कश्मीर में इस्तीफ़ा क्यों दे रही हैं महिला पुलिसकर्मी

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, कुलगाम (जम्मू-कश्मीर) से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर के ज़िला कुलगाम के हाल बोंगाम में अपने दो कमरों के एक छोटे से मकान में बैठी 35 वर्षीय रफ़ीक़ा अख़्तर ज़िंदगी की थकान से चूर किसी कशमकश में नज़र आ रही थीं. वह हर बात नाप-तौल कर बोल रही थीं.
ऐसा लग रहा था कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी बात को कहां से शुरू करें. कभी-कभी वह अपनी हल्की मुस्कुराहट से अपनी परेशानी और डर को दबाने की कोशिश भी कर रही थीं.
आख़िरकार, रफ़ीक़ा बोलीं! ''मैंने किसी के डर में आकर अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा नहीं दिया.''
बीते रविवार को रफ़ीक़ा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था. उस वीडियो में रफ़ीक़ा अपना नाम और पता बताने के बाद पुलिस की नौकरी से इस्तीफ़ा देने का ऐलान करती हुई दिख रही थीं.
रफ़ीक़ा बीते 15 सालों से जम्मू-कश्मीर पुलिस में एसपीओ के तौर पर नौकरी कर रही थीं और कई सालों से वो कुलगाम पुलिस स्टेशन के महिला थाने में तैनात थीं.
पति की मौत
साल 2003 में रफ़ीक़ा के पति की गुर्दों की बीमारी के कारण मौत हो गई थी.
उस वक़्त को याद करते हुए रफ़ीक़ा कहती हैं, "पुलिस में एसपीओ की नौकरी करने के पीछे मेरी एक दर्द भरी कहानी रही है. साल 2003 में मेरे पति के दोनों गुर्दे ख़राब हो गए थे. उनके इलाज के लिए मैंने अपनी ज़मीन बेच डाली, लेकिन मेरे पति ठीक नहीं हो सके और आख़िरकार उनकी मौत हो गई.''
''पति की मौत के बाद घर में आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था, फिर स्थानीय विधायक की सि़फ़ारिश पर मुझे एसपीओ की नौकरी मिली. पहले मेरी तनख़्वाह 1500 रुपए थी, फिर तीन हज़ार और अब छह हज़ार हो गई थी. मैं इन्हीं पैसों से घर का खर्च चलाती थी, लेकिन अब मैंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया है."
बीते एक महीने में कश्मीर घाटी के दर्जनों एसपीओ ने या तो मस्जिदों से अपनी नौकरियों से इस्तीफ़े की घोषणा की है या फिर सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड कर इस्तीफ़ा दिया है.

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हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का संदेश
हाल के दिनों में चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के कमांडर रियाज़ नैको ने अपने एक ऑडियो संदेश में जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले सभी एसपीओ को अपनी-अपनी नौकरियों से इस्तीफ़ा देने को कहा है.
नैको के ऑडियो संदेश और कई एसपीओ की हत्याओं के बाद सोशल मीडिया पर बहुत से एसपीओ ने अपनी नौकरियों से इस्तीफ़ों की घोषणा की है.
चरमपंथियों का आरोप है कि ये एसपीओ उनके ख़िलाफ़ मुखबरी का काम करते हैं.
जम्मू-कश्मीर पुलिस में इस समय क़रीब 35 हज़ार एसपीओ काम कर रहे हैं. पुलिस आंकड़ों के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर में इस समय 1500 महिला एसपीओ हैं. इन एसपीओ को हर महीने छह हज़ार रुपये तनख़्वाह दी जाती है, ये पुलिस विभाग के नियमित कर्मचारी नहीं हैं.
वर्ष 1994-95 में एसपीओ दस्ते के गठन के बाद अब तक चरमपंथ से जुड़े अभियानों या चरमपंथी हमलों में क़रीब 500 एसपीओ मारे जा चुके हैं.
इस्तीफ़े का दबाव तो नहीं?

