दिल्ली प्रदूषणः राजधानी में हवा की ऐसी हालत क्यों है?

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- Author, रिएलिटी चेक टीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
दिल्ली में एक बार फिर से प्रदूषण का स्तर बढ़ गया है और सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती के बाद सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कई क़दम उठाए हैं.
21 नवंबर तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्कूलों को बंद कर दिया गया है और निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गई है. सरकारी दफ़्तरों में कर्मचारियों को घरों से काम करने के लिए कहा गया है.
दिल्ली में ठंड के महीनों में अक्सर प्रदूषण की समस्या बढ़ जाती है. इसके लिए किसानों के पराली जलाने, हवा की गति का कम होना, गाड़ियों के धुएँ से लेकर दिवाली में आतिशबाज़ी जैसे कारणों को ज़िम्मेदार बताया जाता रहा है.
तो प्रदूषण के लिए कितने ज़िम्मेदार होते है ये कारण?
दिल्ली की हवा कितनी ख़राब
दिल्ली में इन दिनों पीएम 2.5 की सघनता का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों से बहुत ऊपर हैं.
पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल वो सूक्ष्म संघटक है जिसे मानव शरीर के लिए सबसे ख़तरनाक माना जाता है.
पर्यावरण संबंधी मसलों पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस के मुताबिक कोरोना लॉकडाउन के बावजूद साल 2020 में दिल्ली में 57 हज़ार लोगों की वायु प्रदूषण के कारण अकाल मृत्यु हो गई.
साल 2020 की विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 30 सबसे ज़्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं जहां पीएम 2.5 की सालाना सघनता सबसे ज़्यादा है.

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पीएम 2.5 क्या होता है?
- पीएम यानी पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण की एक किस्म है. इसके कण बेहद सूक्ष्म होते हैं जो हवा में बहते हैं.
- पीएम 2.5 या पीएम 10 हवा में कण के साइज़ को बताता है.
- आमतौर पर हमारे शरीर के बाल पीएम 50 के साइज़ के होते हैं. इससे आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पीएम 2.5 कितने बारीक कण होते होंगे.
- 24 घंटे में हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए.
- इससे ज़्यादा होने पर स्थिति ख़तरनाक मानी जाती है. इन दिनों दोनों कणों की मात्रा हवा में कई गुना ज़्यादा है.
- हवा में मौजूद यही कण हवा के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर ख़ून में घुल जाते है. इससे शरीर में कई तरह की बीमारी जैसे अस्थमा और साँसों की दिक्क़त हो सकती है.

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प्रदूषण के कारण
साल के इन दिनों में दिल्ली समेत उत्तरी भारत के कई बड़े शहरों में वायु प्रदूषण बढ़ता है और ऐसा दिवाली के पटाख़ों के साथ-साथ कई अन्य कारणों से भी होता है.
इनमें शामिल हैं:
- पंजाब और हरियाणा के किसानों का पराली जलाना
- बड़े और भारी वाहनों से होने वाला उत्सर्जन
- दिल्ली एनसीआर में चल रहा भारी निर्माण कार्य
- और मौसम में बदलाव जो वायु में प्रदूषण के कणों को फंसा लेता है

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दिवाली ने हवा को कितना प्रभावित किया?
कई राज्यों ने दिवाली पर पटाख़ों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है लेकिन राज्यों में इसका ठीक से पालन नहीं हुआ है.
साल 2018 का अध्ययन बताता है कि दिवाली के पटाख़ों का वायु की गुणवत्ता पर 'कम लेकिन महत्वपूर्ण' प्रभाव पड़ता है.
इस अध्ययन में दिल्ली की पांच जगहों पर फोकस किया गया है और 2013 से 2016 के बीच का आंकड़ों का अध्ययन किया गया है.
दिवाली हर साल अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में आती है.
इसमें अलग-अलग तारीखें मायने रखती हैं क्योंकि इससे अध्ययन करने वाले पराली के प्रभाव का भी पता लगा पाते हैं जो साल के इस दौरान जलाई जाती है.
इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों में से एक धनंजय घई ने बीबीसी को बताया, "पराली जलाने की घटनाओं को स्थापित करने के लिए हमने नासा से सैटेलाइट तस्वीरें लीं और उनका इस्तेमाल किया."
चार में से दो सालों में पराली जलाने का सीधा संबंध दिवाली से नहीं रहा है.
वे यह भी बताते हैं कि एक स्थान पर औद्योगिक गतिविधि छुट्टियों के कारण बंद हो गई और उनके अध्ययन में ये भी मौसम को प्रभावित करने वाला एक कारण बना.
शोधकर्ताओं ने पाया कि दिवाली के अगले दिन हर साल पीएम 2.5 की मात्रा क़रीब 40 फ़ीसदी तक बढ़ी.
जब इस आंकड़े को घंटों के आधार पर देखा गया तो शोधकर्ताओं ने पाया कि दिवाली के दिन शाम 6 बजे से अगले पाँच घंटे बाद तक (यानी क़रीब 11 बजे तक) पीएम 2.5 में 100 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.
दिल्ली के प्रदूषण को मापने वाले प्राधिकरण ने भी पाया है कि साल 2016 और 2017 में दिवाली के बाद प्रदूषण तेज़ी से बढ़ा.

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अन्य कारण
ये भी पाया गया है कि सभी पटाख़े अधिक मात्रा में पीएम 2.5 नहीं छोड़ते. बड़े पटाखों में ही पीएम 2.5 की सघनता ज़्यादा होती है.
दिवाली के दौरान लोग तोहफ़े बांटने के लिए निकलते हैं और इस कारण से लगने वाला ट्रैफ़िक जाम भी प्रदूषण बढ़ने का एक बड़ा कारण माना जाता है.
क्या दिवाली के दौरान गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण शहर में वायु प्रदूषण बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है?
इस सवाल पर शोधकर्ता कहते हैं कि आगामी शोध में उन्हें इस तथ्य पर भी ग़ौर करना होगा.
जमशेदपुर में हुई एक रिसर्च में भी पाया गया कि दिवाली के दौरान शहर की हवा में कुछ संघटक तेज़ी से बढ़े हैं जो इस प्रकार हैं-
- पीएम 10
- सल्फ़र डाइऑक्साइड
- नाइट्रोजन डाइऑक्साइड
- ओज़ोन
- आयरन
- मैगनीज़
- बैरीलियम
- निकेल
भारत का केंद्रीय पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड भी मानता है कि पटाख़ों से 15 ऐसे तत्व निकलते हैं जिन्हें मानव शरीर के लिए ख़तरनाक और ज़हरीला माना जाता है.
लेकिन ये भी मानना होगा कि इनमें बहुत सारे तत्व गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण में भी पाये जाते हैं.
हालांकि, पटाख़ों के इस्तेमाल को रोकने के कुछ कारण मौजूद हैं. ये पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की प्रदूषण की समस्या में और योगदान करते हैं.
यह स्टोरी नंवबर 2018 में पहली बार प्रकाशित हुई थी जिसे हाल के अध्ययनों और प्रदूषण के आंकड़ों को दर्शाने के लिए दोबारा अपडेट किया गया है.
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