|
स्मृति ईरानी के साथ एक मुलाक़ात | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इस हफ़्ते हमारे शो की मेहमान हैं एक ख़ास शख़्सियत जो पिछले कई सालों से 'टेलीविज़न क्वीन' के रूप में दर्शकों के दिलों पर राज कर रही हैं. बीच-बीच में वह राजनीति में भी दिखती हैं लेकिन वह छोटे पर्दे पर सास-बहू, माँ, बहन, प्रेमिका सारे किरदारों के लिए सबसे चर्चित चेहरा हैं. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं स्मृति ईरानी की. मैंने आपका परिचय देते हुए इतना कुछ कहा पर आपकी शख़्सियत में सबसे ज़्यादा क्या फ़िट बैठता है? अगर कोई मुझसे मेरा परिचय पूछे तो मैं कहूँगी दो बच्चों की माँ, ज़ुबिन ईरानी की बीवी, भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता, एक्टर, राइटर और प्रोड्यूसर. ये परिचय तो आपने भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता के स्टाइल में दिया है. नहीं, आपके उल्लेख में मैंने सुना कि आपने कहा कि राजनीति में कभी आती हैं कभी जाती हैं, तो मैं स्पष्ट करना चाहूँगी कि जब इस क्षेत्र में क़दम रखा तभी निश्चय किया था कि सिर्फ़ दिखने के लिए राजनीति नहीं करूंगी. एक्टर हूँ तो इसका शायद ये नुकसान रहता है कि लोगों को लगता है कि राजनीति को लेकर गंभीर नहीं रहती. लेकिन अगर संगठन में आप मेरी बढ़त को देखें तो मैंने भारतीय जनता युवा मोर्चा की महाराष्ट्र इकाई की उपाध्यक्ष के रूप में शुरुआत की थी. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेरा यह चौथा कार्यकाल है और अब महाराष्ट्र में ही अब संगठन में सचिव के रूप में काम कर रही हूँ. पसंदीदा बहू का परमानेंट टैग आपके साथ जुड़ चुका है, कैसा लगता है? मुझे लगता है कि सितारे तो बहुत आते हैं जिन्हें चमकने के बाद लोग भूल जाते हैं. बहुत कम लोग होते हैं जो लोगों के दिलों, परिवारों और घरों तक पहुँच पाते हैं. इसलिए जब आप मुझे परमानेंट बहू का ख़िताब देते हैं तो मुझे इससे कोई परहेज नहीं है, बल्कि गर्व होता है. इसका मतलब है कि मैंने परिवारों में जगह बनाई है, परिवारों का विश्वास हासिल किया है जो सच कहूँ तो इतना आसान नहीं है. बिल्कुल यही मैं कहने वाला था. मुझे लगता है कि हमेशा एक दबाव रहता होगा कि आदर्श बहू की तरह दिखना है. ऐसा है क्या? नहीं, दबाव शायद तब होता जब मुझमें और पर्दे पर मेरे किरदार में ज़मीन आसमान का फ़र्क होता. दबाव तब होता जब मैं जैसे रोल पर्दे पर कर रही हूँ वैसी ना होऊँ. लेकिन ऐसे रोल करते वक़्त मैंने हमेशा ध्यान रखा कि इसे अपने व्यक्तित्व के जितना क़रीब रख सकूं, रखूं ताकि जब लोग मुझसे मिलें तो उन्हें इस बात का अहसास न हो कि पर्दे पर अलग दिखती हैं और यहां अलग तरह से व्यवहार कर रही है. हां, ये ज़रूर है कि कुछ लोगों को अचंभा होता है कि स्क्रीन पर तो आप इतनी बड़ी दिखती हैं, बाल सफेद दिखते हैं. हक़ीक़त में तो ऐसा नहीं है. ये अपने आप हुआ कि जैसी आप हैं वैसे ही रोल मिले या फिर जैसे रोल मिले वैसा आपने ख़ुद को ढाल दिया है? मुझे जिस किस्म का रोल दिया गया मैंने जानबूझकर उसे नैचुरल तरीक़े से करने की कोशिश की. मेरा मानना है कि अगर कोई महिला पीड़ा में है और बनावटी रोए तो लोगों के दिल को वो दर्द