BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
रविवार, 22 अप्रैल, 2007 को 03:32 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
एक मुलाक़ात: वसुंधरा राजे के साथ

वसुंधरा रेजा
खादी को बढ़ावा देने के लिए वसुंधरा राजे रैंप पर भी उतर चुकी हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं राजमहल से राजनीति के गलियारे तक का सफ़र तय कर चुकीं राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया से.

वसुंधरा जी, वैसे तो आपके व्यक्तित्व के कई पहलू हैं पर आपको ख़ुद कौन-सा सबसे ज़्यादा पसंद है?

आपने मेरे व्यक्तित्व के कई ऐसे पहलू बताए जिससे मैं ख़ुद भी अनजान हूँ या वो मेरे लिए भी इतिहास बन चुका है. बहरहाल मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है ग्रामीण जीवन. हालांकि कहने वाले तो ये तक कहते हैं कि महारानी को गाँवों के बारे में क्या पता है.

लोग भूल जाते हैं कि एक जमाना था जब गाँव के लोग और महारानी एक परिवार होते थे और इसी अटूट संबंध के बूते महारानियाँ जीतती रही हैं. इस रिश्ते को इतिहास ने बनाया था और हमने अभी तक कायम रखा है. इस रिश्ते को हम आसानी से नहीं भूल सकते. इस संबंध का सबसे ख़ूबसूरत पहलू यह है कि कोई मुखौटा लगाए नहीं रहता, जो जैसा है वैसा है और मैं इस भूमिका को सबसे ज़्याद पसंद करती हूँ.

यानी कि आप लोगों की रानी बनना चाहती हैं.

हाँ, मुझे ये सबसे ज़्यादा पसंद है.

किस तरह का बचपन बीता ? क्या कभी ये एहसास दिलाया गया कि आप राजपरिवार से हैं इसलिए दूसरों से अलग दिखना है या फिर ये बताया गया कि आप भी दूसरों की तरह ही हैं और अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति सजग रहना चाहिए?

ऐसा लगता है कि बचपन की ज़िदगी फ़िल्म की तरह थी.जहाज़ों में घूमना, रेस देखना, महलों में रहना, चाँदी की थाली में खाना, नौकरों का बिगाड़ा जाना और अपनी ट्रेन के सलून में चलना पर यह सब फ़िल्म ही था, असल ज़िदगी नहीं.

आज की ज़िंदगी उससे बहुत अलग है. अपने पिता की मौत के बाद मैंने अपनी माँ से कहा ये तो ऐसी ज़िंदगी है जैसे चिड़िया सोने के पिंजड़े में रहती है. किसी से मिलना नहीं हो पाता. मैंने माँ से कहा कि मुझे बोर्डिंग स्कूल भेज दो और मैं ग्वालियर से बहुत दूर तमिलनाडु के हिल स्टेशन कोडाइकनाल में बोर्डिंग स्कूल गई, मुझे बोडिंग स्कूल मे बहुत अच्छा लगा क्योंकि यहाँ सबसे मिलने और चीज़ों को समझने का मौक़ा मिला. वहाँ मैं हाउस कैप्टन बनी तो अपने बलबूते बनी क्योंकि किसी के ऊपर दबाव नहीं था कि मैं राजकुमारी हूँ. यहीं से असल ज़िदगी शुरू हुई.

बोर्डिंग से आने के बाद कॉलेज गई तो वो भी ग्वालियर से दूर. ऐसा नहीं था कि मुझे ग्वालियर वापस नहीं जाना था लेकिन मैंने अपने आप के लिए सोच रखा था कि दूर रहूँगी तो आगे की ज़िदगी के लिए तैयारी होगी. हालांकि तब यह नहीं सोचा था कि राजनीति में जाऊंगी.

('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.)

यानी कि बचपन से कुछ कर गुजरने की इच्छा के साथ विद्रोह भी छिपा हुआ था.

हाँ, इसे विद्रोह कह सकते हैं क्योंकि मैं वो सब करना चाहती थी जो हमारे सोने के पिंजडे़ में रहते हुए मुमकिन नहीं था. अपने दोस्तों के साथ रहना, लोगों से मिलना, पढ़ाई करना और अपने रैंक की वजह से फर्स्ट आना नहीं बल्कि प्रतियोगिता के ज़रिए आगे बढ़ना, ये सब मुझे पसंद आता था और इससे मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ता था. इसलिए मैंने ये सोचा कि अपने ऊपर इस विश्वास को बढा़ने के लिए घर से दूर जाना होगा और मैंने क्लास पाँचवीं से 12वीं तक की शिक्षा बोर्डिंग में पूरी की.

