भारत प्रशासित कश्मीर: क्यों निशाने पर बाहरी और व्यापारी?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर में बुधवार को संदिग्ध चरमपंथियों के दो हमलों में दो लोगों की मौत हो गई.
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक़ मरने वालों में से एक छत्तीसगढ़ के मज़दूर और दूसरे पंजाब के सेब व्यापारी थे. ये हमले पुलवामा और शोपियां ज़िलों में हुए.
अधिकारियों ने बताया कि हमले में सेब व्यापारी के एक सहयोगी भी घायल हो गए और उन्हें इलाज के लिए श्रीनगर के एक अस्पताल में दाख़िल कराया गया है. दोनों की पहचान चरणजीत सिंह और संजय कुमार के तौर पर हुई है.
संदिग्ध चरमपंथी सोमवार से तीन हमले कर चुके हैं. पुलिस के मुताबिक़ सोमवार को दक्षिण कश्मीर के श्रीमल गांव में संदिग्ध चरमपंथियों ने एक ड्राइवर की गोली मारकर जान ले ली और उसके ट्रक में आग लगा दी. हमले में मारे गए ड्राइवर ट्रक में सेब लादने के लिए आए थे. ड्राइवर की पहचान शरीफ़ ख़ान के तौर पर हुई है.
पुलिस के मुताबिक़ उनकी जान लेने वाले संदिग्ध चरमपंथियों में पाकिस्तान का एक कथित चरमपंथी शामिल था.

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पुलिस के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ के मज़दूर की दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा ज़िले में गोली मारकर हत्या कर दी गई. उनकी पहचान सेथी कुमार सागर के रूप में हुई है. वो छत्तीसगढ़ के बेसोली इलाक़े के रहने वाले थे और ईंट भट्ठे पर काम करते थे.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक दिलबाग सिंह ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि सागर एक अन्य व्यक्ति के साथ कहीं जा रहे थे तभी काकपोरा रेलवे स्टेशन के पासे दो बंदूक़धारियों ने उन पर गोलियां चला दीं.
उन्होंने कहा, "हमने हत्यारों को पकड़ने के लिए कई इलाक़ों में टीमें भेजी हैं." प्रत्यक्षदर्शियों ने चरमपंथियों की संख्या दो बताई है.

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व्यापारियों पर हमले क्यों?
कश्मीर घाटी में बीते कुछ हफ़्तों में कथित चरमपंथियों ने बाहर से आने वाले लोगों को और व्यापारियों को निशाना बनाया है. सुरक्षा विशेषज्ञ और पत्रकार इसे लोगों को डराने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.
पुलिस के मुताबिक़, श्रीनगर के पारिमपोरा इलाक़े के दुकानदार ग़ुलाम मोहम्मद मीर की बीते 29 अगस्त को संदिग्ध चरमपंथियों ने हत्या कर दी.
उनकी हत्या के बाद बीबीसी की एक टीम उनके घर गई थी और उनके परिवारवालों से बात की.
उनके परिवार के एक सदस्य ने कहा, "साढ़े आठ बजे के क़रीब तीन लोगों ने एक पिस्तौल से उन पर गोली चलाई. घटना के वक़्त उनकी पत्नी दुकान पर मौजूद थीं. उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया."
पुलिस और सेना के मुताबिक़ एक महीने पहले दक्षिणी कश्मीर के त्राल में संदिग्ध चरमपंथियों ने दो आम लोगों की जान ले ली.
अभी तक किसी भी संगठन ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी नहीं ली है.
पुलिस के पूर्व अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि ये हत्याएं लोगों के बीच डर पैदा करने की कोशिश हैं. उन्होंने ये भी कहा कि ये भी ज़रूरी नहीं है कि चरमपंथी हर घटना की ज़िम्मेदारी लें.

