारे में भी जिसके साथ आपकी पंचायत बलात्कार का आदेश देती है, फिर आपको अपनी जान बचाने के लिए भारत में ही रहना पड़ेगा.

  • 22. 06:17 IST, 01 जून 2009 Zafar:

    आपने भी खुरंट से छेड़छाड़ कर दी. इससे अच्छा तो यह था कि आप उन दो बच्चियों के बारे में मालूम करके हम हिंदुस्तानियों के ज़ख्म को भरते. और शायद यह संदेश भी ज़्यादा अच्छा होता.

  • 23. 06:26 IST, 01 जून 2009 Amit Shahi:

    बीबीसी को एक नेक सलाह दे रहा हूँ कि कृपया आप ब्लॉग को न्यूज़ की तरह न पेश करें .ब्लॉग व्यक्तिगत विचार होते हैं, समाचार नहीं. ब्लॉग का सही होना आवश्यक नहीं है. आपको लिखना अवश्य चाहिए कि यह बीबीसी का विचार है या खान साहब का.

  • 24. 06:53 IST, 01 जून 2009 Dr. D Singh Punjabi:

    शायद भारत में अल्पसंख्यकों के साथ ऐसा ही होता रहेगा. चाहे वो सिख हों या मुस्लिम या ईसाई. चाहे वो 1984 हो या 1992 हो या गुजरात हो या कंधमाल. बहुसंख्यक जब चाहे जिसको निशाना बनाएं, कुछ नहीं होगा उनको. देश उनका, कानून उनका, सरकार उनकी. व्यवस्था उनकी. क्या यह सही है कि 84 के ज़िम्मेदार आज भी आराम से रह रहे हैं. जबकि हज़ारों सिख बेकसूर जेल में आतंकवाद के नाम पर बंद कर दिए गए. 1992 के ज़िम्मेदार तो ऊँचे पदों पर बैठ गए और आज तक कुछ नहीं हुआ. जबकि मुंबई हमले के आरोपियों के केस भी फ़ाइनल हो गए. शायद इसीलिए ऐसा महसूस होता है कि भारत में हम दूसरे दर्जे के नागरिक हैं.....

  • 25. 06:56 IST, 01 जून 2009 sachin:

    वुसतुल्लाह ख़ान वापस जाओ!

  • 26. 07:06 IST, 01 जून 2009 surya narayan singh:

    आज एक जून है. आपने नेपाल में आज के दिन हुई घटना के बारे में कुछ नहीं लिखा. आज के ही दिन नेपाल में राजा विरेंद्र विक्रम और उनके पुत्रों की हत्या हुई थी.

  • 27. 07:21 IST, 01 जून 2009 shahab alam (saudi arabia):

    खान साहब, पुरानी बातें याद कर के रोने से अच्छा है कि जिस ग़लती से हज़ारों बेगुनाह मारे गए हैं उस तरह की ग़लती दोबारा न होने पाए. हम आम नागरिक ही बेवकूफ़ हैं जो बिना सोचे समझे किसी के भी खून के प्यासे हो जाते हैं और कितनी बर्बादी कर डालते हैं. इन नेताओं के चक्कर में आम आदमी मरता है. खान साहब भारत की बात करते हैं. आए दिन पाकिस्तान में ऐसी घटनाएं होती रहती है. अभी स्वात में जो हो हो रहा है उसका कौन ज़िम्मेदार है. उस बारे में भी बताएँ...पाकिस्तान के बनिस्बत हमारा भारत बहुत ही अच्छा और बेहतर है.

  • 28. 07:55 IST, 01 जून 2009 s l chowdhary:

    ..........तो आपने खुरंट खरोंच ही दिया.....

