कश्मीर का वो गांव जो सुरक्षा बलों के पहरे से आज़ाद है- ग्राउंड रिपोर्ट

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इमेज कैप्शन, हलीमा अपने बच्चों के साथ
    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, कुलगाम (जम्मू-कश्मीर) से, बीबीसी हिंदी के लिए

पिछले रविवार की एक ख़ुशनुमा सुबह पर हम जम्मू-कश्मीर के गुलज़ारबाद स्थित वालिनाड पहुंचे, जहां हमारी मुलाक़ात सड़क के किनारे बातचीत कर रहे कुछ गाँववालों से हुई.

अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के फ़ैसले के बाद से प्राकृतिक रूप से बेहद ख़ूबसूरत इस गांव में एक भी सुरक्षाकर्मी नहीं दिखे हैं और ना ही इनकी तैनाती यहां की गई है.

लेकिन डर के माहौल में लोग तोहफ़े में मिली अपने गाँव की प्राकृतिक ख़ूबसूरती का आनंद भी नहीं ले पा रहे हैं.

ग्रामीणों के समूह से मिलने से पहले मैंने दो महिलाओं को गांव के निचले हिस्से में जाते देखा. बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वहां परिवहन की सुविधा नहीं है इसलिए वो पैदल जा रही हैं.

गुलज़ारबाद का वालिनाड कुलगाम ज़िले का एक छोटा सा गांव है, जो पहाड़ों की चोटियों और हरियाली से आबाद है.

कुलगाम के पश्चिमी छोर पर बसा यह गांव श्रीनगर से क़रीब 130 किलोमीटर दूर है और अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद से यहां घाटी के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक शांति है.

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इमेज कैप्शन, वलिनाड गुलज़ारबाद गांव का एक हिस्सा है

मिट्टी और लकड़ी के घर

गाँव की दिल छू लेने वाली ख़ूबसूरती के बावजूद इसके यहां के लोगों के मन में एक डर और असहज करने वाली शांति है.

घाटी के अन्य हिस्सों के लोग भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं. इस गांव में 50 से अधिक परिवार रहते हैं.

डर की वजह से पिछले 20 दिनों से यहां के लोग गांव से बाहर नहीं गए हैं. गांव के अधिकांश लोग मिट्टी और लकड़ी के घरों में रहते हैं.

बहुत कम लोगों के पास पक्के मकान हैं.

सभी 50 परिवार वलिनाड में आठ महीने ही रहते हैं और उनका बाक़ी का वक़्त पास के गांव गुलज़ारबाद में बीतता है, जहां उनके घर पक्के हैं.

पूरे गुलज़ारबाद गांव में क़रीब 300 घर हैं, जो वलिनाड से तीन किलोमीटर दूर है. वलिनाड गुलज़ारबाद गांव का एक हिस्सा है.

यहां के अधिकांश लोग खेती और मज़दूरी करते हैं. सर्दियों में वे कमाने के लिए पंजाब चले जाते हैं.

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इमेज कैप्शन, गुलज़ारबाद का वालिनाड कुलगाम ज़िले का एक छोटा सा गांव है, जो पहाड़ों की चोटियों और हरियाली से आबाद है

इलाक़े में तनाव

श्रीनगर से गुलज़ारबाद जाते हुए मैंने तीन ज़िलों को पार किया. तीनों जिल़ों की ज़्यादातर दुकानें बंद थीं. कुछ जगहों पर सुरक्षा बल चौकसी करते दिखे.

दमहाल-हंजीपोरा ज़िले की अंतिम तहसील को पार करने के बाद मुझे एक भी सुरक्षाकर्मी सड़क पर नहीं दिखा.

बीते पांच अगस्त को भारत की संसद ने कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर दिया था, जिससे इलाक़े में तनाव बढ़ गया है.

उसके बाद से ही कश्मीर में संचार व्यवस्था ठप है, कर्फ़्यू है, पाबंदियाँ हैं, दूकानें और अन्य व्यापारिक संस्थान बंद हैं. साथ ही स्कूल और कॉलेज भी बंद हैं.

अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के साथ ही भारत सरकार ने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्म-कश्मीर और लद्दाख़ में बाँट दिया है.

