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एक ख़ास मुलाक़ात, विद्या बालन के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इस हफ़्ते हमारी मेहमान हैं एक बहुत ही स्पेशल गेस्ट, बहुत ही ख़ूबसूरत, बहुत प्रतिभाशाली और जिनका इंटरव्यु करने का मेरा बहुत दिनों से मन था, वो हैं, विद्या बालन. अच्छा विद्या सबसे पहले ये बताइए इतने सारे विशेषण मैंने जो दिए उससे कहीं ज़्यादा मैं पढ़ता हूँ, लोग बताते हैं, बोलते हैं, उसमें से एक ये भी है कि विद्या बालन एकदम ताज़ा चेहरा है. एकदम कोई सुकून देने वाला हवा का झोंका. बहुत-बहुत अच्छा लगता है.. नहीं पता इसमें कितना सच है, लेकिन वाकई बहुत अच्छा लगता है. लेख पढ़ती हूँ, इंटरव्यू देती हूँ तो लोग ऐसा कहते हैं. फिर जिन-जिन लोगों से मिलती हूँ, वे भी अक्सर ऐसा कहते हैं. बहुत अच्छा लगता है. मेरी समझ में नहीं आता कि कैसे रिएक्ट करूँ. क्या कहूँ? क्या नहीं करूँ? तो कभी-कभी ऐसे ही हंस देती हूँ. अब ये बताइए विद्या कि आपने एक मॉडल के रूप में काम करना शुरू किया. बाद में कुछ म्यूजिक वीडियो में भी काम किया और फिर फ़िल्में तो सब बड़ी तेज़ी में हुआ कि धीरे-धीरे. नहीं, बहुत धीरे-धीरे हुआ है. पर लोग शायद पूरी कहानी जानते नहीं है. उनको लगता है कि मैं पहले विज्ञापन कर रही थी और तुरंत किसी दिन एक शो में गई, वहाँ विधु विनोद चोपड़ा ने देखा और फ़िल्म ऑफ़र कर दी. असलियत में ऐसा कुछ नहीं हुआ. मैं लंबे समय से इस क्षेत्र में हूँ. मैंने टेलीविज़न से काम शुरू किया. मैने एक धारावाहिक किया था, हालाँकि यह प्रसारित ही नहीं हो सका. इसके बाद ‘हम पाँच’ किया. फिर विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हुआ. कोई 80 के ऊपर विज्ञापन किए होंगे. फ़िर म्यूजिक वीडियो किए और एक बंगाली फ़िल्म की. फिर जाकर ‘परिणीता’ मिली मुझे. आप ख़ासी थक गई होंगी ये सब करते-करते? थक कहाँ गई हूँ. अभी तो मुझे बहुत-बहुत लंबा रास्ता तय करना है. विद्या बालन, बीबीसी एक मुलाक़ात में हमारी अपने मेहमान से एक गुज़ारिश हमेशा होती है कि प्लीज़ अपनी पसंद का एक गाना बताइए. हां. मैं आपको बहुत सारे अपने पसंदीदा गाने बताऊँगी. मैं अपनी पहली फ़िल्म के साथ शुरू करूंगी .परिणीता से मेरा पसंदीदा गाना- पिऊ बोले..वो जरा सुना दें तो मज़ा आ जाए. लगता है गाती भी हैं आप. मैंने सीखा ज़रूर है पर गाती नहीं हूँ, क्योंकि जब मैं गाती हूँ तो सब डर जाते हैं. सीखा है! तो फिर ‘पिऊ बोले’ की एक लाइन. गाती हूँ... पिऊ बोले पिया बोले, क्या ये बोले जाने ना.. अरे यार बहुच अच्छा, सच में बहुत अच्छा. बाकायदा कुशल गायक होने की तैयारी है. पता है, मैं आपको एक राज़ बताती हूँ. मैंने टीवी पर एक इंटरव्यू दिया था, जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया था. काफ़ी लोग उस इंटरव्यू को देख रहे रहे थे. मैने इंटरव्यू के दौरान एक गाना गाया था. उसके बाद मेरी दीदी की दोस्त का फ़ोन मुझे आया और कहा, “मैं एक बात कहूँ, तुम बुरा तो नही मानोगे?” मैने कहा, नहीं. तो उन्होनें कहा- तुम अभिनेत्री बेहतरीन हो पर गाना न गाओ तो यही सब के लिए अच्छा होगा. आपका गाना बहुत अच्छा था. शुक्रिया.