राजसी ठाठ बाट को छोड़कर आप बाहर रहीं उन दिनों का कोई यादगार पल. लोग कहते हैं बचपन और कॉलेज के दिनों में आपने अपने हिसाब से ज़िदगी को जिया.

अपने शर्तों पर ज़िदगी जीने का मौक़ा तो कभी नहीं मिला लेकिन मैं इस मामले में भाग्यशाली थी कि स्कूलिंग कॉन्वेंट से की और फिर मुंबई में सोफाया गई जहाँ मैं अपनी सोच के हिसाब से काम कर सकी लेकिन
हमलोगों को हॉस्टल में नहीं घर में रहना पड़ता था.

कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही मेरी शादी हो गई और ग्रेजुएशन मैंने शादी-शुदा महिला के रूप में किया. इसलिए ये तो नहीं सकते कि अपने हिसाब से ज़िंदगी को जीने का मौक़ा मिला. हम लोगों को पहली दफ़ा विलायत जाने का मौक़ा मिला यूनिवर्सिटी के दिनों में और वो भी भाई के साथ.

एक लड़की जिसने अपनी मर्जी के हिसाब से बाहर जाकर शिक्षा ली इतनी जल्दी शादी क्यों कर ली? लगता है यहाँ पर आप घरवालों के दबाव में आ गईं.

आप विद्रोह की बात करते हैं लेकिन एक सीमा तक ही इसकी इजाज़त थी. स्कूलिंग लड़कियों के कॉन्वेंट स्कूल से की, कॉलेज भी केवल लड़कियों का था. पहली बार जब बाहर गई तो वो भाई के साथ, शादी घर वालों और भाई के कहने पर की.

बस इतनी छूट थी कि पढ़ाई अपने हिसाब से किया पर वह भी घरवालों की शर्तों पर. जबकि मैं दूसरी लड़कियों की तरह स्वतंत्रता चाहती थी, अपने दोस्तों के घर जाना चाहती थी. पर ये सब हमारे नसीब में नहीं था.

आपकी माँ राजमाता विजयराजे सिंधिया का कैसा व्यक्तित्व था?

उनकी सोच बहुत विशाल थी बचपन में हमलोग कभी-कभी इसे समझ नहीं पाते थे. वे एक साधारण घराने की महिला थीं और उनके पिता डिप्टी क्लेक्टर थे. वे स्वतंत्रता संघर्ष में भाग ले चुकी थीं और सुभाष चंद्र बोस से काफ़ी प्रभावित थीं.

स्वतंत्रता संघर्ष के दैरान उन्होंने अपने विदेशी कपड़े जला दिए थे. वह भारत माता की ज़ंजीर में जकड़ी तस्वीर देखकर रोया करती थीं और कहती थीं कि उन्हें आज़ाद कराना है. इस चीज़ को हमलोग कभी समझ ही नहीं सकते थे क्योंकि वह बहुत भावुक थीं और हमलोग इतने भावुक नहीं हो सकते.

माँ बताया करती थी कि शादी के लिए जब मेरे पिताजी के पास पोर्टफोलियो आए तो उसमें राजकुमारियों की तस्वीर के बीच किसी ने उनकी भी तस्वीर रख दी थी लेकिन पिताजी ने उनकी ही तस्वीर को चुना. इससे घर वाले खुश नहीं थे पर दोनों की शादी हुई.

शादी के बाद जब माँ ने ड्रेसिंग रूम की आलमारी खोली तो उन्हीं कपड़ों से भरे पड़े थे जिसे उन्होंने पहले जला दिया था हालांकि इस बार उन्होंने ऐसा नहीं किया.

माँ बताया करती थीं कि जब उनकी शादी हो रही थी और घूंघट से सिर्फ़ अग्नि और कुछ लोगों के पाँव दिख रहे थे तो तभी उन्होंने प्रण ले लिया था कि अब पूरे ग्वालियर राज्य के लोग उनके परिवार होंगे और सबकी देखभाल अपने बच्चों की तरह करेंगी. बाद में इसका विस्तार पूरे देश तक हो गया और उन्होंने राजनीति के लिए पूरे जीवन को समर्पित कर दिया.