370 हटाने के पहले जम्मू और कश्मीर राज्य में तीन क्षेत्र थे- जम्मू, कश्मीर और लद्दाख़. इन तीनों में कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाक़ा है.

इस फ़ैसले से कई दिनों पहले ही सरकार ने कश्मीर घाटी ने अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती कर दी थी.

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इमेज कैप्शन, गांव की एक दुकान

बाज़ार बंद हैं...

गांव में न केवल भय का माहौल है बल्कि यातायात के सभी साधन बंद हैं और ज़रूरतों के सामान कम हो रहे हैं, जिसकी वजह से लोग परेशान हैं.

दो बच्चों की मां 30 वर्षीय हलीमा का कहना है कि वो अपनी बेटी को उसके डॉक्टर के कहे अनुसार दूध नहीं पिला पा रही थीं क्योंकि बाज़ार बंद थे.

बिना बिजली वाले मिट्टी के घर में बैठीं हलीमा ने बीबीसी को बताया, "मेरे पास दूध के कुछ पैकेट थे, जो कुछ दिन पहले ख़त्म हो गए."

"और अब हम अपनी बेटी को गाय का दूध पिलाते हैं, हालांकि वो ठीक है लेकिन उसका शरीर कमजोर हो रहा है."

"हम बाज़ार से दूध का पैकेट नहीं खरीद सकते हैं क्योंकि बाज़ार बंद हैं. हम कहां जा सकते हैं? डॉक्टर ने उसे पैकेट वाला दूध पिलाने को कहा है."

"हमने पास के बाज़ार में इसे खोजा लेकिन नहीं मिला. इसलिए हमने उसे गाय का दूध पिलाना शुरू कर दिया है."

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कश्मीर में सामान्य स्थिति?

बच्ची के दादा 70 वर्षीय अब्दुल राशिद डार ने कहा, "यह सब अनुच्छेद 370 के ख़त्म होने के बाद हुआ. और इस माहौल में हम बाज़ार नहीं जा सकते हैं."

"सभी दुकानें बंद हैं. इसके बावजूद हमने कोशिश की लेकिन नहीं मिला. इसलिए हम अब उसे गाय का दूध पिला रहे हैं."

मोहम्मद अशरफ के मन में डर इस क़दर बैठ गया है कि वो अपने गांव से बाहर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं.

वो सामान की क़ीमतों में हो रही बढ़ोतरी से भी ख़फ़ा दिखे. उनका कहना है कि कश्मीर घाटी बंद है, इसकी वजह से क़ीमतें बढ़ रही हैं.

वो कहते हैं, "अनुच्छेद 370 के ख़त्म किए जाने के बाद हम डरे हुए हैं. ज़रूरत के सामानों के दाम बढ़ गए हैं."

"20 दिन पहले हम एक क्विंटल चावल 2200 रुपए में खरीदते थे, जो अब 3000-3200 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहा है."

"हमारे युवा दूसरे इलाक़ों में नहीं जा रहे हैं क्योंकि वे भी डरे हुए हैं. उन्हें लगता है कि अगर वे अपने गांव के बाहर जाएंगे तो उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है."

"नरेंद्र मोदी कहते हैं कि कश्मीर में स्थिति सामान्य है, यह पूरी तरह आधारहीन है. कश्मीर में सामान्य स्थिति के बारे में जो भी कहा जा रहा है, वो झूठ है."

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद अशरफ़

प्राइमरी और मिडिल स्कूल

अशरफ़ ने कहा, "सरकार हर दिन कहती है कि प्राइमरी और मिडिल स्कूल खोले गए हैं, लेकिन एक भी स्कूल नहीं खुले हैं. मीडिया झूठ बोल रही है."

"पिछले 20 दिनों से मैं अपने गांव से बाहर नहीं गया हूं. अगर जाना भी होता है तो हम तीन या चार लोगों के समूह में जाते हैं. हमें डर है कि कोई आएगा और ले जाएगा."

"यही वजह है कि हम अपने गांव से बाहर नहीं जा रहे हैं. कुछ दिन पहले लकड़ी काटते समय हमारे एक पड़ोसी घायल हो गए थे, हम उनका इलाज नहीं करा सके."

