कश्मीर में पंडितों और सिखों की हत्या से पसरा खौफ़, कई परिवार कर रहे हैं पलायन

- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
कश्मीर में हिन्दू और सिख शायद 2000 के शुरुआती दशक के बाद सबसे ज़्यादा ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब कम से कम दोनों समुदायों के 50 लोगों को अलग-अलग दो जनसंहारों में मार दिया गया था. .
हाल में कश्मीर में चार ग़ैर मुसलमानों समेत सात आम नागरिकों की हत्या हुई, जिसके बाद ये डर फैलने लगा है कि कहीं घाटी में एक बार फिर 1990 के दशक जैसी स्थिति न पैदा हो जाए.
उस दौर में हज़ारों की संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी में अपना घर-बार छोड़कर पड़ोसी राज्यों में जा बसे थे.
साल 1990 में घाटी में चरमपंथ बढ़ने के बाद केवल 800 कश्मीरी पंडितों के परिवार ही ऐसे थे, जिन्होंने यहां से न जाने का फ़ैसला किया.
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कश्मीरी पंडितों की हत्या
53 साल के संजय टिक्कू सालों से घाटी में बसे ऐसे कश्मीरी पंडितों की प्रतिनिधित्व करते रहे हैं, जो राज्य छोड़ कर नहीं गए.
वो कहते हैं, "हां, ये स्थिति 1990 के दशक जैसी दिखती है क्योंकि आज मुझे वैसे ही डर का अनुभव हो रहा है, जैसा उस दौर में हुआ था. हाल के दिनों में कई परिवार घाटी छोड़ कर जा चुके हैं, कई परिवार पलायन की योजना बना रहे हैं."
"कई परिवार डर में हैं और वो मुझे फ़ोन करते हैं. प्रशासन के अधिकारियों ने मुझे मेरे घर से निकाल कर किसी होटल में रखा है. लेकिन इस तरह के खौफ़ के माहौल में हम कैसे जी सकते हैं."
साल 2003 में पुलवामा के सुदूर नंदीमार्ग गांव में 20 से अधिक कश्मीरी पंडितों की हत्या की घटना को याद करते हुए संजय टिक्कू कहते हैं कि सरकार असंवेदनशील हो गई है.
वो कहते हैं, "मैं सालों से चेतावनी देता आ रहा हूं. लेकिन एमएल बिंद्रू के मारे जाने तक उन लोगों की (सरकार की) नींद नहीं टूटी."

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नंदीमार्ग नरसंहार की याद
मंगलवार को अज्ञात हमलावरों ने श्रीनगर में जानेमाने केमिस्ट एमएल बिंद्रू की गोली मारकर हत्या कर दी थी. उसी दिन सशस्त्र हमलावरों ने अलग-अलग घटनाओं में बिहार के रहने वाले एक हिंदू व्यापारी और एक कश्मीर मुसलमान कैब ड्राइवर की हत्या कर दी.
इससे पहले हमलावरों ने श्रीनगर के दक्षिणी इलाके में दो कश्मीरी मुसलमानों को मार डाला. बिंद्रू की हत्या ने कश्मीरी पंडितों को नंदीमार्ग नरसंहार की याद दिला दी.
सिख समुदाय के लोग याद करते हैं कि मार्च, 2001 में अनंतनाग के चित्तीसिंह पुरा में 30 सिख ग्रामीणों को खड़ा करके उनकी हत्या कर दी गई थी.
श्रीनगर के एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल सुपिंदर कौर के अंतिम संस्कार में भाग लेने वाले लोगों ने उनका शव सचिवालय भवन के सामने रखकर विरोध प्रदर्शन किया.
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'हमें इंसाफ़ चाहिए'
46 वर्षीय सुपिंदर कौर और उनके सहयोगी दीपक की गुरुवार को श्रीनगर में एक स्कूल के परिसर में हत्या कर दी गई.
एक प्रदर्शनकारी ने कहा, "चरमपंथियों ने हमारी बेटी की जान ले ली. हमें कौन इंसाफ़ देगा? हमें इंसाफ़ चाहिए और जिन लोगों ने मासूमों का क़त्ल किया है, उन्हें भी गोली मारी जाए."
सिख नेता जगमोहन सिंह रैना ने सभी सिख कर्मचारियों से अपील की है कि जब तक सरकार अल्पसंख्यक कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित न कर दे, वो काम का बहिष्कार करें.