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रफ़ीक़ा सोशल मीडिया पर अपना इस्तीफ़ा देने पर कहती हैं कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से ये इस्तीफ़ा दिया है.
वह कहती हैं, "मैं अपनी मर्ज़ी से एसपीओ की नौकरी छोड़ रही हूं, किसी के दबाव में आकर मैंने इस्तीफ़ा नहीं दिया है. मैं अब अपने परिवार के साथ सुकून से रहना चाहती हूं.''
''अब मेरा दूसरा पति है, वह भी मेरे इस्तीफ़े से खुश हैं. मैंने चरमपंथियों के डर से इस्तीफ़ा नहीं दिया.''
रफ़ीक़ा के पति गुलाम मोहिउद्दीन ठुकर खुद भी एक रिटायर्ड पुलिस अफ़सर हैं. ठुकर कहते हैं कि पत्नी के इस्तीफ़ा देने के पीछे कई सारे कारण रहे हैं.
वह कहते हैं, "मेरी पत्नी ने एसपीओ की नौकरी से इसलिए इस्तीफ़ा दिया क्योंकि इसमें महज़ छह हज़ार रुपए तनख़्वाह मिलती है, इससे अच्छा है कि अपने घर में बैठे, न किसी की दोस्त और न किसी की दुश्मनी."
यह पूछने पर कि चरमपंथियों की धमकियों के बाद ही उनकी पत्नी ने इस्तीफ़े का निर्णय क्यों लिया. इसके जवाब में ठुकर बोलते हैं, "हमने कभी सरकार के ख़िलाफ़ कुछ नहीं किया, किसी के ख़िलाफ़ कुछ नहीं किया. मेरी पत्नी ने एक मजबूरी के तहत एसपीओ की नौकरी शुरू की थी."

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परिवारवालों पर डर
कश्मीर में बीते एक महीने से पुलिसकर्मियों पर होने वाले हमले या उनकी हत्याओं की वजह से पुलिसकर्मियों के परिजन भी डर के साए में जी रहे हैं.
इस बात पर ठुकर कहते हैं, "ये तो एक लाज़मी बात है कि जब किसी इलाक़े में कोई पुलिसकर्मी मारा जाता है तो आस-पास के लोग भी डर से कांप जाते हैं. जिसके घर में पुलिसवाले या फ़ौजी हों तो उनके घर में भी डर पैदा होता है, उनके इलाक़े में भी घबराहट पैदा होती है. हालात ही इस क़िस्म के हैं. "
20 सितंबर 2018 को ठुकर के एक बेटे शब्बीर अहमद ने भी एसपीओ की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया.
वह कहते हैं, "जिस दिन शोपियां में तीन पुलिसकर्मियों की गवाही के बाद हत्या की गई तो मैंने अपने बेटे से उसी समय कहा कि पुलिस की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दो. हमने अदालत से इस्तीफ़े का एक एफ़िडेविट भी बनाया है.''
कश्मीर में महिला द्वारा पुलिस की नौकरी करने पर ठुकर कहते हैं कि महिला की नौकरी को कश्मीर जैसे समाज में अच्छा नहीं समझा जाता है.
वह कहते हैं, "जब महिला यहां पुलिस की वर्दी पहनती है तो लोग उस के मुंह पर कुछ नहीं कहते हैं लेकिन उसकी पीठ के पीछे उसकी बुराई करते हैं. ये भी समझा जाता है तो जो महिला बेल्ट वाली नौकरी करती है वह अपनी संस्कृति से दूर हो जाती है. मैं ख़ुद भी इसके पक्ष में नहीं हूं कि एक महिला नौकरी करे. हमारे इस्लाम में महिला की कमाई हराम समझी गई है."
कुलगाम ज़िले के एसपी हरमीत सिंह ने रफ़ीक़ा के इस्तीफ़े को लेकर बताया कि हम इस तरह से इस्तीफ़ों को संजीदगी से नहीं लेते हैं.
वह कहते हैं, "वह यहां ड्यूटी पर थीं, लेकिन हम इस तरह के इस्तीफ़े को इस्तीफ़ा नहीं मानते हैं. हमारे पास कोई नहीं आया, सोशल मीडिया पर कुछ भी आता रहे.''
''ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि चरमपंथियों ने इन्हें धमकाया है. कई चीज़ें सामने आ रही हैं. चरमपंथी भी सोच रहे हैं कि हम जो कर रहे हैं, उससे कैसे अब बाहर निकला जाए. ये अब एक सामाजिक मुद्दा बन गया है."

