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क्या नहीं होगा, इसकी तो पड़ताल करें..

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|शुक्रवार, 15 मई 2009, 18:14 IST

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चुनावी नतीजों के इंतज़ार में पत्रकारों ने जो ताने-बाने बुने हैं, जो समीकरण बनाए-बिगाड़े हैं और कितने संभावित गठबंधनों और प्रधानमंत्रियों को सत्ता की चाबी दी है, उसका हिसाब लगाना मुश्किल है. लेकिन शनिवार को मतगणना आरंभ होने के कुछ घंटों बाद कम से कम नतीजों के बारे में तो क़यास लगने बंद हो जाएंगे. पर हमारी बिरादरी का मुँह बंद करना इतना आसान नहीं है.

नतीजों के फ़ौरन बाद अटकलबाज़ी के नए दौर शुरू होंगे. कौन कहाँ जा रहा है, कौन किसे छोड़ रहा है. बनते-बिगड़ते समीकरणों का यह दौर और इसपर हमारी पैनी नज़र हमारी अगली सरकार बनने तक अवश्य टिकी रहेगी.

तो नतीजों के इंतज़ार के इन आख़िरी घंटों में आपको यह बता मैं और बोर नहीं करना चाहता कि क्या होने वाला है.

उस विषय पर तो आपको समुचित रूप से भ्रमित और गुमराह एग्ज़िट पोल, सर्वेक्षण और राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणियों ने कर ही दिया होगा.

चलिए मैं आपको यह बताने की कोशिश करता हूँ कि क्या-क्या नहीं हो सकता.

नीतीश-लालू और पासवान एक ही सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे. मायावती और मुलायम भी संग-संग नहीं बैठेंगे. भाजपा और कांग्रेस का साथ आना असंभव है और वाम दल कुछ भी हो जाए भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन नहीं करेंगे. करूणानिधि और जयललिता भी साथ-साथ नहीं जाएंगे.

वामपंथियों और ममता बनर्जी का एक मंच पर आना मुश्किल है पर आज के माहौल में असंभव नहीं है. यही बात चंद्रबाबू नायडू और कांग्रेस पर लागू होती है. नवीन पटनायक भी कांग्रेस का साथ देते नज़र आ सकते हैं.

चिरंजीवी और विजयकांत सुनहले पर्दे से बाहर निकल इस राजनीतिक दंगल में अपने प्रदर्शन को लेकर इतने चिंतित हैं जितना वो शायद ही अपनी किसी फ़िल्म की रिलीज़ से पहले हुए हों. अगर इन्हें सीट मिलती हैं तो यह किसी भी पक्ष के साथ जा सकते हैं.

एक बात और, लोग बहुत ख़रीद फ़रोख़्त, हॉर्सट्रेडिंग और किसी भी क़ीमत पर सरकार बनाने की कोशिश की बात, आपको अगले कुछ दिनों में करते नज़र आएँगे.

मुझे एक और सूरतेहाल भी नज़र आ रही है. दोनों ही प्रमुख राष्ट्रीय दलों में, जो जनता और पार्टी के आम कार्यकर्ता की नज़र में मनमोहन सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. .... यानी राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी....वह सरकार बनाने के लिए शायद उतना बेताब नहीं हों जितना उनकी पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता.

कारण उसका साफ़ है. राहुल या मोदी अपनी पार्टी की कमज़ोर सरकार के आने वाले दिनों में भद्द पिटते देखने से ज़्यादा विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे.

विपक्ष में रहते हुए अगर वो अच्छा काम करते हैं तो अगले चुनावों में उन्हें एन्टी-इनकमबैंसी का लाभ मिलता है और वो अपनी पार्टी को चुनावों में विजय दिलवा सीधे प्रधानमंत्री बनते हैं.

इसके ठीक विपरीत अगर इस बार कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनती है तो प्रधानमंत्री बनते हैं मनमोहन या आडवाणी और अगले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को सत्ता में रहने का जो नुक़सान होता है वो राहुल या मोदी को उठाना पड़ेगा.

यह अलग बात है कि ऐसी सोच पार्टी में अन्य नेताओं की नहीं होगी. उन्हें तो सत्ता में रहने से मतलब है. प्रधानमंत्री तो वह इस बार बन रहे हैं न कि अगली बार.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:54 IST, 15 मई 2009 Satender Rawal:

    बहुत सही लिखा है संजीव जी. राहुल या मोदी की विवेचना काफ़ी पसंद आई.

  • 2. 20:08 IST, 15 मई 2009 vivek:

    एक बात और, क्या ये बात इतने ही भरोसे के साथ कही जा सकती है कि पीएम इन वेटिंग आडवाणी अपनी सीट पर खतरे से बिल्कुल बाहर हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि सारे जुगाड़ के बीच गांधीनगर की ज़मीन ही पैरों के नीचे से सरक जाए. इस बारे में कुछ भरोसे से कहना चाहिए संजीवजी.