रैना ने पत्रकारों से कहा, "हमारे लोग काम पर कैसे निकल सकते हैं? सुपिंदर और उनके सहयोगी जिस स्कूल में बच्चों को पढ़ाते थे, उसी के अहाते में उनकी हत्या कर दी गई." सिख नेता जगमोहन सिंह रैना ने सभी सिख कर्मचारियों से अपील की है कि जब तक सरकार अल्पसंख्यक कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित न कर दे, वे काम का बहिष्कार करें."
केंद्र की सत्ता में रहने वाली कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों की सरकारों ने ये वादा किया था कि वे कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए काम करेंगी लेकिन कश्मीर में अमन एक भ्रम की तरह ही रहा है.
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कश्मीरी पंडितों की वापसी
कश्मीरी पंडितों को घाटी वापस लाने के लिए भारत सरकार ने साल 2009 में नौकरी देने की पेशकश की थी. इसमें उनके लिए सुरक्षित रिहाइश का भी प्रावधान किया गया था.
उसके बाद से लगभग 5000 कश्मीरी पंडित वापस लौटे और उन्हें सरकारी नौकरियों में लाया गया. ज़्यादातर लोगों को शिक्षा विभाग में काम मिला.
संजय टिक्कू बताते हैं, "मुझे लगता है कि उनमें से ज़्यादातर अब जा चुके हैं. मुझे बताया गया है कि दो हज़ार से ज़्यादा लोग कश्मीर घाटी पहले ही छोड़ चुके हैं."
कश्मीर के बडगाम ज़िले के एक ऐसे ही कैंप में 300 फ़्लैट हैं जहां कम से कम 1000 कश्मीरी पंडित रहते हैं.
इस कैंप के एक निवासी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, "हम असुरक्षित महसूस करते हैं. जब कोई घटना होती है तो सरकारी अधिकारी यहां आते हैं और हमें समर्थन का आश्वासन देते हैं. लेकिन स्कूल में शिक्षकों की हत्या से अब डर कैंप से काम करने की जगह की तरफ़ शिफ़्ट कर गया है. क्या वे सभी स्कूलों और दफ़्तरों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं?"

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तनाव का माहौल
14 फरवरी, 2019 को भारतीय सुरक्षाबलों पर एक बम हमला हुआ जिसमें 40 सैनिकों की मौत हो गई थी. इसके बाद से भारत और पाकिस्तान के संबंध बिगड़ने लगे. इस घटना को हफ़्ता भी नहीं बीता था कि भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तानी क्षेत्र में हवाई हमले कर दिए.
जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान ने भारत के एक जेट विमान को मार गिराया और उसके पायलट को अपनी गिरफ़्त में ले लिया. हालांकि पाकिस्तान ने बाद में भारतीय पायलट को वापस लौटा दिया.
इस साल के फरवरी तक 700 मील लंबी नियंत्रण रेखा पर हालात उथल-पुथल भरे रहे. एलओसी पर रिकॉर्ड संख्या में दोनों देशों के बीच इस दरमियां झड़प हुई है. दोनों देशों की सेनाओं ने फरवरी में ये फ़ैसला किया कि वे साल 2003 के संघर्षविराम को लागू करेंगे.
भारतीय सेना और पुलिस के आला अधिकारी ये दावा करते हैं कि फरवरी के बाद से सीमा पर हालात सामान्य हैं और भारत विरोधी प्रदर्शन और पत्थरबाज़ी की घटनाएं अब अतीत की बात हो चुकी है.
लेकिन बीते कुछ दिनों में जिस तरह से आम नागरिकों की हत्याएं की गई हैं, उससे हर तरफ़ असुरक्षा की भावना व्याप्त दिखती है, ख़ासकर सिख और कश्मीरी पंडित ज़्यादा डरे हुए लग रहे हैं.

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क्या अनुच्छेद 370 ख़त्म करने से हिंसा बढ़ी?
कश्मीरी पंडितों के कुछ नेता भारत सरकार की 'बिना ठीक से सोचे-विचारे' बनाई गई नीतियों को हालात बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं.
कश्मीरी पंडितों के संगठन 'रिकंसीलिएशन, रिटर्न एंड रिहैबिलिटेशन ऑफ़ पंडित्स' के अध्यक्ष सतीश महलदार जम्मू और कश्मीर की स्वायत्तता ख़त्म किए जाने पर जश्न मनाने वाले लोगों को चुनौती देते हुए कहते हैं कि "उन्हें सामने आना चाहिए और हमें बताना चाहिए कि आख़िर लोग क्यों मारे जा रहे हैं?"
