#70yearsofpartition: कश्मीर की कहानी कहता पैलेडियम सिनेमा

कश्मीर का पैलेडियम सिनेमा

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    • Author, कनिष्क थरूर और मरियम मारूफ़
    • पदनाम, म्यूज़ियम ऑफ़ लॉस्ट ऑब्जेक्ट्स, बीबीसी

'करोगे याद तो हर बात याद आएगी,

गुज़रते वक़्त की हर मौज ठहर जाएगी'

मरहूम बशर नवाज़ की ग़ज़ल का ये टुकड़ा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों पर बिल्कुल सटीक बैठता है. मुल्क को तक़सीम हुए 70 बरस गुज़र गए. मगर गाहे-बगाहे बंटवारे के ज़ख़्म उभर आते हैं.

कश्मीर का पैलेडियम सिनेमा

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कश्मीर, जिसे कभी जन्नत कहते थे...

भारत और पाकिस्तान की तनातनी की सबसे बड़ी वजह है कश्मीर. जो हड़बड़ी में किए गए बेतरतीब बंटवारे की विरासत है. यह कश्मीर आज भी हिंसा का शिकार है और अमन के लिए तरस रहा है.

मगर कश्मीर में हालात हमेशा से ऐसे नहीं थे. आज़ादी से पहले ये कश्मीर हंसता-खेलता, खिलखिलाता था. इसकी वादियों में गोलियों की गड़गड़ाहट नहीं, लोगों के क़हक़हे गूंजते थे. फ़िज़ां में रंगीनियां थीं.

यही तो वो कश्मीर था जिसके लिए इसे धरती पर जन्नत कहा जाता था.

ये वो दौर था जब कश्मीर की घाटी ज़िंदगी के तमाम रंगों से गुलज़ार हुआ करती थी और इसकी सबसे बड़ी मिसाल था श्रीनगर का पैलेडियम सिनेमा.

कश्मीर का पैलेडियम सिनेमा

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श्रीनगर के लाल चौक पर स्थित पैलेडियम सिनेमा कश्मीर के उस दौर का गवाह था, जब हिंदुस्तान के दो टुकड़े नहीं हुए थे. जब भारत और पाकिस्तान नहीं बने थे. जब कश्मीर कमोबेश आज़ाद रियासत थी. जब यहां डोगरा राजवंश का राज था.

पैलेडियम सिनेमा श्रीनगर के लोगों के मनोरंजन का सबसे बड़ा ज़रिया था. यहां वो तमाम तरह की फ़िल्में देखा करते थे. मर्दों और औरतों के लिए अलग-अलग हिस्से बने हुए थे.

आज की पीढ़ी को पता नहीं...

उस दौर को याद करते हुए कृष्णा मिस्त्री कहती हैं कि पैलेडियम सिनेमा उनके घर के बहुत क़रीब था. वो अपने परिवार के साथ अक्सर वहां सिनेमा देखने जाया करती थीं. इनमें हिंदी फिल्में भी थीं और अंग्रेज़ी फ़िल्में भी थीं.

श्रीनगर के रहने वाले इम्तियाज़ कहते हैं कि पहले सिनेमा देखना एक आदत हुआ करती थी. वो अपने दोस्तों के साथ अक्सर पैलेडियम में सिनेमा देखने जाया करते थे. लेकिन इम्तियाज़ कहते हैं कि आज की पीढ़ी को तो पता भी नहीं है कि श्रीनगर में एक पैलेडियम सिनेमा हुआ करता था.

दिलीप सिंह

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कृष्णा मिस्त्री को आज भी वो इमारत याद है. वो आर्ट डेको स्टाइल में थी. जिसके सामने की तरफ़ दो खंभे हुआ करते थे. अंदर एक तरफ़ टिकट खिड़की थी और दूसरी तरफ़ से अंदर जाने का रास्ता था.

श्रीनगर के महिला कॉलेज में बरसों तक पढ़ाने वाली नीरजा मट्टू की आंखें आज भी उन दिनों को याद करके चमक उठती हैं. वो कहती हैं कि उन्होंने अपने मां-बाप के साथ पैलेडियम सिनेमा जाना शुरू किया था. बाद के दिनों में वो अपने दोस्तों के साथ भी वहां फ़िल्में देखने जाया करती थीं.

