कश्मीरी पंडित जो घाटी में रह गए हैं वो अनशन को मजबूर क्यों हैं?

कश्मीर पंडित

इमेज स्रोत, Kashmiri Pandit Sangharsh Samiti

    • Author, अशोक कुमार पाण्डेय
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

कश्मीरी पंडितों का ख़याल जेहन में आते ही जो तस्वीर सामने आती है वह 1990 के दशक में घाटी से विस्थापन की है.

आम मान्यता यही है कि उस दौर में सभी पंडित घाटी से बाहर निकलकर जम्मू, दिल्ली और दूसरी जगहों पर बस गए थे लेकिन एक हक़ीक़त यह है कि लगभग दस साल तक लगातार चले विस्थापन के बीच 808 परिवार ऐसे हैं जिन्होंने घाटी कभी नहीं छोड़ी और श्रीनगर के अलावा उत्तर और दक्षिण कश्मीर के दो सौ और ठिकानों पर आज भी रह रहे हैं.

इन्हें स्थानीय या ग़ैर-विस्थापित पंडित कहा जाता है.

इन्हीं पंडितों के संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के प्रमुख संजय टिक्कू पिछले नौ दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं तो उनके साथ अलग-अलग इलाक़ों से आए युवा हब्बा कदल के उस ऐतिहासिक गणपत्यार मंदिर में क्रमिक अनशन कर रहे हैं जिसकी पहली मंज़िल पर संगठन का दफ़्तर है.

वीडियो कैप्शन, कश्मीर घाटी छोड़कर पलायन करने को मजबूर कश्मीरी पंडितों की सुध लेने वाला कोई नहीं

मुद्दा क्या है?

डाउनटाउन के हब्बा कदल इलाक़े में बर्बर शाह मोहल्ले के निवासी संजय टिक्कू बताते हैं कि जब 2009 में मनमोहन सिंह ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए राहत और पुनर्वास पैकेज की घोषणा की तो समिति ने ग़ैर-विस्थापित पंडितों को भी इसमें हिस्सेदार बनाने की मांग की.

मामला संसद तक पहुंचा और दो संसदीय समितियों ने हालात का जायज़ा लेकर अपनी रिपोर्ट में ग़ैर-विस्थापित पंडित समुदाय की दारूण सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का हवाला देते हुए उनकी मांग का समर्थन किया.

साल 2013 में मामला राज्य के उच्च न्यायालय में गया और अंततः 2016 में न्यायालय ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया.

इसमें ग़ैर-विस्थापित पंडितों को पैकेज के तहत 500 नौकरियाँ दिए जाने और मकान बनवाने के लिए आर्थिक मदद दिए जाने सहित कई महत्त्वपूर्ण निर्णय थे. हालांकि घाटी के सिखों की ओर से स्टे लिए जाने के कारण अंतिम फ़ैसला 2017 में आ पाया लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है.

वीडियो कैप्शन, Mahashivratri : कश्मीरी पंडितों के लिए क्यों ख़ास है यह त्योहार?

प्रधानमन्त्री पैकेज के तहत

अभी दो दिन पहले प्रधानमन्त्री पैकेज के तहत 2000 नौकरियों के पुनःआवंटन की सरकार की घोषणा में भी ग़ैर-विस्थापित पंडितों का कोई जिक्र नहीं है.

समिति से जुड़े घाटी के वरिष्ठ पत्रकार मनोहर ललगामी इसके लिए स्थानीय प्रशासन की लापरवाही और असहयोग को ज़िम्मेदार बताते हैं.

वह कहते हैं, "एक तो प्रशासन दूसरी चीज़ों में इतना उलझा है कि हमारे अति सूक्ष्म अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए उसके पास समय ही नहीं है. दूसरे 1990 के दशक के बाद प्रशासन में पंडितों की भागीदारी पूरी तरह से ख़त्म सी हो जाने के बाद हमारे साथ सौतेला व्यवहार होता है."