अब हम उन दिनों पर आते हैं जब आप मॉडल थी, क्या मॉडलिंग आसान थी? कहाँ से मॉडलिंग की शुरूआत हुई? कहाँ पढ़ती थीं? और मॉडल कैसे बन गईं? मैं सेंट जेवियर कॉलेज बॉम्बे में आर्ट से पढ़ रही थी और पहले ही साल मुझे टॉयफ़ायड हो गया था. उन दिनों की मेरी एक सहेली है, मनीषा. जो फ़िलहाल जापान में है. उसका मुझे फ़ोन आया कि यहाँ एक पोस्टर लगा हुआ है कि टीवी सीरियल के लिए कलाकारों की तलाश है. उसकी डेट शायद निकल चुकी है. लेकिन तुम ट्राई करना चाहती हो तो कर लो. इससे पहले मैने पृथ्वी थियेटर में दो महीने का एक वर्कशाप किया था. छुट्टियों में. तो मैंने कहा ठीक है, तबीयत ठीक हो जाएगी तो बायोडाटा भेज देती हूँ. मेरी बहन ने एक बायोडाटा बनाया और मैंने एक फ़ोटो स्टूडियो से अपना फ़ोटो खिंचवा कर भेज दिया था. मतलब आपने तैयारी में कोई कसर नहीं छोड़ी थी? नहीं मेरी बहन ने मेरा मेकअप किया, मुझे याद है. हमने गिने-चुने कपड़े पहने, शादी टाइप के. हे भगवान! अगर आप वो फ़ोटो देखेंगे तो बेहोश हो जाएँगे. फिर मेरा बुलावा आया ऑडिशन के लिए. 900 लोगों ने आवेदन किया था. 150 लोगों को ऑडिशन के लिए बुलाया गया और 30 लोगों का चयन हुआ. उन तीस लोगों में से एक मैं भी थी. क्या बात है भई. वो कपड़े तो संभाल के रखे हुए हैं न? जब मैं सीरियल कर रही थी, तब रमण कुमार और विनीता नंदा ने एक दिन मुझे बताया कि तुम्हारे फ़ोटो तो ख़ास नहीं थे, किसी प्रोफेशनल ने नहीं खींचें होंगें, लेकिन बायोडाटा की वजह से मुझे बुलाया गया. तब मैंने कहा कि तब तो आपको मेरी बहन को बुलाना चाहिए था. आपको पहला काम कैसे मिला? वह सीरियल प्रसारित तो नहीं हुआ, फिर ‘हम पाँच’ में काम मिला. लेकिन कॉलेज में हाज़िरी की दिक्कत आने के कारण मुझे यह धारावाहिक छोड़ना पड़ा. इसी दौरान मैं एक टीवी मीडिया पर वर्कशाप कर रही थी नंदू गोहानेकर के साथ. उन्होंने कहा कि कोई आदमी है जो विज्ञापन फ़िल्म के लिए एक नया चेहरा ढूँढ़ रहा है. मैं चाहता हूँ कि तुम वहाँ जाकर ऑडिशन दो. मैं वहां गई. कुल 40 मॉडल थे. उन दिनों के सारे जाने-माने टीवी मॉडल. मेरे साथ मेरी माँ और मेरी बहन भी थीं. हमने छह-सात घंटे इंतज़ार किया. जब मेरी बारी आई तो उसी वक़्त निर्देशक भी आ गए. अभी तक उनके सहायक ऑडिशन ले रहे थे. काफ़ी बार उन्होंने वही चीज़ करवाई. अगली चीज़ जो मुझे पता चली वह यह कि वह विज्ञापन मुझे मिल गया. तो इस तरह विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हुआ. कहना तो नहीं चाहिए, बहुत ही होनहार हैं आप, लेकिन कुछ भाग्य का भी मामला था? हां, सब कुछ भगवान की कृपा थी. क्योंकि बहुत सारे प्रतिभावान लोगों को मैं भी जानती हूँ, लेकिन उन्होंने बहुत ही संघर्ष किया है. शायद अब भी कर रहे हैं. मै सोचती हूं कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ. बीबीसी एक मुलाक़ात में आगे बढ़ें, अपनी पसंद का एक और गाना बताइए और गुनगुनाती रहिएगा. इस गाने को तो मैं गुनगुना नहीं सकती पर दो साल से यह मेरा पसंदीदा गाना है. जब भी मैं यह गाना सुनती हूँ बहुत खुश हो जाती हूँ. ये गाना है कभी अलविदा ना कहना से– मितवा… इसमें गायक की आवाज़ और गाने के बोल मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. एक बात और जो पहले ही दिमाग में आई, वो ये कि आप सेंट जेवियर में पढ़ती थीं तो पढ़ाई-लिखाई में तो होशियार रही होंगी. अच्छे नंबर लाए होंगें तभी एडमीशन हुआ होगा? पढ़ाई लिखाई में कोई ख़ास नहीं थी. औसत थी, पर मेहनत बहुत करती थी. और बंबई की लड़की हैं आप बाकायदा? हां बिल्कुल, यहीं पैदा हुई हूँ, यहीं बड़ी हुई हूँ. मैं मुंबईकर हूँ. बहुत बढ़िया, सेंट