टोक्यो डायरी: भारत से ओलंपिक शहर तक बीबीसी टीम का सफ़र

अरविंद छाबड़ा और जान्हवी मुले
    • Author, अरविंद छाबड़ा और जान्हवी मुले
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, टोक्यो (जापान) से

टोक्यो ओलंपिक कवर करने का मौका आया तो हमारे दिमाग़ में एक बार भी ऐसा ख्याल नहीं आया कि भारत और जापान सहित पूरे विश्व में कोविड फैला है और वहां जाने में कहीं कोई ख़तरा तो नहीं.

यह हमारे लिए एक सपने से कम नहीं है. यह ओलिंपिक ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार ऐसी भयानक महामारी के साए में दुनिया के सबसे बड़े खेलों का आयोजन किया जा रहा है.

लेकिन हमें यह नहीं मालूम था कि यहां पहुँचने तक इतनी चुनौतियाँ, इतनी कठिनायाँ पेश आने वाली हैं. कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा था जैसा शायद उन एथलीटों को होता होगा जो ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई करने के लिए कड़े परिश्रम और प्रक्रिया से गुजरते हैं!

वीडियो कैप्शन, टोक्यो ओलंपिकः खेलों का महाकुंभ देखिए बीबीसी के साथ

वैसे भी इस पर कयास लगाए जा रहे थे कि हर चार साल बाद होने वाले ओलंपिक खेल इस बार होंगे भी या नहीं. ऐसी ख़बरें लगातार आती रहती थीं कि जापान में ही बहुत सारे लोग इसके आयोजन किए जाने के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि उनका मानना था कि इससे देशों विदेशों से लोग आएंगे और भीड़ जुटेगी जिससे महामारी फैलने का ख़तरा है. साल 2020 में ओलंपिक को एक साल के लिए टाला गया था.

टोक्यो

लगातार सात दिन कोविड टेस्ट

फिर 'प्लेबुक' जारी हुई जिसमें सारे नियम कायदे दिए गए थे. यह काफ़ी नहीं था कि भारत से जाने वाले लोग उन देशों में शामिल थे जिन्हें अपनी फ़्लाइट से पहले लगातार सात दिन हर रोज़ कोविड का आरटीपीसीआर टेस्ट कराना है.

मुंबई बड़ा शहर है तो वहां मुश्किल नहीं हुई लेकिन जापान द्वारा जारी की गई सेंटरों की लिस्ट से पता चला कि सारे पंजाब और चंडीगढ़ में किसी लैब के टेस्ट को मान्यता नहीं थी. तो क्या सिर्फ़ टेस्ट कराने के लिए दिल्ली या गुड़गाँव में आठ दिन जा कर रहना पढ़ेगा? और वो भी क्वारंटीन में?

कई दिन की कवायद के बाद एक सेंटर वाले मान गए कि वो चंडीगढ़ के किसी प्रतिष्ठित लैब से सैंपल लेंगे जो दिल्ली भेजा जाएगा. लेकिन आख़िरी दो दिन दिल्ली आना ही पड़ा जब सेंटर वालों ने कहा कि दिल्ली में टेस्ट कराने पर ही आख़िरी टेस्ट का सर्टिफिकेट समय पर आएगा.

कागज़ एकत्रित करना भी एक संघर्ष से कम नहीं था. पढ़ाई के दिनों की याद दिला दी जब नोटस का एक 'थब्बा' बन जाया करता था. हर रोज़ अपने बारे में 'डिटेल' एक ऐप पर डाउनलोड करनी कि क्या आपको बुख़ार है या नहीं, टैंपरेचर कितना है और फिर इन सब चीज़ों के प्रिंट रखना. सारे कोविड टेस्ट की रिपोर्ट रखनी और हर टेस्ट का सर्टिफ़िकेट रखना.

जान्हवी मुले

और जब रद्द हुई फ्लाइट

खैर इन सबसे जूझते हुए धीरे धीरे 13 जुलाई की फ्लाइट की तारीख़ नज़दीक आ रही थी. लेकिन उससे दो ही दिन पहले उस समय बड़ा झटका लगा जब एक मेल 'इनबाक्स' में आ कर गिरी कि फ्लाइट रद्द हो गई है. उस समय ऐसा लगा कि टोक्यो औलिंपिक जाने का सपना टूट चूर-चूर हो गया है.

समय कम बचा था और कोविड के चलते फ्लाइट्स बहुत कम जा रही थी. अगले कुछ घंटे में जहां सूझा उसे फोन कर दिया कि शायद कुछ हो जाए. लेकिन रात होने से पहले ही आशा की नई किरण जागी और एक दूसरी फ्लाइट मिल गई. और वो भी पिछली फ्लाइट के चंद ही घंटों का बाद की.