यहाँ तक समर्पित कर दिया कि हमलोग नाराज़ रहते थे. हमलोग उनसे शिकायत करते थे कि 30 दिन में आप 26 दिन दौरे पर होते हैं और कहाँ-कहाँ जाती हैं हमें मालूम नहीं होता. आपसे मिलने के लिए खरगौन, बिलासपुर और बस्तर में जाकर आपके साथ दौरा करना पड़ता है तब आपसे मुलाक़ात होती है. क्या आप दूसरी माँ की तरह मुंबई या दिल्ली में नहीं मिल सकती है.

तब माँ ने कहा था कि अभी तुम ये सब नहीं समझोगी. शायद जब समझोगी तब पता नहीं मैं ज़िदा रहूँ या नहीं. मैंने जिस भाव से सबको जोड़ा है और जितना प्यार मुझे मिला है उसी भाव से उनको प्यार लौटाओगी तो कभी पश्चताप नहीं होगा.

और आज मैं उस चीज़ को महसूस करती हूँ. पाँच बार लोकसभा में पहुँचना और राजस्थान में लोगों का इतना प्यार मिला. तब ध्यान आता है कि उन्होंने बिल्कुल सही कहा था.

माँ ने एक मंत्र दिया था कि अगर तुम राजनीति में गई तो एक बात ध्यान रखना लोगों को प्यार से जोड़ना. कभी जाति, धर्म और वोट के लिए लोगों को मत तोड़ना, नहीं तो आगे चलकर तुमको इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.

बाद में राज्य के विलय के समय माँ ने ये कहकर 54 करोड़ रुपए भारत सरकार को दिए कि यह जनता का पैसा है और इस पर हमारा अधिकार नहीं है.

इसलिए जब लोग मेरे ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं तो हँसी आती है क्योंकि इस परिवार में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रही और इस परिवार ने हमेशा देना सीखा है, लेना नहीं.

आपके कमरे में भाई माधवराव सिंधिया के साथ बड़ी प्यारी तस्वीर लगी है. कैसे संबंध थे उनके साथ.

हमारी राजनीति अलग-अलग थी. उन्होंने अपनी राजनीति को अपने लोगों को संतुष्ट करने का साधन बनाया और मैंने और राजमाता ने अपनी राजनीति से अपने लोगों को संतुष्ट किया. हम इस बात पर सहमत थे कि हमारे बीच असहमति है. हमारे बीच हमेशा प्रेम बना रहा. उन्होंने मुझे बहुत प्यार दिया और मैंने भी उन्हें हमेशा आदर दिया.

क्या वे सच में एक बढ़िया बड़े भाई थे, कभी यूँ ही फ़ोन करके प्यार से बातें किया करते थे?

कभी थे भी और कभी नहीं भी लेकिन मैं हमेशा अच्छे पल को याद रखना चाहती हूँ.

कोई अच्छा लम्हा बताएं?

मेरे बेटे की शादी के मौक़े पर जिस तरह से उन्होंने किया उसे भूला नहीं सकती. उन्होंने एक बड़े भाई की तरह ही नहीं पिता की तरह सारी चीज़ों को व्यवस्थित किया. कहीं किसी चीज़ की कमी नहीं छोड़ी. मैं समझती हूँ कि विवाह का समारोह सफ़ल नहीं होता अगर वो इस तरह से साथ नहीं होते. ये अंतिम पारिवारिक मौक़ा था जब वे हमारे साथ थे.

आपकी बहन भी सार्वजनिक जीवन में है, क्या उसके साथ कोई प्रतिद्वंद्विता है?

उसके साथ कोई प्रतिद्वंद्विता कभी नहीं रही. मैं उसकी बड़ी बहन हूँ और ये मेरा कर्तव्य है कि उसकी देखभाल करूँ. आज वो जिस मुक़ाम पर है उसे देखकर मुझे खुशी होती है. वो काफ़ी कठिनाइयों का सामने करते हुए विधानसभा से होते हुए लोकसभा तक पहुँची. उसके या मेरे बारे में कोई ये नहीं कह सकता कि हम राजमाता की बेटियाँ थीं इसलिए हमें सबकुछ यूँ ही मिल गया. हम दोनों ने काफ़ी काम किया है.

मैंने जो अपने परिवार से सीखा है उसको सार्वजनिक जीवन में लाने की कोशिश की है. अगर आप वाकाई में लोगों को प्यार करते हैं तो वो आपके पास घूम कर वापस आता है. हमें बार-बार ये बताया जाता था कि लोगों का विश्वास जीतो.

