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जनादेश और राजनीतिक हलकों की हलचल

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|शनिवार, 16 मई 2009, 03:23 IST

19:00 IST

कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूपीए के पास चुनाव परिणामों के आखिरी आकड़े आने तक 250 सीटों से ज़्यादा की ताकत हो जाएगी. कुछ ऐसे निर्दलीय भी यूपीए के साथ खड़े दिखेंगे जो पहले भी सरकार के साथ रहे हैं. इस तरह आंकड़ा 260 को पार कर जाएगा. हालांकि अभी भी यह बहुमत के 272 के पाले से पहले ही रुका रहेगा.

लालू प्रसाद भी अपने गिने-चुके सांसदों के साथ यूपीए के समर्थन में खड़े होंगे. आंकड़ा अभी भी 272 से नीचे होगा पर यूपीए के मैनेजरों को यह ज़्यादा विचलित नहीं करेगा. फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी या वाममोर्चे में से किसी से भी समर्थन लेने का मन बना रही है.

कांग्रेस के पास इस नई अल्पमत सरकार के लिए एक उदाहरण भी है और वो है नरसिम्हाराव के कार्यकाल की कांग्रेस सरकार का. यह सरकार अल्पमत में रहते हुए भी अपना कार्यकाल पूरा करके गई थी क्योंकि इस सरकार का पतन सरकार के बाहर बैठे कुछ दलों के लिए लाभप्रद नहीं था.

इस संसद में भी ऐसे दल हैं ही जिनके लिए कांग्रेस की अल्पमत में ही सही, सत्तासीन सरकार का गिरना ठीक नहीं होगा क्योंकि ऐसी स्थिति में उनके लिए कांग्रेस का और प्रभावी होकर सत्ता में लौटने का ख़तरा है.

इन्हीं बातों की पृष्ठभूमि में यूपीए के मैनेजर बिन बुलाए दलों या आगे चलकर कष्टप्रद हो सकने वाली पार्टियों से फिलहाल किनारा किए हुए हैं. फिर चाहे वो वाममोर्चा हो या फिर कोई अन्य क्षेत्रीय दल.

इस चुनाव से एक और संकेत मिल रहा है. मतदाता ने नकारात्मक प्रचार में लगी भाजपा और वाममोर्चे को ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने उस कांग्रेस के लिए वोट देना ज़्यादा बेहतर पाया जिसके पास नेतृत्व के लिए 78 वर्ष का मनमोहन सिंह जैसा अनुभवी व्यक्ति भी था और देश के युवावर्ग के लिए भविष्य की तेज़तर्रार, युवा, और आशावादी पीढ़ी के लिए राहुल गांधी जैसा चेहरा भी था.

इस जनादेश ने तमाम चुनाव विश्लेषकों और राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया है, यह दिखाकर कि लोगों ने कई जगहों पर जाति, संप्रदाय और क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर वोट दिया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक लहर यूपीए के लिए तैयार की जबकि अधिकतर विश्लेषक एक बंटे हुए जनादेश की बात कह रहे थे.

13:40 IST

यह जनादेश चार स्पष्ट संकेत दे रहा है.

सबसे पहला यह कि ताज़ा जनादेश मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के पक्ष में जाता नज़र आ रहा है. हालांकि इससे भी बड़ा संकेत यह है कि देश की राजनीति में आगे का चेहरा राहुल गांधी का है.

फिलहाल कांग्रेस 272 के आंकड़े से दूर है पर लंबे अरसे के बाद लोगों को लग रहा है कि कोई पार्टी है जो इसके पास जा सकती है. लोग एक ऐसी सरकार चाहते हैं जो स्थिरता की ओर ले जाए.

तीसरा यह कि वाममोर्चे के लिए यह चुनाव केरल और पश्चिम बंगाल मे सत्ता से बाहर होने का साफ़ संकेत दे रहा है. साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में इसके खत्म होते महत्व को भी साफ़ सामने ला रहा है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की बढ़त पार्टी के लिए बहुत सकारात्मक संकेत हैं. अबतक चेन्नई के रास्ते दिल्ली की सत्ता तक आने वाली रेल शायद अगले चुनाव में लखनऊ के रास्ते सत्ता की सीढ़ी चढ़े.

