क्या उत्तरी कश्मीर फिर से बन रहा चरमपंथ का गढ़?

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- Author, माज़िद जहांगीर
- पदनाम, कश्मीर से बीबीसी हिंदी के लिए
हंदवाड़ा भारत प्रशासित कश्मीर के सीमा से सटे कुपवाड़ा जिले का हिस्सा है. यह उत्तरी कश्मीर में पड़ता है.
चौबीस घंटे के भीतर यहां सुरक्षाबलों के 8 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. इनमें आर्मी के एक कर्नल, एक मेजर, जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर और पांच अन्य जवान शामिल हैं. मुठभेड़ और हमले की दो अलग घटनाओं में इन 8 लोगों की जानें गई हैं.
सीआरपीएफ़ के तीन जवान मारे गए
पुलिस के एक बयान के मुताबिक, इन मुठभेड़ों और हमलों में दो चरमपंथी भी मारे गए हैं.
सोमवार को हंदवाड़ा में क्रॉस फायरिंग में एक 14 साल के बच्चे की भी मौत हो गई. चरमपंथियों के इस हमले में सीआरपीएफ़ के तीन जवान मारे गए थे.
अप्रैल के पहले हफ्ते में आर्मी ने उत्तरी कश्मीर के ही केरन सेक्टर में लाइन ऑफ़ कंट्रोल (एलओसी) के पास पांच चरमपंथियों को मारने का दावा किया था.
18 अप्रैल 2020 को उत्तरी कश्मीर के सोपोर में सीआरपीएफ़ के तीन जवान एक चरमपंथी हमले में मारे गए जबकि कई अन्य इस हमले में जख्मी हो गए.
कभी चरमपंथ का अड्डा था कुपवाड़ा
नब्बे के दशक में कश्मीर में चरमपंथ की शुरुआत हुई. एक वरिष्ठ पुलिस अफ़सर के मुताबिक, तब से लेकर 1995 तक कुपवाड़ा जिला चरमपंथ का गढ़ बना रहा.
हंदवाड़ा लीपा वैली से आने वाले घुसपैठ के रास्ते पर पड़ता है. हंदवाड़ा जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के 74 किमी दूर है.
विधानसभा के चुनावों में उत्तरी कश्मीर के उड़ी और गुरेज़ के बाद कुपवाड़ा जिले के चुनाव क्षेत्रों में सबसे ज्यादा वोटिंग हुई थी.
हंदवाड़ा से आने वाले और कभी पत्रकार रहे परवेज़ मजीद ने बीबीसी को बताया, "इस जिले में राजनीति को लेकर आम बहस बड़े तौर पर नेशनल कॉन्फ्रेंस और अलगाववाद से मुख्यधारा की राजनीति में आए सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के मुद्दों पर टिकी होती है."
परवेज़ मजीद अब शैक्षिक कामकाज से जुड़ चुके हैं.

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'नब्बे के दशक की बुरी यादें फिर से डराने लगी हैं'
हालांकि, हंदवाड़ा कस्बा मुख्य अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन का गृह कस्बा भी था. 2002 में अब्दुल गनी लोन की हत्या कर दी गई थी.
इन दो हालिया हमलों ने हंदवाड़ा के लोगों को नब्बे के दशक की यादों से फिर से डराना शुरू कर दिया है.
कुपवाड़ा के रहने वाले राशिद खान बताते हैं, "मुझे याद है कि कैसे चरमपंथी दिन में खुलेआम हंदवाड़ा में राजवर के जंगलों में घूमा करते थे. कैसे वे ख़तरनाक हथियारों के साथ खुले मैदानों में परेड करते थे."
राशिद खान एक पूर्व चरमपंथी कमांडर हैं जो बाद में सरकार समर्थित बंदूकधारी बन गए. खान के बारे में दावा किया जाता है कि वह कश्मीर में चरमपंथ के शुरुआती सालों में कुपवाड़ा जिले में पचास से ज्यादा चरमपंथ विरोधी ऑपरेशंस में हिस्सा ले चुके हैं.
वह बताते हैं, "तब चरमपंथी ज्यादा मजबूत स्थिति में थे. हर दिन वे सुरक्षा बलों पर हमला करते थे और अपना दबदबा बनाए हुए थे."
कुपवाड़ा और हंदवाड़ा में चरमपंथियों का दबदबा
खान ने कहा कि कुपवाड़ा और हंदवाड़ा में चरमपंथियों की मौजूदगी और दबदबा इस हद तक था कि वे किसी भी घर को बीस लोगों के लिए खाना बनाने के लिए बोल देते थे और उस परिवार को ऐसा करना पड़ता था.