जेवियर बढ़िया कॉलेज है? हां बहुत बढ़िया कॉलेज, अगर कुछ कहूँ तो लगेगा मैं वहाँ से हूँ इसलिए ऐसा कह रही हूँ. पर वास्तव में जेवियर का जो माहौल है, शायद ही किसी दूसरे कॉलेज में हो. स्टार बनने के बाद कभी कॉलेज में अपना ज़लवा दिखाया है? नहीं, जेवियर पहले मैं बहुत जाती थी. पर ‘मुन्ना भाई’ के बाद लगभग दो साल से वहाँ नहीं जा पाई हूँ, क्योंकि वहाँ के नियम क़ानून बहुत सख़्त हो गए है. आई-कार्ड के बिना कॉलेज में नहीं जाने देते हैं. यह आप मुझसे न कहें! बिना आई कार्ड के आपको नहीं जाने देंगें? नहीं बहुत ख़राब लगता है, हमारे ही कॉलेज़ में आई-कार्ड कोई हमसे कैसे माँगे. माँगते हैं सो हमने जाना बंद कर दिया था. पर मुन्ना भाई के टाइम हम पास में ही शूटिंग कर रहे थे. मैं सबसे जाकर मिली. बहुत अच्छा लगा. प्रोफ़ेसर से मिली क्योंकि स्टूडेंट तो वहाँ नहीं थे. दोस्त भी नहीं थे. सारे अलग-अलग चेहरे थे. प्रोफ़ेसर से मिल कर के अच्छा लगा. एक कॉफ़ीवाला है हमारे कैंटीन में, उससे कॉफी पी. बहुत अच्छा लगा. अच्छा तो मैं आपसे एक बात पूछूँ कि वो कैसे क़िस्मत जगी कि विधु विनोद चोपड़ा ने देखा और परिणीता का रोल मिला. क्या आप उन लोगों में थी कि जो कि बचपन से ही सोचते हैं कि बस मुझे तो यही एक करियर चुनना है. मैं प्रसिद्ध होऊँ. मुझे लोग देखें, और मैं स्टार बनूँ, अभिनेता बनूँ, मॉडल बनूँ. या पहले पायलट बनने की सोचती थी, फिर एयरफ़ोर्स में जाने की?
आपको यक़ीन नहीं होगा, पर मेरी मम्मी मुझे और मेरी बहन दोनों को शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में ले जाती थीं. हम लोग भी सीख रहे थे. जो तानपुरा बजता था, मुझे नहीं पता था कि वह संगत करने वाला वाद्य यंत्र है. सुर बनाने के लिए तानपुरा बजाया जाता है. एक वक़्त मैं चाहती थी कि मैं तानपुरा शिक्षक बनूं. मेरे पापा दिल के मरीज़ हैं. आप जानते हैं कि एक बार मुझे लगा कि हां मुझे हृदय रोग विशेषज्ञ बनना चाहिए. इसके बाद मुझे शिक्षक बनने का शौक लगा. पर अभिनय का शौक हमेशा से रहा है, मुझे नहीं पता था कि मैं थियेटर करूँगी, विज्ञापन करूँगी कि फ़िल्म करूँगी. आप हृदय रोग विशेषज्ञ तो नहीं बन पाई जो आप बनना चाहती थीं. लेकिन आपने इतने लोगों को हार्ट पेशेंट बना दिया. ये तो कोई सही बात नहीं है आपकी. धन्यवाद. इसमें तो आपने मुझे कॉम्पलिमेंट दे दिया. अच्छा, विद्याजी ये बताइए कि परीणिता कैसे बनी? वास्तव में मैंने प्रदीप सरकार के साथ कुछ म्यूजिक वीडियो किए. चार-पाँच विज्ञापन फ़िल्में की, पहला म्यूजिक वीडियो जो उनके साथ किया यूफ़ोरिया का, आना मेरी गली. तब जाकर पहले दिन की शूटिंग ख़त्म करने के बाद उन्होंने कहा- ऐ लड़की, मैं फ़िल्म बनाने जा रहा हूँ काम करेगी? तो मैंने कहा-हां! दादा ने अपना वादा निभाया. इसके बाद मैनें दो और वीडियो किए. फिर दादा फ़िल्म पर काम करने लगे. कहीं न कहीं मुझे लगता था कि कहते तो सब हैं पर होगा नहीं. पर दादा ने जब फ़िल्म लिखनी शुरू की तो उन्होंने कहा मैं तुम्हें दिमाग में रख कर लिख रहा हूँ. उन्होंने कहा कि तुम खुद को तैयार करो. ये फ़िल्म कभी भी हो सकती है और इस तरह परिणीता बनी. हालांकि जब परिणीता की बात शुरू हुई और विधु विनोद चोपड़ा ने इस फ़िल्म को प्रोड्यूस करने का फ़ैसला किया तो वो चाहते थे कि एक बड़ी स्टार काम करे इस फ़िल्म में, क्योंकि इसमें दो नायक शेखर और गिरीश एक ही हीरोइन यानि लोलिता को