  • 29. 07:55 IST, 01 जून 2009 Amit Shahi:

    मैं आलम साहब की बात से सहमत हूँ और वुसतुल्लाह खान से बस इतना ही कहूँगा कि खोखला प्रचार पाने के लिए बातों को अपूर्ण रूप से न लिखें. आप जब एक बात को आधी बताएँगे तो उससे ग़लत संदेश ही जाता है. आप एक बड़े पत्रकार होंगे लकिन आप यह भूल जाते हैं कि समाज में ज़हर घोलने का काम आप लोग भी कम नहीं करते. बातों को शालीन तरीके से कहना सीखिए और आजकल के नवजात टीवी चैनलों की तरह , टीआरपी बढ़ाने के लिए ग़लत तरीकों का उपयोग न करिए. जनता कभी एक दूसरे से नहीं लड़ती. उसे मीडिया, राजनीतिक लोग और धर्मगुरु ही एक दूसरे से लड़वाते है. राजनीतिज्ञ को सत्ता चाहिए, गुरु को शिष्य तथा औरों से श्रेष्ठ होने का आवरण और मीडिया को मसाला, भले ही वह किसी की मौत से आता हो? थोड़ा रुक कर सोचिये कि कहीं आप भी जाने अनजाने इस जमात में शामिल तो नहीं हो रहे हैं , आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा.

  • 30. 08:20 IST, 01 जून 2009 vishnu sharma:

    अगर यह ब्लॉग बीबीसी उर्दू की वेबसाइट पर भी दिखाया गया है तो यह सकारात्मक सोच को बढ़ाने और वैमनस्य को घटाने का काम करेगा. इसी तरह अगर कोई लेखक पाकिस्तान में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल के बारे में लिखे तो यह भारत में दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने का काम करेगा. नहीं तो आप ग़लत नंबर डायल कर रहे हैं.........

  • 31. 08:50 IST, 01 जून 2009 Devendra Tripathi:

    बहुत लिख लिया आपने भारत के बारे में, कभी अपने भी तो गिरेबाँ में झाँककर देखिए. आपने घर आग लगी है और आप बात करते हैं पड़ोसी की. बहुत अजीब बात है, आपको तो इस समय पाकिस्तान में होना चाहिए था. जनाब बहुत दिनों से इंतज़ार कर रहा हू कि कुछ वहाँ की भी सुनाएं. दुख होता है जब पाकिस्तान वाले भारत की बात करते हैं. कृपया आप भारत से नजरें हटा लें. शांति से रहें और हमें भी शांति से रहने दें. आपको नहीं लगता कि पाकिस्तान को आपकी ज़्यादा ज़रूरत है. यहाँ के गढ़े मुर्दे उखाड़ने से अच्छा है कि आप घर लौट जाएं. हम अपनी समस्याएं सुलझाना जानते हैं. और बेबाकी से किसी भी मसले पर आपस में बात कर सकते हैं क्योंकि हमारे यहाँ फ़तवे जारी नहीं होते. आजकल के हालात के बारे में सोचें तो आपको अपने यहाँ जाकर हालात संभालने चाहिए. फिर आइयेगा भारत हम वाघा बार्डर पर हाथों में फूल लेकर खड़े मिलेंगे.........

  • 32. 09:21 IST, 01 जून 2009 Ajay Pal Singh:

    खान साहब, आप हमेशा भारत की एक न एक समस्या को कुरेदते रहते हैं जबकि अब कोई खास समस्या नहीं बची है. पाकिस्तान को देखें, सभी पाकिस्तानी लोग भारत के मुद्दों को बिना किसी वजह उखाड़ते रहते हैं. मुझे लगता है कि आपके कंधे पर कोई ऐसा चिप लगा है जिससे आप अपने बारे में बात नहीं करते. कुछ साहस दिखाएं और अपने देश की नकारात्मक बातों के बारे में भी बात करें. मैं शर्त लगा सकता हूँ कि आप वापस पाकिस्तान नहीं जा पाएंगे और भारत में ही शरण लेनी पड़ेगी. यही है हमारे भारत की समृद्ध संस्कृति कि हम सभी आलोचकों का स्वागत करते हैं. ताकि समस्या से निपटा जा सके और हम खुद को सुधार सकें.

  • 33. 09:30 IST, 01 जून 2009 Ajay Pal Singh:

    आप भारत के नाज़ुक मुद्दों को उछालकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं. अगर आप सच्चे मानव हैं तो ऐसे मुद्दे पाकिस्तान में उठाकर दिखाइये. जब आप पाकिस्तान जाएंगे तब आपका भी वही हश्र होगा जो इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के अनेक पत्रकारों का हो चुका है. आप भारत के महान प्रजातंत्र का फ़ायदा उठा रहे हैं जहाँ कोई भी कुछ भी कहने को स्वतंत्र है. एक मेहमान होने के नाते आपको अपनी सीमा में रहना चाहिए.

