टोक्यो ओलंपिक में ये घोड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करेगी

टोक्यो ओलंपिक

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    • Author, जान्हवी मुले
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ओलंपिक में भाग लेने वाले भारतीय प्रतिभागियों के बारे में कोई सोचेगा तो उसके मन में खिलाड़ियों, कोच, खेल पदाधिकारियों की तस्वीर उभरेगी. लेकिन क्या आपको मालूम है कि इस बार एक घोड़ी भी टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है?

उसका नाम दयारा-4 है और वह भारत के घुड़सवारी खिलाड़ी फ़वाद मिर्ज़ा के साथ ओलंपिक में प्रतिस्पर्धा करेगी. साल 2011 में पैदा हुई दयारा जर्मन बे होलस्टायनर नस्ल की घोड़ी है. इसका रंग भूरा है. अब तक इसने 23 टूर्नामेंट खेले हैं और उनमें से पांच जीते हैं.

फ़वाद को प्रायोजित करने वाले ऐंबैसी ग्रुप ने साल 2019 में दयारा को ख़रीदा था. इसके लिए उन्हें 2,75,000 यूरो (क़रीब दो करोड़ 43 लाख रुपये) की रक़म चुकानी पड़ी थी. ऐंबैसी ग्रुप ने फ़वाद के लिए तीन और घोड़े ख़रीदे थे.

इनमें से दयारा-4 और सेन्यूर मेडिकोट ने ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई किया. दोनों घोड़ों के मौजूदा प्रदर्शन को देखते हुए फ़वाद ने टोक्यो ओलंपिक में दयारा के साथ खेलने का फैसला किया है.

उनका कहना है, "दयारा अभी शानदार फॉर्म में है और वह विश्व स्तर पर प्रदर्शन के दबाव को झेल सकती है."

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घुड़सवारी अन्य खेलों से अलग खेल है. यहां खिलाड़ियों का यानी घुड़सवारों का अपने घोड़े के साथ रिश्ता काफी अहम होता है. इस तरह के संबंध बनाने के लिए घुड़सवार कुछ साल घोड़े के साथ बिताते हैं, उसके साथ प्रशिक्षण लेते हैं, और यहां तक ​​कि उसकी देखभाल भी करते हैं.

फ़वाद कहते हैं, "यदि आप घोड़ों के साथ सालों काम करते हैं, तो आप उनके साथ भरोसे का रिश्ता बना सकते हैं. चाहे वह अस्तबल में घोड़ों को खिलाना हो या उनकी देखभाल करना हो, इसमें बिताए गए घंटे घोड़ों के साथ संबंध को मजबूत करने में मदद करते हैं."

उन्होंने दयारा के साथ भी ऐसा ही रिश्ता बनाया है.

घोड़ों के लिए भी क्वारंटीन

बेंगलुरु में जन्मे और वहीं पले-बढ़े फ़वाद 29 साल के हैं. इन दिनों वे उत्तर-पश्चिमी जर्मनी के एक गांव में अभ्यास कर रहे हैं. वे लगभग बारह घंटे रोज़ाना घोड़ों के साथ बिताते हैं और उन्हें प्रशिक्षित करते हैं. फ़वाद और दयारा जल्द ही टोक्यो ओलंपिक के लिए रवाना होंगे.

दूसरे एथलीटों और अधिकारियों की तरह घोड़ों को भी कोविड प्रोटोकॉल के तहत क्वारंटीन में वक़्त गुजारना होगा. इसलिए फ़वाद और दयारा टोक्यो पहुंचने से पहले और बाद में सात दिन तक आइसोलेशन में रहेंगे.

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दयारा की देखभाल के लिए फ़वाद के साथ एक विशेष टीम भी है. इस टीम में घोड़े की देखभाल करने वालीं योहाना पोहोनेन, वेटनरी डॉक्टर ग्रिगोरियो मेलीज और फ़िजियोथेरेपिस्ट व्हेरोनिका सिंज़ शामिल हैं.

