टोक्यो ओलंपिक डायरी: इकेबाना और भारत से उसका रिश्ता

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- Author, जान्हवी मुले
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
टोक्यो बिग साइट आजकल मेरा दूसरा घर बन गया है.
पिछले कुछ दिनों से मैंने किसी और जगह की तुलना में यहां ज़्यादा वक़्त गुज़ारा है.
इस इमारत में कई हॉल हैं और उन्हीं में से एक में हम सभी बैठते हैं और अपना काम करते हैं.
इमारत के दो हिस्सों को जोड़ने वाले आंगन में एक कैफ़े, एक गिफ्ट शॉप और एक छोटा सा सुपरमार्केट है.
और इस हिस्से में जो बात मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई है कि वो है 'इकेबाना.'

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भारतीय परंपराएं और प्रतीक
जापानी लोग फूलों को एक ख़ास तरीके से सजाते हैं जिसे इकेबाना कहा जाता है.
जापान में फूलों को सजाने की इस शैली ने अब कला का रूप ले लिया है. इकेबाना आज दुनिया में जापान की पहचान बना चुकी है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस इकेबाना का भारत से क़रीबी संबंध है.
जब बौद्ध धर्म भारत से जापान पहुंचा तो ये कई भारतीय परंपराएं और प्रतीक साथ लेकर आया.
इन परंपराओं और प्रतीकों ने जापानी मुख्यधारा में शामिल होकर एक अलग रूप धारण कर लिया.

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एक प्रकार का ध्यान
मंदिरों में देवताओं की मूर्तियों को फूलों से अलंकृत करने की परंपरा भी उन्हीं में से एक है.
लेकिन जापान ने जब इस चलन को अपनाया तो ये एक तरह की कला बन गई.
कुछ लोगों को ये लगता है कि इकेबाना तैयार करने का अनुभव एक प्रकार का ध्यान करने जैसा है.
जरा सोचकर देखिए कि हम फूलों को कितनी तवज्जो से देखते हैं, जो नाजुक होते हैं, उनका एक मौसम होता है और उनकी उम्र बहुत कम होती है?
लेकिन इकेबाना सजाने वाला व्यक्ति फूलों के हर पहलू को देखता है, उसकी पत्तियों, टहनियों को ग़ौर से देखता है.

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कुदरती ख़ूबसूरती
ऐसा करने पर आप ख़ुद ही फूल के हर पहलू की कुदरती ख़ूबसूरती की कद्र करने लगते हैं.
मैंने स्कूली दिनों में इकेबाना के बारे में पढ़ा था. काफ़ी अरसे पहले एक कैंप में इसके बारे में कुछ सीखने को भी मिला था.
लेकिन मैं जानती हूं कि इकेबाना कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप चुटकी बजाकर सीख लें.
कई सालों के अभ्यास के बाद ही कोई ये कह सकता है कि वो इकेबाना का फनकार बन गया है.
लेकिन मुझे फूलों की ख़ूबसूरत लुक से ज्यादा इकेबाना की एक और अनूठी विशेषता पसंद आई. अमूमन गुलदस्ते फूलों से भरे होते हैं.
ओलंपिक की ओपनिंग सेरेमनी
लेकिन इकेबाना के साथ ऐसा नहीं है. इसमें फूल कुदरती तरीक़े से खिलते हैं.
इकेबाना में फूलों की एक निश्चित संख्या होती है और 'खाली जगह' की ख़ास अहमियत होती है.
ये ख़ालीपन ज़िंदगी में भी ख़ास दर्जा रखता है, है ना?
कई बार, जो चीज़ नहीं होती है, हमें उसकी कमी खलती है. और हमें स्थिति की गंभीरता का अहसास कराती है.
ओलंपिक की पूरी ओपनिंग सेरेमनी में ये अहसास लोगों को साल रहा था.
'ओलंपिक बब्बल'
ओपनिंग सेरेमनी में खिलाड़ी इकट्ठा तो हुए लेकिन फ़ासले के साथ, हज़ारों सीटें खाली पड़ी हुई थीं.
सब कुछ सपने जैसा लग रहा था लेकिन वो एक हक़ीक़त थी. 'ओलंपिक बब्बल' के भीतर की दुनिया ऐसी ही है.
जैसे-जैसे कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं, लोगों को इस 'ओलंपिक बब्बल' के टूट जाने का डर सता रहा है.
ओलंपिक की ओपनिंग सेरेमनी के समय नेशनल स्टेडियम के बाहर लोग विरोध प्रदर्शन भी कर रहे थे.
यहाँ के माहौल में डर का मिलाजुला अहसास है, किसी को ये नहीं मालूम कि कल क्या होने वाला है.
लेकिन एक उम्मीद भी है कि आख़िर में सब कुछ ठीक हो जाएगा.
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