कभी नहीं छू पाएगा. इसलिए जब मैंने अपने सबसे विख्यात रोल की शुरुआत की तो अपने निर्माता से कहा कि देखिए अगर आप चाहते है कि यह रोल लोगों के दिल में जगह बनाए तो मैं चाहूँगी कि नैचुरल तरीक़े से एक्टिंग करूं. मैं चाहती थी कि जब मुझे लोग किरदार निभाते स्क्रीन पर देखें तो वो जीवंत लगे. मुझे विश्वास था कि उस किस्म की एक्टिंग के ज़रिए ही लोगों के दिलों में इस किस्म की जगह बना पाऊंगी. ये तो संभव नहीं है कि आपसे बात करें और सास-बहू कि सिर्फ़ इतनी बात करके छोड़ दें. इस बात को आगे जारी रखेंगे लेकिन उससे पहले अपनी पसंद का एक गाना बता दीजिए. क्योंकि आपने तारीफ़ों के इतने पुल बांधे हैं तो मैं अपनी पसंद का एक गाना बताती हूँ जो 'ओम शांति ओम' का है 'आँखों में तेरी अज़ब-सी अदाए हैं...' आपको शाहरुख़ का नया लुक पसंद आया? अगर ईमानदारी से कहूँ तो मुझे शाहरुख़ ख़ान की 'दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे' वाला लुक पसंद आया. वैसे मैंने 'ओम शांति ओम' अभी देखी भी नहीं है इसलिए कुछ कह नहीं सकती. बहुत से लोगों और मेरा भी मानना है कि शाहरुख़ ख़ान वैसे ही बढ़िया लगते थे, उन्हें सिक्स पैक्स की ज़रूरत नहीं थी. मुझे लगता है कि हर अभिनेता कुछ नया करना चाहता है ताकि अपने दर्शकों को बाँधे रखे. शाहरुख़ कई सालों से हमारी इंडस्ट्री के सुपरस्टार हैं और अपने दर्शकों के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की जो रंग लाई है. मुझे लगता है कि इसकी तारीफ़ की जानी चाहिए. सास-बहू के किस्से पर वापस लौटते हैं. मुझे लगता है कि शायद आपके करियर की शुरुआत इसी रोल से हुई. कैसे हुआ ये सब? मैं वर्ष 1998 में फेमिना मिस इंडिया में भाग लेने के लिए दिल्ली से मुंबई आई. दिल्ली से जब रवाना हो रही थी तो माँ ने समर्थन किया और कहा कि कि कुछ अपने दम पर करना चाहती हो तो जाओ मेहनत करो और अपना नाम रोशन करो. लेकिन मेरे पिता बहुत कंजर्वेटिव नॉर्थ इंडियन बैकग्राउंड से हैं और उन्हें यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी उनकी बेटी मीडिया के बिज़नेस में जाए. मिस इंडिया कॉन्टेस्ट में जाना मेरे लिए ब्यूटी बिज़नेस नहीं था. मीडिया ही एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ मेरे पैरेंट्स कहीं सिफ़ारिश करके नौकरी नहीं लगा सकते थे और मैं हमेशा चाहती थी कि कुछ अपने दम पर करूं. मुंबई जाते वक़्त मेरे पिताजी ने कहा कि ये पैसे आप उधार ले लीजिए अगर आपको चाहिए तो. आपके पास तीन महीने का वक़्त है अगर आपके करियर का कुछ न हो पाए तो वापस आ जाइएगा हम आपकी शादी करा देंगे. यानी कि टिपिकल पिता थे सोचा कि लड़की का खर्चा ठीक से चल जाए और बेटी जब तक वापस आएगी बीच में हम लड़का खोज लेंगे.
