फ़ारूक़ अब्दुल्लाह: 'डिस्को मुख्यमंत्री' से लेकर भारत माता की जय तक

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- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'मेरे साथ हाथ उठाकर एक नारा दीजिए. भारत माता की जय. भारत माता की जय...भारत माता की जय. जय हिंद...जय हिंद...जय हिंद'
बीते दिनों में सियासी मंचों पर अक्सर ऐसी हुंकार तब-तब सुनाई दी है, जब पीएम नरेंद्र मोदी या बीजेपी के नेता मंच पर मौजूद थे. लेकिन संभवत: बीते दिनों में ये पहला मौक़ा होगा, जब नरेंद्र मोदी और बीजेपी से जुड़े लोग मंच के नीचे दर्शकदीर्घा में थे और 'भारत माता की जय' के नारे लगाकर महफिल कोई और लूट रहा था.
अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने के लिए 20 अगस्त को सर्वदलीय सभा हुई थी. इसी सभा में ये नारे जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रेसिडेंट फ़ारूक़ अब्दुल्लाह लगा रहे थे. नारों की गूंजती आवाज़ थमी तो कैमरा मंच के नीचे कुर्सियों पर बैठे पीएम मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह और कांग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद की तरफ मुड़ा. सब मुस्कुरा रहे थे लेकिन पीएम मोदी के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे.
80 साल के फ़ारूक़ के जोशीले नारों के बाद उभरी ये तस्वीर और वाकया सोशल मीडिया पर चर्चा में है. लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है, जब फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने कोई महफिल लूटी है.
आमतौर पर एक नेता से ज़्यादातर लोग जिस गंभीर छवि की उम्मीद करते हैं, फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ऐसी छवियों को कई बार धराशायी करते नज़र आते हैं. इसमें कश्मीर की बहस के बीच खुद के हिंदुस्तानी होने की बात पर ज़ोर देना भी है और हिंदी फ़िल्म एक्ट्रेस शबाना आज़मी को बाइक पर बैठाकर घुमाना भी.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने कब-कब लूटी महफिलें और क्या है फ़ारूक़ की कहानी....

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फ़ारूक़ अब्दुल्ला की लव लाइफ़ वाया तीन तलाक़ का ख़ौफ़
'आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्च हर ज़बान पर...सबको मालूम है और सबको ख़बर हो गई.'
अब से कुछ साल पहले फ़ारूक ने इस गाने को गाया था, लेकिन इस गाने को ज़िंदगी में फ़ारूक ने उतारा था साल 1965 में.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह की पॉलिटिक्स क्या है? इस बात की चर्चा तो अक्सर होती है, लेकिन फ़ारूक़ की ज़िंदगी में जो रंगीनियत है, वो भी कम दिलचस्प नहीं है.
शेख अब्दुल्लाह चाहते थे कि फ़ारूक़ डॉक्टर बनें. लिहाज़ा फ़ारूक़ ने जयपुर (राजस्थान) से पढ़ाई की. फिर वो प्रैक्टिस के लिए इंग्लैंड चले गए. वहां प्रैक्टिस के दौरान नोरफॉक के यारमाउथ हॉस्टिपल में फ़ारूक़ मेडिसन की प्रैक्टिस कर रहे थे, तभी छह फुट से लंबे इस कश्मीरी नौजवान की नज़रें एक ब्रिटिश मेडिकल स्टूडेंट से मिलीं. ये लड़की थी मौली.
सिमी ग्रेवाल के शो Rendezvous में फ़ारूक़ अब्दुल्लाह साल 1999 में अपनी मोहब्बत का पूरा किस्सा बताते हैं.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह कहते हैं, ''मौली एक ऐसी लड़की लगी, जिसमें सारी खूबियां थीं. उसको पार्टियों में जाना पसंद नहीं था. मुझे लगा कि यही मेरे बच्चों की मां बन सकती है. मैं मौली को प्रपोज़ करता हूं. जवाब में वो कहती हैं- क्या तुमने शराब पी हुई है. फ़ारूक़ इनकार करते हैं. तय होता है कि अगली सुबह इस पर बात की जाएगी.''
अगली सुबह ये गोरा चिट्टा कश्मीरी लड़का फ़ारूक़ कुछ सहमा सा अपनी मोहब्बत मौली से मिलने पहुंचा. मौली जवाब देती हैं- मुझे मंज़ूर है.
फ़ारूक की मोहब्बत तो शुरू हो गई थी लेकिन मौली के पिता से मिलना बाक़ी था. मौली फ़ारूक़ को समझाती हैं, ''डैड से बात करो चलकर. लेकिन उनके सामने अपनी आदत के मुताबिक़ हाथों से खाना मत खाना.''
फ़ारूक़ मौली के डैड से कहते हैं, ''मैं आपकी बेटी से प्यार करता हूं. शादी करना चाहता हूं.''
इस मुलाक़ात के बारे में फ़ारूक़ बताते हैं, ''मौली के डैड ने पूछा- तो तुम मुसलमान हो? मैंने हां में जवाब दिया. लेकिन उन्होंने इस्लाम के बारे में किताबें पढ़ी हुई थीं. तीन तलाक़ को लेकर उनके मन में शक था, उन्होंने पूछा कि क्या ऐसा है. मैं उनके शक को दूर किया. आख़िर में वो बोले- मेरी बेटी का साथ तो नहीं छोड़ोगे.''
सालों बाद फ़ारूक़ आँखों में चमक लिए कहते हैं, ''वो दिन था और आज का दिन है...साथ नहीं छूटा है.'

