दुनियाभर में त्योहारों पर घर की सफ़ाई कैसे बढ़ाती है महिलाओं की मुसीबत

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- Author, अशोक पाण्डे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
दुनिया भर में घरों की लंबी-चौड़ी सालाना सफ़ाई किए जाने की पुरातन परंपरा रही है, जिसकी जड़ें धर्म और संस्कृति में खोजी जा सकती हैं.
कुछ सभ्यताओं में तो इसे लेकर बाकायदा त्योहार तक मनाए जाते हैं. ठंडी आबोहवा वाले यूरोप और अमेरिका में यह सफ़ाई वसंत के आगमन पर की जाती है.
बिजली के आविष्कार से पहले घरों में रोशनी करने के लिए जो दीए जलाए जाते थे, उनमें मिट्टी के तेल के अलावा ह्वेल मछली का तेल जैसी चीज़ों का इस्तेमाल होता था, जबकि घरों को गर्म रखने के लिए लकड़ी या कोयले का.
सर्दियों के महीनों में हफ़्तों तक सूरज के दर्शन नहीं होते थे और इनकी औसत से ज़्यादा ख़पत होती थी, जिसके नतीजे में घर का एक-एक कमरा धुएं और कालिख की परत से ढँक जाया करता था.
यही हाल कमरों में रखी चीज़ों का भी होता था. वसंत के आते ही घर की औरतें तमाम खिड़की-दरवाज़े खोल कर धूप का स्वागत करतीं, जिसकी स्फूर्तिदायक गर्मी में कई दिन तक बिस्तर-गलीचे वगैरह सुखाए जाते.
श्रमसाध्य कार्य
चीज़ों की धूल झाड़ी जाती और घर का कोना-कोना झाड़ू-पोछे की मदद से चमकाया जाता. यह काम बेहद श्रमसाध्य हुआ करता था, जिसका बड़ा हिस्सा घर की महिलाओं को निबटाना होता था.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ डेलावेयर में इतिहास पढ़ाने वाली प्रोफ़ेसर सूजन स्ट्रासर की किताब 'नेवर डन: अ हिस्ट्री ऑफ़ अमेरिकन हाउसवर्क' में बताया गया है कि वसंत में होने वाली इस सफ़ाई में घर को पूरी तरह ख़ाली किया जाना होता था.
कई बार तो घर के पुरुष सदस्यों को भी बाहर खदेड़ दिया जाता था, क्योंकि ऐसा काम करने के लिए न उनके पास वांछित कौशल होता था न सलीका. सहायता करने के स्थान पर उनकी उपस्थिति बने-बनाए कामों में अड़ंगा लगाने वाली गिनी जाती थी.
सफ़ाई का यह काम महिलाओं के लिए कितना मुश्किल होता होगा, इसकी एक बानगी एक घरेलू महिला द्वारा अपनी डायरी में 1864 में की गई एक प्रविष्टि में मिलती है. यह डायरी 20 साल पहले एक प्रदर्शनी में दिखाई गई थी.
वे लिखती हैं, "मैंने बैठक और रसोई की सफ़ाई कुल 350 दफ़ा की. दीयों में कुल 362 दफ़ा तेल भरा और भीतर के कमरों के फ़र्श और सीढ़ियों पर 40 बार झाड़ू-पोछा किया."
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बाइबिल के समय
यहूदी-ईसाई परंपरा में बाइबिल के समय से ही एक अलग तरह की परंपरा चली आ रही है.
धर्मग्रंथों में लिखा गया है कि जब यहूदियों को बहुत जल्दबाज़ी में मिस्र से भागना पड़ा था, उनके पास इतना समय तक न था कि वे डबलरोटी में खमीर उठने तक की प्रतीक्षा कर पाते. इस अधबनी और चपटी रोटी से चूरा बहुत निकलता था.
वसंत में मनाए जाने वाले यहूदी त्योहार पासओवर में घर की सफ़ाई किए जाने का धार्मिक प्रावधान बनाया गया है. यह सफ़ाई इस तरह की जानी होती थी कि घर के भीतर रोटी का ज़रा भी चूरा न बचे. एक छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं.
ज़ाहिर है ऐसा करने के लिए घर के चप्पे-चप्पे की ख़ूब सफ़ाई करनी होती होगी. क़रीब-क़रीब ऐसी ही परंपरा पारसियों के नवरोज़ से जुड़ी हुई है.
जापान और थाईलैंड के अलावा अनेक दक्षिण एशियाई देशों में भी वसंत के समय ऐसे सफ़ाई अनुष्ठान किए जाते हैं.
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दशहरे और दिवाली के बीच सफ़ाई
हमारे देश के अधिकतर हिस्सों में यह काम दशहरे और दिवाली के बीच किए जाने की परंपरा रही है.
बरसात के चार महीनों के दौरान घरों की चीज़ों पर धूल के अलावा नमी की मोटी परतें चढ़ जाती हैं, जिन्हें हटाने के लिए वांछित धूप और रोशनी शरद के आगमन पर ही मिल पाती है.
सफ़ाई के इन महोत्सवों के दौरान घर में इकठ्ठा हो गई ग़ैरज़रूरी चीज़ों से भी अमूमन छुटकारा पाया जाता है.
यह अलग बात है कि इस दौरान ख़ास तौर पर हमारे यहाँ ऐसी चीज़ों को लेकर एक ख़ास तरह का मोह दिखाई देता है, जो बताता है कि हमारे देश के लोग मूलतः एक डिब्बाप्रेमी प्रजाति हैं.