जब मैंने मीडिया में अपने करियर की शुरुआत की उस वक़्त मीडिया लड़कियों के लिए मिडिल क्लास परिवारों में उतना सुरक्षित माना नहीं जाता था. लोगों की सोच थी बेटी को कहीं भी भेजो मगर इस क्षेत्र में नहीं. आज आप महिलाओं को बढ़ते देख रहे हैं लेकिन 10 साल पहले ऐसा नहीं था. फेमिना मिस इंडिया में फ़ाइनलिस्ट घोषित की गई तब मुझे लगा कि कॉन्टेस्ट तो ख़त्म हो गया, पैसे भी ख़त्म हो गए और कोई नौकरी नहीं है. जेब में केवल 200 रुपए बचे थे तब एडवरटाइजिंग एजेंसियों के चक्कर काटने लगी. अपने पापा को एक फ़ोन करतीं. कहीं न कहीं वो स्वाभिमान आड़े आ जाता थे. मेरे पिताजी हर रात फ़ोन करके पूछते थे कि अगर मनमानी पूरी हो गई हो तो आप दिल्ली लौट आएं. तो मैं पिताजी से कहती थी कि आपको मालूम नहीं है कल सुबह एक नई शुरुआत होने वाली है और बहुत बड़ा कॉन्ट्रैक्ट मिलने वाला है. इसपर मेरे पिताजी हँसते थे और फ़ोन रख देते थे. तीन महीने बीत गए और नौकरी कहीं मिली नहीं तो एक एडवरटाइजिंग एजेंसी ने मुझे ऑडिशन के दौरान कहा कि मैडम एक काम कीजिए, आप दिल्ली लौट जाइए. एक्टिंग आपसे होगी नहीं और आप जैसी पढ़ी-लिखी लड़की को किसी और नौकरी की तलाश करनी चाहिए. ट्रेन से लौटते वक़्त जब मिड डे में मैं नौकरी वाले सेक्शन में क्लासीफ़ाइड देख रही थी तो देखा कि मैकडॉनल्ड्स में ज़रूरत है. मुझे लगा कि ग्रैजुएट्स माँगा है तो ठीकठाक नौकरी होगी. मैं जब तक वहाँ पहुँची तो बताया गया कि एक ही नौकरी बची है और 1800 रुपए मिलेंगे. मैंने कहा नौकरी तो करनी ही है. मुझे लगा कि किसी मैनेजरियल पोस्ट या एसोसिएट के लिए होगा लेकिन हाथ में झाड़ू पकड़ा दिया और कहा कि आपकी शुरुआत यहीं से होगी. मैंने कहा कि चलो यही सही. डेढ़ महीने तक झाडू-पोछा और ट्रे साफ़ करना और लोगों से कहना कि वेलकम टू मैकडॉनल्ड्स, हाउ कैन आई सर्व यू? कौन से आउटलेट पर? बांद्रा, जो यहाँ पहला आउटलेट था. इस दौरान ऑडिशन देती रही. एक दिन मुझे एक कॉर्डिनेटर ने बुलाया और कहा कि आ जाइए जल्दी नीरजा गुलेरी के ऑफिस में. मैंने कहा कि इतनी क्या ज़रूरत पड़ गई है कि आप शाम सात बजे बुला रहे हैं. उन्होंने कहा कि नीलम कोठारी बीमार पड़ गई हैं और स्टार प्लस पर एक शो आता है ‘बेक मंजूलाला’ उसका एंकर नहीं है. ऑफिस मेरे घर के पास था. मैं गई तो श्रेय गुलेरी लोगों का इंटरव्यू ले रहे थे तो उन्होंने मुझसे पूछा कि हिंदी आती है. मुझे लगा कि यह बहुत विचित्र प्राणी है हमारे देश में ही पूछ रहा है कि राष्ट्रभाषा आती है. मैंने कहा, हाँ सर आती है. उन्होंने एक स्क्रिप्ट दिया पढ़ने को और मैंने पाँच मिनट पढ़ा. इसके बाद उन्होंने कहा कि रात में शूट करेंगे. इसके बाद मैंने उनसे पूछा कि पैसे कितने मिलेंगे, उन्होंने कहा कि दो हज़ार मिलेंगे. मैं काफ़ी खुश हो गई कि महीने भर झाड़ू-पोछा करके महीने भर में 18 सौ रुपए मिल रहे थे और यहाँ एक शो के दो हज़ार मिलेंगे. मैंने पिताजी को फ़ोन किया और कहा कि मेरी गाड़ी चल पड़ी. उन्होंने पूछा, कैसे हुआ ये सब. मैंने उनसे कहा कि आप नीलम कोठारी को जानते हैं उनकी तबीयत ठीक नहीं है और उनकी जगह एंकरिंग करनी है. नीलम कोठारी तो उस ज़माने में स्टार थीं और आपने उनको रिप्लेस किया. हाँ, मुझे मज़बूरी में नौकरी मिली और वह भी एक एपिसोड के लिए. रात भर जितने ख़्वाब पाले थे सुबह चकनाचूर हो गए. एक सप्ताह बाद जब वह एपिसोड एयर हुआ तो मेरे पास फ़ोन आया कि शोभा जी के ऑफिस से बोल रहे हैं, मैंने कहा कि मैं उन्हें नहीं जानती. उन्होंने कहा कि बालाजी से बोल रहे हैं. इससे भी जब मैं नहीं समझ पाई तो उन्होंने कहा कि जीतू जी को जानती हैं, उनकी पत्नी के ऑफिस से बोल रहे हैं. आइए मिलिए उनसे. मैं गई और उनसे