कश्मीर में मारे गए अल्पसंख्यकों के परिजन ने कहा- हम कश्मीरी, यहाँ से जाएँगे नहीं

अज्ञात हमलावरों के हाथों मारे गए माखन लाल बिंदरू के परिजन

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    • Author, रियाज़ मसरूर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी न्यूज़

सिद्धार्थ बिंदरू अपने पिता माखन लाल बिंदरू के लिए चिकन शावरमा लाने जा रहे थे और तभी उन्हें उनके पॉलीक्लिनिक से एक फ़ोन आया. कॉल करने वाले ने कहा, "पापा अब नहीं रहे." यह सुनकर 40 साल के जाने-माने ये कश्मीरी एंडोक्राइनोलॉजिस्ट सदमे में आ गए.

बीते पाँच अक्तूबर की देर शाम हाथों में पिस्टल लिए अज्ञात हमलावरों ने 'बिंदरू हेल्थ ज़ोन' में घुसकर उसके मालिक माखन लाल बिंदरू पर तीन गोलियाँ दाग दी. दुकान के सेल्समैन ने बताया कि जब वो फ़ोन पर बात कर रहे थे, तभी हमलावर उन पर गोली चलाकर अंधेरे में ग़ायब हो गए.

बेहद परेशान दिख रहे डॉक्टर सिद्धार्थ रोते हुए कहते हैं, "एक गोली उनके दिल में लगी. दूसरी उनके कंधे और तीसरी उनके गले में लगी थी."

डॉक्टर सिद्धार्थ उसी पॉलीक्लिनिक में प्रैक्टिस करते हैं, लेकिन उस दिन उनकी छुट्टी थी. वो रोते हुए पूरे घटनाक्रम को याद करते हैं.

वो कहते हैं, "पापा ने दोपहर में फ़ोन किया और मुझे चिकन शावरमा लाने को कहा. मुझे पता था कि वो उनका पसंदीदा भोजन है. इसलिए मैंने इसे उन तक पहुँचाने का फ़ैसला किया. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.''

जाने-माने केमिस्ट माखन लाल बिंदरू
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कौन थे बिंदरू?

68 साल के माखन लाल बिंदरू कश्मीर के प्रसिद्ध डॉक्टर और फार्मासिस्ट राकेश्वर नाथ बिंदरू के बेटे थे.

आरएन बिंदरू ने पूरे कश्मीर ख़ासकर श्रीनगर में एक विशाल फार्मेसी कारोबार स्थापित किया था. श्रीनगर में ''बिंदरू मेडिकेट'' नाम की उनकी दुकान में ज़रूरी दवाओं के साथ कहीं न मिलने वाली दवाएँ भी मिल जाती हैं.

1983 में अपने पिता के मरने के बाद एमएल बिंदरू ने श्रीनगर की अपनी दुकान का जिम्मा संभाला. इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी से साथ देने की गुज़ारिश की.

डॉक्टर सिद्धार्थ याद करते हैं, ''मेरे पिता एक व्यावहारिक इंसान थे. मेरी माँ दुकान पर बिल बनाती थीं. माल ख़रीदने के साथ ग्राहकों को दवाइयाँ भी देती थीं. जब मैंने पिता से पूछा कि मेरी माँ को दुकान पर काम क्यों करना पड़ता है. तो उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कुछ हो जाए तो बच्चों को तकलीफ़ न हो इसलिए. वो अक्सर कहते थे कि उनके न रहने पर भी जीवन ऐसे ही चलते रहना चाहिए.''

1990 के दशक की चरमपंथी हिंसा के बाद कश्मीर घाटी से हज़ारों कश्मीरी हिंदुओं या पंडितों के पलायन के बाद वहाँ थोड़े हिंदू अब भी बचे हैं. ऐसे क़रीब 800 परिवारों में से ही एक बिंदरू का भी परिवार है.

एमएल बिंदरू उन तीन लोगों में से एक थे, जिन्हें एक ही दिन मार डाला गया. अज्ञात हमलावरों की गोलियों से मरने वालों में बिहार के एक हिंदू स्ट्रीट वेंडर और एक कश्मीरी मुस्लिम कैब ड्राइवर भी थे. उससे पहले दो कश्मीरी मुसलमानों को भी ऐसे ही मारा गया था.

