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शुभा मुदगल के साथ 'एक मुलाक़ात' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. हमारी आज की मेहमान हैं मशहूर गायिका शुभा मुदगल जिन्होंने शास्त्रीय संगीत और लोकप्रिय संगीत का अद्भुत मेल करने की कोशिश की है. शुभा मुदगल शास्त्रीय संगीत सुनने वालों और लोकप्रिय संगीत के दीवाने युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं. आपको शास्त्रीय संगीत में रुचि कब और कैसे पैदा हुई और आपने इसकी शिक्षा कहाँ से ली? मेरे माता-पिता ने संगीत की तालीम ली थी. उन्हें कला, संगीत और रंगमंच में गहरी रुचि थी. वैसे वे संगीत से पेशेवर तरीके से नहीं जुड़े थे लेकिन उनकी संगीत के प्रति गहरी श्रद्धा थी. मेरे माता-पिता इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाते थे. तो मुझे और मेरी बहन को घर में संगीत सीखने-जानने का भरपूर मौक़ा मिला. आपके माता-पिता अंग्रेज़ी के अध्यापक थे. आपको सबसे अच्छे लेखक कौन से लगते थे. घर में किसकी बातें सबसे अधिक हुआ करती थीं? मेरे पिता जी को जोनाथन स्विफ़्ट बहुत पसंद थे. स्विफ़्ट ख़ुद भी पढ़ाते थे. शेक्सपियर और मिल्टन भी पढ़ाए जाते थे. सिल्विया पैथ की भी बातें हुआ करती थीं. आप इलाहाबाद में बड़ी हुईं तो क्या आपको बचपन में इलाहाबाद के बड़े-बड़े साहित्यकारों के साथ मिलने, रहने और बात करने का मौक़ा मिला? जी हाँ. ये मेरा सौभाग्य है कि साहित्य की महान विभूतियों को पास से देखने और मिलने का मौक़ा मुझे मिला. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पास बैंक रोड इलाक़े में हम रहा करते थे. हमारे घर के बगल वाला घर ही फ़िराक गोरखपुरी साहब का था. एक दिन घर के दरवाजे पर घंटी बजी और देखा फ़िराक़ साहब गेट पर खड़े हैं. महादेवी वर्मा जी से मुलाक़ात हुई. सुमित्रा नंदन पंत जी मेरे माँ के परिवार के निकट थे. वो भी बहुत प्यार से मिला करते थे. आपने साहित्यकारों की एक बड़ी परंपरा वाले परिवार से निकली हैं. क्या आपको शुरू से लगता था कि आप ललित कला में जाएंगी और संगीत सीखेंगी. इनमें से कोई आपका आदर्श था? ये सोचा ही नहीं था कि कभी गाना सीखूंगी और कलाकार बन पाऊंगी. घर में हमेशा ये बताया गया कि संगीत और कविता को समझने की कोशिश करनी चाहिए. जब मैं संगीत सीख रही थी तो कभी नहीं कहा गया कि मुझे कलाकार ही बनना है और मंच से कार्यक्रम ही पेश करना है. घर से ऐसा कोई दबाव नहीं था. अगर उस समय आज की तरह इंडियन आइडल जैसी प्रतिस्पर्धाएँ हो रही होतीं तो आप ज़रूर जीत जातीं. अगर ऐसे कार्यक्रमों में मैं हिस्सा लेती तो मुझे घर पर बैठा दिया जाता और संगीत न सीख पाती. ('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.) वो कौन सा दौर था जब आपने यह तय किया कि आपको संगीत में ही अपना करियर बनाना है? जब मैनें बीए पास किया तो मेरी माँ ने मुझसे कहा