जनादेश 2009: एक ऐतिहासिक फ़ैसला

जनादेश 2009 के आकलन से पहले मैं एक चेतावनी देना चाहता हूँ. नतीजों के आकलन में हम तथाकथित विश्लेषक कभी-कभी अति सरलीकरण कर डालते हैं या फिर अतिशयोक्तियों में उलझ जाते हैं. कोशिश करूँगा कि इस आकलन में इन त्रुटियों से बचा जाए.
मैं मानता हूँ कि 2009 के नतीजे ऐतिहासिक हैं और एक लहर का संकेत है इस जनादेश में. आप कहेंगे कि कांग्रेस 200 से ज़्यादा सीटें क्या ले आई आप इसे ऐतिहासिक और लहर इत्यादि की संज्ञा दे रहे हैं.
जी हाँ, आप 2009 का जनादेश वर्तमान के आईने में देखिए विगत के नहीं. दो दिन पूर्व तक क्या हम नहीं कर रहे थे कि जिस दल के पास 150 से ज़्यादा सीटें होंगी वह सरकार बनाने का दावा कर पाएगी. यानी 150 का अंक पुराने ज़माने का 272 था तो 200 से ज़्यादा सीटें इस माहौल में कुछ वैसी ही लहर या 'फ़ील गुड' को जन्म दे रही हैं, जो राजीव गाँधी की 405 सीटों के साथ कांग्रेसजनों को महसूस हुआ था.
ऐतिहासिक चुनाव यह इसलिए नहीं है कि कांग्रेस 200 का आँकड़ा पार कर गई.
यह चुनाव भारतीय राजनीति में इसलिए मील का पत्थर होने का दम भर सकता है क्योंकि इसमें भारतीय मतदाताओं ने राजनेताओं और राजनीतिक पंडितों, सभी के अनुमानों को धता बताते हुए जाति, धर्म और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर वोट डाला.
मतदाताओं ने राजनेताओं द्वारा बिछाई गई शतरंजी बिसात को ही जैसे उलटकर रख दिया. उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि चुनावी गणित और जीत के फ़ॉर्मूलों पर अपनी महारत समझने वाले राजनीतिज्ञों को कहीं न कहीं वह विकास, जवाबदेही, ईमानदारी और अच्छाई की कसौटी पर परखेगा और ज़रूरत पड़ने पर नकार देगा.
हो सकता है कि यह मेरे मन के कवि की नासमझ उड़ान हो पर 2009 का जनादेश शायद जाति-धर्म से ऊपर, भविष्य और विकासोन्मुख, एक नए भारत के निर्माण की ओर इशारा कर रहा है जिसमें प्रमुख भूमिका युवा ऊर्जा कि होगी न कि सत्ता के ठेकेदारों की.
सत्ता के ठेकेदारों की बात चली है तो फ़िलहाल उनकी हालत दयनीय है. एक मित्र ने कहा कि यकायक जैसे इन लोगों की दुकानें बंद हो गई हैं. जनादेश 2009 ने 'किंगमेकर्स' होने का गुमान रखने वालों को फ़िलहाल तो बेरोज़ग़ार कर दिया है.
ख़ैर, सत्ता के ठेकेदारों पर इतनी जल्दी मैं श्रद्धा-सुमन नहीं चढ़ाना चाहता. उनमें एक ख़ास तरह की 'सर्वाइवल स्किल्स', बेशर्मी और किसी का भी मन ललचाने जैसी क्षमता होती है, जिससे सत्ता चाहते हुई भी स्वयं को उनसे दूर नहीं रख पाती.
पर फिर भी पिछली दो सरकारों में कम से कम छोटे दलों और सत्ता के दलालों की तो चाँदी हो गई थी, वह सिलसिला फ़िलहाल कुछ थमता नज़र आ रहा है.
राजनीतिक टिप्पणी इन चुनाव नतीजों पर विस्तार से फिर कभी. लेकिन कुछ बातें तो तय है. राहुल का कांग्रेस में उदय और कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में पुनर्जन्म.