संजय कहते हैं कि जो चले गए उनको वापस लाने की इतनी बात होती है लेकिन जो इतने मुश्किल हालात में भी टिके हुए हैं उन्हें सम्मानजनक ज़िन्दगी दिलाने की ओर किसी का ध्यान नहीं है. राज्य के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद हालात और बिगड़े हैं तथा राजनैतिक शक्तियों के अभाव में अधिकारियों की मनमानी बढ़ती गई है.

छोड़िए YouTube पोस्ट, 1
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त, 1

कोटे के भीतर कोटे की मांग क्यों?

न्यायालय के फ़ैसले के बाद ग़ैर-विस्थापित पंडित अपने-आप उन नौकरियों के लिए योग्य हो गए हैं जो पंडितों के लिए आरक्षित की गई हैं. फिर एक सवाल यह बनता है कि आख़िर वे कोटे के भीतर अपने लिए अलग कोटा क्यों मांग रहे हैं?

इस सवाल के जवाब में संजय कहते हैं कि ग़ैर-विस्थापित पंडितों में से अधिकतर निम्नमध्यवर्गीय श्रेणी के हैं और डेढ़ सौ से अधिक परिवार तो ग़रीबी रेखा के नीचे हैं.

संजय कहते हैं, "विस्थापित परिवारों के लिए सरकारों ने बहुत कुछ किया है. उन्हें नकद मुआवजा दिया गया. 2015 में नक़द राहत प्रति व्यक्ति 1500 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये कर दी गई. एक परिवार के लिए अधिकतम राशि 10,000 रुपये तय की गई. 2015 में ही कश्मीरी विस्थापितों के लिए 3000 अतिरिक्त नौकरियों और 6000 आवास देने के लिए 2000 करोड़ का पैकेज अनुमोदित किया गया."

छोड़िए YouTube पोस्ट, 2
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त, 2

आरक्षण जैसी सुविधाएँ

इसके अलावा दिल्ली प्रशासन, केन्द्रीय विद्यालयों में प्रवेश के लिए सुविधाएँ और दिल्ली विश्वविद्यालय में दाख़िले के लिए आरक्षण जैसी सुविधाएँ दी गई, सरकारी आईटीआई संस्थानों में एक प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं.

महाराष्ट्र में डिग्री और डिप्लोमा दोनों स्तरों पर तकनीकी संस्थानों में आरक्षण दिया गया और कश्मीरी पंडित छात्रों के दाख़िले बिना डोमेसाइल सर्टिफिकेट लेने का प्रावधान किया गया.

मध्य प्रदेश में हर तकनीकी संस्थान में हर स्तर पर एक सीट विस्थापित कश्मीरी पंडित के लिए आरक्षित की गई. पंजाब में स्कूल स्तर पर उनके लिए मुफ़्त शिक्षा का प्रावधान किया गया तो गुजरात और राजस्थान में मेडिकल छात्रों को माइग्रेशन की सुविधा दी गई तथा कश्मीरी छात्रों के दाख़िले बिना डोमेसाइल सर्टिफिकेट लेने का प्रावधान किया गया.

इन सबके कारण विस्थापित पंडितों के बच्चों के लिए देश के विभिन्न इलाक़ों में शिक्षा की सुविधा मिली, जबकि आर्थिक संकट से जूझते ग़ैर-विस्थापित पंडित परिवारों के बच्चों के लिए किसी तरह का कोई प्रबंध नहीं किया गया.

छोड़िए YouTube पोस्ट, 3
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त, 3

कट्टरपंथ को बढ़ावा

समिति के महासचिव अजय चाकू जोड़ते हैं कि घाटी में किसी न किसी वजह से शैक्षणिक संस्थान साल में अधिकांश दिन बंद पड़े रहते हैं. इसकी वजह से हमारे बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है, इतने आर्थिक संसाधन हैं नहीं कि बाहर भेज सकें. तो ये बच्चे आख़िर उन बच्चों का मुक़ाबला कैसे कर पायेंगे जिन्होंने जम्मू या दिल्ली में अच्छे स्कूलों में निर्बाध पढ़ाई की है.