शिक्षक दीपक चंद के परिजन

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सुपिंदर कौर और दीपक चंद की हत्या

मुश्किल से दो दिनों बाद अज्ञात हमलावरों ने श्रीनगर के बाहरी संगम इलाक़े के एक सरकारी स्कूल पर धावा बोल दिया. हमलावरों ने स्कूल की प्रिंसिपल और एक शिक्षक की उनकी पहचान पूछने के बाद हत्या कर दी.

उस स्कूल की प्रिंसिपल सुपिंदर कौर नाम की एक कश्मीरी सिख महिला थीं. शिक्षक का नाम दीपक चंद था. वो जम्मू के रहने वाले थे. दो बच्चों की माँ सुपिंदर कौर श्रीनगर के अलुचा बाग में रहती थीं.

उनकी मौत के बाद उनके बैंकर पति रामरेशपाल सिंह सदमे के चलते दो दिनों तक बोल नहीं सके. वो कहते हैं, "मैं पूछ ही नहीं पाया कि उन्हें कैसे मारा गया. अपनी पत्नी को मरा हुआ देखने के बाद मेरे लिए तो सारी चीज़ें ही बेकार हो गईं."

रामरेशपाल सिंह जब बातें कर रहे थे, तब उनके कई सहयोगी उन्हें घेरे हुए थे. सुपिंदर कौर के स्कूल के शिक्षक भी उन्हें याद कर रो रहे थे.

उस स्कूल के खेल प्रशिक्षक अब्दुल रहमान ने कहा कि उन्होंने अपने 35 साल की सर्विस में सुपिंदर कौर जैसा दयालु इंसान नहीं देखा. रहमान कहते हैं, ''वॉशरूम की मरम्मत के लिए उन्होंने अपना पैसा लगा दिया, क्योंकि औपचारिकताओं को पूरा करने में काफ़ी समय लग जाता.''

पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार तीन हथियारबंद हमलावर स्कूल परिसर में घुस गए और सभी स्टाफ़ को बुलाकर उनकी पहचान पूछी.

पुलिस की शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, हमलावरों ने दीपक और सुपिंदर को बाक़ी लोगों से अलग ले जाकर गोली मार दी, जिससे दोनों की तुरंत मौत हो गई.

सुपिंदर के बच्चों को पता है कि उनकी माँ अब नहीं रहीं, लेकिन वे सवालों के जवाब नहीं दे सकते.

अंतिम संस्कार के दौरान अपने आठ साल के भाई को बाँहों में कसकर भींचते हुए उनकी 12 साल की बेटी जसलीन कौर ने कहा, "मैंने कभी लाश नहीं देखी थी. मैं अभी भी सदमे में हूँ. मुझे नहीं पता कि हो क्या रहा है."

उनके पड़ोसी मजीद ने बताया, "सुपिंदर मेरी बहन की तरह थी. वो इतनी उदार थीं कि उन्होंने एक अनाथ मुस्लिम बच्ची को गोद ले रखा था. अपने वेतन का कुछ हिस्सा वो उसके भरण-पोषण पर ख़र्च कर देती थीं. मुझे नहीं पता कि कितने अनाथों ने अपनी गॉडमदर खो दी है."

माखन लाल बिंदरू का परिवार

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'हालात सामान्य होने के सरकारी दावे फेल?'

अक्तूबर के शुरुआती कुछ दिनों में ही सात लोगों की हत्या के बाद राज्य सरकार के शांति और सामान्य हालात के दावे भी सवालों के घेरे में आ गए हैं.

ये हत्याएँ तब हुई हैं, जब सरकार का एक अभियान चल रहा था. इसके तहत केंद्र की मोदी सरकार के 70 से अधिक मंत्री संविधान के "अनुच्छेद 370 को हटाने के लाभ" बताने के लिए राज्य का दौरा कर रहे है.

5 अगस्त, 2019 को सरकार के फ़ैसले के बाद सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया था. साथ ही संचार के ज़्यादातर साधन रोक दिए गए थे और शहरों को हफ़्तों तक बंद कर दिया गया. लेकिन राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों में से किसी ने भी अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर राज्य की आंशिक स्वायत्तता रद्द करने के फ़ैसले की निंदा नहीं की.