कि मेरे अंदर संगीत का ज़ुनून है. मुझे संगीत में ही अपना करियर बनाने के लिए कोशिश करना चाहिए. ये आवश्यक नहीं कि सब की तरह मैं बीए, एमए और पीएचडी की पढ़ाई करूँ. उन्होंने कहा कि मैं एक साल तक संगीत की विधिवत शिक्षा लूँ और अगर लगता है तो उसे ज़ारी रखूँ. मेरे लिए माँ की तरफ से ये छूट मिलना एक अचंभे की बात थी. मैंने एक महीने में ही तय कर लिया कि मैं संगीत सीखूंगी और जमकर संगीत का अभ्यास करने लगी. मेरी सुबह और शाम संगीत सीखने में ही गुज़रने लगी. लेकिन तब भी तय नहीं था कि मैं संगीत को ही अपना करियर बनाउंगी. अपनी पसंद का एक गाना बताइए. 'डोर' फ़िल्म का एक गाना है ये हौसला कैसे मिले.... आपके लिए संगीत क्या है? संगीत मेरे दोस्त की तरह है जिससे मेरा झगड़ा भी हो जाता है. कभी निराशा भी मिलती है. ये ऐसी यात्रा है जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है. संगीत एक ऐसी धनी भाषा है जिसमें आप अपनी बात को कई तरीके से कह सकते हैं. मुझे तो लगता है कि मेरे लिए तो यही भाषा ही सबसे उपयुक्त है. तो किस-किस तरीके से संगीत में आप अपनी बात कह सकती हैं? आप इस कार्यक्रम में फ़िल्मी गाने अधिक चलाते हैं. लोग अक्सर कहते हैं कि ये हैप्पी सांग है या सैड सांग है. जैसे दोनों में कोई फ़र्क होता ही नहीं है. एक ही बात को कहने के कई अंदाज़ होते हैं. संगीत में पूरी रेंज है जिसे आप इस्तेमाल कर सकते हैं. आपको किस तरह का संगीत पसंद है? संगीत की मेरी तालीम भारतीय शास्त्रीय संगीत की विधाओं ख़याल गायकी और ठुमरी-दादरा में है और चल भी रही है. जैसे मातृभाषा बोलने में आसानी होती है वैसे ही मुझे ख़याल और ठुमरी-दादरा में भी आसानी होती है. मुझे क़व्वाली, गज़ल और फ़िल्मी संगीत पसंद है. सिर्फ़ भारतीय ही नहीं बल्कि दूसरे देशों और प्रांतों का संगीत भी पसंद करती हूँ. मैं संगीत की विद्यार्थी हूँ. हर तरह का संगीत एक बार ज़रूर सुन लूँगी लेकिन मेरी अपनी प्राथमिकताएँ भी हैं. अपनी पसंद का एक और गीत बताएँ. राहत फ़तेह अली ख़ान ने भारतीय फ़िल्म मे एक गाना गाया है जिया धड़क-धड़क जाए... एक समय था जब हर घर में लड़कियों को संगीत की तालीम दिलवाई जाती थी. लड़के भी भारतीय संगीत में रुचि लेते थे. लेकिन आज ये रुझान देखने को नहीं मिलता और साथ ही कैसेट और सीडीज़ की बिक्री बढ़ी है. हमारे वाद्ययंत्र पिछड़ रहे हैं. ये बहुत ही जटिल सवाल है. इसका सीधा ज़वाब देना संभव नहीं. हमारे संगीत और कला के प्रति जो पहले श्रद्धा देखने को मिलती थी वो आज देखने को नहीं मिलती. हमारे संगीत का प्रतिनिधि सिर्फ़ फ़िल्मी संगीत नहीं है. हमारे यहाँ शास्त्रीय, लोक, धार्मिक और जनजातीय संगीत भी है. हमारे घरों में विभिन्न अवसरों पर औरतें गाना गाया करती थीं. ये सब आज सुनने को नहीं मिलता है. हमारे संगीत की विविधता का गला घोंटा जा रहा है. गला घोंटा जा रहा है? हाँ देखिए ना. हर