"चार दिनों के बाद किसी तरह एक मेडिकल शॉप पर उनका इलाज करा पाए. अगर कोई रात में बीमार पड़ जाता है, तो हम उन्हें अस्पताल भी नहीं ले जा सकते."

"हम नहीं जानते कि हमारे सभी मंत्री कहां गए हैं. हमें उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है."

"और हम यह भी नहीं जानते कि वे जीवित हैं या मारे गए या फिर जेल में हैं. केवल अफवाहों का बाज़ार गर्म है."

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद अमीन डार ने रेडियो पर अनुच्छेद 370 को ख़त्म किए जाने की ख़बर सुनी

सारा दिन खाली बैठे रहते हैं गांव वाले

पूरे गांव में सामाचार पाने का एकमात्र स्रोत रेडियो है. एक अन्य ग्रामीण (और किसान) मोहम्मद अमीन डार ने रेडियो पर अनुच्छेद 370 को ख़त्म किए जाने की ख़बर सुनी.

उन्होंने बताया, "मैंने रेडियो पर अनुच्छेद 370 को ख़त्म किए जाने की ख़बर सुनी. समाचार के लिए हमारे पास केवल रेडियो है."

"अख़बार नहीं मिल रहे हैं और हम टीवी नहीं देखते हैं."

पेशे से किसान अमीन डार अपने गांव से बाहर नहीं जाते हैं. वो कहते हैं, "हम किसी से संपर्क नहीं कर सकते हैं. कोई नेता नहीं है. सब कुछ बेतरतीब है."

"हमलोग बुरी तरह डरे हुए हैं और हमें लगता है कि अगर हम अपने गांव से बाहर जाते हैं तो हमें सुरक्षा बलों का सामना करना पड़ेगा."

"हालांकि सुरक्षा बल यहां नहीं आते हैं लेकिन दूसरे इलाक़ों में उनकी मौजूदगी है."

जब उनसे पूछा गया कि वह पूरे दिन गांव में क्या करते हैं तो उन्होंने जवाब दिया, "मैं बस बैठा रहता हूं और आते-जाते लोगों को देखता हूं. इस गांव के सभी स्कूल बंद हैं."

"एक भी स्कूल दोबारा नहीं खोले गए हैं. आप खुद जाकर देख सकते हैं."

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इमेज कैप्शन, हनीफा अपनी बेटी के साथ

माहौल अस्पताल ले जाने लायक नहीं

उसी गांव की 60 वर्षीय हनीफ़ा बानो अपनी गर्भवती बेटी को अस्पताल या फिर किसी भी स्वास्थ्य केंद्र ले जाने में असमर्थ थीं क्योंकि आने जाने के साधन नहीं थे.

वो कहती हैं, "कुछ दिनों पहले जब मेरी बेटी गर्भवती थी, हम उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जा पाए थे. हम अपनी बेटी की जांच करवाना चाहते थे."

"लेकिन यह संभव नहीं हो पाया. हमने कई गाड़ी चलाने वालों से अस्पताल ले जाने के लिए अनुरोध भी किया पर उन सभी ने अस्पताल जाने के इनकार कर दिया."

"उन्होंने कहा कि माहौल अस्पताल ले जाने लायक नहीं है. तो हम क्या कर सकते थे? अल्लाह का शुक्र है कि मेरी बेटी की नॉर्मल डिलीवरी हुई."

डिलीवरी के बाद दवाएं किसने दीं, इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं, "हम किसी तरह कंपाउंडर को लाने में सफल रहे."

"पहले तो उन्होंने डॉक्टर से सलाह किए बिना दवा देने से मना कर दिया. लेकिन हमलोगों ने उन पर दबाव डाला. हमें अपनी बेटी के लिए कई चीजों की आवश्यकता थी."

"बाद में कंपाउंडर ने दवाएं दीं. 5 अगस्त से पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट की स्थिति ठीक थी लेकिन अभी एक भी गाड़ी देखने को नहीं मिलती है."