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अर्थव्यवस्था पर हमला?
भारत सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा दिया जिसे लेकर क्षेत्र में तनाव है. अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को ख़ास दर्जा हासिल था.
अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर घाटी संचार तंत्र पर पाबंदी, कर्फ्यू और पाबंदियों की गवाह बनी. स्कूल, कॉलेज और सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद हैं.
लैंडलाइन फ़ोन कुछ हफ़्ते पहले शुरू हो गए. पोस्ट पेड मोबाइल सेवा सोमवार से शुरू हो गईं लेकिन उसी दिन पोस्टपेड कनेक्शन पर एसएमएस सेवा को बंद कर दिया गया.
अनुच्छेद 370 को हटाने के साथ केंद्र सरकार ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ में बाँट दिया.
डेली कश्मीर के एडिटर इन चीफ़ बशीर मंज़र हमले की घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण और त्रासद बताते हैं. वो कहते हैं कि ये कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर हमला है.
वो कहते हैं, "बिना किसी विवाद के कहा जा सकता है कि जब कभी ऐसे घटनाएं या हत्याएं होती हैं तब स्वाभाविक तौर पर डर का माहौल बनता है. ये देखना अहम है कि बाग़वानी कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. बीते एक महीने से सोपोर से शोपियां तक ये हमले हुए हैं. मैं इन्हें बाग़वानी पर हमले की तरह देखता हूं. कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग बाग़ों पर निर्भर हैं. जो लोग फलों के व्यापार से जुड़े हैं, उनके लिए ये कटाई का मौसम है. इस मौसम में सेब तोड़कर दूसरे राज्यों में भेजे जाते हैं. अगर लोगों के बीच इस तरह का डर बिठाया जाए तो वो अपने सेब नहीं बेच पाएंगे और इसका कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर ख़ास बुरा असर होगा. हत्या चाहे किसी कश्मीरी की हो या कश्मीर से बाहर के व्यक्ति की, उसका पूरे माहौल पर बुरा असर होगा."

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परेशान हैं व्यापारी
शोपियां के डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद यासीन चौधरी ने बीबीसी को बताया कि कश्मीर के बाहर के ड्राइवरों को सुरक्षित जगहों पर भेजा जा रहा है.
फलों के व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि वो नहीं जानते कि किसके कहने पर ये घटनाएं हो रही हैं लेकिन इन घटनाओं की निंदा होनी चाहिए.
फल उगाने वालों की एसोसिएशन के चेयरमैन बशीर अहमद ने बीबीसी को बताया, "हमें नहीं पता कि शोपियां में ड्राइवर की जान किसने ली और हमें इन घटनाओं के बारे में सही जानकारी भी नहीं है. जो भी ऐसा कर रहा है, ग़लत कर रहा है."
क्या इन घटनाओं का मक़सद लोगों को डराना है, इस सवाल पर उन्होंने कहा, "ये साफ़ है. लेकिन मैं दोबारा कहता हूं कि हम नहीं जानते कि वो लोग कौन हैं जो ऐसी घटनाएं कर रहे हैं. लेकिन ये स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाओं से लोग डर जाते हैं."

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लगातार हो रहे हैं हमले
सोपोर में बीती 6 सितंबर को संदिग्ध चरमपंथी अर्शिद हुसैन के घर में दाख़िल हो गए और उनके साथ परिवार के सदस्यों पर भी गोलियां चलाईं. इस हमले में एक बच्ची समेत चार लोग घायल हो गए.
अर्शिद और उनके रिश्तेदारों को इलाज के लिए श्रीनगर के अस्पताल में दाख़िल कराया गया. उन्होंने बीबीसी को बताया कि उनके घर आए दो बंदूक़धारियों ने पूछा कि वो दुकान क्यों खोल रहे हैं?
उन्होंने बताया, "रात आठ बजे का वक़्त था. सोपोर के हमारे घर में दो बंदूक़धारी दाखिल हुए.उन्होंने पूछा कि आप फल मंडी में दुकान क्यों खोल रहे हैं. 5 अगस्त के बाद सोपोर की हमारी फल मंडी कुछ दिन के लिए बंद थी. उसके बाद वो खुल गई और हमने अपने कारोबार शुरू कर दिया. इसके बाद हमारी मंडी कुछ और दिन के लिए बंद हो गई. हमारी मंडी दोबारा खुली और हमारे अध्यक्ष ने बताया कि डर की कोई बात नहीं है. आप अपना व्यापार कर सकते हैं. हम सुबह के वक़्त दुकान खोला करते थे."
क्या वो चरमपंथी थे, ये पूछने पर उन्होंने कहा, "उस वक़्त पूरी तरह से अंधेरा था. हम उन्हें पहचान नहीं सके और ये नहीं कह सकते कि क्या वो चरमपंथी थे."
अर्शिद के रिश्तेदार मोहम्मद अशरफ ने बीबीसी को बताया कि उस पर गोली चलाते वक्त भी बंदूकधारियों ने पूछा कि तुम अपनी दुकान क्यों खोल रहे हो?