बीजेपी आने वाले दिनों में नेतृत्त्व के अकाल से जूझेगी पर हार के सही कारणों तक पहुँच, सकारात्मक आत्ममंथन कर पाएगी, ऐसा मुझे नहीं लगता. उन्हें समझना होगा कि भारतीय युवा मतदाता ने नकारात्मक और विगत में देखने वाली सोच को नकारा है.
वामदलों को भी ज़बरदस्त आत्मनिरीक्षण करना होगा और उनके पास भी कोई आसान उत्तर नहीं होंगे. क्षेत्रीय पार्टियाँ भी थोड़ा समय तो अपने ज़ख़्मों पर पर मरहम लगाने का ही काम करेंगी.
पर जैसा मैंने कहा, इन सब पर विस्तार से चर्चा फिर कभी. आज जनादेश 2009 के सही और ज़्यादा महत्त्वपूर्ण संदेश को समझने, स्वीकारने और शायद उसे सेलिब्रेट करने की ज़रूरत है.
न सिर्फ़ जाति, धर्म और क्षेत्रीयता से ऊपर उठकर बल्कि दलगत राजनीति से भी कहीं स्वयं को अलग रखकर.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
बिहार से पासवान का सफ़ाया और लालू का ख़ात्मा सब कुछ बयां कर देता है. ज़ात पात का समीकरण विकास पर भारी हुआ. बहुत दिनों तक जनता को आप मूर्ख नहीं बना सकते. अगर ये सरकार में मंत्री बनते हैं तो लोगों का विश्वास कांग्रेस से उठ जायेगा.
मुझे बहुत ख़ुशी है कि इस बार देश की जनता ने वो कर दिखाया जिसकी इस देश को पिछले कुछ सालों से ज़रूरत थी. और ये तमाचा है उन लोगों के गाल पर जो देश को जातियों के नाम पर बाँटना चाहते हैं. देश वासियों को मेरी तरफ़ से जय हो, जय हो और धन्यवाद जिन्होने धर्म के नाम पर वोट ना देकर विकास के नाम पर वोट दिया.
मतदाताओं ने यह भी जता दिया है कि भावनाएं भड़काने वाले भाषणों के सहारे धार्मिक स्थल खड़े करने की गर्जनाएं भी अब गले नहीं उतरने वालीं। यह तुलना भी करें कि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ओजस्वी नहीं माने जा सकते।
संजीव जी, आप जिस तरफ़ इशारा कर रहे हैं, कितना अच्छा होता हमारे महान लोकतंत्र के पहरेदार समझने की कोशिश करते. चुनाव प्रचार के दौरान बहुत सी ऐसी ख़बरें सुनने में आईं जिससे लोकतंत्र की सबसे अच्छी परिभाषा के तौर पर मेरे ज़ेहन में "लोकतंत्र मूर्खों का शासन है" ही आता था, लेकिन चुनाव परिणाम से मेरे विचार एक बार फिर से दृढ़ हो रहे हैं कि शासन के सर्वोपयुक्त पद्धति के रूप में लोकतंत्र के विकल्प के तौर पर और दूसरा कुछ नहीं हो सकता है. चुनाव प्रचार के दौरान जब बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने मौज़ूदा मुख्यमंत्री की क़ाबलीयत को ललकारा तो मुझे ये अच्छी तरह से एहसास हुआ कि आख़िर क्यों लोग नेता शब्द को गाली के तौर पर लेते हैं. जो एक अनपढ़ महिला को इतनी हिम्मत दे दे कि वो मीडिया के सामने अपने नीतियों एवं व्यवहारों की वजह से विपक्षी लोगों में भी विकास पुरुष के तौर पर शुमार नीतीश कुमार को अयोग्य घोषित करने में शर्मींदगी महसूस ना हो, वह दूसरा और कुछ भी नहीं राजनीति का मौज़ूदा चलन ही हो सकता है. ख़ैर शुक्रिया बिहार की जनता का जिसने राबड़ी के इस बयान का बख़ूबी जवाब दिया. कभी अलग-अलग मंचों से सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने वाले राजद और लोजपा की जो छीछालेदारी हुई वो उनके आत्मभ्रम को समझने के लिए काफ़ी है. एक बात बिहार के संदर्भ में जो बहुत ही अच्छी रही वो ये है कि जिस बिहार के नेताओं ने सत्ता के लिए जात-पात की कुत्सित राजनीति अपनाकर राज्य में राजनैतिक समीकरण को ही बदल दिया था और बिहार की जनता के माथे पर जातिवादी राजनीति का समर्थन करने का कलंक लगवाया था. उन्हें हक़ीक़त का पता चल गया. नीतीश की जदयू अगर अच्छा प्रदर्शन नहीं करती तो सच में विकास की आस में टकटकी लगा रही बिहार की जनता को शायद एकबार फिर से जातिवादी राजनीति के गिरफ्त में आना पड़ सकता था, लेकिन अब तो इतना तय है कि जात-पात पर लगाम लगेगा और सत्ता के लिए विकास के नारे को बुलंद करना अपरिहार्य हो जाएगा. संजीव जी, आशा है आगे आप और भी विश्लेषण पेश करेंगे, मेरी ख़ास तमन्ना है कि आप बिहार में राजनीतिक बदलाव पर एक विवरण पेश करें. धन्यवाद!