उनका मानना है कि कश्मीर छोड़कर गए लोगों की संपत्ति से जुड़ी शिकायतें दर्ज करने के लिए जो पोर्टल बनाया गया था, उससे भी कश्मीरी पंडितों और बहुसंख्यक समुदाय का रिश्ता बिगड़ा है.
सतीश महलदार ने दिल्ली से फ़ोन पर बीबीसी को बताया, "लोगों की संपत्ति दखल किए जाने और जबरन खरीदे जाने की घटनाएं हुई हैं. ये पोर्टल उनकी समस्याओं का हल निकाल सकता था. ज़्यादातर कश्मीरी पंडितों ने अपनी प्रोपर्टी क़ानूनी तरीके से बेची हैं."
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सतीश महलदार कहते हैं, "ऐसी बिक्रियों को प्रशासन ने पूरी तरह से जांच परख के मंज़ूरी दी है. लेकिन जब किसी संपत्ति का कोई सही ख़रीददार एक दिन अपने दरवाज़े पर किसी पुलिसवाले को खड़ा पाता है या फिर किसी को प्रोपर्टी खाली कराने के लिए नोटिस दे दिया जाता है, महज इसलिए कि दिल्ली में बैठे किसी शख़्स ने ऑनलाइन पोर्टल पर एक शिकायत दर्ज करा दी है. हमें सिक्योरिटी गार्ड्स से ज़्यादा सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत है. ऐसी घटनाओं से कश्मीरी पंडितों की वापसी की संभावना और कमज़ोर होती है."
अलगाववादी नेता मिरवाइज़ उमर फ़ारूक़ को लगातार नज़रबंदी में रखे जाने के फ़ैसले पर सतीश महलदार अफ़सोस जताते हुए कहते हैं, "अगर कुछ होता है तो समाज को एकजुट होना पड़ता है लेकिन अब ये कौन करेगा. मिरवाइज़ उमर फ़ारूक़ को सालों से उनके घर में नज़रबंद रखा जाना एक बहुत बड़ी गलती है. वे कम से कम इस तरह से पागलपन में की जा रही हत्याओं के ख़िलाफ़ आम लोगों को एकजुट कर सकते थे."
कई सिख नेता पांच अगस्त, 2019 के बाद कश्मीर में जिस तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं, उसे भी आम लोगों के बीच असंतोष की वजह मानते हैं और उन्हें लगता है कि अभी हो रही हिंसा एक तरह की प्रतिक्रिया है.
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पुलिस का क्या कहना है?
जम्मू और कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग़ सिंह हालिया हुई हत्याओं को एक साज़िश करार देते हैं. उनका कहना है कि ये मुसलमानों और ग़ैरमुसलमानों को एक दूसरे के ख़िलाफ़ भड़काने की साज़िश है.
गुरुवार को शिक्षकों की हत्या के बाद दिलबाग़ सिंह ने कहा, "ये कश्मीरी मुसलमानों को बदनाम करने की साज़िश है."
लेकिन कश्मीर के पुलिस चीफ़ विजय कुमार इन घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशों को खारिज करते हुए दिखते हैं.
उन्होंने कहा कि साल 2021 में चरमपंथियों के हाथों मारे गए 28 लोगों में ज़्यादातर मुसलमान थे.
गुरुवार रात को उन्होंने पत्रकारों से कहा, "साल 2021 में आतंकवादियों ने अब तक कुल 28 लोगों की हत्या की है. उन 28 में से पांच लोग स्थानीय हिंदू और सिख बिरादरी से थे जबकि दो बाहर से आए मजदूर थे."

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समाज और सिस्टम की नाकामी
कश्मीर पंडित नेताओं का मानना है कि उन्हें दो असफलताओं का नतीजा भुगतना पड़ रहा है.
संजय टिक्कू कहते हैं, "ये सिस्टम असंवेदनशील है. कैंप और अल्पसंख्यक आबादी वाले इलाकों में साल 2016 तक सिक्योरिटी गार्ड्स की तैनाती रहती थी. ऐसी कई घटनाएं हुई जब चरमपंथियों ने इन सिक्योरिटी गार्ड्स के हथियार छीन लिए तो इन्हें वहां की ड्यूटी से हटा दिया गया. मैंने इस साल जून और जुलाई में सुरक्षा की गुहार लगाते हुए राज्यपाल को इस बारे में कई खत लिखे. उन्होंने हालिया घटनाओं के बाद मेरी चिट्ठी का जवाब दिया."
