कश्मीर पर 'इसराइली मॉडल' की बात, क्या है ये मॉडल

वेस्ट बैंक में बसाई गई बस्तियां

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अमरीका में मौजूद भारत के एक शीर्ष राजनयिक ने ऐसा बयान दिया है जिसके बाद पाकिस्तान को एक बार फिर भारत सरकार पर निशाना साधने का मौक़ा मिल गया.

न्यूयॉर्क में महावाणिज्यदूत संदीप चक्रवर्ती ने एक निजी कार्यक्रम में कहा कि भारत सरकार को कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए इसराइल जैसी नीति अपनानी चाहिए.

इस कार्यक्रम में भारतीय फ़िल्म जगत की कुछ जानी-मानी हस्तियां शामिल थीं साथ ही अमरीका में रहने वाले कश्मीरी पंडित भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे. संदीप चक्रवर्ती का वीडियो सोशल मीडिया पर चल रहा है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं. उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, ''भारत में आरएसएस की विचारधारा वाली सरकार की फ़ासीवादी मानसिकता दिख रही है. भारत के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में घेराबंदी को 100 दिनों से ज़्यादा समय हो चुका है. कश्मीरियों के मानवाधिकार को कुचला जा रहा है. लेकिन दुनिया के शक्तिशाली देश अपने व्यापारिक हितों के कारण चुप्पी साधे हुए हैं.''

सवाल उठता है कि संदीप चक्रवर्ती ने कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए इसराइल की जिस नीति को अपनाने की बात कही है, वह नीति आखिर है क्या और इसराइल इसमें कितना कामयाब हुआ?

संदीप चक्रवर्ती

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युद्ध के बाद इसराइल की पुनर्वास नीति?

साल 1967 में मध्य पूर्व में चले युद्ध के दौरान इसराइल ने जितने भी इलाक़ों पर कब्ज़ा जमाया वहां उन्होंने यहूदियों को बसाने की नीति पर काम किया. इन इलाक़ों में वेस्ट बैंक, पूर्वी येरूशलम और गोलान की पहाड़ियां शामिल हैं.

इस युद्ध से पहले वेस्ट बैंक और पूर्वी येरूशलम पर जॉर्डन का अधिकार था, जिसे जॉर्डन ने 1948-49 में अरब-इसराइल युद्ध के दौरान कब्जा लिया था.

इसराइल के 'सेटलमेंट वॉचडॉग पीस नाउ' के अनुसार इन इलाक़ों में अभी कुल 132 बस्तियां और 113 आउटपोस्ट (अनाधिकारिक बस्तियां) हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार इन जगहों पर चार लाख से ज़्यादा लोग रहते हैं और इनका आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.

इसके अलावा इसराइल ने गज़ा पट्टी में भी कई बस्तियां तैयार की हैं, जिसे उसने 1967 युद्ध में मिस्र से अपने कब्ज़े में लिया था.

इसराइल

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सर्वसम्मति से हुआ था फ़ैसला

इसराइल के तेल अवीव शहर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्र बताते हैं कि इसराइल ने अरब देशों के ख़िलाफ़ छह दिन तक युद्ध लड़ा और उस युद्ध के बाद इसराइल ने एक बड़े इलाक़े पर अपना कब्ज़ा जमा लिया. यह पूरा इलाक़ा लगभग ख़ाली था, यहां कोई आबादी नहीं थी. जो लोग वहां रहते थे वो युद्ध की वजह से वहां से भाग गए थे.

हरेंद्र मिश्र बताते हैं, ''इस युद्ध के बाद इसराइल ने ग्रीन लाइन के बाहर के इलाक़े पर कब्ज़ा किया. ग्रीन लाइन वो जगह थी जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मान्यता दे रखी थी कि वह इसराइल का इलाक़ा है. ग्रीन लाइन के बाहर का इलाक़ा इसराइल की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन सकता था और इसराइल उसे ख़ाली नहीं छोड़ सकता था. "

''तब इसराइल के सभी नेताओं ने सर्वसम्मति से यह फ़ैसला किया कि वो उस पूरे ख़ाली इलाक़े में बस्तियां बसाएंगे. उस समय इसराइल की राष्ट्रीय नीति का यह हिस्सा बन चुका था. वहां चाहे किसी भी विचारधारा के नेता हों, सभी इन बस्तियों को बसाने की नीति पर एकमत थे.''

इन बस्तियों में ज़्यादा से ज़्यादा लोग रहने के लिए आएं इसके लिए इसराइली सरकार ने वहां के लोगों को कई तरह की छूट दी, उन्हें टैक्स में बहुत छूट दी गई थी. इसके अलावा कई दूसरी सुविधाएं भी प्रदान की गई थीं.

इसराइल, यहूदी

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बस्तियों में रहने को राष्ट्रहित बताया गया

जब इसराइल में इन बस्तियों को बसाया जा रहा था और लोगों को वहां रहने के लिए उत्साहित किया जा रहा था तो लोगों के मन में इस भावना को भी बढ़ावा देने की कोशिश की गई कि इन बस्तियों में रहना एक तरह से राष्ट्रहित में किया गया काम है.

हरेंद्र मिश्र बताते हैं, ''लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि अगर वो वेस्ट बैंक, गोलान की पहाड़ियों या गज़ा पट्टी में जाकर बसेंगे तो यह राष्ट्रहित का काम होगा. इससे इसराइल ने इस पूरे इलाके में सुरक्षा की दृष्टि से अपनी गहरी पैठ जमा ली. लोगों के वहां पर बसने के बाद सुरक्षाबलों की तैनाती भी कर दी गई.''