भारतीय जनता पार्टी का हाल अब मुंशीप्रेमचंद की कहानियों में तड़पते या ऑस्कर अवार्ड जीतने वाली एक फ़िल्म के किरदार झूठे शख्स जैसी हो गई लगता है. कम से कम हम तो इतना कहने के लिए स्वतंत्र हैं ही. नारदमुनी की भूमिका तो आप कर ही देंगे सबको मालूम है. जनता के फ़ैसले को तो कोई नकार ही नहीं सकता इसलिए बिना विश्लेषण के आप भी हारी हुई पार्टियों को ये काम सौंप रहे हैं. ज़रा उन लोगों से पूछिए जो आसमान छूते हुए राशन के दाम और नौकरी से निकाल दिए जाने बीच की परिस्तिथियों में ज़िंदगी बिता रहे हैं. मुझे पता है ऐसे माहौल में आप नकारात्मक रिपोर्टिंग नहीं करेंगे. लेकिन बीबीसी जैसे संगठन से दुसरे चैनलों के सुर में सुर मिलाने वाली प्रवृति का आशा नहीं की जा सकती. लेफ़्ट और अन्य पार्टियों को कोसने के बजाए कांग्रेस ने कैसे लोगों का झांसा दिया इस पर विस्तृत रिपोर्ट कीजिए.
चुनाव 2009 के परिणाम ये साबित करते हैं कि जनमानस "फ़ॉर्मूलाइजेशन" से बाहर की चीज़ है. चुनाव परिणाम सामने हैं और कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है. परिणाम कई मायनो में ख़ास रहे. चाहे वो कांग्रेस की सशक्त वापसी की बात हो या फिर विपक्ष का उन्हें जीत के लिए दिया गया बधाई सन्देश (छोटा ही सही सकारात्मक तो है). बहरहाल ये परिणाम आने वाले पाँच साल तक कांग्रेस को सरकार में रहने और बिना "होस्टाइल" बने देशहित में निर्णय लेकर सरकार चलाने की क्षमता प्रदान करेंगे (जो पिछली बार संभव नहीं था, "वाम को धन्यवाद").
भारतीय इतिहास सरकार बनने से चलने तक राजनीति और ताजनीति के हावी होने को ही दिखता है, इस बार फिर एक मौक़ा है जो कहता है की सरकार बनने की औपचारिकताओं के बाद देशहित में "राज- नीति " का अंत और "सेवानीति" की शुरुवात हो. मुद्दे चुनावों तक ही सीमित न रह जाएं; आज़ादी के 60 साल बाद भी जहाँ देश में "बिजली, पानी और सड़क " जैसे बुनियादी मुद्दे (ग़रीबी और बेरोज़गारी तो बाद की बात है) ज़िंदा और ज्वलंत हो तो स्थिति की समीक्षा और त्वरित कार्यवाई, समय की मांग बन जाती है.
