GROUND REPORT: जम्मू कश्मीर में क्यों निशाने पर हैं पुलिसकर्मी?

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से लौटकर
भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा ज़िले में इंस्पेक्टर मोहम्मद अशरफ़ दार को अज्ञात लोगों ने घर के किचन में तब गोलियां मारी थीं जब उनके हाथ में उनकी डेढ़ साल की बेटी थी. वो 22 अगस्त की बक़रीद की रात थी.
जब अशरफ़ के पिता ग़ुलाम दार वहां पहुंचे तो अशरफ़ को गोली लगी हुई थी. उन्होंने बताया, "उसकी डेढ़ साल की लड़की तो उसकी गोद में थी. वो ख़ून से लथपथ थी, हमने उसे ख़ून में से उठाया."
दार का कहना था कि घर में घुसने वालों ने अशरफ़ के दो बच्चों के गले पर चाकू रखा और फिर अशरफ़ को गोली मार दी.
कश्मीर घाटी में चरमपंथी हमलों और ड्यूटी के दौरान विभिन्न घटनाओं में इस साल अब तक जम्मू कश्मीर पुलिस के करीब 40 जवान मारे जा चुके हैं.
शुक्रवार को ही ख़बर आई कि चरमपंथ-प्रभावित दक्षिणी कश्मीर के शोपियां से पुलिस के एक कांस्टेबल और तीन स्पेशल पुलिस अफ़सरों या एसपीओज़ को अगवा कर लिया गया जिनमें से तीन की हत्या कर दी गई.
इससे पहले चरमपंथियों ने पुलिस वालों के करीब दर्जन भर परिवारवालों को अगवा कर लिया गया था लेकिन बाद में उन्हें छोड़ दिया.

जहां एक तरफ़ पुलिस और सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं, दूसरी तरफ़ सच ये भी है कि उन्हें बेहद कठिन और भयावह परिस्थितियों में काम करना पड़ता है.
जम्मू कश्मीर पुलिस में करीब एक लाख 20 हज़ार जवान काम करते हैं.
मोहम्मद अशरफ़ दार की हत्या को याद करते हुए उनके पिता ने बताया, "रात साढ़े आठ बज़े का वक्त था. बाहर लड़के पटाखे चला रहे थे."
अशरफ़ और उनके पिता ग़ुलाम क़ादिर दर ने फ़ैसला किया था कि अगले 15 मिनटों में वो घर के सामने बनी मस्जिद में नमाज़ के लिए जाएंगे.

ग़ुलाम दार और अशरफ़ के घरों के बीच मात्र एक दीवार की दूरी है. दीवार के बीचोंबीच आने-जाने की जगह है.
घर में घुसने के करीब एक मिनट बाद ही गुलाम दर को बेटे के घर से गोलियों की आवाज़ सुनाई दी. आवाज़ सुनकर वो बेटे की घर की ओर दौड़े. उनके पीछे उनकी पत्नी अमीना बेग़म थीं.
दरिंदों ने मारी गोली
जब गुलाम दार अशरफ़ के किचन में पहुंचे तो उन्हें गोली लगी हुई थी, वो खून से लथपथ थे और उनके हाथों में उनकी डेढ़ साल की बेटी थी.
घर की पहली मंज़िल पर कालीन पर बैठे ग़ुलाम दार की आंखों को देखकर लगा कि जैसे उन्होंने अपनी भावनाओं के बांध को रोक रखा है. जैसे कह रहे हों कि 'घर का सबसे बड़ा होने के कारण मैं टूट नहीं सकता'. किचन में गोलियों के निशान ताज़े थे.
अशरफ़ की माँ अमीना बेगम बताती हैं, "दो मिनट पहले ही वो मेरे साथ बैठा था. उसे अपने बेटे की पैंट बदलनी थी, इसलिए वो घर से निकल गया. गोलियों की आवाज़ सुनने के बाद हम किचन में पहुंचे. पता नहीं वो कौन दरिंदे थे. अगर हम उन्हें देख लेते तो उन्हें पकड़ भी सकते थे."

अशरफ़ की उम्र 45 साल थी और उनके पिता के मुताबिक उन्हें कम से कम 10 गोली मारी गई थी.
अशरफ़ के एक लड़के की उम्र 12 और दूसरे की सात साल है, हत्यारों ने उन्हीं के गले पर चाकू रखे थे. थोड़ी देर पहले ही दोनों स्कूल से लौटे थे. उनके शांत चेहरे जैसे भावविहीन थे.
गुलाम दार बताते हैं, "(उस दिन से) वो सिर्फ़ रो रहे थे. मैं उनसे कुछ पूछ नहीं सकता हूं कि क्या हुआ. वो सदमे में हैं, (मैंने घटना के) छह दिन के बाद (उन्हें) स्कूल भेज दिया."
हमेशा बना रहता है ख़तरा
जैसे ही अशरफ़ की डेढ़ साल की बेटी ने हमें कमरे में देखा वो तेज़ आवाज़ में रोने लगी.
पता चला कि वो जब भी किसी अंजान या दाढ़ी वाले व्यक्ति को देखती है तो ऐसे ही रोने लगती है. घटना के बाद घर में डर बैठ गया है. शाम को सभी दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर दी जाती हैं.