बीमार 'शेर-ए-हिंद' और डॉक्टर फ़ारूक़ की पॉलिटिक्स में एंट्री
साल 1974 के बाद शेख़ अब्दुल्लाह बीमार रहने लगे थे.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने एक इंटरव्यू में कहा था, ''अब्बा बीमार रहने लगे थे. वो लोगों से बात कम ही बात कर पा रहे थे. मुझे महसूस हुआ कि लोगों तक उनकी बात पहुंचाने के लिए एक ब्रिज की ज़रूरत है.''
फ़ारूक़ कहते हैं, ''मैंने मौली से कहा कि मैं अपने अब्बा को अकेले नहीं छोड़ सकता.'' इंग्लैंड में गोल्फ खेलना पसंद करने वाले और ब्रिटिश नागरिक बन चुके फ़ारूक़ 1975 में वतन वापसी करते हैं.
इसी साल फ़ारूक़ राजनीति में घुसने की कोशिश करते हैं. लेकिन ब्रिटिश नागरिकता होने की वजह से ये संभव नहीं हो पाया था. फिर मोरारजी देसाई की सरकार फ़ारूक़ को भारतीय नागरिकता देती है. इसके बाद साल 1980 में फ़ारूक़ पहली बार सांसद चुने गए.
- 1982: पहली बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने
- 1986: दूसरी बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री चुने गए
- 1996: जम्मू -कश्मीर के तीसरी बार सीएम बने, इसके बाद राष्ट्रपति शासन लगा
- 2002 और 2009: राज्यसभा के सांसद बने
- 2009: श्रीनगर लोकसभा सीट से जीते
- 2009-2014: यूपीए-2 सरकार में केंद्रीय कैबिनेट में रहे
- 2014: फ़ारूक़ लोकसभा चुनाव हारे
- 2017: श्रीनगर लोकसभा उप-चुनाव में फ़ारूक़ ने जीत दर्ज की
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में सियासत के बारे में फ़ारूक़ ने कहा था, "मैं मूल रूप से डॉक्टर हूँ. डॉक्टर अगर किसी मरीज को ठीक करता है तो वह कभी नहीं भूलता. लेकिन सियासत में कुछ भी करो, लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं. आप हज़ार काम कर लीजिए, लेकिन दो काम नहीं कर सके हों तो लोग बस उन दो कामों पर ही अटके रहते हैं.''