मिली. उन्होंने मेरे काम की सराहना की. मुझे बाद में पता चला कि तीन-चार और प्रोड्यूशरों ने उसी संडे प्रोग्राम देखा और सबने मेरे पास एक सप्ताह में काम करने के प्रस्ताव भेजे. जब मैं शोभा जी से मिलकर निकल रही थी और वो मेरे साथ ही थीं तो एकता के कैबिन के पास वह रुकीं और बोलीं कि एकता इनसे मिलिए हमने देखा इनको पिछले संडे, इन्होंने बहुत अच्छा काम किया. एकता नाइस टू मीट यू कहकर चली गईं. नीलम कोठारी के घर के आगे आप दीया-बत्ती करती हैं कि नहीं? वो बीमार थीं इसलिए नहीं आ पाई थीं और मैं उनकी बीमारी को सेलिब्रेट नहीं कर सकती. बहरहाल श्रेय गुलेरी और अपने इंटरव्यू के माध्यम उनके पास अपना थैंक्स भिजवाया था. लेकिन वो बड़ी स्टार हैं और शायद मेरा थैंक्स उन तक नहीं पहुंचा. ख़ैर अब मालूम नहीं कौन बड़ा स्टार है. बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ने से पहले अपनी पसंद का एक गाना बताइए. एक गाना जो मेरी नज़रों में आया है वह सिर्फ़ गाने की वजह से नहीं बल्कि एक डांस मूवमेंट की वजह से वो है सांवरिया का टाइटल ट्रैक. रणबीर कपूर को जब मैंने प्रोमो में देखा तो मैंने कहा कि ये तो शम्मी कपूर की तरह नाचता है. मेरी अभी पिछले दिनों अनिल कपूर जी से मुलाका़त हुई थी और मैंने उन्हें सोनम के काम के लिए बधाई भी दी. सांवरिया का गाना मैं सुपरस्टारों की नई पीढ़ी को समर्पित करना चाहूँगी. शम्मी कपूर पसंद थे आपको? शम्मी कपूर बिना किसी रुकावट के दिल से नाचते थे. जो इतने सालों में कोई कॉपी नहीं कर पाया लेकिन अचानक एक लड़का उसी मासूमियत, शैली और ऊर्जा के साथ दिखा. पहली मुलाक़ात में तो एकता कपूर ने आपको बहुत ठंडी प्रतिक्रिया दी फिर उसके बाद यह रोल मिला. लोग कहते हैं कि आप दोनों के रिश्ते में अब वैसी बात नहीं है. क्या कुछ टिप्पणी करना चाहेंगी इस पर? मुझे लगता है कि एकता के साथ सात साल के काफ़ी लंबे सफ़र में मेरे से जो बन सका मैंने किया. आजकल जब मैं अभिनेत्रियों को देखती हूँ वो घड़ी मिलाकर काम करती है. जब हमने अपने काम की शुरुआत की उस वक़्त बालाजी की भी शुरुआत हो रही थी. एक जोश था हम सबमें कि दुनिया को कुछ कर दिखाना है. यह जोश स्क्रीन पर नज़र आता था क्योंकि हम सब एक परिवार बनकर काम करते थे. मेरे लिए यह सबसे सुनहरा दौर रहा. मुझे उस रोल की वजह से जितना प्यार और सम्मान मिला मैंने भी उतनी ही मेहनत की और समर्पण दिया. मैं जब पलटकर देखती हूं तो मुझे गम नहीं है कि इतना संघर्ष किया क्योंकि लोगों ने इतना ही प्यार दिया. यह प्यार सिर्फ़ उस रोल तक नहीं रहा यह मेरी ज़िंदगी में भी आया. मैंने जब फिर लेखिका और निर्माता के रूप में काम शुरू किया तो लोगों ने इतना ही प्रोत्साहित किया. मिस इंडिया कॉन्टेस्ट का अनुभव कैसा रहा? मेरा रुझान ख़बरों के प्रति ज़्यादा रहता था तो ग्रुप की लड़कियों का ये एजेंडा रहता था कि मेरे साथ सुबह चाय पीएं और जाने कि देश-दुनिया में क्या चल रहा है. मुझे लगता था कि आप हाज़िरजवाब हों, आपके पास दिमाग हो और सुंदरता उतनी जरूरी नहीं है. लेकिन यह हक़ीक़त नहीं है. मिस इंडिया बनने के लिए दिमाग के साथ आपका अत्यंत आकर्षक होना जरूरी है. इसके अलावा तक़दीर भी जरूरी है. हालांकि उस समय दुख हुआ था क्योंकि पैसे भी ख़त्म हो गए थे और प्रतियोगिता भी नहीं जीती. लेकिन आज जब पीछे पलटकर देखती हूँ तो लगता है कि अच्छा ही हुआ वरना आज इस मुक़ाम पर नहीं होती. आगे हम आपके बचपन की बातें करेंगे इससे पहले अपनी पसंद का एक गाना बताइए? शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म का गाना है ‘कल हो न हो….’ काफ़ी कुछ आप 'ब्यूटी विद ब्रेन' की कहावत पर खरा उतरती हैं. आपको देखकर लगता है कि हमेशा समझदारी से बात करती हैं. क्या यह शुरू से आपकी शख़्सियत का हिस्सा था या बाद में धक्के खाने के बाद यह समझदारी आई? इसका श्रेय आप मेरे परवरिश को दे सकते हैं. ज़िंदगी में हमेशा सोच-समझकर बोलना चाहिए क्योंकि आपके बोले शब्द का आप पर असर पड़ता है. मेरे माता-पिता ख़ासकर मेरे दादाजी हमेशा कहते थे कि आप जिस तरह से आचरण करते हैं उससे सिर्फ़ आप प्रभावित नहीं होते बल्कि आपके परिवार पर भी असर पड़ता है. इसलिए अगर कोई आकर हमारी बेटी की बात करे तो हमें गर्व हो कि स्मृति ईरानी हमारी बेटी या बहू है. अच्छी बातों को कोई बुरा नहीं कह सकता लेकिन बिंदास बोलने और बिंदास जीवन जीने का भी तो अपना मज़ा है. मज़ा तो है लेकिन फिर वही बात आती है कि आप समाज या परिवार में किस तरह की छवि बनाना चाहते हैं, ज़िम्मेदार की या गैर-ज़िम्मेदार की. अगर आप दो बच्चों की माँ हैं तो आपको सोचकर व्यवहार करना पड़ता है क्योंकि उसका असर आपके बच्चों पर पड़ता है. आगे बढ़ने से पहले अपनी पसंद का एक और गाना बताइए? मेरा सबसे पसंदीदा गाना है किशोर कुमार का 'जीवन के दिन छोटे सही हम भी बड़े दिलवाले...' हम चाहेंगे कि अपनी पसंद का एक और गाना बता दीजिए? मिस्टर इंडिया का एक गाना है, 'जीवन की यही रीत है, हार के बाद जीत है...' आपको ऐसी चीज़ें पसंद है जो गायब हो जाती हैं? यह फ़िल्म बहुत प्रेरणा देने वाली थी. मुझे इस फ़िल्म का एक दृश्य आज भी याद है कि जब अनिल कपूर शाम को लौटते हैं और बच्चे इंतज़ार कर रहे हैं कि वह खाने के लिए कुछ लाए हैं कि नहीं. यह दृश्य देखकर आज भी आँखों में आँसू आ जाते हैं. कभी आपका मन भी करता है कि सेट शॉट के लिए तैयार हो और आप गायब हो जाएं? मेरी हमेशा से ये कोशिश रही है कि मैंने जो-जो ज़िम्मेदारियां उठाई हैं उन सबके साथ न्याय करूं. नहीं तो मुझे अधिकार नहीं है कि इतनी सारी चीज़ों में एक साथ हाथ लगाऊं. आपके पति नहीं कहते कि थोड़ा आराम करो. इतनी ज़िम्मेदारी लेने की ज़रूरत नहीं है. जब मेरे पहले बच्चे का जन्म हुआ तो मैंने अपने पति से कहा कि अब मुझसे यह सब नहीं संभल पाएगा तो मुझे काम छोड़कर घर पर बैठना चाहिए. इस पर मेरे पति ने शम्मी कपूर के अंदाज़ में कहा कि बच्चा तो मेरा भी हुआ है और जब मैं काम छोड़कर घर पर नहीं बैठूंगा तो आप क्यों ऐसा करेंगी. उस दिन मुझे पता चला कि पुरुष और महिला में समानता क्या होती है. बोलने के लिए लोग समानता की बाते करते हैं पर उस दिन उन्होंने समझाया कि जो उनके लिए अच्छा है वही मेरे लिए भी है. जिस तरह आपके पति ने आपकी चुनावी मुहिम के दौरान ज़िम्मेदारी उठाई थी वो काबिले तारीफ़ थी. मेरा करियर मेरी शादी के बाद ही ऊपर उठना शुरू हुआ. चाहे हम जितनी भी आज़ादी की बात कर लें लेकिन हक़ीक़त यही