इन हत्याओं और पुलिसकर्मियों के परिवार के अगवा होने की घटनाओं पर अधिकारी कह रहे हैं कि सब कुछ ठीक है.
कश्मीर रेंज के आईजी स्वयं प्रकाश पानी ने बीबीसी को बताया, "जवानों ने इस संघर्ष का बहुत अच्छे से संचालन किया है. उन्होंने ये काम क़ानून के दायरे में रहकर किया है... पुलिसकर्मियों का बलिदान बेहद फ़ख़्र की बात है और हम हर शहादत को पूरी तरह सराहते हैं."
लेकिन चरमपंथियों की धमकियों पर आप अकेले में सड़क पर ड्यूटी कर रहे हैं पुलिसवालों से बात करें तो वो खुलकर बात तो करते हैं लेकिन कैमरे से दूर.
अज्ञात लोगों की गोलियों का निशाना बने शुजात बुखारी के अख़बार 'राइज़िंग कश्मीर' के दफ़्तर के नज़दीक ड्यूटी कर रहे एक पुलिसकर्मी ने कहा, "हम बेहद मुश्किल परिस्थितियों में काम कर रहे हैं. हमें महीने का 30,000 रुपए मिलता है. हम 24 घंटे की ड्यूटी करते हैं. ओवरटाइम के कारण तनख़्वाह क़रीब 60,000 रुपए पहुँच जाती है. हमले का ख़तरा हमेशा बना रहता है. हमें छुट्टियां भी नहीं मिलतीं. आप हमारी बात एसी कमरों में बैठे अफ़सरों तक ज़रूर पहुँचाएँ."

उधर दबे स्वरों में पुलिस अधिकारी याद दिलाते हैं कि पुलिसकर्मी और चरमपंथी कश्मीर के एक ही समाज से आते हैं और दोनों पक्ष या उनके परिवार एक दूसरे की पहुँच से दूर नहीं.
पुलिस में करीब 30 हज़ार एसपीओज़ काम करते हैं. ये एसपीओज़ साढ़े पांच या छह हज़ार रुपए की बेहद कम तनख़्वाहों पर काम करते हैं.
एसपीओज़ की मुश्किल
चरमपंथियों के खिलाफ़ कार्रवाइयों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. जम्मू और कश्मीर पुलिस ने साल 1994-95 में एक नए दस्ते का गठन किया था. इस दस्ते का नाम एसपीओज़ या स्पेश पुलिस ऑफ़िसर्स रखा गया था.
पूर्व डीजीपी डॉक्टर एसपी वैद्द ने बीबीसी हिंदी के हमारे साथी माजिद जहांगीर को बताया कि इस दस्ते के गठन से लेकर आज तक क़रीब 500 एसपीओ चरमपंथी हमलों या चरमपंथियों के ख़िलाफ़ चलाए गए ऑपरेशंस में मारे गए हैं.
चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियानों में हिस्सा लेने के अलावा इन एसपीओ को विभाग के दूसरे कामों में भी लगाया जाता है.
पिछले दिनों चरमपंथियों की धमकियों के कारण कई एसपीओ ने मस्जिदों में जुमे के दिन ऐलान किया कि वे अपनी नौकरियां छोड़ रहे हैं.

दक्षिणी कश्मीर के एसपीओ जावेद अहमद (बदला हुआ नाम) के गांव में भी चरपमंथियों का धमकी भरा पत्र आया कि वो नौकरी छोड़ दें.
उनके इलाके से करीब 100-150 लड़के एसपीओज़ के तौर पर पुलिस में काम करते थे.
गांव में धमकी भरी चिट्ठी मिलने पर जावेद के साथ 20-25 लड़के अफ़सरों को बिना बताए घर वापस लौट आए.
जावेद और उनके साथ के सात-आठ लड़कों ने तो जुमे की नमाज़ के दिन गांव की मस्जिद से लाउडस्पीकर पर घोषणा भी कर दी कि वो नौकरी छोड़ रहे हैं.
घर के बाहर बरामदे में एक ऊंची फ़र्श पर पांव सिकोड़कर बैठे जावेद ने मुझे बताया, "मस्जिद में हम माफ़ी मांगते हैं कि हम दोबारा एसपीओ नहीं बनेंगे. हम घर में बैठेंगे. हम इस्तीफ़ा देते हैं. हमें मस्जिद पर यही बोलना पड़ता है. जुमे के दिन वहां गांव के सभी लोग जमा होते हैं."