तरफ हिंसा, आगज़नी का माहौल है. आपको क्या लगता है हमारे संगीत का गला घोंटा जा रहा है या हमारी संगीत परंपरा ने समय के साथ अपने में बदलाव नहीं लाया? मैं आपसे एक सवाल पूछती हूँ कि अगर आपके घर में शादी है तो क्या शादी का गाना नहीं गाया जाएगा. जब सेहरा बँधेगा तो सेहरा बँधने का गाना नहीं गाया जाएगा. आप शादी का गाना गाएँगे या काँटा लगा...? मानिए सेहरे में काँटा लगा हो तो? अगर सेहरे में इतने काँटे लगे हों तो अज़ब ही बात होगी. ज़ाहिर सी बात है कि हर अवसर के लिए कुछ गीत-संगीत होते हैं उसे गाइए. अगर कृष्ण जन्माष्टमी या ईद हो तो धूम मचा ले... गाने की क्या ज़रूरत है. उस दिन से जुड़ा कुछ तो गाइए. ये धारणा हमने ख़ुद बना ली है. नेहरू पार्क में जब हम गाते हैं तो हर तरह का आदमी होता है. तो कैसे कह सकते हैं कि संगीत सुनने वाले कम हो रहे हैं. अगर हम आज शास्त्रीय संगीत गा रहे हैं तो हम आज के दौर का शास्त्रीय संगीत गा रहे हैं. इसे पुरातत्व विभाग में भेजने की क्या ज़रूरत है.
हमारी सोच और परंपराओं में जो परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं उसके लिए आप क्या हिंदी फ़िल्मों को ज़िम्मेदार मानती हैं? हिंदी फ़िल्मों को क्यों दोष दें. उनका अच्छा समय चल रहा है. आज भी अच्छा संगीत सुनने वाले लोग हैं. अगर वो अच्छा संगीत सुनना चाहते हैं तो आवाज़ क्यों नहीं उठाते. क्योंकि आज तो ये सुविधा भी है कि आप एसएमएस से ये बता सकते हैं कि आपको कार्यक्रम अच्छा लगा कि नहीं. आप बता सकते हैं आप कौन सा गीत सुनना चाहते हैं. अगर आप ये एसएमएस कर सकते हैं एक फ़िल्म के किसिंग सीन पर आपकी राय क्या है तो ये संदेश क्यों नहीं भेजते कि आपको ये गाना सुनना है. अगर आवाज़ नहीं उठाएंगे तो दूसरे तो अपनी मनमानी करते रहेंगे. रिमिक्स ट्रेंड के बारे में आपका क्या कहना है जिसके तहत कुछ पुराने गानों को नए कलेवर के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है. कुछ लोगों का कहना है कि पुराने गानों और संगीत को जवान किया जा रहा है तो कुछ लोगों को कहना है कि पुराने संगीत की टाँगें तोड़ी जा रही हैं? देखिए मैं तो संगीत की दृष्टि से ही बात कर सकती हूँ. अगर किसी गाने का रिमिक्स बनाया जा रहा है उसे पुनर्जीवन दिया जा रहा है तो पहले ये बताइए कि किस कंपोज़र ने सबसे पहले इस गाने को तैयार किया था. उस कंपोज़र की सांगीतिक सोच को ख़त्म करना मुझे लगता है सही नहीं है. ये ऐसी ही बात हुई कि आप कोई पेंटिंग लाएँ और एक दिन कहें कि मुझे ये लाल अच्छा नहीं लग रहा. मैं इसे बदल देता हूँ. आपने कलाकार की कोई कदर नहीं की. दूसरी बात ये है कि ये भी पता लगना चाहिए कि आप क्या नया लाए. अगर आपने तबला और ढोलक हटा दिया और ड्रम और की बोर्ड्स ले आए तो लोगों तक आपका ये मैसेज़ जा रहा है कि तबला और ढोलक पुराना है इसे फेंक दो. ये तर्क मुझे समझ नहीं आता. आज दुनिया में