पुरस्कार वापस करने के मायने

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- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
लौटाना अपने आप में एक शब्द है, क्रियापद है लेकिन इस्तेमाल में उसे अकसर ग़लत समझा जाता रहा है.
वह दो शब्दों- ‘लौट’ और ‘आना’ की संधि से बना है, जिसका अर्थ मूलतः लौटना था. यानी कि अपनी ओर वापसी.
यह एक क्रिया है जो सुधर जाने, ग़लती स्वीकार कर लेने और भटकाव छोड़कर सही जगह वापसी की तरफ़ इशारा करती है.
यह क्रिया जितनी बाहरी है, उससे ज़्यादा आतंरिक है. इसका मूल मतलब आना है, जाना नहीं.
शब्दों की रूढ़ होती दुनिया में इसका अर्थ ‘वापस करना’ हो गया, जैसे कोई र्ज़ लौटाए. यह उसका न तो अर्थ था, न भाव.
अलग-अलग पदों को जोड़ने से उसका भाव बदल जाए, यह समाज ही कर सकता है.
उसके हस्तक्षेप ने ‘अपनी ओर लौटने’ और ‘ख़ुद को सुधारने’ को ‘किसी को देने’ में बदल दिया.
मुहावरे

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लौटाना या लौटाया में दोनों क्रियापद ‘आना’ और ‘आया’ वापसी की ओर संकेत करते हैं. उनका अर्थ किसी तरह यह नहीं लगाया जा सकता कि लौटाना किसी को कुछ देना है.
लौट लौट आना एक तरह से लौट आना का विस्तार है. शब्द समूह के रूप में, कहावत की तरह बार-बार आने की ओर इशारा करता है.
जाना या देना उसमें निहित नहीं है. ख़ुद से दूर जाना या किसी वस्तु को स्वयं से अलग करना तो बिल्कुल नहीं.
प्रचलित मुहावरों में भी लौटाना या लौटाया इसी अर्थ में आता है. मसलन, ‘सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते.’
मतलब यह कि चूक हुई थी पर जल्दी ही सुधार ली गई. इतनी देर नहीं हुई कि सुधरने की संभावना ख़त्म हो जाए.
एक लिहाज़ से यह उस मुहावरे पर भारी पड़ता है जो ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ के सहारे मान बैठता है कि देरी की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है. कभी भी लौट आना, दुरुस्त आना होगा.
पहले मुहावरे में यह मोहलत सिर्फ़ बारह घंटे की है.
लौटाना और 'लौट आना'

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एक और मुहावरा ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ भी यही कहता है. हालांकि उसमें तात्कालिक विफलता, कुछ न कर पाने का दबाव और दीगर बाहरी कारण देखे-गिने जा सकते हैं.
लेकिन अंततः वह भी अपनी ओर लौटना ही है, देना या जाना नहीं.
लौटाना और लौट आना पदों को साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने के संदर्भ में देखा जाए तो शायद बात कुछ और स्पष्ट हो.
अपने प्रचलित अर्थ की वजह से ऐसा ज़रूर लगता है कि कई लेखकों, कलाकारों ने अकादेमी द्वारा दिया गया सम्मान लौटाया है. तमगे, प्रशस्ति पत्र और धनराशि सहित. ख़बरों से भी यही भान होता है.
पर दरअसल ऐसा है नहीं. यह उस शब्द का सही अर्थ नहीं है.
पुरस्कार वापसी

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लेखकों और कलाकारों ने किसी को कुछ नहीं लौटाया है. बल्कि वे लौट आए हैं. उन्होंने बस इतना अहसास किया है कि उन्हें अपनी पुरानी जगह लौट आना चाहिए.
वह जगह, वह समय और वह स्थिति, जब उनके पास यह सम्मान नहीं था.
यह क़दम सराहनीय है और ‘लौटाना’ के मूल अर्थ के साथ बेहतर न्याय करता है.
इस लौट आने का विरोध लेखकों के मौलिक अधिकार का हनन है क्योंकि सुधर जाने का अधिकार किसी से नहीं छीना जा सकता.
अपनी पूर्व स्थिति में लौट आने को दबाव, विरोध या प्रतिरोध के रूप में अवश्य देखा जा सकता है और वह है भी.
लेकिन उससे पहले वह आत्मावलोकन के आधार पर आत्मसुधार की बड़ी कोशिश है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.
आत्मावलोकन

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अपनी तरफ़ लौट आने और अपने साथ खड़े होने के अंतरात्मा के फ़ैसले को यश, कीर्ति, तमगे और धनराशि से जोड़कर देखना न इस तरफ़ सही है, न उस तरफ़.
लौटाने या लौट आने से कोई विपन्न नहीं होता. उसका सुर्ख़ियों से भी कोई संबंध नहीं होता.
बस, इतना होता है किसी लेखक ने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनी और उसपर अमल करते हुए लौट आया.
कमज़ोर पायों पर खड़े सत्ता प्रतिष्ठान लेखकों और कलाकारों के इस ‘लौट आने’ को दबाव और हमले की तरह देखें तो मान लेना चाहिए कि वे सहज नहीं हैं. आत्मावलोकन का समय अब उनका है.
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