ट्रेन ब्लॉग- शहर कुछ कहता है

हर शहर कुछ कहता है कि इसमें कौन रहता है.
18 दिनों में आठ शहर घूमने के बाद ये तो मैं कह सकता हूँ लेकिन साथ ही ये भी कह सकता हूँ कि अब हर शहर एक जैसा दिखता है.
चाहे अहमदाबाद हो या मुंबई या फिर हैदराबाद, कोलकाता, भुवनेश्वर, पटना या फिर इलाहाबाद कुछ बातें अब हर शहर की एक जैसी हो गई हैं.
अगर आँखों पर पट्टी बाँध कर किसी शहर में उतार दिया जाए और अचानक पट्टी खोली जाए तो बिना पूछे बताना मुश्किल होगा कि आप कौन से शहर में हैं.
कारण हर शहर का मुख्य बाज़ार ब्रांडेड दुकानों से भर चुका है. वही मैकडोनाल्ड्स, वही पिज्ज़ा हट, बड़े बड़े एयरकंडीशंड मॉल्स जिसमें वही नाइकी-रीबॉक की दुकानें दर शहर में दिखती हैं.
एक तरह से ये अच्छा ही है क्योंकि जो चीज़ें जिस क़ीमत पर दिल्ली या मुंबई वाले को मिलती हों वही पटना में मिले तो बुरा क्या है लेकिन पटना की पहचान उसमें गुम होकर रह जाए तो फिर ये मुश्किल है.
लेकिन क्या ऐसा होता है. मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूँ कि अभी ऐसा हुआ नहीं है लेकिन आने वाले दिनों में शायद हो सकता है.
अगर आपको हैदराबाद की बिरयानी खानी हो या फिर चारमीनार के पास का दोसा, कोलकाता की पानी पूरी, रसगुल्ले या मछली या फिर इलाहाबाद की कचौरियां आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी लेकिन मैकडोनाल्ड का बर्गर खाना हो तो वो आपको आसानी से इन सभी जगहों पर मिल जाएगी.
वैश्वीकरण के बाद विकास हुआ है और ये बुरी बात नहीं हो सकती है. हां ये बुरी बात होगी जब मुझे इलाहाबाद में नेतराम की कचौरियां नहीं मिलेंगी या पटना में लिट्टी चोखा के लिए दर दर भटकना पड़ेगा.
यही बात कपड़ों पर भी लागू होती है. स्थानीय कपड़ों या आभूषण मसलन हैदराबाद की चूडियां हो या फिर कोलकाता की बालूचरी साड़ी के लिए भी आपको थोड़ा प्रयास करना पड़ता है लेकिन डिजाइनर कपड़े अपने होर्डिंग बैनरों से आपको आकर्षित कर लेते हैं.
अपनी इस यात्रा में मैंने ये महसूस किया कि किसी शहर को जानने के लिए प्रयास करना पड़ता है जो शायद आज से बीस साल पहले नहीं करना पड़ता होगा क्योंकि तब न तो लोग इतने व्यस्त होंगे और न ही इतनी दुकानें होंगी.
हाँ इस प्रयास में कई और बातें पता चलने लगती हैं और लगता है हर शहर कुछ कहता है.
किसी शहर के बारे में कुछ कह जाना आसान तो नहीं है लेकिन फिर भी सोचता हूँ कह दूँ. हैदराबाद दोनों बाहें फैलाकर आपका स्वागत करता है. अहमदाबाद आपकी जाँच पड़ताल करता है. मुंबई सपने दिखाता है. भुवनेश्वर आपको साफ़ रहने पर मजबूर करता है और कोलकाता कहता है कि आओ खाना खाओ और बतियाओ जितना मन करे.
बिहार की राजधानी पटना के बारे में अपने एक साथी की टिप्पणी लिखता हूं...वो कहती हैं पटना अराजक लगता है पहली नज़र में और ये शहर आपका स्वागत नहीं करता.
और आखिर में इलाहाबाद जो दिल खोलकर आपसे मिलता है और मिलाता है.
वैश्वीकरण के बावजूद भारत के ये शहर आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं और मैं यही चाहूँगा कि मैकडोनाल्ड के बर्गर के बीच नेतराम की कचौड़ियों को जगह मिलती रहे. एलन सॉली की शर्ट के साथ बंगाल की बालूचरी साड़ी ख़रीदने में मुश्किल न हो और राडो की घड़ियों के साथ हैदराबाद में काँच की चूड़ियाँ आसानी से मिले तो किसी को कोई शिकायत नहीं होगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
सुशील जी हम आप के बात से सहमत छी.