भारत के सबसे जाने-माने संगीतकार एआर रहमान तो पश्चिमी वाद्य यंत्रों और तकनीकी का इस्तमाल करके संगीत तैयार करते हैं? लेकिन अगर आप देखें तो वो साथ ही पारंपरिक यंत्रों का पूरा इस्तमाल करते हैं. आपको उनके पास ढोल, मंजीरा, घंटी, इकतारा भी मिलेगा. लोक संगीत परंपरा की झलक भी मिलेगी. ऐसे लोग भी हैं जो परंपरा और आधुनिकता का ख़ूबसूरत मेल कर रहे हैं. ये संगीत का एक प्रकार है. इसमें आप मिश्रण कर सकते हैं. आपको पसंद आए तो सुनिए नहीं तो न सुनिए. इस तरह के संगीत को अच्छा-बुरा कहने की क्या ज़रूरत है. और भारतीय फ़िल्मों में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. लंबे समय से पश्चिमी और भारतीय वाद्ययंत्रों का एक साथ इस्तेमाल होता आ रहा है. लेकिन भारतीय संगीत की विविधता को किसी तरह का नुकसान नहीं होना चाहिए. मानिए आप संगीत निर्देशक हैं और आप से कहा जाए कि पुराने गाने को रिमिक्स करके गाइए तो आप कौन सा गाना रिमिक्स करेंगी? मैं तो रोज़ ही करती हूँ. मैं शास्त्रीय संगीत की पुरानी बंदिशों को रोज़ नया करके गाती हूँ. कोई गीत लेकर उसे नया ज़ामा पहनाना तो हमेशा हमारी परंपरा में रहा है. किसी ऐसे गाने का रिमिक्स जिसे सुनकर लगा हो कि इसका रिमिक्स बहुत अच्छा था. याद नहीं. कोई ऐसा गाना जिसका रिमिक्स सुनकर लगा कि ये बनना ही नहीं चाहिए था. लगा हो जैसे गाने की हत्या हो गई. कभी आर कभी पार...वो कभी नहीं होना चाहिए था. आपको सूफ़ी गाने का काफ़ी शौक़ रहा है. मैं सूफ़ी गाने सुनती हूँ. लेकिन तालीम नहीं ली है. अगर कोई सूफ़ी संगीत का गाना आप सुनना पसंद करें तो कौन सा बताएंगी? अभी एक-दो साल पहले रब्बी शेरगिल ने अपने सूफ़ी गानों से बहुत धूम मचाई थी. अच्छा लगा कि अपनी तरह के संगीत में अपनी आवाज़ को लोगों तक पहुँचाने की हिम्मत किसी ने की. लोगों ने पसंद भी किया. उसी का गाना सुना दीजिए. आप स्पिक मैके के कार्यक्रमों में भी जाती हैं. आपको क्या लगता है कि आज का युवा किस तरह का संगीत पसंद कर रहा है? ये कहना मुश्किल है कि कोई एक तबका किस तरह का संगीत पसंद कर रहा है. एक तरफ देखने में आता है कि युवाओं को पारंपरिक संगीत में कोई रुचि नहीं है. वहीं ये भी देखने को मिलता है कि संगीत के संस्थानों में संगीत सीखने के लिए युवाओं का तांता लगा रहता है. कुछ लोग आपकी आलोचना करते हैं कि आप पारंपरिक संगीत से पॉप संगीत की ओर गईं हैं. आपका क्या कहना है? देखिए आलोचक बहुत अच्छे होते हैं और आलोचना से डरना नहीं चाहिए. वैसे कहीं मैंने अपनी आलोचना नहीं सुनी है. अगर कोई पब्लिक डिबेट हो तो शायद ही कोई कलाकार कहे कि मैंने लोकप्रिय संगीत गाया हो. लेकिन ये ज़रूर है मुझसे पहले जो संगीत के पंडित और विद्वान हुए हैं उन सबने ऐसा किया हुआ है. आपको पॉप स्टार कहते हैं तो अच्छा लगता होगा. मुझे गायिका माने यही मेरे लिए बहुत है. मैंने किसी संगीत घराने से नहीं