संजय टिक्कू को इस बात का भी अफ़सोस है कि हत्या की इन घटनाओं पर कश्मीर के बहुसंख्यक समाज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
वे कहते हैं, "बहुसंख्यक समाज को किसी भी जरिये से अपना विरोध जतलाना चाहिए था. सोशल मीडिया पर इन हत्याओं के प्रति सांत्वना का भाव ज़रूर है लेकिन कश्मीर में ज़िंदगी रोज़मर्रा की तरह की चल रही है. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है. अगर ये घटनाएं कश्मीर में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साज़िश है तो बहुसंख्यक समुदाय की ख़ामोशी इसे और ख़तरनाक बना रही है."
इस बीच अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने शुक्रवार को पीड़ित परिवारों के लिए संवेदना प्रकट करते हुए एक बयान जारी किया.
मिरवाइज़ उमर फ़ारूक़ की अगुवाई वाले हुर्रियत धड़े के बयान में कहा गया है, "कश्मीर की आवाम इस बात पर यकीन रखती है कि संघर्ष में जाने वाली हर जान की बराबर क़ीमत होती है. किसी भी पीड़ित को मजहब के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. हरेक व्यक्ति हमारे समाज में एक जैसी अहमियत रखता है."
इसी बयान में भारत पर सरकारी नीति के तौर पर सैन्यीकरण का आरोप लगाया गया है.
"जब सरकारें समस्या का समाधान निकालने के बजाय आम लोगों से निपटने और कश्मीर में जारी संघर्ष को और लंबा खींचने के लिए सेना का इस्तेमाल नीतिगत रूप से करती हैं तो इसका नतीज़ा रक़्तपात और जानोमाल के नुक़सान के रूप में होगा."

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क्या सुरक्षा उपाय किए गए हैं?
प्रशासन ने अल्पसंख्यक बहुल आबादी वाले इलाकों की सुरक्षा स्थिति का जायजा लेना शुरू कर दिया है. इसमें आम लोगों की सुरक्षा के अलावा बाहर से आए हिंदू कारोबारियों की सुरक्षा का मुद्दा भी शामिल है.
पुलिस के एक आला अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि कश्मीरी पंडितों और बाहर आए हिंदुओं के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर सुरक्षा के लिहाज से कड़ी नज़र रखी जा रही है.
इस बीच पूर्व चरमपंथियों और पत्थरबाज़ी के मामलों के अभियुक्तों पर प्रशासन फिर से ग़ौर कर रहा है. पुलिस पहले ही कह चुकी है कि जो लोग इन हत्याओं के लिए जिम्मेवार हैं, उन पर कार्रवाई की जाएगी.
जम्मू और कश्मीर के लेफ़्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने गुरुवार को अल्पसंख्यक समुदाय के दो शिक्षकों की हत्या की निंदा की है. उन्होंने कहा कि इस चरमपंथी हमले को अंजाम देने वालों को करारा जवाब दिया जाएगा.
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उन्होंने कहा कि आतंकवादी और उन्हें संरक्षण देने वाले लोग जम्मू और कश्मीर के अमन में खलल डालने में कामयाब नहीं हो पाएंगे.
मनोज सिन्हा ने ट्विटर पर लिखा है, "मैं आतंकी हमले में शहीद हुए नागरिकों को नमन करता हूँ, और उन्हे श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ. दुख की इस घड़ी में जम्मू कश्मीर प्रशासन और पूरे देश की संवेदनाएं उनके परिवार के साथ हैं. मेरे मन में बहुत पीड़ा और आक्रोश है. मैं परिवार के सभी सदस्यों को भरोसा देता हूँ, आपके एक-एक आंसुओं का हिसाब लिया जाएगा. 130 करोड़ देशवासी सभी परिवारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं. हमने सुरक्षा एजेंसियों को पूरी स्वतंत्रता दी हैं और मानवता के दुश्मन इन आतंकवादियों को जल्द ही इसकी कीमत चुकानी होगी. आतंक के सरपरस्तों को भी मैं कहना चाहता हूँ, जम्मू कश्मीर में शांति, विकास और समृद्धि की यात्रा को अस्थिर करने के उनके मंसूबे कभी कामयाब नहीं होंगे."
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