वो अपने ऊपर हुए हमले को याद करते हैं.
जावेद ने कहा, "मैं घर पर था. जब मैं पास की दुकान पर काम से गया तो (लड़कों ने) मुझे पकड़ा और फ़ायर किया... उनके पास बंदूक थी... वो दो लोग थे."
पुलिस अधिकारी इन इस्तीफ़ों को आधिकारिक नहीं मान रहे हैं क्योंकि उनके मुताबिक इन इस्तीफ़ों को प्रक्रिया के तहत विभाग को नहीं भेजा गया.
अधिकारी ये भी याद दिलाते हैं कि जब पुलिस की भर्ती होती है तो नौकरियों के लिए लंबी लाइनें लगती हैं.
समस्या का हल क्या है?
जावेद अहमद के घर से थोड़ी ही दूर एक अन्य गांव में रहने वाले एक और एसपीओ शब्बीर खान (बदला हुआ नाम) ने बताया कि एसपीओ बनने का मुख्य कारण इलाके में बेरोज़गारी है.

शब्बीर ने एसपीओ के पद पर पांच से छह साल काम किया और चरमपंथियों की धमकियों और घर पर पत्थरबाज़ी के बाद नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया.
उन्होंने चरमपंथियों के खिलाफ़ कई कार्रवाइयों में हिस्सा लिया है और गोलियों से बाल-बाल बचे हैं.
वो बताते हैं, "मेरा एक दोस्त ग्रैजुएट था. वो खाना बनाता था लेकिन धमकी और घर पर पत्थरबाज़ी के बाद मैंने सोचा, जान है तो जहान है."
लेकिन इस समस्या का क्या हल है?
जानकारों को मुताबिक चरमपंथ में बढ़ोत्तरी का एक कारण पुलिस का पूर्व चरमपंथियों और उनके परिवार के साथ व्यवहार है.
इस कारण ये लोग समाज में दोबारा वापस नहीं आ पाते और ये चक्र चलता रहता है.

शोपियां के नाज़नीनपुरा इलाके में देर रात मेरी मुलाकात मोहम्मद हुसैन शाह से हुई.
स्थानीय लोगों ने बताया कि चरमपंथियों की तलाश में बेहद एलर्ट मुद्रा में सुरक्षाबलों की टुकड़ियां देर रात निकलती हैं, इसलिए मैं संभल कर रहूं.
मोहम्मद हुसैन शाह का बेटा सैयद रुबानी हुसैन 18 जुलाई से गायब है. गायब होने के दो तीन बाद उसकी फ़ोटो वायरल हुई जिसमें उसके हाथ में बंदूक थी.
पता चला कि सैयद रुबानी हुसैन अल बद्र चरमपंथी संगठन में शामिल हो गया था. मोहम्मद हुसैन शाह अपने बेटे के चरमपंथी बनने में पुलिस और सुरक्षाबलों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
उनका आरोप है कि पुलिस और सुरक्षा बलों ने उनके बेटे को इतना परेशान किया, उसको इतना पीटा कि "उसने बंदूक उठा ली".



वो कहते हैं, "फ़ौजियों ने इतने थप्पड़ मारे. (उन्होंने) हथियार उठाया मेरे बच्चे के कंधे पर रखा, (उसका) फ़ोटो खींचा. एक और बेटे की पिटाई की. (मेरे बेटे ने उनसे कहा, आपने) मेरा करियर आपने ख़राब किया. (उससे पहले उसे) कश्मीर पुलिस ने उठाया था, (उसकी) पिटाई की (थी)."
श्रीनगर के बेहद सुरक्षित गुपकार रोड पर रह रहे रिटायर्ड डीआईजी एएम वटाली के अनुसार इन घटनाओं से पुलिसकर्मियों के हौसलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
1988 से झेल रहे हैं चरमपंथ
वो कहते हैं, "इन घटनाओं से पुलिस अफ़सरों के हौसलों पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. क्योंकि ये लोकल हैं और वो 1988 से चरमपंथ को देख रहे हैं... शिकायत ये आती है कि उनको (चरमपंथियों को) सेटल नहीं होने देते हैं. एक बार किसी ने सरेंडर कर दिया तो उसको तंग किया जाता है. इतना तंग किया जाता है कि वो फिर हथियार उठाता है. ऐसे मामले हैं जहां बाप-बेटों ने हथियार उठाए. ज़रूरत है एक सोची समझी रिहैबिलिटेशन नीति की."
उधर अपना बेटा खो चुके ग़ुलाम क़ादिर दार के मुताबिक जब भी वो रात में आंखें बंद करते हैं तो उनका बेटा उनकी आंखों के सामने नज़र आता है.

वो कहते हैं, "मैं हर दिन, हर वक्त उसे याद करता हूं. जब तक मैं ज़िंदा हूं, तब तक मैं उसे याद करूंगा."
जिन्होंने उनके बेटे को मारा वो उनसे क्या कहेंगे?
वो कहते हैं, "मैं उनसे कहूंगा, ऐसा काम कभी नहीं करना चाहिए.... सज़ा देने वाला ऊपर है, कोई इंसान सज़ा नहीं दे सकता है. हमें सज़ा मिल गई. वो हमें वापस नहीं मिलेगा... जिसने भी ये काम किया अल्ला उन्हें हिदायत करे (सही रास्ता दिखाए)."
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