नीरजा ने इसी सिनेमाघर में दिलीप कुमार की फ़िल्म शहीद देखी थी. आख़िर में हीरो के मर जाने पर वो ख़ूब रोई थीं. तब नीरजा की मां ने उन्हें डांटा था कि तुम मौज-मस्ती के लिए फ़िल्म देखने गई थी, या रोने के लिए!

तीस और चालीस के दशक में कश्मीर के राजा थे हरि सिंह. कश्मीर की आबादी में मुसलमान बहुमत में थे और कश्मीरियों के नेता थे शेख़ अब्दुल्ला.

शेख़ अब्दुल्ला

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इमेज कैप्शन, 1949 में गांधी पार्क में एक सभा को संबोधत करते हुए शेख़ अब्दुल्ला

रेड स्क्वॉयर की तर्ज पर लाल चौक का नाम

शेख़ अब्दुल्ला ने चालीस के दशक में जब अपनी पार्टी का घोषणापत्र जारी किया तो उसमें उन्होंने कश्मीर के मुसलमानों, पंडितों और सिखों को बराबरी का दर्जा देने की बात कही थी.

श्रीनगर के लाल चौक में अक्सर लोगों का मजमा लगता था. यहां पर तमाम नेता तक़रीरें दिया करते थे. लाल चौक कश्मीर की राजनीति का बहुत बड़ा केंद्र था. सोवियत संघ के प्रभाव से ही इसका नाम रेड स्क्वॉयर की तर्ज पर लाल चौक रखा गया था.

लाल चौक

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इमेज कैप्शन, श्रीनगर का लाल चौक

लाल चौक में सियासी हलचलों का गवाह यहां स्थित पैलेडियम सिनेमा था. यहां तमाम लोग जमा होकर देशभक्ति के गीत गाते थे.

कृष्णा मिस्त्री को उस दौर का एक गाना याद आता है-

'लहरा ए कश्मीर के झंडे,

हलवाले दिलगीर के झंडे,

बाज़ुए बे शमशीर के झंडे'

जब भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की तारीख़ क़रीब आ गई तो कश्मीर के भविष्य को लेकर भी सवाल उठने लगे.

लॉर्ड माउंटबेटन के साथ जवाहर लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना

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इमेज कैप्शन, लॉर्ड माउंटबेटन के साथ जवाहर लाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना

कश्मकश में था कश्मीर

भारत चाहता था कि कश्मीर की रियासत उसका हिस्सा बने. भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की नज़र में शेख़ अब्दुल्ला ही कश्मीर के असली नुमाइंदे थे. वो ही कश्मीरियों को भारत के साथ आने के लिए राज़ी कर सकते थे.

मगर कश्मीर के भारत में विलय का फ़ैसला महाराजा हरि सिंह को करना था. हरि सिंह कोई फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे.

कश्मीर की ज़्यादातर आबादी मुसलमान होने की वजह से पाकिस्तान इस पर अपना हक़ समझता था.

1947 में भारत और पाकिस्तान आज़ाद हो गए. मगर कश्मीर कश्मकश में था. स्थानीय लोग महाराजा के ख़िलाफ़ थे. अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कबाइलियों के ज़रिए कश्मीर पर हमला बोल दिया. कबाइली हमलावरों ने कश्मीर में लूट-पाट और मार-काट मचानी शुरू कर दी.

नेहरू

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सेना को कश्मीरियों का साथ मिला

हालात से घबराए महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी. साथ ही उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय के काग़ज़ पर दस्तख़त कर दिए. भारतीय सेनाओं ने कबाइली हमलावरों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया.

इस अभियान में भारतीय सेना को कश्मीरियों का भी ख़ूब साथ मिला. महाराजा के ख़िलाफ़ आंदोलन चला रहे शेख़ अब्दुल्ला ने कश्मीर के लोगों को एकजुट किया.

नीरजा कहती हैं कि कश्मीरी लोगों ने भी भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी.