11:20 IST

केरल के बाद अब पश्चिम बंगाल से भी वाम मोर्चे के लिए निराश करनेवाले रुझान आने लगे हैं. तो क्या इसे तीन दशक लंबे वाम वर्चस्व की खात्मे का संकेत माना जाए... शायद.

11:00 IST

गुजरात से जो रुझान आ रहे हैं, भाजपा के लिए वो एक अहम संकेत साबित होंगे. इन रुझानों के आधार पर कहा जा सकता है कि हिंदू हृदय सम्राट और विकासपुरुष की छवि वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अगले लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हो सकते हैं.

यानी वर्ष 2014 में हम नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी पर आधारित आम चुनाव देख सकते हैं.

10:04 IST

मतगणना का ताज़ा रुझान अब यह संकेत दे रहा है कि भारत के मतदाता ने यूपीए के पक्ष में अपना जनादेश दिया है. जनादेश के ताज़े रुझानों ने कई राजनीतिक पंडितों और विश्लेषकों को ग़लत साबित कर दिया है.

ऐसा लग रहा है कि मतदाता ने क्षेत्र, जाति और संप्रदाय के दायरे से ऊपर उठकर मतदान किया है. हालांकि स्थिति अभी भी बदल सकती है पर अभी तक जितनी सीटों का रुझान मिला है, उनमें यूपीए को 50 प्रतिशत से ज़्यादा पर बढ़त मिलती नज़र आ रही है. यह जनादेश बदलेगा, इसके आसार कम दिख रहे हैं.

09:30 IST

बसपा को मिल रही शुरुआती बढ़त यह संकेत दे रही है कि उनके लिए आंकड़ा 40 का पाला छू सकता है. पर सबसे बड़ी ख़बर अबतक की यह है कि कांग्रेस को दक्षिण भारत में अच्छी बढ़त मिल रही है. आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल से ऐसे ही संकेत आ रहे हैं. क्या यह ये संकेत दे रहा है कि इसबार ज़्यादा मज़बूत कांग्रेस के साथ यूपीए दोबारा सत्ता संभालेगा.

दूसरा ध्यान देनेवाला रुझान गुजरात से आ रहा है जहाँ कांग्रेस इतनी बहुत बुरी स्थिति में नहीं दिखती. नरेंद्र मोदी के लिए यह एक तकलीफ़देह ख़बर हो सकती है.

08:52 IST

मतगणना का बहुत शुरुआती रुझान सामने आ रहा है पर केरल से शुरुआती रुझानों में वाम मोर्चे को हो रहा नुकसान कांग्रेस नेतृत्ववाले यूपीए गठबंधन के लिए एक अच्छा संकेत माना जा सकता है. ताज़ा रुझान पश्चिम बंगाल और केरल में वाममोर्च को नुकसान होता दिखा रहे हैं. इसका असर तीसरे मोर्च पर पड़ता नज़र आएगा.

चौंकानेवाला रुझान मिल रहा है तमिलनाडु से जहाँ डीएमके और कांग्रेस गठबंधन को बढ़त मिलती नज़र आ रही है. हालांकि अभी बहुत जल्दी है पर क्या यह कोई संकेत देता नज़र आता है.

08:15 IST

ताज़ा रुझानों और परिणामों की प्रतीक्षा अपने चरम पर है. सबको रुझानों, नतीजों का इंतज़ार है पर इस पूरी स्थिति में जिस एक सवाल पर ज़ोरदार कयास और अटकलों का क्रम जारी है, वो है प्रधानमंत्री पद के नाम को लेकर.