फ़वाद का मानना ​​है कि दयारा ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन करेगी. साल 2020 में दयारा केवल पाँच प्रतिस्पर्धाओं में ही भाग ले पाई क्योंकि कोरोना महामारी के कारण कई प्रतिस्पर्धाएं नहीं हो पाईं.

लेकिन इस बार वो अच्छी फॉर्म में है. इटली में आयोजित प्रतिस्पर्धा में वो पांचवें स्थान पर रही. इसके बाद वो पोलैंड के बाबोरोव्को में आयोजित प्रतिस्पर्धा में तीसरे और पोलैंड के स्टर्ज़ेगोम में आयोजित एफईआई नेशंस कप में दूसरे स्थान पर रही.

20 बरस का इंतज़ार

दो दशकों में पहली बार ओलंपिक में कोई घुड़सवार भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा है. फ़वाद से पहले दिवंगत विंग कमांडर आईजे लांबा और इम्तियाज़ अनीस ही ऐसे भारतीय हैं जिन्होंने ओलंपिक में घुड़सवारी में भारत का प्रतिनिधित्व किया है.

विंग कमांडर आईजे लांबा ने साल 1996 के अटलांटा ओलंपिक में घुड़सवारी स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया था. साल 2000 के सिडनी ओलंपिक में इम्तियाज़ अनीस को वाइल्ड कार्ड एंट्री मिली थी.

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फ़वाद ने पिछले साल ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई किया था, लेकिन ये उनके लिए पहली बड़ी खेल प्रतिस्पर्धा नहीं है. फ़वाद साल 2018 में जकार्ता (इंडोनेशिया) एशियाई खेलों में दो श्रेणियों व्यक्तिगत स्पर्धा और टीम स्पर्धा में रजत पदक जीत चुके हैं.

इसी उपलब्धि के लिए उन्हें 2019 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. फ़वाद टोक्यो ओलंपिक में व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे.

पिछले साल उन्होंने दक्षिण और पूर्वी एशिया-ओशिनिया समूह विश्व रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल किया और ओलंपिक टिकट हासिल किया. फ़वाद के पिता पशु चिकित्सक हैं और बचपन से ही घुड़सवारी का शौक रखते हैं.

क्या दयारा भारत में घुड़सवारी को बढ़ावा देगी?

घोड़ों का भारत के इतिहास और संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रहा है. चाहे शिवाजी महाराज का मोती हो या कृष्ण, महाराणा प्रताप का चेतक या झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का बादल. भारत की कहानियों में घोड़ों का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है.

माना जाता है कि दक्कनी नस्ल के भीमथडी घोड़ों ने सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.

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महाराष्ट्र के सारंगखेड़ा में आज भी घोड़ों का बड़ा बाज़ार है जहां करोड़ों का कारोबार होता है. इसके बावजूद भारत में घुड़सवारी एक खेल के रूप में बहुत लोकप्रिय नहीं है.

ऐंबैसी ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जीतू वीरवानी कहते हैं, "इसका मुख्य कारण यह है कि ये खेल बेहद महंगा है और इसमें काफी निवेश की जरूरत होती है."

वे आगे कहते हैं, "घोड़े खरीदने में काफी बाधाएं आती हैं. एशियाई खेलों में टीम भेजने के लिए हमें काफी संघर्ष करना पड़ा. लेकिन अब हमें उम्मीद है कि स्थिति बदलेगी.''

भारत में घुड़सवारी के खेल को बहुत शोहरत हासिल नहीं है लेकिन जानकारों का मानना है कि फ़वाद और दयारा इसे बदल सकते हैं. फ़वाद भी इससे सहमत हैं कि दयारा को देख लोगों की इन खेलों के प्रति रुचि बढ़ेगी.

वह कहते हैं, "हम पहले से ही इतिहास बनाने की राह पर हैं और दयारा इस यात्रा में मदद करेगी. वह बहुत अच्छी, बहुत खूबसूरत घोड़ी है. मुझे उम्मीद है कि वह लोगों का ध्यान इस खेल की ओर खींचेगी और युवा पीढ़ी को प्रेरित करेगी."

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