एक समय ज़रूर इसराइल में इन बस्तियों को बसाने पर सभी पार्टियां एकमत थी लेकिन अब कुछ राजनीतिक दल इनका विरोध करने लगे हैं. वामपंथी दलों का मानना है कि सरकार इन इलाक़ों में बहुत अधिक धन ख़र्च कर रही है.

इन्हीं बस्तियों पर आधारित साल 2010 में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि वेस्ट बैंक के पूरे इलाक़े के महज़ दो प्रतिशत हिस्से में ही बस्तियां बसाने का काम हो सका है. इनके आलोचकों का कहना है कि बस्तियां बसाने के उलट वहां पर खेती और सड़कों का निर्माण अधिक हो चुका है. इस वजह से इस पूरे इलाक़े की सुरक्षा के लिए अधिक सुरक्षाबलों की ज़रूरत पड़ती है.

यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी ऐसी आवाज़ें उठी हैं जिसमें बस्तियों को ग़ैरक़ानूनी बता दिया गया है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ये बस्तियां अंतरराष्ट्रीय नियमों के आधार पर नहीं बसाई गई हैं.

इतना ही ट्रंप ने तो येरूशलम को इसराइल की राजधानी तक घोषित कर दिया था, जबकि पूर्वी येरूशलम अभी भी अरब बहुल इलाक़ा ही है.

फलस्तीन में इन बस्तियों का विरोध होता है.

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क्या यहूदियों को ही बसाने के लिए बनी बस्तियां?

कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को बसाने के लिए इसराइली नीति का अनुसरण करने की बात उठी है तो सवाल उठता है कि क्या इसराइल ने जब बस्तियां बसाने का काम किया तब उन्होंने भी सिर्फ़ यहूदियों को बसाने का काम किया था.

इस पर हरेंद्र मिश्र कहते हैं, ''वेस्ट बैंक, गोलान की पहाड़ियां और गज़ा पूरी तरह ख़ाली था, इसलिए यहां नए लोगों को ही बसाना था और वो नए लोग निश्चित तौर पर यहूदी ही हो सकते थे. इसके साथ ही दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोगों को यहां पर बसाने का काम हुआ. यही वजह है कि इन इलाकों में दक्षिणपंथी राजनीति का बोलबाला अधिक है.''

दुनिया के किसी भी हिस्से में यहूदी रहता हो तो उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह इसराइल में आकर बस सकता है. यही वजह है कि दुनियाभर से कई नए यहूदी इसराइल में आकर बसते रहते हैं.

हरेंद्र मिश्र बताते हैं, ''भारत के उत्तर पूर्व में रहने वाले कुछ यहूदी भी इसराइल की इन बस्तियों में आकर रहने लगे हैं. बाहर से आने वाले इन यहूदियों पर इसराइल की संसद में एक बार सवाल भी उठ चुका है कि क्या इन नए यहूदियों को किसी विशेष योजना के तहत इन बस्तियों में बसाया जा रहा है.''

उत्तर पूर्वी भारत के कुछ राज्यों में बनेई मनेछ नाम से यहूदी समुदाय के लोग रहते हैं.

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यह नीति कामयाब हुई या नाकाम?

इसराइल में बस्तियों को बसाने की नीति किस हद तक कामयाब हुई इस पर कई सवाल हैं. संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने साल 2016 में इन बस्तियों को कोई क़ानूनी वैधता नहीं दी थी.

इस नीति की कामयाबी पर हरेंद्र मिश्र कहते हैं, ''अगर इस इलाक़े की सुरक्षा की बात की जाए तो इसराइल इसमें कामयाब रहा है क्योंकि वहां पर अब उनके अपने लोग रहते हैं इसलिए इसराइल को वहां किसी तरह के हमले का ख़तरा नहीं है, इसी मक़सद से इसराइल ने इस नीति को अपनाया भी था.''

वहीं उसकी नाकामी पर हरेंद्र मिश्र बताते हैं, ''एक उदाहरण गज़ा का भी है, जहां पर सिर्फ़ आठ हज़ार यहूदी ही बसने गए. जबकि इसका बहुत बड़ा क्षेत्र इसराइल के कब्ज़े पर था. इसके उलट गज़ा का वो हिस्सा जहां पर अरब आबादी रहती है वह आज भी फ़लस्तीन के साथ है. इस इलाक़े को दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले इलाक़ों में से एक माना जाता है. इस छोटे से इलाक़े में क़रीब 20 लाख लोग रहते हैं, यहां बहुत से रिफ़्यूजी कैंप भी हैं.''

''इसराइल को यह लगता था कि इन आठ हज़ार यहूदियों को सुरक्षित रखने में ही उनका काफ़ी पैसा और मेहनत लग रही है. इसलिए साल 2005 में इसराइल की सरकार ने गज़ा का इलाक़ा ख़ाली करने का फ़ैसला किया था.''

इसराइल

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संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भी इसराइल की इन बस्तियों को अवैध बताया है. इसके पीछे मुख्य वजह 1949 में हुई जिनेवा संधि है, जिसमें कहा गया है कि किसी कब्जे वाले इलाके में सत्तासीन ताक़त अपने लोगों को स्थापित नहीं कर सकेगी.

हालांकि इसराइल इस संधि पर कहता है कि उस पर यह नियम लागू नहीं होता क्योंकि वेस्ट बैंक पर उसने तकनीकि रूप से कब्ज़ा नहीं किया है.

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