देश के दोनों प्रमुख राजनीतिक गठबंधन, एनडीए और यूपीए सरकार बनाने की कवायद में आगे आगे चलने की कोशिश करते नज़र आएंगे पर भाजपा और कांग्रेस के संदर्भ में देखें तो राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी इसके लिए इतने बेचैन नहीं होंगे. उनकी मंशा एक स्थाई सरकार बना पाने की होगी. दोनों ही नेता चाहेंगे कि उन्हें सत्ता की भूख में कोई जल्दबाज़ी करते हुए दल के तौर पर न देखा जाए.

कारण उसका साफ़ है. राहुल या मोदी अपनी पार्टी की कमज़ोर सरकार के आने वाले दिनों में भद्द पिटते देखने से ज़्यादा विपक्ष में बैठना पसंद करेंगे.

विपक्ष में रहते हुए अगर वो अच्छा काम करते हैं तो अगले चुनावों में उन्हें एन्टी-इनकमबैंसी का लाभ मिलता है और वो अपनी पार्टी को चुनावों में विजय दिलवा सीधे प्रधानमंत्री बनते हैं.
इसके ठीक विपरीत अगर इस बार कांग्रेस या भाजपा की सरकार बनती है तो प्रधानमंत्री बनते हैं मनमोहन या आडवाणी और अगले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को सत्ता में रहने का जो नुक़सान होता है वो राहुल या मोदी को उठाना पड़ेगा.

यह अलग बात है कि ऐसी सोच पार्टी में अन्य नेताओं की नहीं होगी. उन्हें तो सत्ता में रहने से मतलब है. प्रधानमंत्री तो वह इस बार बन रहे हैं न कि अगली बार.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 04:35 IST, 16 मई 2009 Sanjay Kumar:

    हाँ, मैं आपके विचार से सहमत हूँ. ऐसे भी राहुल गांधी में अभी प्रधानमंत्री बनने के कोई गुण दिखाई नहीं देते हैं. पार्टी में जहाँ प्रणव मुखर्जी जैसे लोग हों, वहाँ राहुल गांधी का प्रधानमंत्री के लिए नाम लेना ही नहीं चाहिए. पता नहीं आप लोगों को राहुल गांधी में ही सब कुछ क्यों दिखाई देता है. संजीव जी, आप अच्छा लिखते हैं लेकिन आप एकपक्षीय हो जाते हैं.

  • 2. 07:02 IST, 16 मई 2009 Ramkomal Yadav:

    ताज़े रुझानों को देखते हुए पता चलता है कि अब राजनीतिज्ञों को केवल विकास के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ना चाहिए क्योंकि भारत की जनता अब समझदार हो गई है.

  • 3. 07:09 IST, 16 मई 2009 Vipul:

    नमस्कार, बीबीसी नए ज़माने के अनुरूप बदल रही है. ब्लॉग देख कर अच्छा लगा. अचला जी की कमी खलती है. फिर भी चुनाव की कवरेज ठीकठाक है. लगे रहिए.

  • 4. 07:20 IST, 16 मई 2009 prabhat kumar:

    इस चुनाव के परिणामों को वाकई चौंकाने वाले परिणाम तो नहीं कह सकते हैं लेकिन मैं आपकी इस बात का पूरी तरह से समर्थन करता हूँ कि सरकार पूर्ण बहुमत में ही बनाएं. भद्द पिटवाने से तो अच्छा यही है. लेकिन भाजपा को अब चुपचाप विपक्ष में बैठ जाना चाहिए क्योंकि शायद यही जनादेश कहता है. भाजपा का भद्द पिटवाने से अच्छा है कि जनता के फ़ैसले को स्वीकार करें. वैसे जनता को किसी पार्टी से लेना देना नहीं है. लेना तो उनकी नीतियों से है बाकी देखते हैं कि और क्या होता है इन पाँच सालों में........

  • 5. 08:10 IST, 16 मई 2009 pranav anand:

    आपको अभी और देखने की ज़रूरत है.

  • 6. 10:00 IST, 16 मई 2009 zafeer uddeen sheikh:

    आपके विचार परिणामों से मेल खा रहे हैं. अच्छा पूर्वानुमान है आपका.