वर्तमान में आंतरिक और बाह्य सुरक्षा एक गंभीर चुनौती बनी हुई है; कमी सुरक्षा बलों में नहीं (वे सक्षम थे और सक्षम हैं ) नीतिओं में है. आवश्यकता इन चुनौतियों से निपटने के लिए कारगर नीतियाँ बनाने और उनका सटीक कार्यान्वन में निहित है. बेतुकी क्रांति की बातें कर जनमानस में भय और आतंक फैलाने वालों के लिए क़ानून में "विशेष स्थान" का होना आवश्यक है. एक एक "लाल क्रन्तिकारी(फ़र्जी)" को मुख्यधारा में आने का मौक़ा देना और ना आने पर "सही जगह" भेजना होगा.
डेमोक्रेसी के अपवाद स्वरुप 'किंगमेकर्स' पहले की तरह फिर सक्रिय हो गए हैं, विडम्बना ही है कि लोकतंत्र का ये कैंसर डाइग्नोस हो कर भी ट्रीट नहीं हो पा रहा है. खैर ये सब थिंकटैंकस पर छोड़ना ही उचित होगा.
जातिवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद जैसे शब्द अपने मायने खो दे तो कितना अच्छा हो; भारत, भारतीय और भारतीयता अच्छे रिप्लेसमेंट मालूम होते हैं. वैसे भी संसद में बैठने वाला एक-एक प्रतिनिधि , एक-एक प्रजातान्त्रिक दल अगर एक ही उद्देश्य: "विकसित, सशक्त और ख़ुशहाल भारत" को ही चाहता ही तो रास्ता कोई भी हो जीत सभी की होगी.
नई सरकार से आने वाले समय में देशहित में उच्चतम आदर्शों का पालन कर कार्य करने की आशा, और कार्यों में सफलता के विश्वास सहित, बधाई....
आपकी बातें शत-प्रतिशत सही है. इन चुनावों में जनता ने दिखा दिया कि उसे हमेशा के लिए मुर्ख नहीं बनाया जा सकता है. काम करो और चुनाव जीतो. अब तो एक यही मंत्र रह गया है चुनाव जितने के लिए. सारे परिणाम यही दिखाते है. बिहार से किसी अपराधी का चुनाव नहीं जितना यह दर्शाता है कि मतदाता अब पहले से ज़्यादा परिपक्व हो गया है. हमारे देश का लोकतंत्र सही दिशा में जा रहा है.
चुनाव 2009 के नतीजों से ज़ाहिर है कि भारत के लोग अभी भी गांधी परिवार के वफ़ादार हैं और इतने समय बीतने के बावजूद नहीं बदले हैं. ये जानते हुए कि कांग्रेस पार्टी भारत की सारी समस्याओं का मूल कारण है उन्होंने न ही भाजपा को और न ही किसी दूसरी पार्टी को मौक़ा दिया. आरक्षण, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण, और बहुसंख्यक हिंदुओं को दबाने के लिए और पांच साल दे दिया गया है. ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस फिर से सत्ता में आ गई.
संजीव जी, भारत का मतदाता अभी भी ग़रीब है, सिर्फ़ आर्थिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक, शारीरिक और हर उस दृष्टिकोण से जिससे किसी की हालत का अंदाज़ा लगाया जाता है. रही बात इस तथाकथित जनादेश की तो इसे मैं जनादेश नहीं कुछ रोटियों और शराब की ज़बानी कही कोई कहानी के तौर पर देखता हूं. अगर बीस बेवक़ूफ़ लोग किसी पार्टी और नेता को युवा नेता के प्रतीक का ख़िताब दे दें इससे तथ्य नहीं बदल जाता. आप के जैसे मीडिया और पत्रकार जो ज़िंदगी में सिर्फ़ इसी चीज़ का विश्लेषण करके पैसे कमाते हैं, ये बस उनके लिए जनादेश है. एक और बात ये है कि भारत से पत्रकार को ख़त्म कर देना चाहिए, ये लोग विकास में बाधा डालने और फ़साद करने वाले हैं. ये लोग चीज़ों को उल्टा-पुल्टा दिखाते हैं और मुफ़्त की खाते हैं, नेताओं से कहीं ख़तरनाक हैं ये लोग. मैं किसी विकल्प की तलाश में रहुंगा जिससे मैं अपने पचास हज़ार वार्षिक कर को इन बेवक़ूफ़ों की तिजौरी में जाने से रोक सकूं.