काश, आप कानपुर भी आते.
सुशील भाई अब हर एक शहर यही कहता है कि कृपया करके मेरी पहचान से छेड़छाड़ मत करो. मेरे खानपान रहन-सहन और कला को बचाए रखो. लेकिन सवाल यही है कि क्या ऐसा हो रहा है? वैश्वीकरण का सबसे बड़ा खतरा यही है कि पहली नजर में यह बराबरी और समानता का एहसास कराता है लेकिन इसके पीछे असमानता की गहरी खाई होती है. इलाहाबाद की कचौडि़यां मैकडोनाल्ड के बर्गर के साथ कितनी देर तक मुकाबला करेंगी? इसीलिए वैश्वीकरण के ख़तरे को पहचानने की ज़रूरत है, इसके उपरी चमक-धमक से प्रभावित हुए बिना.
किसी भी शहर के आंकलन के दो पहलू होते हैं. एक उसका हार्डवेयर और दूसरा उसका सॉफ़्टवेयर जैसे कि कंप्यूटर में होता है. आपने पहले पहलू यानी किसी शहर के बाहरू रूप या उसके हार्डवेयर की चर्चा की है लेकिन अगर अंदरूनी रूप को देखें तो हमें इन सभी शहरों में एक विभिन्नता स्पष्ट नज़र आती है. लोगों की सोच में आपको अंतर मिलेगा. इसका अंदाज़ा आप इन शहरों के पार्कों से लगा सकते हैं, दिल्ली से इन शहरों को जाने वाली ट्रेनों से भी लगा सकते हैं.
सुशील जी, शहरों के एक जैसे लगने का कारण है, इसमें रहने वाले लोग जो हैद्राबाद से इलाहाबाद तक एक ही मांसिक्ता और सोच के साथ जी रहे हैं. बीबीसी की नज़र ख़ासकर आप और वुस्तुल्लाह जी जिस ख़ूबसूरती के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद. बीबीसी शुभ यात्रा.
सुशील जी मैं आपसे सहमत हूं. ग्लोबलाइज़ेशन एक तर्फ़ा नहीं होना चाहिए, इसे दूतर्फ़ा होना चाहिए. अगर हमारे यहां शहरों के हर नुक्कड़ पर एक मैक्डोनाल्ड है तो दुनिया भर में लिट्टी-चोखा या समोसा या पानीपूरी, भेलपूरी, इडली, डोसा वग़ैर क्यों नहीं होना चाहिए. हम पश्चिमी देशों को अपने शहरों की संस्कृति और अपना ब्रॉंड क्यों नहीं बेच सकते. हमारे लिए चिंता की बात ये है कि हम अपनी पहचान खोते जा रहे हैं. मुझे नहीं मालूम कि किस प्रकार पिज़्ज़ा और बर्गर लिट्टी चोखा या भारत के दूसरे फ़ास्ट फूड की जगह ले सकता है. यही बात दूसरी चीज़ो पर भी लागू होती है. ग्लोबलाइज़ेशन का समर्थन करें... उसका भाग बनें.. लेकिन अपनी शर्तों पर... ऐडिडास या नईकी पहनें लेकिन अपने मूल को सुरक्षित रखें अपने पांव अपनी ज़मीन पर रखें जो कि पटना है पेरिस नहीं क्योंकि पटना उसी वक़्त तक पटना रहेगा जब तक वह पेरिस नहीं बन जाता... हर शहर कुछ अपना कहता है.
वाह सुशील जी, पटना आपको अराजक और इलाहाबाद स्वागत करता नज़र आता है. मैं भी इन शहरों में गया है. मुझे ऐसा कभी नहीं लगा. अभी दो महीने पहले ही इलाहाबाद जाने का मौक़ा मिला था. मेरा किसी ने स्वागत नहीं किया. 11 तारीख़ की रात पटना लौटा हूँ, किसी तरह की अराजकता वहाँ नज़र नहीं आई है.
सही में, यह एक अहम सच्चाई है जो दफ़न थी, जिसे आपने अपने लेख के ज़रिए लोगों के सामने लाया है.
