BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मित्र को भेजेंकहानी छापें
एक मुलाक़ात: अमजद अली ख़ान के साथ

अमजद अली ख़ान
अमजद अली ख़ान संगीत को इबादत मानते हैं
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध सरोद वादक अमजद अली ख़ान से.

पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश.

जैसे आप हैं, जाकिर हुसैन हैं, शिवकुमार शर्मा हैं, जितने अच्छे कलाकार हैं, भगवान आप लोगों के चेहरे-मोहरे पर भी उतना ही मेहरबान हुआ है, क्या ये भी कोई संयोग है. आप क्या मानते हैं?

देखिए ये तो आपकी मोहब्बत है, ज़र्रानवाज़ी है. कई लोगों को हम बहुत बुरे भी लगते हैं. ये सब देखने वाले की नज़र पर निर्भर करता है कि उसे सामने वाला इंसान कैसा लगता है. मैं समझता हूँ कि ये सब संगीत की वज़ह से है. अगर बहुत ही हसीन औरत मेरे सामने बेसुरा गाएगी तो मैं उसे कभी नहीं सुनूँगा.

कभी आपको लगता है कि ये अच्छे चेहरे-मोहरे वाले कलाकार जब अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं तो क्या वह अपने कपड़ों पर भी उतना ही ध्यान देते हैं?

हमारे देश में जिन लोगों की बहुत लंबी दाढ़ी होती है, उस पर ज़्यादा विश्वास किया जाता है. हमारे देश का यही इतिहास और परंपरा रही है. यानी जिसकी दाढ़ी लंबी है, माना जाता है कि वह बहुत बड़े महात्मा या गुरु हैं और उनके चरण स्पर्श करने चाहिए. लेकिन अगर हम स्टेज पर शेव करके आते हैं, या अच्छे कपड़े या शॉल ओढ़कर आते हैं, तो वह हमारे लिए फ़ैशन नहीं, अनुशासन है.

हम इसलिए भी साफ-सुथरे होकर स्टेज पर जाते हैं कि हो सकता है कि हमारी मुलाक़ात खुदा या मालिक से हो जाए.

अच्छा आपका पसंदीदा गाना क्या है?

हर हिंदुस्तानी बचपन से फ़िल्मी गानों को सुनकर बड़ा होता है. मुझे भी कई गाने पसंद हैं. फ़िल्म ‘अमर प्रेम’ का गाना, “चिंगारी कोई भड़के..” इसके अलावा, ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा..’ परवरिश फ़िल्म का ‘आंसू भरी है..’ और ‘डमडम डिगा-डिगा’ भी मुझे बहुत पसंद था.

उसी जमाने में एक विदेशी गाना ‘कम सेप्टेम्बर’ का खूब हल्ला था, तकरीबन हर शादी में बजाया जाता था.इसके अलावा नुसरत फ़तेह अली का ‘मेरा पिया घर आया’ भी अच्छा लगता है.

यूँ तो आपकी पिछली छह पीढ़ियों का ताल्लुक़ संगीत से है, लेकिन संगीत को लेकर आपकी पहली याददाश्त क्या है?

परिवार में पूरी तरह से संगीत का माहौल था. खाना-पीना, सोचना सब कुछ संगीत के बीच ही होता था. मैं परिवार में सबसे छोटा था. मेरे चाचा, चचेरे भाई सभी अच्छे कलाकार थे और मेरे लिए गुरु समान थे.

हमारे खानदान में संगीत की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चल रही है और खुदा के फ़ज़ल से अमान-अयान इस परंपरा की सातवीं सीढ़ी हैं.

आपकी पैदाइश ग्वालियर की है, तानसेन भी शायद यहीं से थे?

हाँ, मियाँ तानसेन उन्हें कहा जाता था. मियाँ का ताल्लुक़ लग गया है. हमारे शास्त्रीय संगीत के कुछ ऐसे नियम हैं, जिस तरह से मंदिर में पुजारी, चर्च में फादर होते हैं, उसी तरह हम भी स्वर और लय के पुजारी हैं और इसीलिए शास्त्रीय संगीत में भी आमतौर पर नाम न लेकर ‘पंडितजी’ या ‘खां साहब’ आदि कहा जाता है. ये हमारी परंपरा है, लेकिन दुःख की बात है कि लोग अब इसे भुलाते जा रहे हैं.

सरोद की क्या ख़ासियत है. मतलब अगर दूसरों को इसके बारे में समझाएँ तो कैसे?

बस ये समझिए कि ये हिंदुस्तानी गिटार है. दरअसल सरोद का मतलब है संगीत. इसके इतिहास में जाएँ तो अफ़गानिस्तान में एक साज बजाया जाता है, वह है ‘रबाब’.

सन् 1966 में भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ मैं अफ़गानिस्तान गया था. मेरे अलावा इस दल में पार्श्वगायक हेमंत कुमार, तबला वादक पं. किशन महाराज, यामिनी कृष्णमूर्ति थीं. उस वक्त के शासक ज़हीर शाह ने हमें दोबारा कार्यक्रम पेश करने के लिए अपने महल बुलाया था और हमने लगभग उनकी पसंद पर छह घंटे संगीत सुनाया था.