हूँ. फिर भी अगर मुझे पहली पीढ़ी की कलाकार को लोग गायिका मानते हैं तो मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है. आपने कभी अपनी इमेज़ बनाने की सोची कि ऐसे कपड़े पहनने हैं, ऐसे जाना है और ऐसे मिलना है? नहीं मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा. जब मैं शास्त्रीय संगीत गाती हूँ या पॉप संगीत गाती हूँ तो दोनों समय एक सी नज़र आती हूँ. विदेश में भी ऐसे ही रहती हूँ. मैं इमेज़ेज़ में नहीं जीती. मैंने कई ऐसे कलाकार देखे हैं जो आपके साथ बैठे हों तो आपको पता तक नहीं चलेगा कि आपके साथ कौन बैठा है. लेकिन वही कलाकार मंच पर अलग तरह से होगा. आपको जिसमें मज़ा आए वही कीजिए. अपनी पसंद का एक और गाना बता दीजिए. आप कैलाश खेर का अल्ला के बंदे... गाना सुना दीजिए. वो दिल्ली के ही हैं और अच्छी धूम मचाई हुई है. आप इलाहाबाद की हैं. कभी अमिताभ बच्चन से मुलाक़ात हुई है. अमिताभ बच्चन से मुलाक़ात तो नहीं हुई है लेकिन जब राजकमल प्रकाशन ने उनके पिता जी का काव्यसंग्रह निकाला था तो मैंने गाना गाया था. तब मैं नई-नई ही दिल्ली आई थी.
इलाहाबाद में ऐसी क्या ख़ास बात है जो वहाँ से इतने महान लोग आते हैं? इलाहाबाद विश्वविद्यालय वाला शहर है. पढ़ने-पढ़ाने की परंपरा रही है वहाँ. आज भी वहाँ कई विद्वान लोग पढ़ा रहे हैं. प्राचीन तीर्थस्थान भी है. वहाँ बड़े राजनीतिज्ञ भी हुए हैं. जहाँ कला, साहित्य और संस्कृति को जगह दी जाती है वहाँ से ऐसे लोग आते ही हैं. क्या सचमुच इलाहाबाद एक ख़त्म होता शहर है? ऐसा नहीं है. अभी भी वहाँ बहुत से अच्छे लोग हैं. विश्वविद्यालय का राजनीतिकरण ज़रूर हुआ है. वहाँ माहौल बिगड़ गया है. आपका बचपन कैसा था? बहुत ही मज़ेदार. हम अपने माँ पिता जी के साथ संगीत समारोह में घूमने जाते थे. पहाड़ों पर जाते थे. मुझे फ़िल्में देखने का बहुत शौक़ था. मेरे दोस्त शर्त लगाते थे कि मैं फ़िल्म देखने के दौरान ही एक गीत याद करूँ. आप शर्त जीत जाती थीं? अधिकतर तो जीत ही जाती थी. आप पहले से याद करके जाती होंगी? ये सब तो चलता ही रहता था. कौन सी फि़ल्में पसंद थीं? मुझे याद है कि एक बार हम स्कूल से भाग कर 'अभिमान' फ़िल्म देखने गए थे. बहुत ही बेहतरीन फ़िल्म थी. इस फ़िल्म के लिए स्कूल से भागना ठीक था. हाँ मैं भी यही मानती हूँ. तब किस कक्षा में पढ़ती थीं आप? बीए में थी तब. मैं अपनी क़रीब दस दोस्तों के साथ रिक्शे से वापस लौट रही थी और अभिमान का पिया बिना पिया बिना... गाना गा रही थी. जब आप अभिमान देखकर लौट रही थीं तो क्या आपको पता था कि एक दिन ये अमिताभ बच्चन बहुत बड़ा स्टार बन जाएगा. कभी ऐसा सोचा नहीं था. दोनों ने ही अच्छा काम किया था. मैंने नहीं सोचा था कि अमिताभ इतने बड़े स्टार बन जाएंगे. और कौन से एक्टर पसंद हैं? मुझे ओमपुरी, नसरुद्दीन शाह, पंकज कपूर और इरफ़ान का काम पसंद है. इरफ़ान की कोई फ़िल्म देखी है