खान के मुताबिक, "उन दिनों सुरक्षा बलों के लिए चरमपंथियों से लड़ पाना एक मुश्किल काम था क्योंकि चरमपंथियों की कुपवाड़ा जिले के पूरे इलाके पर मजबूत पकड़ थी. लेकिन, 1995 के बाद हालात सामान्य हुए और सुरक्षा बलों को इस इलाके से चरमपंथ का सफ़ाया करने में कामयाबी मिल गई. हालांकि, इसमें कई साल का वक्त लग गया."
लंबे वक्त तक उत्तरी कश्मीर में काम कर चुके एक टॉप पुलिस अफ़सर ने नाम न छापे जाने की शर्त पर बताया कि हालिया घटनाएं सीमापार से हुई घुसपैठ का नतीजा हो सकती हैं.
क्या उत्तरी कश्मीर पर चरमपंथियों का बढ़ रहा फोकस?
पुलिस अधिकारी ने कहा, "पहले सीमापार के लोगों ने दक्षिण कश्मीर को चुना था और अब शायद उत्तरी कश्मीर में उनकी दिलचस्पी पैदा हो गई है. जब भी घुसपैठ होती है तो वे पहले उत्तरी कश्मीर पहुंचते हैं और इसके बाद उन्हें छोटे समूहों में दक्षिणी कश्मीर भेज दिया जाता है."
वह बताते हैं, "एक और अहम चीज यह है कि उत्तरी कश्मीर पहुंचने वाले किसी भी घुसपैठिए ग्रुप को उनकी मदद करने वालों की जरूरत होती है. उन्हें पहले दो-तीन दिन के लिए खाना चाहिए होता है उसके बाद उन्हें अपने लोग मिल जाते हैं. ये जरूरत उन्हें उत्तरी कश्मीर से दक्षिणी कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान भी पड़ती है. ऐसे में मुझे लगता है कि उन्होंने कुछ वक्त के लिए उत्तरी कश्मीर को तरजीह दी है और इससे उन्हें अपनी मदद के लिए लोगों की जरूरत नहीं रहेगी."
पुलिस अधिकारी ने कहा कि उनकी जानकारी के मुताबिक, दक्षिणी कश्मीर के मुकाबले उत्तरी कश्मीर हमेशा से विदेशी चरमपंथियों का गढ़ रहा है. स्थानीय चरमपंथियों की ज्यादा मौजूदगी दक्षिणी कश्मीर में रही है.
गुजरे कुछ सालों में दक्षिणी कश्मीर में सैकड़ों युवा चरमपंथ से जुड़े हैं. पिछले एक महीने में ज्यादातर एनकाउंटर कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में हुए हैं. सुरक्षा बलों के साथ हुई इन मुठभेड़ों में 20 से ज्यादा चरमपंथी मारे गए हैं.

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लॉकडाउन पालन करा रहे जवान बन रहे आसान निशाना
हालांकि, पुलिस हंदवाड़ा के अटैक को एक आम मसला बताती है. कश्मीर ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (आईजी) विजय कुमार ने बीबीसी को बताया कि पूरी पुलिस और सीआरपीएफ़ इस वक्त कोविड-19 के चलते लॉकडाउन का पालन कराने के लिए तैनात है. ऐसे में चरमपंथी सॉफ्ट टारगेट्स को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, "कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन का पालन कराने के लिए हमारे जवान पांच सौ से ज्यादा जगहों पर तैनात हैं. ऐसे में वे सॉफ्ट टारगेट बन जाते हैं. हमारे जवान नाकों और दूसरी जगहों पर लोगों की आवाजाही के पास देखते हैं ताकि कोरोना के लिए लॉकडाउन का प्रभावी रूप से पालन हो सके. ऐसे में चेकिंग पॉइंट्स पर आने वाले लोगों की मंशा समझना मुश्किल हो जाता है. इस तरह के हालात में जोखिम बढ़ जाता है."
क्या उत्तरी कश्मीर चरमपंथ का नया अड्डा बन गया है? इस पर कुमार कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि उत्तरी कश्मीर बहुत एक्टिव हो गया है. जहां तक मेरा सवाल है, उत्तरी कश्मीर में मुठभेड़ भी हो रही हैं. हाल में ही हमने सोपोर में जैश के एक टॉप कमांडर को मार गिराया है. लश्कर का एक और कमांडर दो दिन पहले ही हंदवाड़ा में मारा गया है जिसमें आर्मी के कमाडिंग ऑफ़िसर (सीओ) भी मारे गए थे. केरन सेक्टर में पांच दुर्दांत चरमपंथी मारे गए थे और उनसे 25 से ज्यादा हथियार बरामद हुए थे. हम अच्छा काम कर रहे हैं. सीआरपीएफ़ के जवानों को मारने वाले चरमपंथी ज्यादा दिन तक बच नहीं पाएंगे. कुछ दो-तीन चरमपंथी वहां सक्रिय हैं और उनका सफ़ाया कर दिया जाएगा. उत्तरी कश्मीर चरमपंथ का गढ़ नहीं बना है."