अब जनता भी नेताओं को समझाने लगी है. परिणाम सामने हैं.
जनता ने तो वोट देकर कांग्रेस को जीत दिला दी लेकिन आज जो ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे है उन्हें उनका हक़ कब मिलेगा.
चुनाव परिणाम आने के बाद जनता का फ़ैसला ऐतिहासिक बताना शायद आपकी मजबूरी है क्योंकि जनता नेताओं के साथ साथ लोकतंत्र के एक स्तंभ पत्रकारिता को वर्षो से बर्दाश्त करती आ रही है. किस पार्टी ने जीत हासिल की किसने नहीं ये उतना महत्वपूर्ण नही, जितना कि किसी असफल सरकार की वक़ालत. जब बहन जी की सरकार बनती है तो उसे आप सोशल इंजीनियरिंग कहते हैं और जब हारती है तो आप बड़बोलापन कह कर मज़ाक़ उड़ाते हैं. पत्रकारिता भी सब्जी की दुकान हो गयी है और पत्रकार सड़ी गली सब्जियों को भी बढ़िया बता कर मुनाफ़ा कमाने से नहीं चूकते. जनता इतनी ही होशियार है तो पिछले 60 सालों से अपने लिए साफ़ पानी की व्यवस्था क्यों नही कर सकी?
अछा होता पत्रकार जनता की कमीयो को भी उजागर करते और बताते की जिस सरकार को अपने चुना है वह पिछले ५ सालो मे आपके लिए जो वादे किए थे उन पर खरी ऩही उतरी.
मैं बहुत खुश हूँ कि भारत के लोगों में बदलाव लाने या सरकार बनाने की शक्ति तो है. लोगों ने कांग्रेस को बहुमत से जिताया है और साथ ही चिदंबरम और लालू यादव को उनका रास्ता दिखा दिया. पासवान ने अपनी सीट खो दी. चिदंबरम को इन चुनावों से कुछ शिक्षा लेनी चाहिए. ख़ास बात यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इससे बहुत खुश होंगे कि उनकी पार्टी इतने मतों से जीती है लेकिन साथ ही यह दुखद भी है कि हमारे प्रधानमंत्री ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें जनता ने नहीं चुना है.
यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कांग्रेस को बहुमत मिला नहीं बल्कि देश की जनता ने एक होकर सोचा है देश के बारे में.
ये कांग्रेस की जीत नहीं बीजेपी की हार है राष्ट्र को अब और 5 साल अनिश्चय की अवस्था मैं रहना होगा. देश एक राष्ट्रवादी नेतृत्व की बाट जोह रहा है. ये देश का दुर्भाग्य है कि बीजेपी एक राष्ट्रवादी नेतृत्व नहीं दे पा रही है. बीजेपी को समझना होगा कि कांग्रेस की कार्बन कॉपी बनके वो कुछ नहीं पा सकती. बीजेपी 2 से 182 पर छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण से नहीं पहुंची थी. देश की 86 फ़ीसदी आबादी को इनसे विकास और राष्ट्रवाद पर कुछ उम्मीदें हैं जिन को अगर ये पूरा करेंगे तो आगे जा पाएंगे. इस देश के लोकतंत्र का ये दुर्भाग्य है कि यहां मीडिया कांग्रेस का पहरुआ बना हुआ है. संजीव जी ने लालू और करात जैसे लोगों को तो प्राइम टाइम पर बुलाया पर बीजेपी के किसी नेता को नहीं. सभी न्यूज़ चैनलों का यही हाल है. राष्ट्रवादी को कोई जगह नहीं देता. दुर्भाग्यवश अब पाँच साल तक एक ऐसा व्यक्ति जो एक अच्छा अर्थशास्त्री तो हो सकता है पर नेता नहीं, जो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सावर्जनिक बहस नहीं कर सकता पर जब बोलता है तो बहुत ही कटु और अर्थहीन बोलता है, नेतृत्व करेगा.