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'नाकाम हैं सुरक्षाबल'
श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार हारून रेशी ने कहा कि ये साफ है कि कश्मीर में चरमपंथियों की मर्जी मजबूती से चलती है और सुरक्षाबल लोगों को महफूज रख पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं.
उन्होंने कहा, "जब भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया करीब एक लाख अतिरिक्त सुरक्षा बलों को कश्मीर घाटी भेजा गया. ऐसे करते हुए सरकार ने संकेत देने की कोशिश की कि हालात से निपटा जा सकता है. बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है. लेकिन अब ये घटनाएं दिखाती हैं कि कश्मीर के कुछ हिस्सों में सरकार की नहीं चलती है. ऐसी घटनाओं को देखकर कहा जा सकता है कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां लोगों की रक्षा में नाकाम हैं. मुझे नहीं लगता कि ये हत्याएं लोगों को डराने की समझी हुई कोशिश है लेकिन इन हत्याओं या ऐसी घटनाओं से डर फैलता ही है."
उन्होंने आगे कहा, "जब ऐसी घटनाओं की ख़बर बाहर जाती है तब ये सोच बनती है कि कश्मीर बाहर के लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है."

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सेना देगी सुरक्षा
भारतीय सेना ने बुधवार को कहा कि कश्मीर के सेब उगाने वालों और व्यापारियों को सुरक्षा दी जाएगी.
श्रीनगर स्थित सेना की 15वीं कोर के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लों ने कहा कि सेब व्यापारियों और व्यापारियों समेत किसानों को सुरक्षा देना सेना की जिम्मेदारी है.
पुलिस की आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट और विभिन्न समाचार रिपोर्टों के मुताबिक 5 अगस्त 2019 से कश्मीर घाटी में हुई चार अलग-अलग मुठभेड़ों में कम से कम नौ संदिग्ध चरमपंथी मारे जा चुके हैं.
अधिकारियों ने पीटीआई को बताया कि बुधवार को अनंतनाग ज़िले में हुई मुठभेड़ में तीन स्थानीय चरमपंथी मारे गए.
बौखला गए हैं चरमपंथी
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के बाद कश्मीर में हिंसा नहीं होने से चरमपंथी बौखला गए हैं.
उन्होंने कहा, "जब अनुच्छेद 370 की दीवार गिरी तब पाकिस्तान ने सोचा कि कश्मीर में खून बहेगा. लेकिन बीते 70 दिन में कुछ नहीं हुआ. ये उनके बौखलाने की वजह है. वो (चरमपंथी) जानते हैं कि कश्मीर में विकास होगा."
उन्होंने आगे कहा, "अब वो (चरमपंथी) मासूम लोगों पर गोली चला रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं.लोग अब खुद ही दुकान खोल रहे हैं.कश्मीर के लोग मेहमाननवाज़ हैं और अब चरमपंथी उनकी छवि खराब करना चाहते हैं."

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बीजेपी नेता ठाकुर ने कहा, "सरकार ने यात्रा को लेकर जारी की गई सलाह भी वापस ले ली है और आप देख सकते हैं कि पर्यटक श्रीनगर में आना शुरू हो गए हैं. लेकिन बाहरी लोगों की हत्या करके चरमपंथी संदेश देना चाहते हैं कि कश्मीर बाहर के लोगों के सुरक्षित नहीं है."
नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता देवेंद्र सिंह राणा ने बीबीसी से कहा कि किसी भी समाज में चरमपंथ के लिए कोई जगह नहीं है. उनकी पार्टी किसी भी तरह के आतंक के ख़िलाफ है.
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