कश्मीर में नेताओं के बिना कैसी राजनीति और कैसा लोकतंत्र?-विश्लेषण

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर का विशेषाधिकार समाप्त करने के बाद से ही राजनीतिक गतिविधियाँ बंद हैं.
मार्च 2015 में जम्मू-कश्मीर में जब विपरीत विचारधारा की बीजेपी और पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाई तो इसे लोकतंत्र में एक नए प्रयोग के तौर पर देखा गया. जून 2018 में ये गठबंधन टूटा और राज्य एक बार फिर गवर्नर के शासन में चला गया. दिसंबर 2018 में यहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.
इधर जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने और नई सरकार के गठन की मांग उठ रही थी और उधर दिल्ली में कोई और ही पटकथा लिखी जा रही थी. फिर अचानक 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक विशेषाधिकार को समाप्त करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया.
राजनीति में सक्रिय नेताओं की धरपकड़ कर उन्हें नज़रबंद करके सख़्त लॉकडाउन लगा दिया गया.
पाँच अगस्त के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य नहीं रहा बल्कि दो केंद्र शासित प्रदेश हैं जिनका शासन दिल्ली से नियुक्त प्रतिनिधि चला रहे हैं, विधानसभा का अस्तित्व नहीं है इसलिए राजनीति का कोई केंद्र ही नहीं बचा है.
अब एक साल बाद ये सवाल उठ रहा है कि कश्मीर में लोकतंत्र बचा भी है या नहीं? लोकतंत्र का मतलब होता है जनता का शासन यानी जनता अपने बारे में फ़ैसले लेती है. जनप्रतिनिधि चुनती है जो क़ानून बनाते हैं और सरकार चलाते हैं.
कश्मीर की वरिष्ठ पत्रकार और कश्मीर टाइम्स अख़बार की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन मानती हैं कि कश्मीर में लोकतंत्र अब अंतिम सांसें ले रहा है और राजनीतिक प्रक्रिया पूरी तरह से रुकी हुई है.

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नेता क़ैद, राजनीतिक गलियारों में ख़ामोशी
अनुराधा भसीन का मानना है कि पिछले एक साल में कश्मीर में बिलकुल ख़ामोशी रही, उसके बाद कुछ लोगों ने आहिस्ता-आहिस्ता बोलना शुरू किया है लेकिन मुख्यधारा की पॉलिटिक्स के, हिंदुस्तान के लोकतंत्र में यक़ीन रखने वाले राजनीतिक लोग अभी तक हिरासत में हैं या उन्हें नज़रबंद रखा गया है.
वो कहती हैं, ''कुछ को बोलने की इजाज़त है, कुछ को बोलने की इजाज़त नहीं है. जिन्हें बोलने की इज़ाजत है भी वो भी सीमित है. जो मुख्य मुद्दा है, कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का, उस पर कोई बात नहीं हो रही है. जब तक राजनीतिक अभिव्यक्ति पर रोक रहेगी, उसका दायरा सीमित रहेगा. कुछ लोगों को कुछ ही मुद्दों पर बोलने की इजाज़त रहेगी तो लोकतंत्र कैसे ज़िंदा रहेगा? अगर ऐसे ही हालात रहते हैं तो कहीं से भी राजनीतिक प्रक्रिया के शुरू होने की उम्मीद नज़र नहीं आती."
श्रीनगर में बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर का भी यही कहना है कि कश्मीर के सबसे बड़े मुद्दे पर ही बात नहीं हो पा रही है तो फिर राजनीति या लोकतंत्र के क्या मायने हैं.
रियाज़ कहते हैं, ''कश्मीर में राजनीति का जो सबसे बड़ा मुद्दा रहा है, जम्मू-कश्मीर का संवैधानिक विशेषाधिकार, उसकी अब कोई बात नहीं कर पा रहा है. पांच अगस्त 2019 को ऐसा हुआ जैसे एक इमारत को पूरी तरह गिरा दिया गया हो. स्वायत्ता या एक तरह से भारतीय संघ के तहत जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा बरकरार रखना ही कश्मीर की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा रहा है.'