है कि एक महिला के लिए परिवार और करियर की ज़िम्मेदारी उठाना मुश्किल होता है अगर पति और परिवार से सहारा न मिले. मैं पिछले सात साल से मनोरंजन की दुनिया में इस पायदान पर हूँ और डटी हुई हूँ क्योंकि मेरा परिवार मेरे साथ है. जीवन के किस मोड़ पर पति से मुलाक़ात हुई थी? मैं उन्हें बचपन से ही जानती हूँ. आप तो बड़ी छिपी रुस्तम निकलीं, लगता है आपने एक ही मुद्दे पर अपने माँ-बाप की बात नहीं मानी ? नहीं, रिश्ता मेरे पिताजी के पास पहुँचा था और उन्होंने ही इसके लिए हामी दी थी. लेकिन आप तो पंजाबी लड़की लगती है? नहीं मेरी माँ बंगाली हैं और उनकी माँ असम से हैं. मेरे पिताजी पंजाबी हैं और उनकी माताजी महाराष्ट्र से थीं. इसलिए एक पारसी से शादी करने पर परिवार में किसी ने आपत्ति नहीं जताई. मैं वापस 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' पर आता हूँ. आप शो में एक ही चरित्र निभाती रहीं और सामने के चरित्र बदलते रहे इससे कोई परेशानी हुई? एक अभिनेता के रूप में आपको इससे मतलब होना चाहिए कि आपका चरित्र क्या है. निर्माता से मेरी बात सिर्फ़ इस बात तक सीमित थी कि मैं अपना रोल ठीक से निभाऊं. इस तरह के टेलीवज़न शो में जटिल परिवार, ढेर सारे विवाहेतर संबंधों का चित्रण होता था जो हक़ीक़त से काफ़ी दूर लगता है. आपका क्या कहना है. यह एक नाटक था जीवन नहीं है. अगर हक़ीक़त देखना है तो समाचार चैनल देखिए. आजकल तो समाचार चैनलों में भी अंधविश्वास और अपराध के कार्यक्रमों की भरमार होती है. नाटक में आप हक़ीक़त की उम्मीद नहीं कर सकते. इस सफ़र को आगे बढ़ाए उससे पहले अपनी पसंद का एक गाना बताइए? 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' का गाना है ‘हो गया है तुझको तो प्यार सजना…’ आपने बड़े पर्दे पर आने का कभी सोचा? मैं बड़े पर्दे के लिए अभी निर्माता या लेखिका के रूप में काम करना चाहूंगी अभिनेत्री के रूप में फिर कभी बाद में सोचूंगी. ऐसा क्यों? छोटे पर्दे पर पाँच सीरियल के लिए बतौर निर्माता काम कर रही हूँ. फिर चुनाव आने वाले हैं. फ़िल्म में बतौर अभिनेत्री काम शुरू करने के लिए एक साल चाहिए और अभी मेरा पास इतना समय है नहीं. हाँ, बतौर नर्माता जरूर ऐसा कर सकती हूँ इसलिए अभी एक फ़िल्म निर्माण की प्रक्रिया में हूँ. अभिनेत्री से निर्माता क्यों बनीं आप ? मेरे लिए यह स्वाभाविक रूप से अगला क़दम था. छोटी-मोटी नौकरी करते वक़्त मैंने एसोसिएट प्रोड्यूशर और एग्जक्यूटिव प्रोड्यूशर के रूप में काम किया था. इसलिए मेरे लिए ये दुनिया इतनी अलग नहीं थी बल्कि इसके लिए मैंने ख़ुद को प्रशिक्षित करके तैयार भी किया. इसके अलावा मैंने जिस तरह के किरदार से शुरुआत की थी वैसे ही किरदारों वाले शो की भरमार थी. उस समय हमने स्टार प्लस पर एक अलग तरह के शो 'थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान' की शुरुआत की थी जिसमें सास-बहू ड्रामा नहीं था. इसमें मैंने एक अलग छवि के साथ काम किया. बतौर निर्माता आज जो मैं अलग-अलग सीरियल करती हूँ उसमें अलग किरदार को गढ़ने में मज़ा आता है. बतौर अभिनेत्री मैं सोनी पर 'विरुद्ध' कर रही हूँ. आपकी ज़िदगी का सबसे लज्जित करने वाला क्षण. मैंने जीवन में ऐसा कुछ नहीं किया