कश्मीर

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कृष्णा और नीरजा को याद है कि इस दौरान महिला स्वयंसेवियों को भी हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी. वो लोग अक्सर लाल चौक में पैलेडियम सिनेमा के सामने जमा हुआ करते थे.

कृष्णा कहती हैं कि उस दौरान उनकी टोलियां पैलेडियम सिनेमा के सामने मार्च किया करती थी. आज ये बात भले अजीब लगे, मगर उस दौर में कश्मीर की लड़कियां मर्दों के कंधे से कंधा मिलाकर चलती थीं.

'कश्मीर का भारत में विलय स्थायी नहीं था'

कृष्णा के भाई पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई में मारे गए थे. उनकी अंतिम यात्रा पैलेडियम सिनेमा के सामने से होकर गुज़री थी. उसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे.

कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच ये पहली लड़ाई थी. जब ये जंग ख़त्म हुई तो कश्मीर का दो तिहाई हिस्सा भारत के हाथ में आया, जबकि एक तिहाई पर पाकिस्तान का क़ब्ज़ा हो गया.

1948 में जंग ख़त्म होने के बाद नेहरू श्रीनगर आए. उन्होंने लाल चौक पर तिरंगा फहराया और शेख़ अब्दुल्ला के साथ लोगों को संबोधित किया. ये सभा पैलेडियम सिनेमा के सामने ही हुई थी.

श्रीनगर का पैलेडियम सिनेमाघर

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कश्मीर में उस वक़्त से शुरू हुई सियासी उठा-पटक आज तक जारी है. हालांकि पिछली सदी के पचास से अस्सी के दशक तक कश्मीर में कमोबेश अमन का माहौल रहा.

लेकिन, अस्सी के दशक के आख़िर में 1989 में कश्मीर में चुनावों के बाद हालात पूरी तरह से बदल गए.

ज़बरदस्त हिंसा की चपेट में आया कश्मीर

अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया. लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा.

कश्मीर

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भारतीय सुरक्षा बलों पर भी ज़ुल्म करने के आरोप लगे. बड़ी तादाद में लोग मारे गए.

हिंसा के चलते श्रीनगर के तमाम सिनेमाघर बंद हो गए. क्योंकि चरमपंथी इसके ख़िलाफ़ थे. वो इसे ग़ैर इस्लामिक कहते थे.

श्रीनगर के इम्तियाज़ कहते हैं कि वो अपने दोस्तों के साथ अक्सर सिनेमा देखने जाया करते थे. लेकिन कश्मीर में उग्रवाद के चलते पैलेडियम सिनेमा भी बंद हो गया. इसे ग्रेनेड के ज़रिए उड़ा दिया गया था.

पिछले तीस सालों से कश्मीर में हालात कमोबेश जस के तस हैं. आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए भारत ने कश्मीर में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट लागू किया हुआ है. चरमपंथियों के ख़िलाफ़ लगातार अभियान चलाया जा रहा है. कई बार इसके शिकार आम कश्मीरी भी होते हैं.

कश्मीर

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इम्तियाज़ कहते हैं कि आज तो उन्हें अपने घर से निकलने में भी डर लगता है. वो घर से सीधे दुकान जाते हैं और दुकान से वापस घर आ जाते हैं.

आते-जाते इम्तियाज़ पैलेडियम सिनेमा के खंडहर के सामने से गुज़रते हैं. उन्हें उन दिनों की याद आ जाती, जब वो यहां अपने दोस्तों के साथ फ़िल्में देखने आया करते थे.

आज उसके खंडहरों की तकलीफ़ को बशर नवाज़ के अश'आर बड़ी ख़ूबी से बयां करते हैं...

'गली के मोड़ पर सूना सा कोई दरवाज़ा

तरसती आंखों से रस्ता किसी का देखेगा

निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी'

(#70yearsofpartition सिरीज़ के तहत पेश की गई ये कहानी बीबीसी के रेडियो कार्यक्रम 'म्यूज़ियम ऑफ़ लॉस्ट ऑब्जेक्ट्स' का हिस्सा है. मूस कार्यक्रम सुनने के लिए यहां क्लिक करें. )

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