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ऐसे हालात में कैसे बचेगा लोकतंत्र?
रियाज़ कहते हैं कि कश्मीर के बड़े नेता इस मुद्दे पर ही राजनीति करते रहे थे और जब विशेषाधिकार समाप्त किया गया तो सभी बड़े नेताओं को पूरी तरह ख़ामोश कर दिया गया. उन्हें या तो नज़रबंद कर दिया गया या हिरासत में ले लिया गया. कुछ को जेलों में भी रखा गया.
कश्मीर का विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया और यहां के नेता इस पर विरोध तक नहीं कर पाए. उनसे बॉन्ड भरवा लिए गए, कहा गया कि इस मुद्दे पर बात मत करे. ऐसी परिस्थिति में कौन राजनीति करेगा और राजनीति होगी कैसे? लोकतंत्र कैसे यहां बचा रहेगा?'
भारत सरकार यह तर्क देती रही है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से कश्मीर में हालात सामान्य हो रहे हैं और चरमपंथ ख़त्म हो गया है.
सरकार के इस दावे पर अनुराधा भसीन कहती हैं, ''उन्होंने तर्क दिया कि कश्मीर में मिलिटेंसी (चरमपंथ) की वजह अनुच्छेद 370 है, जब से ये अनुच्छेद हटा है, मिलिटेंसी ख़त्म नहीं हुई है बल्कि बढ़ गई है. डेटा किसी भी नज़रिए से देखें, चरमपंथ बढ़ा हुआ ही नज़र आएगा.''

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'चरमपंथियों को मारने से नहीं ख़त्म होगा चरमपंथ'
भसीन का मानना है कि सिर्फ़ चरमपंथियों को मारने से ही चरमपंथ ख़त्म नहीं होगा.
उनके मुताबिक़ सरकार अगर कहती है कि 150 से ज़्यादा चरमपंथी मार दिए गए हैं तो इसका मतलब है कि चरमपंथ कम हो रहा है. लेकिन उतने ही चरमपंथी बढ़ भी रहे हैं. बहुत से युवा लापता हुए हैं, कुछ एनकाउंटर में मारे भी गए हैं.
देश के गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कह चुके हैं जम्मू-कश्मीर में ग्रासरूट डेमोक्रेसी को बढ़ावा दिया जाएगा जिसके लिए पंचायत स्तर से लेकर ऊपर तक, राजनीतिक नेताओं की नई पौध तैयार की जाएगी.
अनुराधा भसीन कहती हैं, "बीते दो महीनों के भीतर ही पंचायत के दो सदस्य मारे गए हैं. एक तरफ़ सरकार पंचायत स्तर पर राजनीतिक को मज़बूत करने की बात कर रही है और दूसरी तरफ़ वहां सुरक्षा ही नहीं है".
जम्मू-कश्मीर में इन दिनों राजनीतिक सरगर्मियां पूरी तरह से बंद हैं और जो नेता सक्रियता दिखा भी रहे हैं वो बस बयान देने तक सीमित हैं.

नई राजनीतिक पार्टी
कश्मीर एक नई पार्टी अस्तित्व में आई है. इस पार्टी का नाम 'अपना पार्टी' है. इस पार्टी से जुड़े कई लोग पहले पीडीपी के कार्यकर्ता या मंत्री तक रहे हैं. पीडीपी से अलग होकर इन लोगों ने अपनी एक अलग पार्टी बनाई है. अल्ताफ़ बुख़ारी इसके नेता हैं.
बुख़ारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मिले हैं. उनकी कुछ आवाज़ें ज़रूर सुनाई देती हैं लेकिन उनकी राजनीति भी अपने बयान देने और बयानों को अख़बारों में छपवाने तक सीमित है.
बुख़ारी के बयान सड़कें बनवाने या रोज़गार के मुद्दे तक ही हैं, उन्हें कश्मीर के स्पेशल स्टेटस के बारे में या लोकतांत्रिक आज़ादी के बारे में बातें करते हुए नहीं सुना जाता.
गृह मंत्री अमित शाह कहते रहे हैं कि वो कश्मीर में मिलिटेंसी को खत्म करके एक नया राजनीतिक ढाँचा तैयार किया जा रहा है.
दूसरी ओर अनुराधा भसीन कहती हैं, "अगर आप ऐसा राजनीतिक ढांचा बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें हर मुद्दे पर दिल्ली से नियंत्रण हो तो फिर ऐसी राजनीति का लोकतंत्र के साथ बहुत तालमेल बैठ नहीं पाएगा. राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने में जितनी देर की जाएगी उतना ही लोगों का ग़ुस्सा भरता जाएगा."
कश्मीर घाटी में राजीव गांधी के ज़माने से जनभावनाओं और दिल्ली की सरकारों की नीतियों का टकराव ही चलता रहा है, कभी विरोध दबा रहा है, कभी उग्र हो गया लेकिन पूरी तरह से खत्म कभी नहीं हुआ, अब बदली हुई परिस्थितियों में भी वह दबा हुआ है, खत्म नहीं हुआ है.
अनुराधा भसीन कहती हैं, "कश्मीर के लोगों में इस बात को लेकर रोष है कि पिछले साल जो फ़ैसले हुए उनमें किसी भी स्तर पर उन्हें शामिल नहीं किया गया. वो फ़ैसले ग़लत थे या सही ये अलग बात है, लेकिन उनमें किसी भी तरह कश्मीर के लोगों को शामिल नहीं किया गया".
वहीं, रियाज़ मसरूर के मुताबिक़, "लोकतंत्र का मतलब होता है कि लोगों की ख़ुद की सरकार और लोगों का उस सरकार में हिस्सेदारी लेना. कश्मीर में अभी ऐसा बिलकुल नहीं हैं. कश्मीर में दो-चार सलाहकार हैं जो गवर्नर के साथ मिलकर बड़े फ़ैसले करते हैं. क़ानून बनाने में या सरकारी फ़ैसलों में जनता की किसी भी तरह की कोई हिस्सेदारी नहीं है".