चाहते थे तो चैलेंजिंग होने के कारण विधु बड़ी स्टार चाहते थे, लेकिन दादा ने कहा कि विद्या ही अपनी लोलिता होगी, आप इसे एक मौका तो दें. उन्होंनें मेरे बहुत से टेस्ट किए. आपको लगता था कि दो बड़े स्टार के सामने आप वह लोलिता साबित हो पाएँगी? देखिए, अगर कुछ करने की चाह हो तो मुश्किल कुछ नहीं. मेरा फ़िल्मों की कोई पृष्ठभूमि नहीं थी, इसलिए थोड़ा डर लगता था. लगता था कि फ़िल्मों की दुनिया बहुत गंदी होती है. लेकिन दादा की टीम बहुत अच्छी थी. तो इन सबको ध्यान में रखकर, मैंने बहुत मेहनत की. दादा ने भी बहुत मेहनत की मुझ पे. उनकी पूरी टीम टेस्ट के समय मेरे पीछे खड़ी रही, मुझे नैतिक समर्थन भी बहुत मिला. परिणीता की बात और करेंगे आपसे पर उससे पहले अपनी पसंद का एक और गाना हमारे सुनने वालों के साथ शेयर कीजिए. अच्छा ‘अमर प्रेम’ का एक गाना है- कुछ तो लोग कहेंगें लोगों का काम है कहना. मैने इसे बहुत गुनगुनाया है. क्या आपने यह फ़िल्म देखी है? शर्मिला टैगोर, राजेश खन्ना... हां, यह फ़िल्म और इसके गाने मुझे पसंद हैं. मैं अपने दोस्तों को सलाह देती रहती हूँ और मेरे बारे में जब भी कुछ लिखा जाता है वो ज़्यादा दुखी हो जाते हैं. तो हमेशा उन्हें यह लाइनें सुनाती हूं कि…तू कौन है तेरा नाम है क्या, सीता भी यहाँ बदनाम हुई. तो आजकल वो गुस्सा होने लगते हैं जब भी मैं ये लाइन इस्तेमाल करती हूँ. इस फ़िल्म का एक डॉयलॉग है, पुष्पा आई हेट टियर्स. रोओ मत पुष्पा, आई हेट टियर्स. अच्छा बताएँ. परिणीता जैसी बहुत सुंदर लेकिन बहुत ही साधारण लड़की की भूमिका करते हुए कहीं ये तो नहीं लग रहा था कि मैं इस फ़िल्म के बाद पल्ला-साड़ी-वाड़ी लड़की की तरह टाइप्ड हो सकती हूँ? नहीं, मैने ऐसा सोचा ही नहीं, फ़िल्म चलेगी, नहीं चलेगी, कैसी प्रतिक्रिया होगी? वो सब. यह मेरे काम करने का समय था और मैंने किया. जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो काफ़ी लोगों ने कहा कि अरे आपने ऐसी शुरूआत की है. आमतौर पर लोग रोमांटिक फ़िल्म से शुरूआत करते हैं, आपको नहीं लगा कि आप करियर एक बहुत परिपक्व रोल से शुरू कर रही हैं. मैंने कहा, मैंने बढ़िया शुरूआत के बारे में बात नहीं की थी. मैं जब फ़िल्में देखती थी तो मुझे हमेशा लगता था कि ऐसे टाईप की एक फ़िल्म हो. जैसा दादा के वीडियो देखकर लगता था कि शायद इस टाइप की वीडियो में मुझे काम करने का मौका मिले. और वही उन्होंने इस फ़िल्म के साथ किया. जी, कइयों का तो पूरा करियर निकल जाता है, ऐसी भूमिका के इंतज़ार में. देखिए परिणीता के बाद मेरी छह फ़िल्में रिलीज़ हो चुकी है. पर किसी में भी परीणिता नहीं है. सही है, लेकिन कोई दूसरी ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ भी नहीं है. जिसके बारे में हम बात करते हैं. ये बताइए सैफ़ के साथ काम करना, उनके जैसे बड़े अभिनेता के साथ काम करने का अनुभव कैसा था? बेशक, तभी ‘हम-तुम’ रिलीज़ हुई थी. और वे बहुत ही ऊंचाई पर थे. सैफ़ इतना स्वाभाविक अनुभव करते हैं कि अगर आप उनके साथ काम कर रहे हों तो कभी-कभी आपको लगेगा कि हे भगवान कहीं मैं ज़्यादा तो नहीं कर रही. सैफ़ और मेरे बीच ख़ास बातचीत नहीं हुई. मैं बहुत नई थी और काम में बहुत मशग़ूल थी. पर हमारी केमेस्ट्री बहुत अच्छी निकली. शायद इस वज़ह से कि.. बात कम करते थे शायद. हां बात कम करते थे. और वो जो एक तक़रार है वो भी अच्छी तरह उभर के आया है इस