अगर आप सरोद नहीं बजाते तो दुनिया को अपना हुनर दिखाने के लिए कौन सा वाद्य चुनते?

सरोद के अलावा मैं बिल्कुल बेकार आदमी हूँ. हालाँकि मैने थोड़ा बहुता गाना और तबला सीखा था. आज़ादी के बाद देश में पढ़ाई का ज़बर्दस्त माहौल बन गया था, हर आदमी पढ़लिखकर सरकारी नौकरी करना चाहता था. इस दौर में बहुत से कलाकारों की नैसर्गिक प्रतिभा नष्ट हो गई.

अमजद अली ख़ान का परिवार
अमजद अली ख़ान का परिवार कई पीढ़ियों से संगीत के क्षेत्र में है

लेकिन एक जिंदगी में सब कुछ नहीं कर सकते. एक ही जिंदगी में पीएचडी करना और कला के ज़रिए मशहूर होना बेहद मुश्किल है. मैंने अपने बच्चों को भी कहा कि अगर ज़्यादा पढ़ोगे तो सरोद नहीं बजा सकते.

वैसे भी पढ़ाई-लिखाई का दुनिया में क्या योगदान है. मैं तो यही नहीं समझ पाया हूँ. पढ़ाई की डिग्री इंसान को रहमदिल नहीं बना पाई है. इतनी नफ़रत, ईर्ष्या, गुस्सा. ये कौन सी पढ़ाई है जो इंसान को तहज़ीबदार नहीं बना पाई है.

आप तो संगीतकार होने के साथ-साथ क्रांतिकारी सोच भी रखते हैं?

नहीं ये मेरे दिल की अनुभूति है. मेरा यही कहना है कि जो पीएचडी कर सरोद बजा रहा है तो लगता है कि ‘पीएचडी सरोद’ बजा रहा है. लेकिन जब तक आदमी पूरी तरह से लय, सुर को समर्पित नहीं होगा अच्छा सरोद नहीं बजा सकता.

मेरे लिए तो अंग्रेजी भी अपनी भाषा नहीं है. मैं मजबूरी में अंग्रेजी बोलता हूँ. मैं दिल से हिंदुस्तानी हूँ. मेरा बस चले तो मैं अंग्रेज को भी हिंदुस्तानी सिखा दूँ.

कई लोग कहते हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को पसंद करने वाले या इसकी क़द्र करने वाले लोग हिंदुस्तान के बाहर बसते हैं, क्या आप भी इससे इत्तफ़ाक रखते हैं?

नहीं, ऐसा नहीं है. भारत में बहुत प्रांत हैं. मैं 12 साल की उम्र से ही देशभर में घूम रहा हूँ. बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब में कई जगह गया हूँ. हिंदुस्तान में मजहब, राजनीति के कितने ही उतार-चढ़ाव आए हों, लेकिन इस बात को तो नहीं नकार सकते कि अमजद अली ख़ान, बिस्मिल्ला ख़ान को बनाने वाला हिंदुस्तान ही है.

मुझे देशभर में बहुत प्यार मिला है. खासकर महाराष्ट्र, बंगाल, और दक्षिणी राज्यों में मुझे चाहने वाले बहुत हैं.

आप दिल्ली में 31 दिसम्बर को पूरी रात शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम की कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन चेन्नई में संगीत अकादमी ने पिछले साल वहाँ सरोद का कार्यक्रम रखा था और आपको विश्वास करना होगा कि ढ़ाई हज़ार सीटों वाले हॉल में लोगों के खड़े होने की जगह नहीं थी. कहने का मतलब कि दक्षिण में संगीत पूजा है.

दिल्ली ऐसी क्यों हो गई?

दिल्ली रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह है. हर आदमी यहाँ अपने प्रमोशन, ट्रांसफर के इंतज़ार में रहता है और लोग बहुत कम समय में लंबी छलाँग लगाना चाहते हैं.

वैसे भी दिल्ली का इतिहास ही कुछ ऐसा है. यहाँ शरणार्थी आए और पैसा कमाने के लिए खूब मेहनत की. खुदा का शुक्र है कि आज दिल्ली में बहुत पैसे वाले हैं और व्यापार के लिहाज से लोग बहुत सफल है. लेकिन संगीत की जो संस्कृति बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण में है, दिल्ली में उसकी कमी खलती है.

मेरी ख्वाहिश है कि मैं ग्वालियर जाऊँ और वहाँ संगीत का प्रचार करूँ.

आपके बेटे भी बहुत स्मार्ट हैं. जाहिर है कार्यक्रम के दौरान कई लड़कियां भी उनकी तरफ आकर्षित होती होंगी, आपको कैसा लगता है?

देखिए, हर कलाकार के प्रशंसक होते हैं. उन्हें लड़के, लड़कियां, बूढे-बच्चे सभी प्यार करते हैं. उन सभी का प्यार-सम्मान मिलता रहे, दुआएं मिलती रहें, यही काफ़ी है.