मैं चुनाव परिणामों का स्वागत करती हूँ और संजीवजी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ. यहां हम यह नहीं कह सकते कि जातिवादी और धार्मिक राजनीति का अंत हो गया लेकिन उम्मीद करते हैं कि जो होगा अच्छा ही होगा. मुझे लगता है कि यह गरीब जनता की जीत है जिन्हें हिंदूवादी संगठन अनदेखा कर रहे थे. मैं यूपीए की जीत पर उतनी खुश नहीं हूँ जितनी एनडीए की हार पर हूँ.
अगर पत्रकार ख़ुद को अफ़वाह फैलाने से बचाकर रखें तो बेहतर होगा. जनता को ही यह तय. करने दें कि वह क्या चाहती है. आजकल मीडिया ने अपने विचार फैलाकर प्रजातंत्र का अपहरण कर लिया है. मीडिया सिर्फ़ सूचना देने का माध्यम हैं लेकिन आजकल यह तथाकथित धर्मनिरपेक्ष भी बना हुआ है. भाजपा ऐसे ही मीडिया की शिकार हुई है जो यह सोचते हैं कि भाजपा का विरोध करना ही मुख्यधारा का काम है. भाजपा ही ऐसी पार्टी है जो सिद्धांतों की लड़ाई लड़ रही है. अगर लोग आप पर हमला करने लगें तो ऐसे में सिद्धांत बदलना राजनीति में ठीक नहीं. दूसरे सभी दल हार जाने पर अपने मुद्दे बदल देते हैं. इसे सिद्धांत नहीं कहते.
मैं कांग्रेस का समर्थन करता हूँ लेकिन मनमोहन सिंह को कभी नहीं. लोग राहुल को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं क्योंकि हमने राहुल के लिए वोट दिए हैं न कि मनमोहन सिंह के लिए.
बहुत दुख हुआ संजीवजी की प्रतिक्रिया पढ़कर. भारतीय मतदाता अत्यंत ही बेवकूफ़ हैं. इन्हीं मतदाताओं ने वाजपेयी को हराया और आज मनमोहन सिंह को जितवाया जबकि वाजपेयी का काम मनमोहन सिंह से कहीं बेहतर था. ये बात तो संजीवजी भी समझते होंगे कि मनमोहन सिंह को जनता ने नहीं बल्कि राहुल गाँधी ने जितवाया है. भारतीय जनता अभी तक सामंतवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाई है जिसमें राजा का बेटा ही राजा बनता है.
अगर कांग्रेस हार जाती तब क्या होता. मैं जानता हूँ कि तब आप अपना ब्लॉग भाजपा के समर्थन में लिखते. यह आपका काम है और कुछ नहीं.....जीतने वाले के पीछे बहुत लोग होते हैं. लेकिन यह सच है कि भारत की जनता ने नकारात्मक और ब्लैकमेलिंग की राजनीति को नकार दिया है.
बिहार से शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, प्रभुनाथ सिंह, साधु यादव, सूरजभान सिंह, सुरेंद्र यादव, तस्लीमुद्दीन, मुन्ना शुक्ला, लवली आनंद, उत्तर प्रदेश से अक्षय प्रताप सिंह, अतीक अहमद, अफ़ज़ल अंसारी, मुख़्तार अंसारी, डीपी यादव जैसे नेता जो खुद लड़ रहे थे या उनकी पत्नियाँ मैदान में थीं, का हार जाना ये बताता है कि उसे साफ़ सुथरे नेता चाहिए चाहे वो कांग्रेस से हो, राजद से हों या भाजपा से हों.
स्टॉक मार्केट ने इतिहास में पहली बार 20 फ़ीसदी का ऊपरी सर्किट छुआ!! ये क्या दिखाता है? ये यही दिखाता है कि ये ही है यही है राइट च्वाइस! आहा ! कांग्रेस ने 50 सालों में जितना काम नहीं किया उतना पिछले पाँच सालों में किया. नतीजा सबसे बड़ी और सबसे मज़बूत पार्टी. एक बात उन्हें याद रखकर चलना है कि राहुल जब बात करते हैं तो जितना सच्चा आदमी लगता है, काम करने में भी उतना ही सच्चाई और ईमानदारी दिखती है. वे इसी तरह गरीबों के लिए काम करें. फिर देखना 2014 में कांग्रेस 300 के पार होगी, सिंग इज़ किंग. जय हो!
मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि चुनाव के नतीजों ने देश की क्षेत्रीय पार्टियों को उनकी औकात का अहसास करा दिया..हालांकि मैं बीजेपी को तब तक समर्थन करती थी जब तक मजबूत नेता वाजपेयी जी ने एक निर्णायक सरकार देश को दी और विकास के आधार पर देश में परचम लहराया लेकिन अब मुझे कांग्रेस के डॉ मनमोहन में मज़बूत नेता की छवि दिखती है जो बोलने और दिखावे में विश्वास न करके अपने काम के जरिए विरोधियों को जवाब देते हैं. वहीं कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी को लोग भले ही तानाशाह कहते होंगें लेकिन इटली की इस महिला ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया है और उसका नतीजा आज हम सबके सामने है. युवा कांग्रेस का ज्यादा श्रेय हमें राहुल गांधी से ज्यादा प्रियंका गांधी को देना चाहिए क्योंकि लोग प्रियंका से राहुल के मुकाबले जल्दी खुद को जोड़ पाते हैं. हमें भगवान का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि आज भी देश में ऐसे नेता हैं जो सादा जीवन उच्च विचार में विश्वास रखते हैं.
कांग्रेस पार्टी ही देश को स्थिर सरकार दे सकती है. उसकी जीत पर मुबारकबाद. पर अब ज़रूरत है कि युवाओं को मौक़ा दिया जाए. राहुल गाँधी प्रधानमंत्री हों और सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य आदि कैबिनेट में आएं ताकि हमारे यहाँ की युवा पीढ़ी का लगाव राजनीति में और बढ़े.
लगता है कि संजीव भी पक्षपाती हो गए हैं शायद. जैसे कि एनडीटीवी, सीएनएनआईबीएन और टाइम्स नाउ अपने पक्षपाती विश्लेषण के लिए बदनाम हैं. इनसे ज़रा बच कर रहें वरना बीबीसी की निष्पक्षता पर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा. जहाँ तक स्तर और निष्पक्षता का सवाल है बीबीसी के सामने देश के समाचार टेलीविज़न मीडिया कहीं नहीं ठहरते. ऐसे न्यूज़ चैनलों में आपको भाग लेते देखकर निराशा हुई.
इस बार का जनादेश बिलकुल साबित करता है कि युवा और काम करने वाले ही जीत सकते हैं. इस बार के चुनाव में गुंडे और मवालियों को बाहर ही कर दिया है. कांग्रेस की सरकार अब आराम से पाँच सालों तक देश के लिए कुछ योगदान दे सकेंगी. ऐसा जनता का मानना है.
कांग्रेस की जीत देश और विकास की जीत है. इस बार भाजपा का सत्ता में न आना देश के हित में है. मैं चाहता हूँ कि कांग्रेस धीरे धीरे इस मंडी के बारे में कुछ सोचे.
संजीव जी, मैंने सारे पाठकों के विचार पढ़े और पता नहीं कि देश भर के लोगों को क्या हो गया है कि भाजपा का साथ देना चाहते हैं. चुनाव के परिणाम आ चुके हैं और कांग्रेस सत्ता में है. मैं यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि अगर लोग भाजपा को इतना समर्थन करते हैं तो वो चुनाव में क्यों नहीं जीती., हमेशा उसी पार्टी की हार होती है जिस पार्टी में कोई कमी होती है. यह बात हर कोई जानता है कि 2004 के चुनाव में अगर कांग्रेस सत्ता में न आकर भाजपा सत्ता में आती तो आज कश्मीर हमारे पास न होकर पाकिस्तान के पास होता. जिस गाँधी परिवार की लोग बुराई कर रहे हैं उसी गाँधी परिवार ने लोगों को रोटी और मकान दिये हैं. संजीव जी मेरी आपसे गुज़ारिश है कि मेरी इस बात को आप अपने शो पर दिखा कर जनता से पूछिए कि क्या यह सरकार ग़लत है?