घुड़सवारी, शूटिंग सब आपको पसंद थे या सिर्फ़ कोई एक चीज़ पसंद था?

ये सब तो हमलोगों को सीखना ही पड़ता था. सुबह पाँच बजे हमलोग घुड़सवारी सीखने जाते थे और वो सब करना पड़ता था जो शाइस्त करते थे. उसके बाद ब्रेकफास्ट करके स्कूल जाते थे.

इन सबमें आपको सबसे ज़्यादा क्या पसंद था और किससे बचना चाहती थीं ?

पिताजी से बहुत डरते थे इसलिए उनसे बचते थे. उनकी आहट सुनते ही लगता था कि पता नहीं कौन सा काम हमने खराब किया और किस चीज़ के लिए डाँट लगेगी. सबसे ज़्यादा मुझे किताब पढ़ना पसंद है. इस मामले में मैं भाग्यशाली थी क्योंकि राजभवन में दुनिया भर के बाल साहित्य की किताबें थीं.

आपने किताबों की बाती की. यहाँ आपके सिटिंग रूम में देख रहा हूँ कि आपको इतिहास का बहुत शौक है. फ्रेडरिक द ग्रेट और हिलेरी क्लिंटन पर भी दो-तीन किताबें दिख रही हैं.

मैं सभी तरह कि किताबें पढ़ती हूँ. मैं अध्यात्म, दर्शन, अच्छी जीवनी से लेकर मर्डर मिस्ट्री तक सब पढ़ती हूँ.

इन सबके लिए समय कैसे निकाल पाती हैं?

मैं तो हर दिन सोने से पहले पढ़ती हूँ और किताब हमेशा साथ लेकर चलती हूँ. आजकल एडवर्ड लुईस को लेकर चल रही हूँ. कभी गाड़ी में समय मिल जाता है तो कभी प्लेन में, पर पढ़ती जरूर हूँ.

आपको कौन ज़्यादा पसंद है बिल क्लिंटन या हिलेरी?

मुझे महिला जाति पर गर्व है और हिलेरी क्लिंटन ऐसी महिला हैं जिनकी कोई भी प्रशंसा करेगा. वो बहुत-सी महिलाओं के लिए आदर्श हैं. मेरा उनकी राजनीति से कोई मतलब नहीं है. हालांकि वे अकेली ऐसी महिला नहीं हैं लेकिन उनमें से एक है. अगर कोई एक महिला की बात की जाए तो वो मेरी माँ है.

आपके यहाँ गायत्री देवी की दो तस्वीरें लगी हैं उनसे जुड़ी कोई यादें?

जब मैं माँ से पूछती थी तो बताती थीं कि वो अपने समय की दुनिया की सबसे सुंदर महिला थीं.

क्या आप फैशन के प्रति सजग रहती हैं?

हर महिला सुंदर दिखना चाहती है और अगर कोई महिला कहती है ऐसा नहीं है तो झूठ बोल रही है. फिर सुंदर दिखने में हर्ज भी क्या है. क्या राजनीति में ये जरूरी है कि आप रात को कुर्ते को तकिए के नीचे रखें और सुबह उसे पहनें. मेरे हिसाब से हर किसी को अपना आदर्श ख़ुद बनने की जरूरत है. जो महिला कपड़े साफ़ नहीं पहनती उसकी सोच भी साफ़ नहीं होगी.

इतनी आपाधापी के बीच जब कोई आपसे खादी के लिए रैंप पर उतरने का अनुरोध करता है तो आप उसे आनंद से करती हैँ?

मैं हर उस चीज़ का आनंद उठाती हूँ जिससे मेरे लोगों का फ़ायदा हो. ऐसे कामों के पीछे कोई मक़सद हो तो अपने आप आत्मविश्वास बढ़ जाता है. बिना मतलब के ये सब नहीं कर सकती.वैसे हर महिला को अपनी सुंदरता दिखाने के लिए एक बहाना चाहिए और इस तरह का मक़सद मेरे लिए बहाना है.

कोई नई फ़िल्म देखी है आपने?

‘कल हो न हो’. वैसे मैं ज़्यादा फ़िल्में नहीं देखती.

कोई पसंदीदा अभिनेता या फ़िल्म?

एक ही फ़िल्म मैंने दो-तीन बार देखी वो थी ‘चैरियट ऑफ फायर’. यह गज़ब की फ़िल्म थी.