  • 3. 20:45 IST, 15 मई 2009 surinder kumar sharma:

    सब मौकापरस्त हैं, किस की कहें- हमें तो आज तक न कांग्रेस ने कुछ दिया है और न ही किसी और पार्टी ने. मुझे तो ये समझ में नहीं आता कि हम एक पार्टी को अपना मत देते हैं और उसी की विरोधी पार्टी मिलकर सरकार बनाती है. जैसे रामविलास पासवान हैं, जिस भी सरकार में हो किसी न किसी तरह मंत्री बन जाते हैं.

  • 4. 20:59 IST, 15 मई 2009 rahul sharma:

    संजीव जी आपने बहुत सटीक बात कही है, हमारे देश में नेता केवल कुर्सी को देखते हैं देश को नहीं, काफ़ी अच्छा लगा आपका आकलन पढ़कर.

  • 5. 21:11 IST, 15 मई 2009 samir azad kanpur:

    विवेक जी, केवल आडवाणी क्यों? क्या राहुल और सोनिया कभी नही हार सकते.

  • 6. 21:14 IST, 15 मई 2009 SHREEANSH SINGH (PRINCE) :

    संजीव जी पूरे महीने नेताओं ने अपने घटिया बयानों से परेशान किया और 13 मई के बाद सभी न्यूज़ चैनल अपने-अपने खोखले एक्ज़िट पोल के साथ लोगों का मानसिक शोषण कर रहे हैं. धन्य हो बीबीसी और इसके ब्लॉग का जिसने पूरी ज़िम्मेदारी के साथ लोगों की आवाज़ और साथर्क टिप्पणी की. आपका भी शुक्रिया जो आपने इस ब्लॉग को ज्योतिष कोना नहीं बनने दिया.

  • 7. 21:14 IST, 15 मई 2009 Jitesh:

    इसका मतलब है कि आडवाणी को भी कुछ फ़ायदा मिलना चाहिए क्योंकि वो पिछली बार विपक्ष में बैठे थे.

  • 8. 23:04 IST, 15 मई 2009 Nick Mehta:

    मुझे नहीं लगता मोदी कभी गुजरात छोड़ना चाहेंगे. इसके दो कारण हैं. अगर आप के कहे के मुताबिक नेता को सिर्फ़ कुर्सी प्यारी है तो गुजरात की कुर्सी मोदी से कोई नहीं छीन सकता. और मिली जुली तो ठीक लेकिन अगर भाजपा में भी कोई उनकी तरह काम नहीं करता तो उसे भी वो उठाकर फेंके देंगे, 18 पार्टी वाली सरकार चलाना मोदी के लिए तो मुमकिन या ठीक नहीं लगता.

  • 9. 01:59 IST, 16 मई 2009 Gyaneesh Chaturvedi:

    यह सच है कि पत्रकार राजनीति समझने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन वो भविष्यवक्ता या भाग्यविधाता नहीं हो सकते. देश को क्या चाहिए और क्या मिलेगा, यह कभी पूरा नहीं होता. क़यास लगाना अलग बात है.

  • 10. 02:05 IST, 16 मई 2009 jayantilal jain:

    आपका आकलन सही है. बीबीसी डॉट कॉम पर लेख पढ़ना दिमाग़ झकझोर देने वाला होता है. कृपया इसी तरह लिखते रहिए.

  • 11. 03:14 IST, 16 मई 2009 Malkiat singh Virk:

    अपने सर्वे की बात बताएं, किसकी हवा ख़राब है... इस पर बहुत से चैनलों ने सर्वे किया है इस बार....लालू और समाजवादी की हालत बहुत खराब है. कही ऐसा बताने से लालू और समाजवादी पार्टी को यह संदेश तो नहीं जा रहा है कि आप मुश्किल में हो, बिना शर्त यूपीए की बात मानो. सर्वे के पीछे क्या सोच है, वह भी एक सवाल है.

  • 12. 03:24 IST, 16 मई 2009 Anoop Shrivastava(Satna):

    सच है कि आज ऐसा कोई नेता नहीं है जो देश के बारे में सोचे. हर कोई अपनी सीट को सुरक्षित करना और पैसा कमाना चाहता है. वह चाहे सीधे से मिले या उसके लिए जोड़तोड़ करनी पड़े. मैं यह कहना चाहता हूँ कि अडवाणी ऐसे शख्स नहीं है जिन्हें नेतृत्व के लिए चुना जाना चाहिए.

  • 13. 03:44 IST, 16 मई 2009 Maneesh Kumar Sinha:

    संजीव जी, आपके ब्लॉग में सिर्फ़ एक बात गायब है वह यह कि भारतीय नेता खुद को सुधार नहीं सकते.

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