फ़िल्म में. क्योंकि वो ज़रूरी था. क्योंकि जब आप किसी को बहुत अच्छी तरह जानते हैं तो जान-पहचान के साथ कभी-कभी एक असहजता भी आ जाती है. जो उस फ़िल्म में नज़र आया. दादा हमेशा कहते थे कि नहीं, तुम यह महसूस करो. तुम जानती हो उसकी शर्ट कहा है, वह ख़ुद नहीं जानता. उस तरह का एक समीकरण जो है वह तुम्हारे बॉडी लैंग्वेज में भी झलकना चाहिए. अगर तुम जा के ढूँढ़ रही हो तो फ़िर इसका मतलब कि तुम नहीं जानती. निश्चित स्टेप होने चाहिए. ये छोटी-छोटी चीज़ें दादा बोलते रहते थे, मै समझती हूं कि ये चीज़े सहायता करती हैं. वह आपकी पहली फ़िल्म थी कि आप इतनी इनवाल्व हो गईं उस चरित्र में. तो क्या सच में आप उन दिनों लोलिता की तरह सोचने लगी थीं. मतलब उन दिनों विद्या बालन और लोलिता के बीच की लाइन कहीं धुंधली हो गई थी? आज आपको मैं कह सकती हूँ कि मैने नौ फ़िल्में की हैं. मेरे अनुभव में जब आप सच्चाई से काम कर रहे हैं और अपने चरित्र के साथ कहानी में पूरी तरह से डूब गए हों तब आपको पता चलेगा कि यह काम है. जब आप चरित्र के साथ जुड़ने लायक हो जाते हैं, तो आप चरित्र जैसा महसूस करते हैं. जो मेरे साथ लोलिता के साथ हुआ. उस समय जब मै संजय दत्त के साथ सीन कर रही थी तब मुझे लगता था कि गिरीश का जो नज़रिया है वह बिल्कुल सही है. जब मैं शेखर के साथ सीन कर रही थी तो लगता था कि, नहीं ये जैसे रिएक्ट कर रहा है वो तो बिल्कुल ठीक है. आप जानते हैं कि जब आप जैसा महसूस करते हैं वैसा ही सोचने लगते हैं तो आप कहानी के समकालीन हो जाते हैं. इसका पूरा श्रेय जाता है दादा को. वास्तव में वे डेढ़-दो, ढाई साल से किसी चीज़ के बारे में वो नहीं सोच रहे थे सिवाय परिणीता के. और उस वज़ह से न सिर्फ़ मैं बल्कि उनकी पूरी टीम, सबके ज़ेहन में एक ही चीज़ थी– परिणीता. फिर जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो आप नवागत की श्रेणी में आ गई. फ़िर एक के बाद एक, मुझे याद है जो पुरस्कार वितरण समारोह होता था विद्या बालन चली आ रही हैं स्टेज़ के ऊपर. कभी बेस्ट नवोदित अभिनेत्री, तो कभी बेस्ट ये तो कभी वो. तो कैसा था यह सब? यह अविश्वसनीय था. क्योंकि जैसा मैंने कहा था कि मैंने यह अवसर यह फ़िल्म करके पाया था. वही मेरे लिए सबसे बड़ा अवार्ड था. उसके बाद नामांकन हुए तो लगा कि पहले फ़िल्म के साथ ही नामांकन हो रहे हैं, फिर पुरस्कार मिलने शुरू हुए. यह सब अविश्वसनीय था. आप जानते हैं क्या अविश्वसनीय था, मेरे पिता की आंखों में अभिमान था. मै सोचती हूं कि मेरे पिता एक बच्चे की तरह हैं. अब भी वो बहुत एक्साइट होते हैं. मेरे पिता की आंखों का अभिमान अमूल्य है. सही बात है. बीबीसी एक मुलाक़ात में विद्या बालन आगे बढ़ें. अपनी पसंद का प्लीज़ एक और गाना बताएं. कलयुग फ़िल्म से गाना है ‘जिया धड़क-धड़क’. जो राहत फ़तेह अली ख़ाँ का गाना है. मुझे उनकी आवाज़ बहुत अच्छी लगती है. गाने की शुरूआत में शास्त्रीय पुट है. बेहतरीन है.. अब बात करते हैं हम परिणिता में आपके दूसरे सह कलाकार की और दूसरी बड़ी फ़िल्म की, जिससे कि एकदम ही भई विद्या बालन की तो बल्ले-बल्ले हो गई, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’. संजय दत्त के साथ काम करने का अनुभव कैसा था?