फिर क्या था? तैयारी की और 13 जुलाई को हम दोनों मुंबई और चंडीगढ़ से अपने अपने घर से दिल्ली के लिए रवाना हो गए. आख़िरकार, हम दोनों जब दिल्ली हवाई अड्‍डे पर एक दूसरे से मिले, तो लगा जैसे काफी संघर्ष करने के बाद किसी बड़े टूर्नामेंट के सेमीफ़ाइनल में पहुंच गए हों.

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फ़्लाइट में लगभग आठ घंटे बिताने के बाद जापान पहुंचे. लेकिन आगे क्या होने वाला है इसका अंदाजा जहाज से उतरने से पहले ही हो गया जब यह अनाउंस किया गया कि सारे यात्री जहाज से उतर सकते हैं सिवाए उनके जो ओलंपिक के लिए यहाँ आए हैं.

जी नहीं, कोई वीआईपी ट्रीटमैंट नहीं मिलने वाला था. जहाज से बाहर ही कुछ लोगों ने जापानी स्टाइल में हमारा अभिनंदन किया और हमें अपने साथ आने को कहा.

अरविंद छाबड़ा और जान्हवी मुले

ओछा ऐप

हवाई अड्डे पर ओलंपिक के लिए आने वाले हर व्यक्ति के लिए अलग कारीडोर था. बड़े ही नम्रतापूर्ण तरीके से हमारे कागज़ देखे गए. लेकिन समस्या यह थी कि जो ऐप वो हमारे मोबाईल फोन में देखना चाहते थे वो हमारे पास था पर चालू नहीं था. जैसे भारत में कोविड के लिए मोबाईल फोन पर अरोग्य ऐप होना ज़रूरी है वैसे ही जापान में 'ओछा' ऐप होना लाज़मी है. हमने इसे अपने अपने फोन में डाउनलोड तो किया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद अपने आप को इसमें रजिस्टर नहीं कर पाए थे. पर नियम तो नियम है.

हमें इमीग्रेशन काउंटर से पहले ही रोक दिया गया. फिर भी जापानी अधिकारी और वॉलिंटियर हमसे बहुत अदब और सहनशीलता से पेश आ रहे थे. पर समस्या उस समय और बढ़ गई जब उन्होंने यह पाया कि जिस फ्लाइट से हम आने वाले थे वो तो फ्लाइट आई ही नहीं. तो एक अधिकारी ने पूछा कि जब फ्लाइट ही नहीं आई तो आप कैसे आ गए?

हमारे बीच भाषा की समस्या अलग थी. उनमें से ज्यादातर लोग तो जापानी भाषा बोलते थे पर कई अंग्रेज़ी भी बोल रहे थे. फिर भी हमारे बीच संवाद इतना साफ़ नहीं हो पा रहा था. उन्हें समझाया कि कैसे हमें अचानक से एक दूसरी फ्लाइट से आना पड़ा.

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कड़े नियम

कई काउंटरों से गुज़रना था. सब ओछा ऐप चाहते थे जो हमारे पास नहीं था. लेकिन तारीफ़ करना होगी उनके वॉलंटियरों की जो हमारी मुश्किल और मज़बूरी समझ ही जाते थे. एयरपोर्ट पर एक और कोविड टेस्ट हुआ और 'नेगेटिव' आने पर ही हवाई अड्डे से बाहर आने की इजाज़त मिली.

नींद ना होने की वजह से थकान महसूस हो रही थी. चलना भी इतना पड़ रहा था. लेकिन टोक्यो की पहली झलक ने सारी थकान मानों दूर कर दी.

होटल पहुँचते ही हमें कहा गया कि अगले तीन दिन हमें अपने कमरे में ही बिताने हैं. बस, खाना लाने के लिए नीचे लॉबी तक जा सकते हैं.

इसके अलावा हमे अगले तीन दिन तक सिर्फ़ कोविड टेस्ट के लिए बाहर जाने की अनुमति मिली. यानी बाहर जा पाएँगे पर सिर्फ़ कोविड टेस्ट के लिए और फिर वापस कमरे में!

नियम इतने कड़े हैं कि मैं और जान्हवी एक ही होटल में एक ही फ़्लोर पर होते हुए भी एक दूसरे से मिल नहीं सकते.

यहाँ कुछ वालंटियर और सुरक्षा गार्ड हैं जो हमारी मदद भी करते हैं और साथ ही यह देखते हैं कि कोई नियम न तोड़े. अब तीन दिन का क्वारंटीन खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि हम कहीं भी जा सकते हैं. कुछ पाबंदियां अभी भी हैं.

लेकिन इसके बावजूद हमें कुछ जगहों पर जाने की इजाज़त है जहाँ से हम लगातार आपके लिए ओलंपक्सि से जुडी दिलचस्प खबरें लाते रहेंगे.

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