लोग जब भी राजस्थान की बात करते हैं तो रंगों, रेगिस्तान, हवेली और ऊंटों की बात करते हैं, क्या आपको लगता है कि राजस्थान के साथ न्याय करते हैं?

थोड़ा-सा अन्याय तो करते हैं. आप जो कह रहे हैं वो सब है राजस्थान में है लेकिन नए राजस्थान की भी बात होनी चाहिए.राजस्थान अब नए रास्ते पर चल चुका है और आईटी, बीपीओ, औद्योगिकीकरण सारे क्षेत्रों में दूसरे उन्नत राज्यों से होड़ ले रहा है. इसलिए अब राजस्थान सिर्फ़ पर्यटन केंद्र ही नहीं रहा लोग यहाँ निवेश कर रहे हैं.

आपने अपना वज़न कैसे नियंत्रण में रखा है ?

इसका एक मात्र तरीक़ा व्यायाम है. मैं प्रतिदिन आधा से एक घंटा व्यायाम करती हूँ. जब सुबह फ्लाइट पकड़ना हो तो भी पाँच बजे उठकर व्यायाम करती हूँ. मेरे पास अपना ट्रेनर भी है और घर पर मशीनें भी हैं.

आपका पसंदीदा खाना क्या है ?

मैं बहुत सादा और नियंत्रित खाना खाती हूँ. वैसे बाजरे की रोटी और गरम-गरम चने का साग और उस पर लहसुन की चटनी बहुत पसंद है.

मुझे लगता है आप गाती भी हैं ?

मैं हमेशा ही बाथरूम सिंगर रही और मेरी हमेशा ये आरज़ू रही कि कोई गुरु मुझे अपने संरक्षण में ले ले और मुझे स्टेज पर गाने लायक बना दे. उसके बाद मैं लता मंगेशकर, आशा भोंसले से अच्छा गाने लगूँ लेकिन मुझे ये मालूम है कि ये अब होने वाला नहीं है.

वैसा कोई लम्हा जिसे आप अपनी ज़िंदगी से हटाना चाहती हूँ.

कोई एक लम्हा नहीं है, बल्कि ज़्यादा हैं.जिसे मैं यहाँ नहीं कह सकती.

आपके जीवन की ऐसी कोई एक ख़्वाहिश जिसे आप पूरा करना चाहती हूँ और इसका राजनीतिक जवाब मत दीजिएगा कि राजस्थान ये हो जाए और वो हो जाए.

आप ग़लत समय में ये सवाल पूछ रहे हैं, अगर आज से तीन साल पहले आपने पूछा होता तो दूसरा जवाब होता लेकिन आज मेरा सबकुछ राजस्थान से जुड़ा है.

चलिए तो फिर दूसरी कोई ख़्वाहिश बता दीजिए.

मैं चाहती हूँ कि मेरे पोते-पोती जीवन में अच्छा करें क्योंकि मुझे अभी उनके लिए समय नहीं मिल पाता. अब मुझे याद आता है कि मैं माँ को जो उलाहना देती थी मुझे लगता है कि वो मेरे बच्चे और पोते-पोती भी मेरे लिए कहेंगे लेकिन मेरे पास ऐसी कहानी नहीं है जैसी अम्मा के पास थी और मैं उन्हें माफ़ कर देती थी.

मुझे इस बात का अफसोस है कि उनके साथ उतना समय नहीं बिता पाती लेकिन मैं चाहती हूँ कि उन्हें जीवन में सारी खुशियाँ मिलें और मैं उनकी सारी इच्छाओं को पूरा कर सकूँ.

राम जेठमलानीजेठमलानी से मुलाक़ात
राम जेठमलानी से उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर विशेष बातचीत.
प्रियरंजन दासमुंशीदासमुंशी से मुलाक़ात
भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी से एक मुलाक़ात.
लालू यादवलालू प्रसाद से मुलाक़ात
अपने ख़ास अंदाज़ से चर्चित करिश्माई नेता लालू प्रसाद से एक मुलाक़ात.
इरफ़ान पठानएक ख़ास मुलाक़ात
क्रिकेट खिलाड़ी इरफ़ान पठान से जीवन के अनछुए पहलुओं पर बातचीत.
इससे जुड़ी ख़बरें
एक मुलाक़ात: लालकृष्ण आडवाणी से
26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात- शीला दीक्षित के साथ
03 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: गायत्री देवी के साथ
04 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: अमजद अली ख़ान के साथ
17 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: ग़ुलाम अली के साथ
04 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: अमर सिंह के साथ
07 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>