राज्य में लोगों की हत्याओं की नेताओं ने कड़ी निंदा की है. नेताओं ने मौजूदा हालात को 1990 के दशक की तरह ही ख़राब बताया है. राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि ताज़ा हालात "शांति और सामान्य स्थिति के झूठे दावों के पोल खोलने" जैसा है.

कश्मीर में गुरुवार के आतंकी हमले में मारी गईं सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल सुपिंदर कौर के शोक-संतप्त परिजन

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दो दशक में पहली बार अल्पसंख्यक बने निशाना

एमएल बिंदरू और सुपिंदर कौर की हत्या, पिछले 18 सालों में किसी भी कश्मीरी पंडित या सिख नागरिक पर हुआ पहला हमला है.

इससे पहले मार्च 2000 में, अनंतनाग ज़िले के चिट्टीसिंह पुरा गाँव में अज्ञात हमलावरों ने 35 से अधिक सिखों की हत्या कर दी थी. उसके बाद साल 2003 में पुलवामा के एक सुदूर गाँव नदीमर्ग में 20 से ज़्यादा कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी.

हालाँकि कश्मीर के पुलिस प्रमुख विजय कुमार इसका खंडन करते हैं कि कश्मीर में सांप्रदायिक तनाव है. पिछले हफ़्ते उन्होंने पत्रकारों से कहा कि इस साल चरमपंथियों ने जिन लोगों की हत्या की है, उनमें से अधिकांश मुसलमान हैं.

विजय कुमार ने बताया, "2021 में चरमपंथियों के हमले में 28 नागरिक मारे गए हैं. इनमें से केवल 5 लोग स्थानीय हिंदू और सिख थे. दो बाहरी मज़दूर थे."

जम्मू और कश्मीर पुलिस के महानिदेशक दिलबाग़ सिंह ने भी कहा कि ताज़ा हत्याएँ सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की कोशिश है.

लेकिन बिंदरू की हत्या ने उन कश्मीरी पंडितों को भी डरा दिया है, जो राज्य से कभी पलायन नहीं किए या ​पिछले एक दशक के दौरान जो वापस लौट आए.

हालाँकि पुलिस का कहना है कि हमलावरों को पकड़ने के लिए व्यापक तलाशी अभियान चल रहा है. आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि सैकड़ों पूर्व चरमपंथियों और ज़मानत पर छूटे प्रदर्शनकारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के संजय टिक्कू

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'अल्पसंख्यक ऐसे हालात में कैसे रहेंगे?'

संजय टिक्कू 5000 से अधिक "गैर-प्रवासी" पंडितों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक संस्था के प्रमुख हैं.

ताज़ा हालात के बारे में टिक्कू ने बीबीसी को बताया, "हाँ, हालात 1990 के दशक जैसे हैं, क्योंकि मुझे उतना ही डर लग रहा है, जितना कि तब महसूस किया था. बीते दिनों कई कश्मीरी पंडित परिवार घाटी छोड़कर जा चुके हैं, जबकि कई परिवार जाने की तैयारी में हैं. मुझे पंडित परिवारों से घबराहट भरे फ़ोन आ रहे हैं. अधिकारियों ने मुझे श्रीनगर में मेरे घर से हटाकर मुझे एक होटल में बंद कर दिया है. हम ऐसी भयावह स्थिति में कैसे रह सकते हैं."

अधिकारियों ने बिंदरू के घर पर सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर दिया है, जबकि कुछ पंडित नेताओं को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है. लेकिन असुरक्षा का भाव पड़ोस के सभी पंडितों और सिखों में मौजूद है.

हाल ये है कि दीवारों से घिरे उन अपार्टमेंट में, जहाँ पिछले कुछ सालों के दौरान सरकारी पैकेज के तहत लौटे पंडित परिवार रहते हैं, अजीब सी शांति छाई हुई है. ऐसा ही एक कैंप कश्मीर के बड़गाम ज़िले में है. यहाँ क़रीब 300 फ़्लैट्स में कम से कम 1,000 कश्मीरी पंडित रहते हैं.