संजय दत्त बोलते बहुत कम हैं पर जब वो सेट पर रहते हैं तो बहुत प्यारा सा माहौल रहता है. वो ख़ासतौर पर काम के वक़्त केंद्रित रहते हैं. यानी जब टेक होता है तब. नहीं तो आपको लगेगा कि हां ये शायद इच्छुक है ही नहीं. बहुत कैजुअली काम कर जाते हैं. बहुत आसानी से काम कर जाते हैं. वह कभी तनाव में नहीं आते. मुझे ये भी लगता है कि ज़्यादातर चरित्र जो संजय दत्त निभाते हैं वो जैसे उन्हीं के लिए बनाए गए होते हैं? हां, सच में, क्योंकि वो इतना प्रभावशाली अभिनय करते हैं. आप जानते हैं उनकी जो शर्मिली मुस्कान है न वो एकदम दिल से निकलती है. जो मुझे बहुत अच्छी लगती है. वह बहुत अच्छे आदमी हैं. सेट पर स्पॉट ब्वाय से लेकर सभी उनको बहुत मानते हैं. निर्माता-निर्देशक, क्योंकि सभी से एक ही तरह वे पेश आते हैं. मै समझती हूं कि यह उनकी अच्छाई है.. यह एक एफ़एम चैनल है. जिस तरह से आपने लगे रहो मुन्ना भाई में हैलो...बोला था, एक बार बोल कर बताएँगी? बिल्कुल, गुड मार्निंग......मुंबई. कहीं इसकी थोड़ी बहुत ट्रेनिंग ली थी कि बस ऐसे ही आ गया और शुरू. कोई एफ़एम जॉकी को देखा है काम करते हुए? हाँ, मैं काफ़ी सारे रेडियो स्टेशनों पर गई थी और रेडियो जॉकी को देखा-सुना. कुछ फ़िल्में भी देखी जिसमें रेडियो जॉकी थे. फिर राजू हीरानी, शीना पारिख़ जो उनको असिस्ट कर रही थीं और मैं, तीनों बैठकर हमलोग कई तरह से गुड मार्निंग बोला, कई तरह के प्रयोग किए. गुड मॉर्निंग को लंबा और फैलाकर कहने से ये बहुत प्यारा लगा था तो हमने यही किया. आपने रेडियो जॉकी को इंज्वाय किया? हां, मैंने रेडियो मेज़बान की भूमिका को इंज्वाय किया. जिसकी लिए मेरी बहुत सराहना भी हुई. काफ़ी सारी रेडियो जॉकी ने मुझसे कहा कि हमें अच्छा लगा कि किसी ने ठीक से हमारा प्रतिनिधित्व किया. मुझे नहीं पता कि वो लोग ऐसे ही कह रहे थे कि वाकई मैने ऐसा किया. दरअसल, रेडियो जॉकी के और भी कई आयाम हैं, आप कोई चरित्र निभा रहे होते हैं जैसे रेडियो जॉकी या पत्रकार का तो उसके साथ पूरी तरह न्याय करने की स्थिति में नहीं होते है, क्योंकि आपको वो मौका नहीं मिलता पूरा दिखाने का. यह बहुत चुनौतीपूर्ण है. किसी का मनोरंजन करने के लिए बातें करते रहना पड़ता है. जब लोग आपका चेहरा देख सकते हैं तो अलग बात है, किंतु केवल आवाज़ के साथ यह काफ़ी कठिन है. कुछ लोग कहते हैं कि बहुत ही अच्छी एक्टर है. कोई कहते हैं कि बहुत सुंदर दिखती है. कोई कहते हैं कि ग्लैमरस कम है, एक्टिंग ज़्यादा है. आपको खुद क्या लगता है? अगर मैं बोलूँ कि भई विद्या बालन जरा बताएँ, ये सब जो लोग भाषणबाजी करते हैं आपके बारे में, आपका क्या कहना है? मेरा मानना यही है कि जैनुइन ग्लैमरस रोल मैंने अब तक नहीं किया है और जहाँ मुझे मौका मिला है, मैंने बहुत गंदा काम किया है. ‘हे बेबी’ में ग्लैमरस दिखने के लिए मुझे थोड़ी और मेहनत करनी चाहिए थी. क्योंकि मनीष मल्होत्रा कर रहे थे तो मुझे लगा कि मेरी तो ज़िम्मेदारी है ही नहीं. मनीष ने बहुत सी हीरोइनों को इतनी ख़ूबसूरती से पेश किया था. तो उस वजह से उन्होंने जो मुझे दिया, मैं पहन रही थी. अब अगर कहीं ग्लैमरस रोल करने का मौका मिले तो मैं जी-जान लगाकर करूँगी. अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ. भूल-भुलैया से ‘मेरे ढोलना’. फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत साल नहीं हुए हैं आपको लेकिन फिर भी कैसा अनुभव है आपका. आपके साथ अच्छा बर्ताव हुआ. क्या अच्छे लोग हैं यहां? मै सोचती हूं कि अच्छे-बुरे लोग तो हर जगह होते हैं. पर अगर यहाँ की ज़रा भी बुराई के बारे