आपने हाल में? मैंने अभी 'नेमसेक' फ़िल्म देखी है जो झुंपा लाहिड़ी के उपन्यास पर बनी है. आपकी पसंद का कोई एक नया गाना. गुरू फ़िल्म का गाना तेरे बिना... क्या पिछली बार की तरह इस बार भी भूमिका में परिवर्तन होगा. क्या अभिषेक ऐश्वर्या से बड़े स्टार बन पाएंगे. आज तो ऐश्वर्या बड़ी स्टार हैं? मैं सोचती हूँ तो दोनों का करियर अच्छा रहेगा. ऐश्वर्या ख़ूबसूरत हैं लेकिन ऐश्वर्या के अभिनय की मैं बहुत तारीफ़ नहीं कर सकती. और डांस की. डांस भी ठीक-ठाक है. अभिषेक बच्चन के अभिनय पर क्या कहेंगी. सरकार देखी है आपने? सरकार देखी है. उनका अभिनय ठीक है लेकिन अभी मेहनत करने की ज़रूरत है. अभिषेक में अमिताभ वाली बात दिखती है कि नहीं? थोड़ी-थोड़ी तो दिखती है. लेकिन आगे क्या होगा ये अल्ला के बंदे ही जाने. आजकल जो संगीत चल रहा है भारत में. उसके बारे में आपका क्या कहना है. जैसे हिमेश रेशमिया का संगीत? देखिए अगर किसी कलाकार को सफलता मिलती है तो अच्छा ही है. लेकिन मुझे लगता है कि लोगों की संगीत की समझ कम हो रही है. अगर यही दौर ज़ारी रहा तो लोगों को गले से गाने की ज़रूरत नहीं रहेगी. (नाक से बोलते हुए) आप क्या नाक की बात कर रहे हैं. मुझे नज़ला नहीं हुआ है. अपनी पसंद का एक और गाना बताएँ. मुझे आप मेरा गाया हुआ ही एक गाना सुनवा दीजिए. मन के मंजीरे...सुनवा दीजिए. आपका एक और गाना है अली मोर अंगना...उसके पीछे क्या प्रेरणा थी? उस गीत को न मैंने तैयार किया न मैंने लिखा. मेरे एक दोस्त हैं जवाहर वातल. जो लोकप्रिय संगीत बनाते हैं. उन्होंने 1996 में मुझसे कहा कि वो कुछ ऐसे गाने बनाना चाहते हैं जो लोकप्रिय संगीत के हों. इन गानों को वो मुझसे गवाना चाहते थे. लेकिन मैं उन दिनों ऐसे गानों के लिए ख़ुद को तैयार नहीं पाती थी. उन्होंने कहा कि आइए प्रयास करते हैं अगर आपको पसंद आ जाएगा तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं. एक गाना गाया तो बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम लगा. मुझे तो तबले, हारमोनियम की आदत थी. लेकिन यहाँ तो मल्टीट्रैक बज रहा था. चुनौती भी थी और मज़ा भी था. उन्होंने कहा एक और गीत बनाएँ. मैंने कहा बना लीजिए. इस तरह एक अलबम तैयार हो गया. कुछ को पसंद भी आया और कुछ को नहीं भी आया. नई पीढ़ी के प्लेबैक सिंगरों में आपको कौन से गायक पसंद हैं? हरिहरन, शंकर महादेवन, सुखविंदर और केके बहुत पसंद हैं. और लता और आशा जी में कौन अधिक पसंद है? दोनों ही पसंद है. पहले मैं कोशिश करती थी कि मेरी गायकी में उनकी छटा आ जाए. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. वो लोग इतनी बड़ी गायिका हैं जो लोगों के अंतरचेतन में ज़रूर जगह बनाती होंगी. आशा जी का कोई गाना जो आपको पसंद है? एक गाना है उनका मुझे रंग दे, मुझे रंग दे... आपका रोलमॉडल कौन है? मुझे लता जी, आशा जी, बेगम अख़्तर और सिद्धेश्वरी देवी जैसी बड़ी गायिकाओं से बहुत प्रेरणा मिलती है. इनकी ओरिज़िनैलिटी मुझसे कहती है कि अपनी आवाज़ ढूँढो. जो सफलता आपको मिली है उसके बनाए रखने के लिए आपको क्या अभी भी मेहनत करनी पड़ती है? जी हाँ. अगर मेहनत नहीं करेंगे तो हमारी आवाज़ हमको बता देगी. मेहनत में कमी नहीं होनी चाहिए. क्या मेहनत के साथ परहेज़ भी करना पड़ता है? ये आवाज़ पर निर्भर करता है. जिस किसी की आवाज़ नाज़ुक होती है उसे अधिक सावधानी लेनी पड़ती है. मेरी आवाज़ ऐसी नहीं है. आपको खाने में क्या पसंद है? मुझे मीठा बहुत पसंद है. मीठे में क्या पसंद है? कुछ भी जो मीठा हो. मीठे में इलाहाबाद का कौन सा पकवान पसंद है? इमरती, जलेबी और दूध. इसमें भी आप पारंपरिक हैं. नहीं चॉकलेट भी पसंद है. आपकी पसंद का एक और गीत. तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं...'आँधी' फ़िल्म का गीत है. बहुत ही बेहतरीन फ़िल्म है. गुलज़ार साहब ने गीत लिखे हैं. जीवन के वो क्षण जब आप अपने को सातवें पा रही हों. मेरा बेटा धवल 1984 में पैदा हुआ था तब मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी. आपका बेटा भी संगीत के क्षेत्र में जा कहा है और आप से अलग तरह का संगीत बना रहा है. आपको ऐसा नहीं लगता कि वो भी आप के जैसा संगीत बनाए. मुझे तो ये बहुत अच्छा लगता है कि वो संगीत को अपना रहा है. ये कहना बहुत ही ग़लत होगा कि मैं उससे कहूँ कि वो इस तरह का संगीत बनाएँ. मैं इतनी राय उसको ज़रूर दूँगी कि वो जिस तरह का संगीत बनाए वो अनुशासन में रहकर बनाए. संगीत को अनुशासन में रहकर सीखे. अभी वो 22-23 साल का है. आप कितना अनुशासन चाहती हैं? मुझे तो कूल मॉम की उपाधि मिल चुकी है. हम एक-दूसरे को अपना संगीत सुनाते रहते हैं. आपकी ज़िंदगी के सबसे ख़राब क्षण. जब मुझसे कोई कहता है कि अरे शुभा तुम तो बहुत मोटी हो गई हो. कोई ऐसी इच्छा जो आप पूरी करना चाहती हैं? मुझे गुरुओं से बहुत कुछ सीखने को मिला है. मुझे बहुत अवसर मिले. हमारे यहाँ गुरू-शिष्य परंपरा है. लेकिन आम आदमी तक संगीत पहुँचाना बहुत ज़रूरी है. मैं उसी दिशा में कुछ काम करना चाहूँगी. | इससे जुड़ी ख़बरें मुलाक़ात- लालकृष्ण आडवाणी के साथ26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: शीला दीक्षित से02 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: अमर सिंह के साथ07 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: वसुंधरा राजे के साथ22 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात : मणिशंकर अय्यर के साथ29 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस 'एक मुलाक़ात' सर्वश्रेष्ठ मौलिक कार्यक्रम घोषित04 जून, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: लालकृष्ण आडवाणी से26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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