  • 7. 10:25 IST, 16 मई 2009 SHIV SHANKER MISHRA:

    बीबीसी की टीम को बधाई, आपके अंदाज़े ठीक बैठ रहे हैं.

  • 8. 10:42 IST, 16 मई 2009 ANIL JOSHI:

    भारतीय जनता पार्टी के चुनाव परिणाम बेहद निराशाजनक साबित हुए हैं.

  • 9. 10:50 IST, 16 मई 2009 kamlesh kumar diwan (writer):

    आज हम किसी को कुँवर, राजा, महाराज, युवराज आदि विशेषणों से संबोधित कर राजतंत्र के अवशेषों का पोषण कर रहे है, किन्तु उन बालिग मतदाताओं की आकाँक्षाओं को प्रतिबिंबित करने में समर्थ नहीं हो पाए हैं जो बेरोज़गार हैं, सुविधाओं के अभाव में पढ नही पाए हैं, नौकरियों से हाथ धो बैठे हैं. खेती॑.. किसानी और व्यवसाय में घाटा होने से हताश हैं. जाति.. पाँति,धर्म..सम्प्रदाय ,और ऊँच..नीच में विभाजित किये जा रहे हैं.

  • 10. 10:55 IST, 16 मई 2009 sanjeev kumar:

    आपका लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा. चुनाव की ताज़ा तरीन ख़बरों की ये अच्छी कवरेज है. जहाँ तक मेरा मत है, हमारे देश की जनता को चाहिए कि पाँच साल में सरकार को बदले न कि दस या 20 साल में.

  • 11. 11:08 IST, 16 मई 2009 ashraf patel:

    कांग्रेस को मत देने के लिए भारतवासियों को सलाम. भारतीय जनता पार्टी को समझ लेना चाहिए कि मोदी एक अपराधी हैं और अगर वे सत्ता में आना चाहते हैं तो उन्हें प्रगति के बारे में बात करनी चाहिए न कि सांप्रदायिक मुद्दों पर. अब आडवाणी को ज़िंदगी में आराम करना चाहिए. इंटरनेट पर भाजपा समर्थकों को अब भाजपा की जगह कांग्रेस को ही एकमात्र उपाय के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए.

  • 12. 11:25 IST, 16 मई 2009 kamlesh kumar diwan(writer):

    इस जनादेश के संबंध में मेरी राय है कि हमें सांगोपांग चुनाव सुधार की प्रक्रिया अपनाकर आम चुनाव करवाने चाहिये थे, समुचित रूप से कोई भी राजनैतिक दल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं अन्यथा पूर्ण बहुमत मिलना चाहिये था. पश्चिम देशों की तर्ज़ पर सुधार हुए हैं, किन्तु क्षेत्र परिसीमन में संशोधन का आधार जनसंख्या ही रही. हमें पंचायती राज की संस्थाओं और स्थानीय निकायों के लिए किए गए संविधान के 73 और 74 वें संशोधनों के दृष्टिगत लोकतंत्र और संघीय शासन प्रणाली के आधारों को विस्तृत
    करना चाहिये था. भविष्य में सुधार होंगे ,आशा करते हैं. लोकतंत्र में जनादेश ही शासन का अधिकार है, यदि वह समझौतों से पूर्ण होता है तब चिंतन करना जरूरी है.

  • 13. 11:43 IST, 16 मई 2009 Malkiat singh Virk:

    जय हो भारत. ये जो हलचल है, इस बात की हलचल है कि भारत बदल रहा है. इस चुनाव के लिए पूरे देश के युवाओं को धन्यवाद देना चाहिए. हम लोग जो बाहर रहते हैं, आशा करते हैं कि भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऊँचा होगा.

  • 14. 14:07 IST, 16 मई 2009 harmail preet:

    लोक सभा चुनाव 2009 के नतीजे निस्संदेह सकारात्मक हैं और आपकी टिप्पणियाँ भी.