में लिखा जाता है तो लोगों को लगता है कि ये बुरे लोगों से भरा पड़ा है, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है. इन लोगों ने मेरा खुली बांहों से स्वागत किया, मेरी सराहना की और मुझे स्वीकार किया. मैं खुद को इंडस्ट्री का हिस्सा मानती हूँ. ऐसे कौन-से कलाकार हैं जिनके साथ आप काम करना चाहेंगी. आपने कुछ लोगों के साथ काम किया जो स्थापित हैं, क्या आप दोबारा उन्हीं के साथ काम करना चाहेंगी? उनके साथ दोबारा काम करना ज़रूर चाहूँगी. क्योंकि मेरे सभी पुरुष सह कलाकारों के साथ अच्छे रिश्ते हैं, मैंने अभी शाहरुख़, आमिर, ऋतिक और सलमान के साथ काम नहीं किया है, मैं इनके साथ भी काम करना चाहूंगी. और इनमें तरज़ीह देने का क्रम बनाएँगी कि किनके साथ..? शाहरुख़ मेरी पहली पसंद हैं, मुझे उनकी सभी फ़िल्में पसंद हैं और उसके बाद सभी और.. सभी बराबर. शाहरूख में ऐसी क्या ख़ास बात है. उनकी आँखें. जो रोमांटिक रोल उन्होंने किए हैं. मैं अपने दोस्तों से हमेशा कहती हूँ कि वो जब भी हीरोइन के लिए गाना गाते हैं तो आपको लगता है कि काश वो मेरे लिए गा रहे होते. मैं समझती हूं कि यहाँ शाहरुख़ से बड़ा कोई रोमांटिक हीरो नहीं हैं. और आपको लगता है कि अभिनेत्रियों की आपस में अच्छी दोस्ती होती है? पर मुझे पता है कि आप इसका क्या जवाब देंगी. पर हीरोइनों की क्या आपस में अच्छी दोस्ती हो सकती है? हां बिल्कुल हो सकती है. राइमा सेन मेरी बहुत अच्छी दोस्त है, बिल्कुल छोटी बहन की तरह, मैं उसे बहुत पसंद करती हूँ. हम एक दूसरे के काम की चर्चा करते हैं. ऐसा नहीं कि हम रोज़ मिलते हों या फ़ोन पर बात कर लेते हों. हफ्ते-दस दिन में हम बात करते हैं चाहें जहाँ भी हों. लेकिन एक दूसरे के काम को लेकर दोनों में कोई असुरक्षा की भावना नहीं होती. और डायरेक्टरों में कौन आपका फेवरेट है. आप किन लोगों के साथ दुबारा काम करना चाहेंगी, लेकिन ऐसा कोई नाम जिसके साथ काम करने का सबसे ज़्यादा मन हो? मैंने जितने लोगों के साथ काम किया है सभी के साथ फिर ज़रूर काम करना चाहूँगी. चाहे वो दादा हों, निखिल अडवाणी हों या फिर प्रियदर्शन. मैं संजय लीला भंसाली के साथ भी ज़रूर काम करना चाहूँगी. मुझे उनके साथ काम करना पसंद है. आप अभी तक अकेली हैं. तो कोई एक ड्रीम मैन या ड्रीम ब्वाय, कैसा होना चाहिए. मैं गिनाने के लिए तो काफी चीजें गिना सकती हूँ. यही जो आम लड़कियां कहती हैं कि वो मुझे खुश रख सके, मेरी सब ज़रूरी चीजों और लोगों को समझे उनका सम्मान करे. कोई ऐसा हो जिसकी तरफ मैं खुद-ब-खुद आकर्षित हो जाऊं, क्योंकि अगर किसी से आकर्षित हों तो उनकी हर बात अच्छी लगती है. बाकी़ सादगी और ईमानदारी भी महत्वपूर्ण है लेकिन वह निर्भर करता है.
और हां, सबसे ज़रूरी है कि उसे बहुत सफाई पसंद होना चाहिए, उसका कमरा बिल्कुल साफ सुथरा होना चाहिए. क्या मतलब, तीन या चार बार नहाने वाला होना चाहिए. नहीं तीन-चार बार नहाने वाला नहीं, पर अगर उनका कमरा अगर साफ सुथरा नहीं है तो फिर समस्या है. मैं बहुत तुनकमिजाज़ हूँ इन सब मामलों में. मैं नींद में भी होती हूं, तो कोई चीज आप माँगें तो आँखे बंद करके आप को दे सकती हूँ. इतनी ऑर्गेनाइज्ड? जी हाँ मैं बहुत ऑर्गेनाइज्ड हूँ, बहुत ज़्यादा. क्यों हैं भई आप इतनी आर्गेनाइज्ड. मेरे पापा बहुत ऑर्गेनाइज्ड हैं. और मैं बिल्कुल उनकी तरह हूँ. मम्मी इतनी आर्गेनाइज्ड नहीं हैं और मेरी छोटी बहन भी उनकी