आप कितने वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं? जो भी हो, आपको अपनी पत्राकरिता के दौरान इन सब शहरों में कोई प्रगति नहीं दिखती? मेरा मानना है कि आप लोगों की मानसिकता भारत को स्लमडॉग की तरह हमेशा देखने की है. आप लोगों के मुँह से प्रगति की बात भी निकालना पाप है. मेरा अनुरोध है कि आप आज के भारत और 20-30 साल पहले के भारत की तुलना करें और पाठक को अपने अनुभव बताएं.
वैश्वीकरन के आफ्टर ईफेक्ट ने कई मायने में विकास को एक नया आयाम दिया है. और इस मायने में मैं आपसे सहमत हूं लेकिन जहॉ तक आपके मित्र का पटना के बारे में विचार है वो पूर्वाग्रह से ग्रसित है. अतीत की घटनाओं का मुलम्मा वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं को निगल लेता है. उम्मीद है कि आपके वो मित्र हिंदुस्तानी न हो या पत्रकार न हो. अगर वो इन दोनों में से कुछ भी है तो समस्या है...
मैं आपके लेख से पूरी तरह सहमत हूँ. मैं समझता हूँ कि अगर हम नहीं चेते तो आने वाले दिनों में पश्चिमी संस्कृति पूरे देश में छा जाएगी.
इलाहाबाद शहर एक अलग तरह का संतोष देता है. वक़्त की तेज़ रफ्तार में भी इलाहाबाद में बहुत कुछ नहीं बदला. मुझे तो अभी भी वो धर्मवीर भारती का शहर लगता है. इलाहाबाद के सिविल लाइन्स को छोड़ दें तो बाकी जगह यह शहर अपनी आत्मा के साथ आबाद है. यह शहर कभी भागता नहीं रेंगता है.
दूसरे शब्दों में इसे 'घर में लग न जाए बाजार देखना' की तरह भी कह सकते हैं. हाट से मंडी और मंडी से माल तक आते आते चीजें बहुत तेज़ी से बदल जाती हैं. नेतराम की कचौरी हो या हैदराबादी की चूडियां .. विविधता हमारी संस्कृति की पहचान ही नहीं हमारी ख़ासियत है जो हमें ऊर्जा देती है. यह ऊर्जा बनी रहे, बहुत जरूरी है, हमारे समाज के लिए और हमारे लिए. बहुत सुंदर...
सटीक विवरण और अवलोकन है, देश के अधिकतर शहरों में एकरूपता हावी है और यही तबाही की वजह है. आप देश के सभी शहरों के बारे में लिखें तो रोचक होगा.
हमें भी अपने कपडों, आभूषण, चूड़ियों, साड़ियों, बिंदियों और खाद्य पदार्थ जैसे रस्गुलों कचौरियों, समोसों और डोसा इत्यादि चीजों का बाजारीकरण करना होगा और इसे बेहद तड़क-भड़क और मोहकता के साथ पेश करना होगा ,जिससे ख़ास कर युवा वर्ग इसमें ज्यादा आकर्षण देख सकें.
भारत के प्रत्येक शहर की संस्कृति अलग है. इसे ही 'अनेकता में एकता' कहा जाता है.
सुशी जी लगता है कि आप बनारस नहीं गए, वरना आप वहाँ के बारे में भी कुछ ज़रूर लिखते.
यही तो ख़ासियत है अपने भारत कि की यहाँ हर गली, हर चौराहा और हर शहर आप से कुछ कहता है. हर जगह की अपनी अलग कहानी है. भले ही वैश्विकरण की आँधी ने शहरों के रुप रंग को एक करने की कोशिश की हो, फिर भी हर एक शहर अपने बारे में कुछ तो अलग कहता ही है. इसीलिए तो भारत की पहचान 'विविधता में एकता' के रुप में की जाती है.
सुशीलजी, आपकी बात से सहमत हूँ. मैं अहमदाबाद से हूँ और आजकल जर्मनी के स्टुटगार्ट में एक महिने तक हूँ. वैश्विकरण के अपने खतरे हैं जिस से ना तो अहमदाबाद बच पाया है, ना यहां का स्टुटगार्ट, फिर भी इतना तो कह सकते हैं कि शहर चाहे कोइ भी हो, उसके चारित्र की कुछ बातें तो ऐसी होती ही है, जिसे आसानी से मिटाया नहीं जाता.