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जब शबाना आज़मी को फ़ारूक़ ने बाइक पर घुमाया...
फ़ारूक़ 1982 में जब पहली बार जम्मू-कश्मीर के सीएम बने थे, तब कश्मीर के हालात आज जैसे नहीं थे.
मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसे कई मौक़े रहे, जब अब्दुल्लाह ने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए काम किए. इनमें अपनी सुरक्षा के साथ लापरवाही जैसे कई किस्से शामिल हैं.
80 के दशक में एक ऐसा वाकया हुआ जो भारतीय राजनीति में शायद कभी नहीं हुआ था. शबाना आज़मी की फ़िल्मों की हर जगह चर्चा हो रही थी. फिर एक दिन कश्मीर में ख़ूबसूरत डल लेक के पास शबाना आज़मी एक मोटरसाइकिल की पीछे वाली सीट पर बैठकर कश्मीर घूम रही थीं.
इस नज़ारे को देखने वाले लोगों ने ग़ौर किया तो देखा कि ये मोटरसाइकिल फ़ारूक़ अब्दुल्लाह चला रहे थे. बाद के सालों में शबाना आज़मी ने इस वाकये की वजह से फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को प्यार से 'डिस्को मुख्यमंत्री' भी नाम दिया.
शबाना संग बाइक की सवारी पर सालों बाद फ़ारूक़ ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था, ''शबाना जी आईं और मेरी मोटरसाइकिल पर बैठ गईं. वो वाक़या मेरी ज़िंदगी के साथ मानो चिपक सा गया है.''
कश्मीर मसले पर क्या फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने ग़लती की थी?
साल 2006 में फ़ारूक़ ने कहा था, ''मैंने ज़िंदगी में कभी कोई ग़लती नहीं की. मैंने बस एक चीज़ की वो ये कि शबाना आज़मी को बाइक पर लेकर घूमा. क्या शबाना के साथ बाइक पर घूमना ग़लती है? अगर हां तो ये मेरी ग़लती है. वरना मैंने कभी कोई ग़लती नहीं की."

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जब बाप-बेटे की जोड़ी मंच पर कूदी और टूट गया मंच
ऊर्जा से भरपूर फ़ारूक़ अब्दुल्लाह हमेशा ही धमाल मचाने के लिए जाने जाते हैं. यह वाक़या सितंबर 2002 का है, राज्य विधानसभा चुनाव में प्रचार का अंतिम दिन था. फ़ारूक़ और उनके बेटे गांदरबल में एक रैली को संबोधित करने वाले थे.
एक पहाड़ी नदी के ऊपर पटरे रखकर अस्थायी मंच बनाया गया था जहाँ से बाप-बेटे की जोड़ी स्थानीय लोगों को संबोधित करने वाली थी. देर से पहुँचे फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने जनता का उत्साह बढ़ाने का फ़ैसला किया. उन्होंने अपने शर्मीले बेटे उमर को मंच पर खींचा और भाषण देने की जगह कश्मीरी में नारे लगाते हुए मंच पर कूदने लगे, इतना ही नहीं उन्होंने उमर को भी कूदने पर मजबूर कर दिया.
ग़ज़ब का नज़ारा था, लोगों में उत्साह भर गया, फ़ारूक़ ज़ोर-ज़ोर से गाने लगे, अपने चुनाव चिन्ह हल वाला झंडा लहराते हुए उनका कूदना तेज़ से तेज़तर होता गया, तभी ज़ोर की आवाज़ आई और मंच टूट गया. फ़ारुक़ और उमर नीचे नदी में गिरते-गिरते बचे.
इसके बाद भी फ़ारूक़ अब्दुल्लाह का जोश बरक़रार रहा और उन्होंने भाषण कम दिया और चीख़-चीख़कर ख़ूब नारे लगवाए.
खाने-पीने, फिल्में देखने और नाचने-गाने के शौक़ीन रहे फ़ारुक़ अब्दुल्लाह 1990 के शुरुआती दशकों में दिल्ली के कनॉट प्लेस और पंडारा रोड के रेस्तरां में आते-जाते अक्सर दिख जाते थे, पान की दुकान पर खड़े लोगों से इस तरह गप्पें लड़ाते कि मानो वो कश्मीरी नहीं बल्कि दिल्ली वाले हों.