ही तरह है. अच्छा ये जो ड्रीम लक्षण वाले शख्स की आप बात कर रही हैं, उसकी तलाश में कहां तक पहुँची हैं. कहीं नहीं, और अब तो ढूंढना भी बंद कर दिया है मैंने. क्या टाइम नहीं मिलता. नहीं इन मामलों में टाइम की कोई बात नहीं होती. मेरे ख़्याल से जब होना होगा तभी होगा. क्यों कि ढूँढने से नहीं मिलता. मैंने बहुत कोशिश की मगर. लेकिन आपको नहीं लगता कि जब स्टार बड़े सेलिब्रिटीज हो जाते हैं तो लोगों के साथ आपका संपर्क कट जाता है? हां लोगों को थोड़ी-सी तो हिचकिचाहट होती है, कैसे संपर्क करें. लेकिन जो मुझे जानने लगते हैं वो अच्छी तरह जानते हैं कि मुझसे संपर्क किया जा सकता है.. लेकिन पता नहीं क्यों पिछले दो-तीन सालों में मुझसे किसी ने ऐसा नहीं कहा, जो बहुत ही दुखद है. बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र आगे बढ़ाएँ, अपनी पसंद का एक गाना और बताएँ? इजाज़त फ़िल्म का गाना.. मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है. यह मेरा पसंदीदा गाना है. गुलज़ार साहब ने खूबसूरती से लिखा है ये गाना. आपने जब अपने ड्रीम शख्स की खूबियां बताई थी तो उसमें एक सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी था. तो ऐसा कोई पुरुष सह कलाकार हो, जिसमें जबरदस्त सेंस ऑफ ह्यूमर हो? मेरा मानना है कि अक्षय कुमार में जबरदस्त सेंस ऑफ़ ह्यूमर है अच्छा अच्छी-अच्छी बातों के अलावा फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसी क्या चीज है जिससे आपको नफरत होती है? मेरे अब तक के अनुभव में मुझे नहीं लगता कि किसी चीज़ से मुझे नाराज़गी है. लेकिन अव्यवस्था मुझे पसंद नही. लोग काफी बार बहुत अव्यवस्थित होते है. अगर आप व्यवस्थित काम करते हैं तो अपना बहुत सा समय और पैसा बचा सकते हैं. इसलिए मैं अपने काम के अलावा लोगों से अनावश्यक नहीं मिलती. मेरा मानना है कि अगर आप मेरे अच्छे दोस्त हैं तो अच्छा लगे या नहीं लगे पर मैं कमियां बताती हूं पर अगर अच्छे दोस्त नहीं हैं तो मैं भला कुछ क्यों कहूं. और विद्या बालन की आदर्श शाम कैसी होगी. विद्या बालन- काम खत्म करने के बाद मैं घर लौटूंगी, तो अपने परिवारजनों और दोस्तों के साथ समय बिताना, देर रात तक पढ़ना, फ़िल्म देखना या लंबी ड्राइव पर जाना पसंद करूंगी. .इतनी सारी चीजें लगता है कि अगली शाम तक ये सब जारी रहेंगीं. यानी अगले दिन काम नहीं करना असली बात ये है? हां, बिल्कुल अगले दिन काम नहीं करना. बीबीसी एक मुलाक़ात का सफ़र आगे बढ़ाएँ, अपनी पसंद का एक गाना और बताएँ? पुरानी फ़िल्म आपकी कसम का गाना है जय जय शिवशंकर.. कांटा लागे ना कंकर. यह वाकई एक ख़ूबसूरत गाना है, जब भी सुनती हूं मेरा मन नाचने को करता है. और गुलाबी साड़ी में टिप्सी मुमताज़ और राजेश खन्ना का दृश्य आंखों के सामने आ जाता है. और अब से पाँच-दस साल बाद विद्या खुद को कहाँ पाती हैं? शायद तब तक शादी हो जाएगी, परिवार होगा. लेकिन अभिनय भी जारी रखना चाहूँगी. उम्मीद है कि जो पसंद है उनके बीच सामंजस्य बिठा लूँगी. विद्या बालन, आप बीबीसी एक मुलाकात के लिए स्टूडियो आईं, इतनी अच्छी बात की, गाने भी गुनगुनाए और बीच बीच में हल्की स्माइल भी देती रहीं, इसलिए आपकी ये इछ्छाएं तो 100 फीसदी ज़रूर पूरी होंगीं कि पांच दस सालों बाद बहुत अच्छी फ़ैमिली होगी, बहुत आर्गेनाइज्ड पति मिलेगा आपको. धन्यवाद. |
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