  • 34. 09:58 IST, 01 जून 2009 Rajeev Sharma:

    खान साहब, मैं भी कहानियाँ लिखता हूँ......लेकिन आप जैसी नहीं. मेरी कहानियाँ मेरी ज़िंदगी और मेरी यात्राओं से जुड़ी होती हैं. आज मैंने सोचा कि भारत में जातिवाद पर कहानी लिखी जाए. ऑस्ट्रेलिया में भी भारतीय छात्रों पर हमला हुआ है जो शायद जातिवादी नहीं है लेकिन उन हमलों का क्या जो भारत में ही राजनीति और जातिवादी वजह से होते हैं. उनके लिए कौन ज़िम्मेदार होता है. उनकी किसे चिंता है. उन हमलावरों का समर्थन नहीं है लेकिन भारत के अंदर भी ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता. मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि इस पर कोई कहानी या लेख लिखें. अगर आप नहीं लिखेंगे तो मैं ज़रूर इस पर लिखूँगा. यह मेरा विनम्र निवेदन है.

  • 35. 10:36 IST, 01 जून 2009 tyagi:

    यह बकवास है. यह व्यक्ति बिना किसी वजह के समस्याएं पैदा कर रहा है. अगर बीबीसी मुझे पाकिस्तान के बारे में इसी ढंग से लिखने की अनुमति दे सकती है. यह आधारहीन और अर्थहीन है. खान हमें चिढ़ाना चाहते हैं और बीबीसी भी इसका ज़रिया बन रही है.

  • 36. 10:40 IST, 01 जून 2009 Amit Prabhakar:

    आप अपने प्रति व्यंग्य कर रहे हैं. इससे मुझे मिर्ज़ा असदुल्लाह खान बेग गालिब की एक प्रसिद्ध गज़ल की याद आ गई. पहले दो मिसरे इस तरह हैं--ज़िक्र उस परिवाश का और बयान अपना. बन गया रकीब वोही जो था राज़दान अपना.

  • 37. 10:47 IST, 01 जून 2009 Mohammad Ali Zaidi Bahuwa:

    क्या लिखा है खान साहब, शुक्रिया. अतीत को भुला देने में ही भलाई है पर हमें अतीत से सबक भी लेना चाहिए और भविष्य में ऐसी कोई ग़लती दोबारा न हो इसका ध्यान रखना चाहिए. बीबीसी हिंदी पर आपका कॉलम हमेशा आना चाहिए खान साहब.

  • 38. 12:03 IST, 01 जून 2009 raj:

    आप अच्छा लिखते हैं लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि कृपया इस तरह की बातें न लिखा करें क्योंकि यह दिल दुखाने वाली बातें हैं.

  • 39. 12:08 IST, 01 जून 2009 archana nautiyal:

    आप अपने देश के बारे में सोचिए तो ज़्यादा अच्छा होगा. क्योंकि जो ज़ख्म आपने बांग्लादेश को दिये हैं, जो आपने हिंदुस्तानियों (कश्मीर, मुबई, दिल्ली) को दिए हैं और जिस बेरहमी से और जिस बेदर्दी से आपने अफ़ग़ानिस्तान और वहाँ के प्यारे देशवासियों को अनगिनत ज़ख्म दिए हैं - बदकिस्मती से यदि किसी ने उन्हें भी खुरच दिया तो सात सागरों का पानी भी मरहम के लिए कम पड़ेगा.

  • 40. 12:15 IST, 01 जून 2009 asish:

    मियाँ, जब आपके देश में आग लगी हुई है तो आप हिंदुस्तान में क्या कर रहे हैं. आप पाकिस्तान से देशद्रोह कर रहे हैं. अरे भाई ज़रा जाकर अपने तालिबान भाइयों को भी कुछ नसीहत दे दें.

  • 41. 12:19 IST, 01 जून 2009 Rajeev:

    इन सभी बातों के पीछे पाकिस्तान ही है. वह भारत के खिलाफ़ साज़िश करता है और उसने ही कुछ सिखों को देश के खिलाफ़ भड़का दिया है. आपको अपने देश के कामों पर शर्म आनी चाहिए और आपको अपने देश की ग़लती महसूस करनी चाहिए.