जिसके लिए मुझे शर्मिंदगी उठानी पड़ी. सही किया या ग़लत किया वो नहीं जानती. अपने किसी भी काम से मैं लज्जित नहीं होती बल्कि उसके परिणाम से सबक लेती हूँ. आपके जीवन का सबसे सुखद क्षण. जिस दिन मेरी शादी हुई. उस समय मेरा करियर उड़ान भरने के रास्ते पर था और निजी जीवन में भी शादी के बाद सेटल हो गई. मेरे माता-पिता के चेहरे पर मैंने इस बात की चमक देखी कि उनकी बेटी अब पूरी तरह से सेटल हो गई. इसलिए मेरे जीवन का सबसे सुखद क्षण शादी का दिन था. स्टारडम के बीच ऐसा कोई किस्सा या क्षण जिससे सबसे ज़्यादा खुशी मिली? रविवार का दिन था. एक वृद्ध ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी मैंने उन्हें अंदर आने के लिए कहा लेकिन वो नहीं आए और मेरे सिर पर हाथ रखकर चले गए. मैं पाँच मिनट तक इस बारे में सोचती रही और फिर दौड़कर उनके पास पहुंची. मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं आपके लिए कुछ कर सकती हूँ. उन्होंने कहा कि नहीं आपको देख लिया, आशीर्वाद दे पाए यही मेरे लिए काफ़ी है. वह ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे. उन्होंने कहा कि वह संयुक्त परिवार में रहते हैं और घर में सबसे बड़े हैं. लेकिन ज़िंदगी की भाग-दौड़ में उनके बेटे और उनकी बहुएं ये भूल जाते हैं कि वह भी घर में हैं. वो परिवार का एहसास दिलाने के लिए मुझसे मिलना चाहते थे. उन्होंने कहा कि हर रात को घर पर अकेला रहता हूँ और रात को साढ़े दस बजे तुम्हें देखता हूँ तो कहीं न कहीं लगा कि रिश्ता है. लगता था कि तुम्हें आशीवार्द देकर निकल जाऊं तो तुम पूछोगी कि मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ. तुम आई और मैं ग़लत नहीं था. आने वाले सालों में आपसे लोग किस तरह की अपेक्षा करें? मैं कभी कोई चीज़ योजना बनाकर नहीं करती. एक ही बार दिल्ली में एक समाचार चैनल में नौकरी करने की योजना बनाई थी लेकिन आवेदन करने के डेढ़ महीने बाद भी जब कोई जवाब नहीं आया तो मैंने सोच लिया कि अब कुछ भी योजना बनाकर नहीं करूंगी और एक-एक दिन ज़िंदगी के हर पल को जीऊंगी. अब तो पत्रकार बनने का भूत उतर चुका है ना? सच पूछा जाए तो मुझसे एक्टिंग और प्रोडक्शन बंद करवा दिया जाए तो मैं आज भी किसी नेता या मशहूर हस्ती का इंटरव्यू लेना पसंद करूंगी. |
इससे जुड़ी ख़बरें एक मुलाक़ात: जावेद अख़्तर के साथ28 जनवरी, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस कविता कृष्णमूर्ति के साथ 'एक मुलाक़ात'24 जून, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'चक दे...' गर्ल्स के साथ 'एक मुलाक़ात'02 सितंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस कैलाश खेर के साथ 'एक मुलाक़ात'16 सितंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस शत्रुघ्न सिन्हा के साथ 'एक मुलाक़ात'07 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस सुनिधि चौहान के साथ 'एक मुलाक़ात'13 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस मधुर भंडारकर के साथ 'एक मुलाक़ात'18 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस संघर्ष करके शिखर तक पहुँचे सोनू 25 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||