विजय कुमार बताते हैं, "ये तीनों अटैक लश्करे तैयबा ने किए हैं और जैश का इनसे कोई लेनादेना नहीं है. हालांकि, लश्कर ने ये तीनों हमले किए हैं, लेकिन इनकी जिम्मेदारी टीआरएफ़ (द रजिस्टेंस फ्रंट) ने ली है. टीआरएफ़ लश्कर का ही एक गुट है."

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कुछ घुसपैठिए उत्तरी कश्मीर में दाखिल होने में सफल हुए
मंगलवार को सीआरपीएफ़ के जवानों को श्रद्धांजलि के कार्यक्रम में जम्मू-कश्मीर के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (डीजीपी) दिलबाग सिंह ने मीडिया के सवालों के जवाब देते हुए कहा कि कुछ घुसपैठिए उत्तरी कश्मीर के हिस्सों में पहुंचने में सफल रहे हैं और इनका उत्तरी कश्मीर के सोपोर में सुरक्षा बलों से आमना-सामना हुआ है जिसके चलते ये हमले हुए हैं.
मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंह ने कहा, "हंदवाड़ा के चंजमुल्ला इलाके में मारे गए चरमपंथियों का सुरक्षा बल पिछले तीन दिन से पीछा कर रहे थे. लेकिन, दुर्भाग्य से फायरिंग के दौरान हमने अपने पांच लोग गंवा दिए जिनमें दो आर्मी अफ़सर और जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर शामिल हैं."
क्या चरमपंथियों ने उत्तरी कश्मीर को नया ठिकाना बना लिया है?
श्रीगर में सीआरपीएफ़ के इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) ज़ुल्फ़िकार हुसैन ने बीबीसी को बताया, "हम इस वक्त यह नहीं कह सकते कि चरमपंथी दक्षिणी कश्मीर से उत्तरी कश्मीर में अपना बेस शिफ्ट हो रहे हैं या नहीं."
उन्होंने कहा, "चाहे उत्तर में हो या दक्षिण में, चरमपंथ, चरमपंथ ही होता है. चरमपंथी गतिविधियां दोनों जगहों पर होती हैं. आप देखेंगे कि पिछले साल चरमपंथी गतिविधियां उत्तरी कश्मीर में भी हो रही थीं. लेकिन, कई दफ़ा ये गतिविधियां बढ़ जाती हैं और कई बार इनमें गिरावट आती है. फिलहाल उत्तरी कश्मीर के बारे में ऐसा कुछ कहना जल्दबाजी होगी."
24 जनवरी 2019 को पुलिस ने तीन चरमपंथियों को मारने के बाद दावा किया था कि उत्तरी कश्मीर का बारामुला जिला अब चरमपंथ से मुक्त हो गया है.
हालांकि, आर्मी का कहना है कि पाकिस्तान कश्मीर में मुश्किलें पैदा करने के लिए पुरजोर कोशिशों में जुटा हुआ है.
श्रीनगर में सेना के प्रवक्ता कर्नल राजेश कालिया ने कुछ दिन पहले बीबीसी को बताया था कि कश्मीर में दाखिल होने के लिए लॉन्चिंग पैड्स पर चरमपंथी तैयार बैठे हैं.
राजेश कालिया ने कहा था, "आप देखेंगे कि कैसे हमने केरन सेक्टर में भारी रूप से हथियारबंद चरमपंथियों के एक समूह का सफ़ाया कर दिया था."
हंदवाड़ा के लोगों को फिर से चरमपंथ बढ़ने का डर
हंदवाड़ा के एक स्थानीय नागरिक माजिद अहमद कहते हैं कि हंदवाड़ा में चरमपंथी गतिविधियों में हालिया उछाल ने नब्बे के दशक की यादों को ताज़ा कर दिया है.
माजिद कहते हैं, "मुझे याद है कि 14 अगस्त को जब पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, कैसे चरमपंथी भी हंदवाड़ा के राजवर इलाके में इसे सेलिब्रेट करते थे. हमने चरमपंथियों को परेड निकालते देखा है. मैंने उन परेडों की रिकॉर्डेड वीडियो कैसेट्स देखी हैं. राजवर जंगल के आसपास के इलाकों पर चरमपंथियों का कब्जा था. हालांकि, अभी के हालात उतने खराब नहीं हैं, लेकिन गुजरे तीन दिनों में हंदवाड़ा में हुई घटनाओं ने नब्बे के दशक के गंभीर हालात याद दिला दिए हैं."
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