सफ़ाई का काम शुरू हुआ नहीं कि गोपन-अगोपन अलमारियों, दराज़ों, दुछत्तियों और खाने-तहखानों से डिब्बों का निकलना शुरू होता है और देखते-देखते उनकी संख्या तीन-चार अंकों को छूने लगती है.
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सफ़ाई
मेरे ही घर में लकड़ी के मंदिर की दराज़ के भीतर से निकले ज़ंग लगे, लोहे के नन्हे से डिब्बे के भीतर से 25 साल पुराना सिन्दूर निकलता है, जिसे हमारी बुआ हरिद्वार से लेकर आई थीं.
इसी दराज़ से अब दिवंगत हो चुके रज्जू मामा की जम्मू-श्रीनगर से लाई गई कश्मीरी पेपरमैशी से बनी एक डिबिया भी निकलती है, जिसके रंग धुंधले पड़ चुके हैं और उसके ऊपर महीन ब्रश से बनाए गए चित्र को देखकर यह तो समझ में आता है कि वह किसी चौपाये की तस्वीर है, लेकिन यह नहीं कि वह बिल्ली-कुत्ता है या ऊँट-डायनासोर.
उसके भीतर अलबत्ता कभी कुछ नहीं रखा गया. गंगाजल से भरे हुए कोई सौ अलग-अलग प्रकार के डिब्बों-बाल्टियों-बोतलों के लिए मंदिर के कमरे में एक बड़े रैक के दो खाने आरक्षित हैं.
एक डिब्बे में पिछली शताब्दी में तैयार किया गया लाल मिर्च का काला पड़ गया अचार पाया जाता है और गत्ते के एक दूसरे बड़े डिब्बे के भीतर पिछली 15 दिवालियों में ख़रीदे गए गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों के तमाम जोड़े धरे मिलते हैं.
उन्हें इस साल भी ख़रीदा जाना है. कुछ डिब्बों के भीतर से ऐसी गंध निकल रही है, जिन्हें मानव सभ्यता के इतिहास में पहली बार सूंघा जा रहा होता है. संसार की किसी भी भाषा में अभी उनके लिए शब्द गढ़ा जाना बाक़ी है.
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'सूंघ कर पहचानना मुश्किल'
दुनिया का कोई ऐसा मसाला न होगा, जो रसोई की एक अलमारी में न पाया जा सके.
आयु के साथ परिपक्व हो चले इन अनुभवी मसालों को एक ही शेल्फ में धरे-धरे इतना समय हो चुका है कि वे एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचानने लगे हैं.
उनमें आपस में ऐसी मोहब्बत हो गई है कि 'प्रेम की माला जपते-जपते आप बनी मैं श्याम' की तर्ज़ पर वे सारे के सारे एक जैसे हो गए हैं.
उनकी रंगत देख कर या उन्हें सूंघ कर पहचानना मुश्किल हो जाता है कि मामी का बनाया गरम मसाला कौन-सा है और पीसा नमक कौन सा.
एक डिब्बे के भीतर रखे मसाले ने विद्रोह कर दिया है और अपने ऊपर फफूंद लगा ली है. वह इस जीवन से मुक्ति पाकर परमात्मा में विलीन हो जाना चाहता है.
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40 साल पुराना, विविध आकारों वाले चार डिब्बों का एक सेट है. लाल ढक्कन वाले ये मज़बूत डिब्बे एक के भीतर एक समा जाते हैं.
लखनऊ में रहने वाला एक चचेरा भाई इसे बतौर उपहार तब लाया था, जब उसकी पहली नौकरी लगी थी.
वह ऐसे अनेकानेक सेट अनेकानेक अवसरों पर लाता रहा है और उनके प्लास्टिक, ढक्कनों के रंगों और डिज़ाइन भर देख कर ही इस कज़िन के जीवन का पूरा इतिहास लिखा जा सकता है.
घर पर डालडा के पीले प्लास्टिक और टीन के कोई 20 डिब्बे हैं - एक से पाँच किलो तक के. रथ वनस्पति के भी इतनी ही संख्या में होंगे. उनका रंग नीला है. इन पर छपी तारीखें पेरेस्त्रोइका, ग्लासनोस्त और लाल निशान वाली खोपड़ी के स्वामी मिखाइल गोर्बाचेव के युग की याद दिला जाती हैं.
सरसों-लाही के तेल के ढक्कन लगे कनस्तर हैं, जो दुछत्ती के एक कोने में स्थापित उस विशाल पेटी के भीतर से उरियां होना शुरू करते हैं जिसमें तीन साल पहले ख़रीदा गया बड़ा फ़्रिज पैक होकर आया था.
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एलुमीनियम, लोहे, पीतल, प्लास्टिक, गत्ते, प्लाई, तांबे, लकड़ी, स्टील, लुगदी और अनेक तत्वों से निर्मित इन कोई एक लाख डिब्बों को साफ़ किया जाना है, उनके भीतर सतत कायान्तरण कर रहे भौतिक-रासायनिक तत्वों को चीन्हा जाना है, वैज्ञानिक तरीक़े से उनका वर्गीकरण होना है और मुझ जैसी नालायक संततियों की निगाह पड़ने से पहले ही उन्हें पिछली बार से भी अधिक गोपनीय ठिकानों पर ठिकाने लगा दिया जाना है.
दुनिया के बाक़ी देशों-समाजों के बारे में मुझे ज़्यादा मालूम नहीं, लेकिन अगर यह देखना हो कि ख़ाली डिब्बों और पुरानी चीज़ों से हमारा मोह किस क़दर पुराना और मज़बूत है तो दिवाली के इस मौसम में एक बार किसी ऐसे घर का फेरा मार आइए,जहाँ सालाना सफ़ाई का यह पवित्र अनुष्ठान चल रहा हो.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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