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फ़ारूक़ अब्दुल्लाहकी कुछ दिलचस्प बातें
- पसंदीदा पासटाइम: गोल्फ़ और संगीत
- पसंदीदा फ़िल्में: उमराव जान, ब्लैक, सिंह इज किंग, जोधा अकबर
- पसंदीदा संगीतकार: ए आर रहमान...मगर बाद में फ़ारूक़ को रहमान भटके हुए लगे
- उदासी ख़त्म करने का तरीक़ा: कार में संगीत बजाकर कुदरत के नज़ारे देखना
- पसंदीदा राजनेता: अटल बिहारी वाजपेयी
- फेवरेट हीरोइन: बचपन में मधुबाला, बाद में शबाना आज़मी और बाद के दिनों में ये लिस्ट बढ़ती चली गई....
फ़ारू़क अब्दुल्लाह अपने और बेटे उमर अब्दुल्लाह के बीच फर्क पूछने पर बताते हैं, ''मुझमें और उसमें एक फर्क़ है कि उसकी बीवी जनरल की बेटी है. मजाल है कि उसकी आँख कहीं और उठे. मेरी बीवी अंग्रेज़ है और मैं महिलाओं के बीच खूब उठता-बैठता हूँ.''

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आसाराम से बोले फ़ारूक़- महाराज की जय हो...राम
कश्मीर में 'मिले सुर' नाम से एक प्रोग्राम था. इसे आप कश्मीर का 'इंडियन आइडल' कह सकते हैं. इस प्रोग्राम में फ़ारूक़ कई बार शरीक़ हुए और गाना गाते सुनाई दिए.
ऐसे कई वीडियो आसानी से आपको यू-ट्यूब पर मिल जाएंगे.
ऐसा ही एक वीडियो है फिलहाल जेल में बंद आसाराम के मंच का. इस मंच पर पहुंचे फ़ारूक़ कहते हैं, ''महाराज की जय हो. इससे पहले कि मैं कुछ कहूं. कभी-कभी गा लेता हूं. कुछ आपके सामने सुनाना चाहता हूं. हरि ओम. कब आओगे मेरे द्वार. राम...राम....राम. गली गली ढूंढा. न ही मिले मोहे राम. मोहे श्याम.''
फ़ारूक़ पाकिस्तान के बारे में बात करते हुए कहते हैं, ''महाराज हमारा ये पड़ोसी हमें तंग करता रहता है. वो समझता है कि हम ज़्यादा मुसलमान हैं तो हमें ले जाएं. लेकिन हम भारतीय मुसलमान हैं पाकिस्तानी मुसलमान नहीं हैं.''

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फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के चुटकुले, गाने और डांस प्रेम
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह माहौल को हल्का बनाए रखने के लिए भी जाने जाते हैं. साल 2011 में श्रीनगर के दूरदर्शन स्टूडियो में प्रोग्राम था. छात्र फ़ारूक़ का इंतज़ार कर रहे थे.
फ़ारूक़ इस प्रोग्राम के लिए काफी देरी से पहुंचे. फ़ारूक़ ये समझ चुके थे कि उनके देरी से पहुंचने पर लोग ग़ुस्से में हैं. फ़ारूक़ इस मुश्किल से निकलने का रास्ता खोजते हैं.
स्टूडियो के सोफे में बैठते हुए वो कहते हैं, ''मेरे चेहरे पर ज़रा ढंग से पाउडर लगाओ. इस स्टूडियो में सबसे जवान मैं ही हूं. ध्यान रहे कि मैं जवान दिखूं.'' उस वक्त 73 साल के फ़ारूक़ की ये बात सुनकर सब हँस पड़े.
साल 2015. एनडीटीवी का एक प्रोग्राम था. मंच पर छैल छबीले एक्टर रणवीर सिंह थे. तभी तेज़ आवाज़ में गाना बजता है, 'बजने दे धड़क धड़क ढोल..' इस गाने पर एक तरफ़ 30 साल के रणवीर सिंह थे और दूसरी तरफ़ 77 साल के फ़ारूक़.
गाने की धुन पर जिस रफ्तार में फ़ारूक़ रणवीर उछल रहे थे, 40 साल का फासला ख़त्म हो गया था.
इसके अलावा नवरात्रों में भी फ़ारूक़ गाते नाचते नज़र आते हैं. 2015 में अलगाववादियों को चिढ़ाते हुए एक मंच पर फ़ारूक़ ज़ोर से गाते झूमते दिखे थे. बोले थे- 'चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है.'