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अलगाववादी और मुख्यधारा की राजनीति
जून 2018 में गवर्नर राज के साथ ही विधानसभा रद्द हो गई थी. और अभी केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं, यह भी मालूम नहीं है कि अगर भविष्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू हुई तो उसका स्वरूप क्या होगा.
रियाज़ कहते हैं, "कश्मीर में भारत का समर्थन करने वाले सभी नेताओं को या तो नज़रबंद कर दिया गया था या हिरासत में ले लिया गया था. बीजेपी के साथ गठबंधन की सरकार चलाने वाली महबूबा मुफ़्ती को तो अभी तक रिहा नहीं किया गया है. पब्लिक सेफ़्टी एक्ट यानी पीएसए के तहत उनकी हिरासत को तीन महीने और बढ़ा दिया गया है. ऐसे में राज्य में लोकतांत्रिक राजनीति कैसे संभव हो सकती है?"
बीते 73 साल में कश्मीर की राजनीति दो विचारधाराओें में बंटी थी, एक और अलगाववादी थे और दूसरी तरफ़ भारत का समर्थन करने वाले लोग. अब अलगाववादियों और मुख्यधारा की राजनीति करने वालों में कोई अंतर नहीं रह गया है. ऐसे में कश्मीर में फिर से राजनीतिक प्रक्रिया का शुरु होना बहुत आसान नहीं होगा.
रियाज़ कहते हैं, 'पार्टियों का लोगों के साथ गांव से लेकर शहर तक हर स्तर पर एक कनेक्शन होता है. पांच अगस्त के बाद से अब वो नहीं रहा है. अब कोई नेता दिखाई नहीं देता है. कोई नेता किसी से नहीं मिल रहा है. पब्लिक और नेताओं के बीच पूरी तरह से संबंध टूट से गए हैं.'
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केंद्र सरकार में मंत्री रहे सैफ़ुद्दीन सोज़ के बारे में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो बिल्कुल आज़ाद हैं लेकिन उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है.
पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि कश्मीर में हिंसा थी, चरमपंथ था, उनकी पार्टी के कई कार्यकर्ता मारे भी गए, बावजूद इसके वो भारत का समर्थन करते रहे और फिर उन्हें ही नज़रबंद कर दिया गया.

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लोगों का भरोसा जीतकर ज़िंदा होगा लोकतंत्र
अनुराधा भसीन मानती हैं कि इस समय सरकार और लोगों के बीच भरोसा नहीं रहा है और बिना भरोसा क़ायम किए फिर से लोकतंत्र को ज़िंदा नहीं किया जा सकता है.
वो कहती हैं, "कश्मीर के लोगों का केंद्र सरकार से भरोसा उठ गया है और जब तक कश्मीर के लोगों को पूरी तरह से बोलने की आज़ादी नहीं दी जाएगी, उनका भरोसा क़ायम नहीं होगा. कम से कम शीर्ष नेताओं को खुलकर बोलने की आज़ादी होगी तो उसका सकारात्मक असर होगा."
भसीन कहती हैं, "राजनेता तो छह-छह, नौ-नौ महीने हिरासत में रहकर आए हैं, उनमें अलग तरह का डर हो सकता है. सिर्फ़ नेता ही ख़ामोश नहीं है बल्कि यहां के अधिकारियों ने भी भी अजीब किस्म की चुप्पी साध ली है. कोई अधिकारी किसी भी सवाल पर किसी भी रूप से जवाब नहीं देता है."
मीडिया की स्वतंत्रता भी मज़बूत लोकतंत्र की निशानी होती है. कश्मीर में इस समय मीडिया पर कई तरह की पाबंदियां हैं. समाचार संकलन बेहद मुश्किल है.
अनुराधा के मुताबिक़, "हालात ऐसे हो गए हैं कि कितना भी वरिष्ठ पत्रकार किसी भी अधिकारी से अगर किसी भी माध्यम से कोई सवाल पूछे तो उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. मानो वो हो ही नहीं. इस तरह के माहौल में लोकतंत्र कैसे सांस सकता है?"
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