इस कैंप के एक निवासी ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया, "कई परिवार चले गए हैं. हम असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. सरकारी अधिकारी यहाँ आ रहे हैं और कोई घटना होने पर हमें मदद करने का भरोसा देते हैं. लेकिन स्कूली शिक्षकों की हत्या के बाद डर अब कैंप से कार्यालयों में पहुँच गया है. क्या सरकार सभी स्कूलों और कार्यालयों को सुरक्षा दे सकती है?"

कश्मीर

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आम जनजीवन पर पड़ा बुरा असर

हालांकि सिख नेताओं ने कश्मीर में रहने की प्रतिबद्धता जताई है. लेकिन उन्होंने सभी सिख कर्मचारियों से तब तक ड्यूटी पर न जाने को कहा है, जब तक कि सरकार उन्हें सुरक्षा का भरोसा नहीं दे देती.

भय और अनिश्चितता के मौजूदा हालात ने कश्मीरियों को काफ़ी प्रभावित किया है. ताज़ा घटनाओं के कई दिनों बाद भी शहर की सड़कों पर सुरक्षा के इंतज़ाम, गाड़ियों के साथ पैदल चलने वालों की भी तलाशी और लगातार बजने वाले सायरन तनाव को और अधिक ज़ाहिर करते हैं.

श्रीनगर की एक बेकरी के पास अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे लोग 1990 जैसे हालात के लौटने को लेकर चिंतित दिख रहे थे.

उन्हीं में से एक मोहम्मद असलम ने कहा, "1990 में पंडितों का पलायन एक त्रासदी थी और उसके बाद जो हुआ वह दूसरी त्रासदी थी. पूरी आबादी को बड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ा. मुझे उन दिनों को याद करने में भी डर लगता है. ये फिर से नहीं होना चाहिए.'' मुहम्मद असलम 1991 में गोलीबारी की एक घटना में अपने एक भाई को खो चुके हैं.

माखन लाल बिंदरू का परिवार

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बिंदरू परिवार का पलायन से साफ़ इनकार

नौकरी पैकेज के तहत घाटी लौटने वाले कई पंडित परिवार अब कश्मीर छोड़ना चाहते हैं, लेकिन बिंदरू परिवार अपने पिता की विरासत को छोड़ना नहीं चाहता.

बिंदुरू की बेटी श्रद्धा बिंदरू ने कहा, "माखन लाल ने सब कुछ इसलिए झेला, क्योंकि वो यहाँ रहना चाहते थे. हम कश्मीर से ताल्लुक रखते हैं. हम कश्मीरी हैं और हमारी रगों में एमएल बिंदरू का ख़ून दौड़ता है."

डॉक्टर सिद्धार्थ के दो बेटे हैं. दोनों अपने दादा के दाह संस्कार में मौज़ूद थे. वो कहते हैं, "मैं अपने बेटों को उनके दादा के अंतिम संस्कार का साक्षी बनाना चाहता था. उस दौरान वहाँ हिंदू से ज़्यादा मुसलमान थे. मैं चाहता था कि मेरे बेटे मेरे पिता की सामाजिक पूँजी को जानें. एक अल्पसंख्यक की हत्या सिर्फ़ एक हत्या नहीं बल्कि सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश है. मुझे नहीं लगता कि यहाँ से पलायन करने की कोई वज़ह है. यहाँ मेरे लोग हैं. मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता."

वो कहते हैं- मेरे घर आने वालों में 90 प्रतिशत मुसलमान थे. ऐसे लोगों को अपने पिता की विरासत बताते हुए सिद्धार्थ 1990 के दौर को याद करते हैं. उस समय तनाव के चरम समय पर भी उनके मुस्लिम दोस्त उनके घर आकर चाय पीते थे.

डॉक्टर सिद्धार्थ कहते हैं, "हमारे घर आने वाले लोग ये जताने आते हैं कि वो हमारे साथ हैं. पिछले 25 सालों से मेरी माँ एक मुस्लिम शख़्स को राखी बाँध रही हैं. क्या आपको लगता है कि यहाँ से पलायन करने का मेरे पास कोई कारण है?"

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