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जब चरमपंथियों को छोड़ने की बात पर चीखे फ़ारूक़
1999 में एयर इंडिया विमान का अपहरण हुआ था. फ़ारूक़ अब्दुल्लाह चरमपंथियों को छोड़ने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे.
ऐसी ही एक बैठक के दौरान फ़ारूक़ अब्दुल्लाह चीख पड़े थे.
साल 2000 तक रॉ प्रमुख और फिर कश्मीर मामलों पर तत्कालीन पीएम वाजपेयी के सलाहकार रहे एएस दुलत ने बताया था कि अब्दु्ल्लाह इतने नाराज़ थे कि इस्तीफ़ा तक देना चाहते थे. फ़ारूक़ अब्दुल्लाह हमेशा यह कहते थे कि दिल्ली उन पर विश्वास नहीं करती है.
दुलत ने अपनी किताब 'कश्मीर - द वाजपेयी इयर्स' में लिखा है कि साल 2002 में वाजपेयी ने फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को उपराष्ट्रपति बनाने का वादा किया था जो उन्होंने पूरा नहीं किया.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह वाजपेयी से ही जुड़ा एक किस्सा सुनाते हैं, ''जब वाजपेयी लाहौर गए थे तो उन्होंने मुझसे कहा था कि आप भी चलिए. क्योंकि पाकिस्तानी फ़ारूक़ को पसंद नहीं करते हैं. क्योंकि आप लोग मुझे पाकिस्तानी और आतंकवादी समझते हैं और वो समझते हैं कि मेरी चमड़ी उतार देंगे. जब वाजपेयी लौटे तो मैंने पूछा कि आपने क्या किया जाकर? वो बोले- मैंने बोला कि आप वो हिस्सा रखो और हम ये. लेकिन नहीं हुआ.''

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'फ़ारूक़ साहेब, खुद को भारतीय मानते हैं?'
बीते दिनों चर्चा में रहे पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ भी फ़ारूक़ का एक किस्सा शायद आपको याद हो.
दिसंबर 2017 में एक निजी चैनल के कार्यक्रम में पुण्य प्रसून ने फ़ारूक़ से सवाल पूछा था- क्या आप खुद को इंडियन मानते हैं?
इस सवाल को सुनते ही फ़ारूक़ का पारा गरम हो गया. वो कहते हैं, ''क्या कभी आपको इस पर शक है. मुझे इस पर शक नहीं है. आपको शक है, तभी आपने मुझसे ये सवाल पूछा. आपको ये किसने हक दिया कि आप मुझसे पूछें कि मैं भारतीय हूं या नहीं. यहां बैठे बाकी लोगों से तो आपने नहीं पूछा कि वो भारतीय हैं या नहीं. मैं भारतीय हूं या नहीं...आपकी ये सवाल पूछने की हिम्मत कैसे हुई. आपको एक मनोवैज्ञानिक को दिखाने की ज़रूरत है.''
फ़ारूक़ कहते हैं- मैं भारतीय हूं या नहीं... ये पूछने की कभी हिम्मत मत कीजिएगा.'
इसके बाद इसी साल लोकसभा में भी फ़ारूक़ ये कहते नज़र आए थे, 'मैं हिंदुस्तानी हूं. मैं कभी पाकिस्तानी नहीं रहा था और न कभी होऊंगा.'
अपने भाषण में फ़ारूक़ लोकसभा सदस्य इक़बाल का शेर पढ़ते हैं, ''मज़हब नहीं सिखाता..आपस में बैर रखना. सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा.''
अतीत के पन्नों को पलटें तो फ़ारूक़ का हिंदुस्तान से मुहब्बत नई बात नहीं है. नई बात थी वो चुप्पी जो 20 अगस्त को फ़ारूक़ अब्दुल्लाह के भारत माता की जय नारे लगाने के बाद तस्वीरों में पीएम मोदी के चेहरे पर कुछ लोगों ने देखी थी.
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