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नौकरी के अलावा दूसरा सहारा नहीं
दक्षिणी कश्मीर की रहने वाली ज़ैनब (बदला हुआ नाम) बीते 15 सालों से जम्मू-कश्मीर में एसपीओ की नौकरी कर रही हैं.
वह कहती हैं कि जब से चरमपंथियों ने एसपीओ से नौकरियां छोड़ने को कहा है, वह तब से रात को ठीक से सो नहीं पाती हैं.
उन्होंने कहा, "जब से एसपीओ का मुद्दा चर्चा में आया है मैं तबसे सो नहीं पाई हूं. मैं डर-डर कर बाहर निकलती हूं. घर के दरवाज़े पर अगर ज़ोर से कोई दस्तक देता है तो हम सब सहम जाते हैं.''
''अगर मैं नौकरी छोड़ दूं, तो मेरे बच्चे सड़क पर भीख मांगने पर मजबूर हो जाएंगे. इस नौकरी के अलावा हमारे पास कमाई का कोई सहारा नहीं है. मैंने अपनी तनख़्वाह से एक लाख का बैंक लोन भी लिया है. हमारे पास कोई ज़मीन नहीं है. अगर कुछ है तो बस यही छह हज़ार हैं जो मुझे तनख़्वाह में मिलते हैं."
ज़ैनब कहती हैं कि जिन लोगों ने हमें नौकरी छोड़ने के लिए कहा है, वह हमारे घर आकर हमारी हालत देखें.
ज़ैनब को आख़िरकार नौकरी छोड़ने के फरमान के बारे में कैसे पता चला. इसके जवाब में उनका कहना था, "मोबाइल में चरमपंथियों की रिकॉर्डिंग पहुंच जाती है.''
ज़ैनब के पति निसार अहमद (बदला हुआ नाम ) अपनी पत्नी की बेबसी को देखते हुए कहते हैं कि उन्हें लगता है कि वह ज़िंदा क़ब्र में हैं.
वह कहते हैं, "मैं एक बीमार इंसान हूं. सिलाई के काम से दिनभर सिर्फ़ पचास रुपया कमा पाता हूं. अगर मेरी पत्नी नौकरी छोड़ देगी तो मैं क्या करूंगा. जो मेरे पास एक कमरा है वह मोहल्ले वालों ने बनाकर दिया है. मोहल्ले वालों ने ही मेरी पत्नी कि एसपीओ नौकरी के लिए सिफ़ारिश की थी. मैं अपने उन भाइयों से अपील करता हूं, जिन्होंने नौकरी छोड़ने के लिए कहा है कि वह आएं और मेरे घर का हाल देखें.''
''चरमपंथी कहते हैं एसपीओ मुखबिरी करते हैं. मैं चुनौती देता हूं कि मेरी पत्नी पर वह इसको साबित करके दिखाएं. हमने कोई गलती की ही नहीं है."
कश्मीर घाटी में एसपीओ के इस्तीफ़ों की ख़बरें सामने आने के बाद गृह मंत्रालय ने इस तरह की सभी ख़बरों का खंडन किया है और बताया है किसी भी एसपीओ ने इस्तीफ़ा नहीं दिया है.
कश्मीर घाटी में कई दूसरी महिला एसपीओ से हमने बात करने की कोशिश की लेकिन डर के मारे मीडिया के साथ कोई बात नहीं करना चाहता है.
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