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इमेज कैप्शन, दुकानदार एजाज़ अहमद

ख़त्म हो रहे दुकानों के स्टॉक

जैसे ही मैं गांव के दूसरे इलाक़े में पहुंचा, मैंने देखा कि एक दुकानी खुली हुई थी और कुछ गांव वाले सामान ख़रीदने के लिए वहाँ खड़े थे.

युवा दुकानदार एजाज़ अहमद ने बताया कि उन्होंने कुछ ही मौक़ों पर इमरजेंसी काम के लिए अपनी दुकान खोली थी.

उन्होंने बताया, "पिछले 20 दिनों में मैंने कुछ ही बार अपनी दुकान खोली है. कुछ लोगों को चीजों की सख़्त ज़रूरत थी. मेरी दुकान में सामान ख़त्म हो गए हैं."

"बाज़ार जाना मुश्किल है. आने-जाने की व्यवस्था नहीं है. दो बार मैं बाज़ार गया था और कुछ सामान लेकर आया था."

"जब डर का माहौल हो और आपके पास आने-जाने के साधन न हों, तब बाज़ार कैसे जाया जा सकता है."

"आम तौर पर मैं हर दिन दो से तीन सौ रुपए कमाता था लेकिन 5 अगस्त के बाद गांव में बहुत कम लोग घूमने आते हैं. लोगों में भय है. वे अपने घरों से निकलते ही नहीं हैं."

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फोन और ट्रांसपोर्ट बंद

गांव में एक दवा की दुकान है. यह लोगों के लिए एक उम्मीद की तरह है. लेकिन कश्मीर घाटी में नाकाबंदी के चलते दवाओं की आपूर्ति में समस्या है.

उसके दुकानदार ने नाम ना जाहिर करने की शर्त पर बताया, "स्टॉक कम पड़ रहे हैं. फोन और ट्रांसपोर्ट बंद होने की वजह से नया स्टॉक मंगवाने में मुश्किल हो रही है."

"आम तौर पर जब सामान की कमी होती है, हम तुरंत ऑर्डर करते हैं, लेकिन आज दवा मंगाना भी मुश्किल है. मैं आपको उदाहरण दे सकता हूं."

"हाल ही में एक गाँववाले मेरे पास आए थे और दूध के पैकेट की मांग की थी लेकिन यह हमारे पास नहीं था. मुझे बहुत बुरा लगा था लेकिन आप कर ही क्या सकते हैं."

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सुरक्षाबलों की तैनाती

गांव के मुखिया गुलज़ार अहमद डार ने बताया कि वहां की स्थिति सामान्य ज़रूर है लेकिन लोगों में डर है.

उन्होंने बताया, "अनुच्छेद 370 के ख़त्म होने के बाद यहां लोग डरे हुए हैं. इसे नहीं ख़त्म किया जाना चाहिए था. यहां सुरक्षाबलों की तैनाती नहीं की गई है."

"लेकिन डर ने हमें जकड़ लिया है. हमें नहीं पता कि हमारे आसपास क्या हो रहा है."

"हम श्रीनगर, कुलगाम या नजदीक के तहसील डमहल नहीं जा सकते हैं, जो यहाँ से सिर्फ़ 25 किलोमीटर दूर हैं."

80 साल के गुलाम रोसूल अनुच्छेद 370 के हटाए जाने को कश्मीर पर हमले के रूप में देखते हैं.

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बाहर का माहौल

इलाक़े में तनाव क्यों बढ़ रहा है, इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "यह नरेंद्र मोदी की वजह से है. उन्होंने ही अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया है. हम बहुत परेशानी में हैं."

"हमें कुछ नहीं मिल रहा है. हमलोग कहां जा सकते हैं? स्थिति अच्छी नहीं है. हम केवल रोडियो सुनते हैं और खुद को अपडेट रखते हैं."

"लेकिन असल समाचार बताया नहीं जा रहा है."

गांव के बाहर का माहौल कैसा है, इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "बाहर का माहौल अच्छा नहीं है. हर जगह सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है."

"किसी को भी अपने घरों से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है. युवाओं को गिरफ़्तार किया जा रहा है. मैं पिछले बीस दिनों से अपने गांव से बाहर नहीं गया हूं. हम डरते हैं."

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