  • 15. 15:21 IST, 16 मई 2009 sushil kumar:

    बीजेपी ने जो बोया वही काटा है. वे महज एक व्यक्ति की आलोचना कर नकारात्मक चुनाव प्रचार करते रहे. मुझे यह समझ में नहीं आया. क्या वे हिटलर या इंदिरा गाँधी की तरह का प्रधानमंत्री चाहते हैं.

  • 16. 16:17 IST, 16 मई 2009 Nasim Ansari Pratapgarh(U.P.):

    बीबीसी की टिप्पणी बेशक क़ाबिले तारीफ़ है. इस जनादेश से वामपंथियों को सबक़ लेना चाहिए, कुछ कम्यूनिस्ट अपने आप को "किंग मेकर" समझने लगे थे. वे ये भूल गए थे कि असली किंग मेकर तो जनता है. इस नसीहत के लिए सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश की जनता को सलाम.

  • 17. 18:59 IST, 16 मई 2009 Anu from Blackburn UK:

    सारे भारतीय को मुबारकबाद. ये जीत है उन सारे भारतीयों की जो विकास, संवेदनशीलता और सुरक्षा में विश्वास करते हैं. अब भाजपा को बांटो और राज करो का पुराना तरीक़ी अपनाना होगा. लेकिन वह ज़माना जा चुका है. अब सारे भारतीय शांति और भाईचारे के माहौल में जीना चाहते हैं.

  • 18. 18:59 IST, 16 मई 2009 धीरज वशिष्ठ:

    पूरे मीडिया विश्लेषण के दौरान एक बात पर हम सभी ग़ौर शायद नहीं कर पा रहें हैं, वह ये हैं कि लोकसभा के इस चुनाव में केंद्र के कामकाज की जगह राज्य सरकारों के कामकाज पर वोट पड़े. यूपी जैसे राज्य अपवाद हैं. बिहार, झारखंड, उड़ीसा, हरियाणा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में राज्य सरकार का प्रदर्शन अहम रहा. विपक्ष में बीजेपी के पहले जैसे तेवर रहते थे जो इन 5 सालों में कहीं नहीं दिखे, इसका नुक़सान उठाना पड़ा. सबसे बड़ी बात लेफ़्ट और उसके साथ जुड़ने वाली पार्टियों को नुक़सान उड़ाना पड़ा है. चाहे टीडीपी, टीआरएस, एआईडीएमके, पीएमके, कुछ हद तक बीएसपी बेहतर नहीं कर पाई. क्षेत्रीय पार्टियों की दुकानें बंद होना केंद्रीय राजनीति के लिए अच्छी बात है. कुल मिलाकर ये विकास पर वोट है.

  • 19. 21:41 IST, 16 मई 2009 Dr Durgaprasad Agrawal:

    इस बार के चुनाव परिणामों ने कुछ बहुत साफ़ और आश्वस्त करने वाले संकेत दिए हैं. जनता ने रुढ़िवादी जड़ और किताबी क़िस्म के नारे लगाने वालों को नकार कर उन्हें समर्थन दिया है जिनसे ठीक-ठाक काम की उम्मीद की जा सकती है. भाजपा और वाम दोनों को ही नकारा जाना, जड़ता और अतिवाद की अस्वीकृति के रूप में देखा जाना चाहिए. लगता है कि वाम ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर जनता को नाराज़ किया था. भाजपा को अब अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा. हर चुनाव राम के भरोसे नहीं जीता जा सकता.

  • 20. 22:09 IST, 16 मई 2009 zafarul haque khan:

    ये चुनाव साबित करता है कि भारत में अब सांप्रदायिक शक्ति काम नहीं कर सकती है, साथ में मैं बीबीसी की विश्वसनीय रिपोर्टिंग का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं.