  • 42. 12:50 IST, 01 जून 2009 Abhay SIngh:

    अगर मैं सही समझ रहा हूँ तो खान साहब यह कहना चाह रहे हैं कि अलगाववाद और उसकी राजनीति ने हमेशा आम लोगों को दुख और परेशानियाँ ही दी हैं. ये बात पाकिस्तान की कश्मीर नीति पर भी लागू होती है ना. खान साहब कुल मिलाकर यह कहना चाह रहे हैं कि जो कुछ भी पाकिस्तान ने कश्मीर, मुजाहिर, बलूच, सिंध और तालेबानी संकट के लिए नीतियाँ बनाई थीं, सब ग़लत थीं. उनके अपने देश को सारे मुद्दों पर ठंडे दिमाग़ से सोचना चाहिए.

  • 43. 12:58 IST, 01 जून 2009 lok prakash:

    मुझे यह पढ़ कर अच्छा लगा कि इतने सारे लोग अपनी बात रखते हैं यहाँ.

  • 44. 14:19 IST, 01 जून 2009 नदीम अख्तर:

    मैंने लेख पढ़ते वक्त कमेंट करने की सोची भी वहीं थी. लेकिन, जैसे ही मैं दूसरे लोगों के कमेंट पढ़ता गया, वैसे-वैसे मुझे लगता गया कि क्या हो गया है लोगों को. वुसतुल्लाह ख़ान साहब ने तो बहुत ही अच्छा संस्मरण लिखा है. उन्होंने तो भारत की तारीफ़ ही की है, लेकिन कमेंट देने वालों की अंधी अकल न जाने धृतराष्ट्रिता के किस मुक़ाम पर पहुंच गयी है कि ये लोग आलेख पढ़कर समझ भी नहीं पा रहे हैं कि लेखक कहना क्या चाह रहा है. वुसतुल्लाह ख़ान साहब ने तो ठीक ही लिखा है कि भारत में पुनर्वास का काम अच्छा चल रहा है. दुर्भाग्य ने जिनसे माता-पिता छीन लिये, उनकी शादी हो रही है और बच्चियां डॉक्टर बनने का सपना साकार करने के बारे में सोच रही हैं..और मोंटी सिंह की कहानी संदर्भ है यह समझाने के लिए कि आप कभी अतीत में न जीयें. इसमें वुसतुल्लाह साहब की पाकिस्तान परस्ती कहां से आ गयी भई. हाइट है, नाअकली की. मैं तो स्तब्ध हूं ऐसे ऐसे कमेंट देखकर कि आखिर आलेख पर कमेंट न होकर व्यक्तिगत टिप्पणियों को बीबीसी क्यों प्रकाशित कर रहा है. कमेंट मॉडरेशन या फिर कमेंट को लेकर क्या कोई एडिटिंग संभव नहीं है. ऐसे तो कोई भी किसी के ऊपर भी कीचड़ उछाल लेगा. बीबीसी के पदधारी इस मामले पर विचार करें कि कोई भी अधकचरा कमेंट प्रकाशित न हो. आखिर किसी को क्या हक है अपने दिमागी दिवालियेपन की सार्वजनिक रूप से कै करने का?

  • 45. 14:23 IST, 01 जून 2009 भारत अनजान:

    हिन्दी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट पर काम करते वक्त कहा जाता है कि कहानी जीवन से जोड़ो. असल ज़िन्दगी के बारे में लिखो. लिखो, जो तुम पर बीती हो. लिखो, जो तुमने महसूस किया हो. लेकिन क़लम पकड़ते ही लेखक फ़न्ने ख़ां बन बैठता है फिर लिख जाता है वह सब कुछ, जो न तो उस पर बीती हो, न ही उसने महसूस किया हो. आडंबर में लिपटा ऐसा माल, जो कहीं नहीं बिकता और बाद में निर्देशक महोदय बाज़ार में उतर कर कहते हैं, फ़िल्म ज़रा आगे की सोच वाली थी. लेकिन वुसत भाई, आपने तो कमाल कर दिया है. क़लम बिलकुल सही थामी है आपने. you learn best from your life. कितनी सच है ये बात, आपके ब्लॉग पढ़ कर पता चलता है. बस क़लम थामे रहना ताकि बीस साल बाद की हवाएं इन विचारों को पीछे न फेंक पाएं.