मनोहर ललगामी एक और बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं. "घाटी में जिस तरह कट्टरपंथ को बढ़ावा मिला है उसका शिक्षण संस्थानों पर गहरा असर पड़ा है. ऐसे में पंडित छात्र उपेक्षा महसूस करते हैं. कई लड़के-लडकियाँ अवसाद का शिकार हो गए हैं. साथ ही लगातार की टालमटोल से उनकी आवेदन योग्य उम्र बीतती जा रही है. ऐसे हालात में किसी तरह बीए-एमए कर चुके छात्रों को अगर नौकरी भी नहीं मिलेगी तो वे घाटी छोड़ने पर मज़बूर होंगे."

साथ ही पहले 370 हटाने के बाद के हालात और फिर कोविड के चलते लगभग सवा साल से कश्मीर में जारी लॉकडाउन ने वहाँ की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है. संजय बताते हैं कि लगभग साढ़े तीन सौ परिवार ऐसे हैं जिनकी रोज़ी-रोटी पूरी तरह से निजी क्षेत्र पर टिकी थी. उनमें से अधिकांश की नौकरियाँ चली गई हैं और व्यापार ठप पड़े हैं. ऐसे में सहायता की तुरंत आवश्यकता है वरना उनके सामने जीने का संकट उपस्थित हो जाएगा.

छोड़िए YouTube पोस्ट, 4
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त, 4

माँगें क्या हैं?

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का यह आन्दोलन मुख्यतः उच्च न्यायालय के फ़ैसले को लागू करवाने के लिए है. इसके तहत उन्होंने चार प्रमुख मांगे सामने रखी हैं.

  • ग़ैर-विस्थापित पंडितों के 500 योग्य उम्मीदवारों को प्रधानमन्त्री पैकेज के तहत नौकरियाँ दी जाएँ.
  • सभी 808 परिवारों को मासिक सहायता राशि उपलब्ध कराई जाए.
  • मकान बनवाने के लिए आर्थिक सहायता दी जाए.
  • आपदा प्रबंधन - सहायता. पुनर्वास और पुनर्निर्माण विभाग के उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही की जाए जो जानबूझकर उच्च न्यायालय के आदेश लागू करवाने में अड़ंगे डाल रहे हैं.
छोड़िए YouTube पोस्ट, 5
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त, 5

यह एक विडंबना ही कही जाएगी कि जिस देश में कश्मीरी पंडित इतना बड़ा मुद्दा हैं वहाँ नौ दिन बीत जाने के बाद भी नेशनल कांफ्रेंस के अलावा किसी राजनैतिक दल ने ग़ैर-विस्थापित पंडितों की इन जायज़ मांगों के प्रति कोई समर्थन प्रदर्शित नहीं किया है और मुख्यधारा की मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में इसे लेकर कोई हलचल नहीं है.

सरकार के प्रतिनिधि ने एक बार ज़रूर मुलाक़ात की लेकिन कोई पक्का आश्वासन न मिलने के कारण तबीयत लगातार बिगड़ते जाने के बावजूद संजय टिक्कू आमरण अनशन ख़त्म करने को तैयार नहीं हैं.

जब मैंने रतन चाकू से संजय का ध्यान रखने के लिए कहा तो उनका जवाब था - दुनिया में तो अब कोविड आया है हम तो पिछले तीस साल से जबान पर पट्टी बांधकर जी रहे हैं. कब तक मर-मर के जियेंगे भाई साहब?

इस सवाल का जवाब है किसी के पास?

(अशोक कुमार पांडेय 'कश्मीरनामा' और 'कश्मीर और कश्मीरी पंडित'जैसी दो चर्चित किताबों के लेखक हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)