  • 21. 07:20 IST, 17 मई 2009 Sanjay Kumar:

    नमस्कार संजीव जी, कांग्रेस को अपने अच्छे काम और सोनिया गांधी और डाक्टर मनमोहन सिंह की साफ़ छवि का फल मिला है. कांग्रेस ने किसानों के लिए क़र्ज़ माफ़ी से लेकर मज़दूरों के लिए भी काफ़ी काम किए. बीजेपी ने पहली बार मंदिर के नाम पर और दूसरी बार अटल जी के नाम पर जीत हासिल की थी लेकिन बाजेपी का सिद्धांत, हिंदु और मुस्लिम को लड़ाओ और शासन करो, ही बहुत घटिया है. इस तरह की लड़ाई में सिर्फ़ जनता ही मारी जाती है. कोई अनाथ होता है तो कोई विधवा. लेकिन इन नेताओं का तो कोई नहीं मरता. इसलिए वो जनता का दर्द क्या समझेंगे? ऐसे भी अब जनता काम के आधार पर वोट देती है जैसे बिहार में नीतीश जी ने अच्छे काम किए हैं और जनता ने उन्हें इसका ईनाम भी दिया है. इसी तरह कांग्रेस को भी उसके काम का ईनाम दिया है. अब कांग्रेस को चाहिए की वो किसानों के लिए अच्छे से अच्छा काम करे क्योंकि किसानों की तरफ़ कोई ध्यान नहीं देता. पार्टियां सोचती हैं कि इन ग़रीब किसानों को फुसलाकर ठग लेंगे. वो नहीं जानते कि एक किसान को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए कितने दुख उठाने पड़ते हैं.

  • 22. 09:24 IST, 17 मई 2009 Dr.Vivek Shrivastava:

    संजीव जी, बहुत से समाचार पत्र देखे, बहुत सी इंटरनेट साईट देखीं (टीवी चैनल नहीं देखे). आप अगर एक सहायता कर सकें तो बहुत अच्छा लगेगा. मुझे ये जानने की बहुत उत्सुकता है कि इस रिज़ल्ट पर प्रधानमंत्री के पद के लिए देश के सर्वाधिक योग्य और मुखर (हो सकता है कुछ लोग इस बड़बोलेपन को ही सबसे बड़ा साहस और योग्यता मानते हों) दावेदार नरेंद्र मोदी जा क्या कहते हैं? उनकी प्रतिक्रिया कहीं देखने पढ़ने को नहीं मिली. आपके माध्यम से मालूम हो जाए ऐसी उम्मीद है. आप सब ने भी ऐसे वीवीआईपी को कवर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया. कुछ लोग आप पर एकपक्षीए होने का आरोप शायद इसीलिए लगाते हैं, थोड़ा ध्यान तो रखिए भाई आख़िर वो देश के होने वाले पीएम हैं. हाँ अब अगर आडवाणी जी के बाद का क्रम तय करें तो 2014 ना सही, कभी ना कभी तो सही. आख़िर सपने देखने का हक़ तो सभी को है.

  • 23. 09:59 IST, 17 मई 2009 sachin yadav:

    सबसे पहले यहाँ ये समझना ज़रूरी होगा कि चुनाव किन लोगों ने किया है. नरेगा, किसानों की क़र्ज़ माफ़ी और छठां वेतन आयोग ऐसे कारण रहे कि यूपीए को गांवो से ज़्यादा वोट मिले. साथ ही सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने मुस्लिमों को यूपीए के साथ खड़ा कर दिया. मनमोहन सिंह काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं. उन्हें अपनी सेहत का ख़्याल रखना चाहिए. प्रणव मुखर्जी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि उन्हें हिंदी नहीं आती है और रही राहुल की बात तो उन्हें अब शादी कर लेनी चाहिए. ममता बनर्जी को इस बार मौक़ा मिलना चाहिए और वो एक अच्छी पीएम साबित हो सकती हैं.

  • 24. 10:05 IST, 17 मई 2009 vinay shankar:

    इसे कांग्रेस की काफ़ी अच्छी सफलता ही मानी जायेगी. राहुल ने अपने गुणों को भी जनता के सामने रखा है. इन चुनावो में जनता ने दिखा दिया कि उसे हमेशा मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है. काम करो और चुनाव जीतो. चुनाव जीतने के लिए अब तो इक यही मंत्र रह गया है .

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