  • 46. 15:25 IST, 01 जून 2009 Munish Tyagi:

    खान साहब, कृपया भारत के दो संप्रदायों के बीच में न पड़िये. आप तो पाकिस्तान के बारे में ही सोचिये जहाँ तालेबान मंदिरों, गुरुद्वारों और मस्जदों तक को नष्ट कर रहे हैं.

  • 47. 15:27 IST, 01 जून 2009 प्रभात तिवारी,इलाहावाद:

    आपने इस विचार का प्रकाशन यदि लोकिप्रयता हासिल करने के लिए किया है तो वाकई आप का यह कृत्य काबिले तारीफ़ है क्योंकि आप लोकप्रियता के मापदण्डों से काफी परिचित है. आप खुद भारतीयों के अन्दर बैठे उस खुरंट को जगज़ाहिर कर रहे हैं जो अब बेमानी हो गए हैं. आप इस लेख द्वारा विश्व को अपना ऩया रूप दिखा रहे हैं....आप जानबूझकर उन जख्मों को ताज़ा कर रहे हैं जो काफी हद तक सूखकर अपने निशान छोड़ चुके है. यदि नहीं तो आपने आज से पूर्व ऐसा क्यों नहीं लिखा....??? किसी भी राष्ट्र के नाजुक पलों को बयां करते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए क्योंकि आपकी लेखनी की हल्की सी चूक किसी भी अच्छी बुरी घटना को जन्म देने का कारण बन सकती है......।

  • 48. 15:28 IST, 01 जून 2009 प्रभात तिवारी:

    सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे भारत में क्षमा करने के गुण को बड़प्पन की दृष्टि से देखा जाता है, ऐसे में इन सज्जनों द्वारा क्षमादान इनके बड़प्पन को दर्शाता है... हमारे यहां एक कहावत है-बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि ले...अर्थात बीते हुए कल को भूलकर आने वाले कल के बारे में सोचना चाहिए. यह कहावत ऐसी ही दुखद घटनाओं के संबंध में अक्षरश: लागू होती है......

  • 49. 15:58 IST, 01 जून 2009 Prakhar Giri:

    दो दिन पहले तक खान जी की यह ब्लॉग पर वाहवाही हो रही थी. टिप्पणीकारों की. अब क्या हुआ? आप लोग को पहचानने में इतने देरी क्यों हुई. मैं तो पहले ही खान जी की लेखनी से समझ गया था कि यह सिर्फ फालतू की बहस है, और कुछ नहीं.

  • 50. 16:12 IST, 01 जून 2009 S.Khanna:

    मियाँजी को मालूम चल गया होगा. उम्मीद तो है कि हिंदुस्तान एक है. पत्र लिखने वाले हिंदू भी है, सिख भी और मुसलमान भी और भी...पर है सब एक ही प्रजातंत्र में रहने वाले हिंदुस्तानी. कभी दिल मायूस हो जाया करता है पर जब हम फिर एकजुट खड़े हो जाते हैं तो कितना गर्व से सिर ऊँचा हो जाता है. हर वीर है भारतवासी. जय हिंद

  • 51. 16:26 IST, 01 जून 2009 s_khanna:

    मियाँ, अब भी समझ जाइये. ये लिखने वाले हिंदुस्तानी हैं. धर्म इनका एक पहलू है. सिर्फ़ धर्म ही नहीं है दुनिया में. यह सब हैं हिंदुस्तानी.

  • 52. 17:30 IST, 01 जून 2009 रणवीर कुमार:

    मैं बीबीसी को निष्पक्ष व महान माध्यम मानता था. पर अब मुझे इसपर ग्लानि हो रही है. अब खान का अगर एक भी ब्लॉग मैं बीबीसी पर देखूँगा तो सौगंध है कि मैं बीबीसी कभी न देखूँगा, न सुनूँगा, और न ही पढ़ूँगा.

  • 53. 17:59 IST, 01 जून 2009 amit kumar:

    अनुभव तो सबका एक सा ही होता है...इसे व्यक्त करने वाली भाषा बस अलग होती है...आपको हिंदी में लगातार पढ़ रहा हूं..आपके नज़रिए से हिंदुस्तान को देखना अच्छा लगता है..लिखते रहें.