सच में, सुशीलजी, नेतराम की कचौरियां याद आ गईं. इलाहाबाद की तंग गलियों से होकर यूनिवर्सिटी रोड जाना, क्या बात है. और नौकरी बेचने वाली प्राइवेट दुकानों पर बेरोज़गार बुद्धिजीवियों की भीड़, कुछ तो ख़ास था इलाहाबाद में.
सुशील जी, आपका इलाहाबाद से हमारे जैसा ही कोई ख़ास याराना लगता है, सच कह रहा हूं ना?
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि....
सुशील जी, उम्दा लेख है. पिज्जा और बर्गर का स्वाद भले ही लाजवाब हो लेकिन मैनें बड़े-बड़े मॉल्स के बाहर ठेलों पर लोगों को चाट-पकौड़े खाते देखा है. यकीनन ये बात सुकून देती है कि इतना ब्रांडेड होने के बावजूद हमारी पहचान बाकी है. हमारे शहर-मोहल्ले अपना वजूद बचाए हुए हैं.
सुशीलजी, मेरा मानना है कि भारत की सबसे बड़ी ख़ासियत यही रही है कि इसने किसी को नकारा नहीं. हर प्रार्थना, हर अजान, हर शबद और हर प्रेयर को खुद में समेट लिया है. आज मैकडॉनल्ड नेतराम के लिए कोई ख़तरा नहीं है. हर साल दर साल सदी दर सदी भारतीय शहरों की कहानी में ये एक और युग हो सकता है. एकमात्र युग नहीं....
अच्छी नहीं है शहर के रस्तों की दोस्ती, आंगन में फैल न जाए, बाजार देखना। इस बाजार में बाज छिपा है जो छपट्टा मारकर सब कुछ छीन लेता है। कभी-कभी तो इस बाजार से डर लगने लगता है।
सबसे पहले सुशीलजी को नमस्कार, प्रिय, आपकी ट्रेन यात्रा कभी न ख़त्म हो और आप हमें पूरे देश का हाल सुनाते रहें और उनकी संस्कृति के बारे में बताते रहें. बड़ा अच्छा लगा ये जानकर कि मैक डॉनल्ड और पिज़्ज़ा हट के बीच अभी भी हमारी पहचान बाक़ी है. धन्यवाद.
दिल्ली में चाँदनी चौक अकेला खाने के लिए मशहूर है. यहाँ भी आएँ, पर ये न कहें, कौन जाए दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर......
आपकी टिप्पणी सटीक लगी, क्योंकि हमारे चारो तरफ़ यही नज़ारा है. कुछ और शहरों के बारे में भी ज़रूरत है जानने की.
बेशक सुशील जी यह चुभने वाली सच्चाई है कि अमूमन सारे शहर एकसे हो गए हैं. अगर जलवायु का भेद न होता तो शहर बदल जाने की गंध भी न आती. ग्लोबलाइज़ेशन का तकाज़ा भी यही है कि भेद न रहे और हर ज़गह एक सी कंपनियाँ वाशिंदों के दिलोदिमाग़ पर बसर करे. रही सही कसर ग्लोबल वार्मिंग से पूरी हो रही है. झीलें घट रही हैं वन कट रहे हैं. हमारी अपनी ज़मीन भी कहाँ बची जो जेहन में थी सौंधी सौंधी बचपन की महक देती हुई . फिर भी शहरों के अपने नाम हैं जैसे दुकानों के हुआ करते हैं.. अपने अपने कारोबार है शहरों के भी और हमारे भी. और महज़ कारोबारी का सा हमारा मिजाज़ और अहमियत. अच्छे सुन्दर सुरुचिपूर्ण आलेख के लिए साधुवाद.
सुशीलजी, मैंने भारत के बहुत से शहर देखे हैं. सभी शहरों के बारे में आपकी राय से मैं सहमत हूँ. एक बात जो मैं कहना चाहता हूँ, वह यह कि ज़्यादातर राज्य में राज्यवाद देखा जो बिहार में कभी नहीं लगा.
बहुत अच्छा लगा पढ़कर सुशील जी का यह ब्लॉग...
मैं आपकी बात से सहमत हूँ. बिलकुल सही बात लिखी है. इस विषय पर कुछ और भी लिखिए.