  • 54. 22:52 IST, 01 जून 2009 Jayvind Singh:

    खान साहब, मैं अब भी आपको अच्छी सोच रखने वाला गुणी मानता हूँ. क्या आप समझते हैं, कागज़ पर स्याही खर्च होते ही आपका कर्तव्य पूरा हो जाता है? लोग प्रतिक्रियाएं देंगे और फिर सब सामान्य. नहीं...इतिहास गवाह है, सुलेखन से बड़े बड़े आंदोलन हुए हैं. क्रांतियाँ आई हैं. यहाँ तक कि निरंकुश सत्ता के तख्ता पलट में भी कलम का अप्रतिम योगदान रहा है. आप बीती बातें छोड़कर ऐसी बातें लिखें जिनमें सर्वहित हो. आज भारत प्रगति कर रहा है और हम सभी की इच्छा है कि हमारा भाई-भाई उन्नति करे. हम भाई-भाई हैं यानी हमारी माँ एक है. एकता की बात कीजिए मान्यवर, आप जैसे भले आदमी को तो सोचना शुरू करना चाहिए कि क्यों हम तीनों भाई फिर साथ नहीं हो सकते. यह सोचना पाप नहीं बल्कि हमारी कौम की सच्ची सेवा होगी.

  • 55. 01:43 IST, 02 जून 2009 Abhi:

    खान साहब, आपके ब्लॉग में कोई संदेश निहित नहीं है. आप अपनी ही बात को काट भी रहे हैं. आपने ऐसी नकारात्मक बात क्यों लिखी है जो कोई भी पढ़ा लिखा आम आदमी लिख सकता है.

  • 56. 06:01 IST, 02 जून 2009 sanjay purohit:

    ये आप नहीं आपका नज़रिया बोल रहा है. आप भूले हुए ज़ख्म हो याद दिला कर खुंरट को खरोच रहे हैं. पाकिस्तान चाहे कुछ भी कर ले वह भारत नहीं बन सकता. आप स्वात में तालेबानों का जिक्र क्यों नहीं करते. स्वात को जख्म नहीं बनने दें. जख्म बनेगा तो खुरंट भी आएगा उसे ना कुरेदने की सलाह हम नहीं देने वाले.

  • 57. 06:03 IST, 02 जून 2009 परमजीत सिंघ :

    लम्हों ने ख़ता की, सदियों ने सज़ा पाई.

  • 58. 08:52 IST, 02 जून 2009 lokesh chopra:

    ख़ान साहब पहले अपने देश पर ध्यान दीजिए जिसने मानवता पे जितने जुल्म किए हैं उतने तो शायद हिटलर ने भी नहीं किए होंगे. सिख भाइयों को हम लोगों ने अपना भाई माना है, वे पूरे देश में फैले हैं और काम कर रहे हैं. आप अपने देश में ऐसी कल्पना नहीं कर सकते हैं.

  • 59. 11:42 IST, 02 जून 2009 brijesh tripathi:

    यदि आपमें हिम्मत है तो ऐसा ही ब्लॉग पाकिस्तान के ऊपर लिखिए. वहाँ मासूमों पर हो रहे जुल्म के बारे में लिखिए. तब मैं मानूँगा कि आप निरपेक्ष भाव ले लिखते हैं, उम्मीद है कि आपका अगला ब्लॉग पाकिस्तान के ऊपर होगा.

  • 60. 18:34 IST, 07 अगस्त 2009 G. K. Pandey:

    ये बात सही है कि पुरानी बातों को भूल जाना चाहिए, परंतु क्या हम वाकई में बीती बातों को भूल पाते हैं. बचपन में मेरे पैर मे एक बेल का कांटा चुभ गया था जो पैर के आर-पार हो गया था, वो मुझे अब भी याद है. तो क्या जिन्होंने अपने बेकसूर परिवारवालों को खोया है, वो उन्हें भूल जाएँगे. सिख भाइयों को इसका हिसाब सरकार से मांगना चाहिए. एक सिख का प्रधानमंत्री बना देने मात्र से वो घाव नहीं भर जाएंगे. इसके असल मुज़रिमों को सज़ा दिलाकर ही ये घाव भर पाएँगे.

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