हम बच्चों से कहते हैं कि यह बहुत लंबी यात्रा है. खूबसूरत लोगों को देखो तो खुदा का ध्यान करो और उसका शुक्रिया अदा करो कि उसने इतने अच्छे लोग बनाए हैं. ज़रूरी नहीं है कि हर फूल को आप तोड़ते रहें, कुचलते रहें. आपकी यात्रा बहुत लंबी है और आपको सुर की गहराइयों तक पहुँचना है.

आपकी लंबी यात्रा में ऐसी कितनी चुनौतियां आईं, जब आपने फूल को सूंघकर ही छोड़ दिया और उसके आगे कुछ नहीं सोचा?

ये स्वाभाविक है. मौलिक कलाकारों के जीवन में झांके तो कई कहानियां मिल जाएँगी. कलाकार कोई पत्थर तो नहीं है, आम आदमी की तरह उसकी भी भावनाएं हैं.

1966 में मैं जब अफ़गानिस्तान गया था तो वहाँ मुझे एक महिला बेहद आकर्षक लगी. तब मुझे लगा था कि उससे हसीन कोई दूसरी महिला नहीं है. मुलाक़ात हुई और फिर दोस्ती रही.

ऐसा नहीं है कि लोग मुझे पसंद नहीं आए, लेकिन मित्रता रही, रिश्ते रहे, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी. मेरी जिंदगी में सब सुबुलक्ष्मी के साथ हुआ.

ये कैसे हुआ?

वो खुद नृत्यांगना थीं. मेरे ससुर परशुराम बरुआ का असम (शिवसागर) में चाय बागान का व्यवसाय था. कलकत्ता में जब मैने पहली बार सुबुलक्ष्मी का नृत्य देखा तो लगा कि खुदा ने उन्हें मेरे लिए ही भेजा है. फिर हमने मिलने-जुलने की कोशिश की. प्यार का इज़हार किया और उनके माता-पिता, भाई आदि को मनाया और आखिरकार हमारा मिलन हो गया.

आपकी इस प्रेम-कहानी में कोई खलनायक तो नहीं था?

थे. खलनायक थे. औरतें भी थी, आदमी भी थे. बहुत लोग थे जो नहीं चाहते थे कि ये मिलन हो, लेकिन खुदा चाहता था. हमने कोशिश की और खुदा ने हमारा साथ दिया.

सबसे बड़ी बात है कि हमारी सोच एक थी. हम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझते थे.मुझे तो बड़ी हैरानी होती है और अफ़सोस होता है कि जिस शिक्षा की हम इतनी चर्चा करते हैं वह इतनी छोटी सी बात अब तक नहीं कह सकी कि हम सबका ईश्वर एक है.

ये अजीब बात है कि धर्मनिरपेक्ष सोच कलाकारों की ही क्यों होती है. दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग क्या इस मामले में कम समझदार हैं?

हर कलाकार की सोच अलग है. हमारे क्षेत्र में भी नफ़रत है, ईर्ष्या है. सृजन के लिहाज़ से ये क्षेत्र जितना सकारात्मक है, उतना ही नकारात्मक भी है.

9/11 के हादसे से तो मुझे खुद के इंसान होने पर भी शर्म महसूस हुई. भूख लगने पर जानवर भी एक ही आदमी का शिकार करता है, लेकिन हम इतने बड़े जानवर हो गए हैं कि एक ही वार से कई हज़ार लोगों को मार देते हैं. ये हम किस भगवान या खुदा को खुश कर रहे हैं. किसी भी मजहब में इसकी अनुमति नहीं है.

छुट्टियां बिताने की आपकी पसंदीदा जगह कौन सी है?

मेरी पत्नी को तो समुद्री पर्यटन स्थल ज़्यादा पसंद हैं. मुझे पहाड़ पसंद हैं. एक जमाने में मैं शिमला काफ़ी जाता था.

मुझे भीड़भाड़ पसंद नहीं है. बड़ी पार्टियों में मेरा दम घुटता है, चार-पाँच लोगों के साथ पार्टी करना अच्छा लगता है. लेकिन दस हज़ार लोगों के लिए सरोद बजाना मुझे अच्छा लगेगा.

समकालिक कलाकारों में आपका पसंदीदा कौन है?

मैंने रविशंकर, भीमसेन जोशी, विलायत खान, बिस्मिल्ला ख़ान, पं किशन महाराज, गुदई महाराज, कुमार गंधर्व के साथ काम किया है. इनमें से कुछ दुनिया को अलविदा कह गए और बाकी उम्रदराज़ हो गए हैं. आज मैं उन सबकी कमी महसूस करता हूँ.

बड़े गुलाम अली जी के साथ भी बैठने का मौका मिला और हमेशा यही कोशिश रही कि जिसके साथ भी काम करें, कुछ न कुछ सीखें.

अमान-अयान जो भी बजा रहे हैं, वो मेरे लिए चुनौती बन गया है. मसलन, जो मैं बजा चुका हूँ अब अगर वो इसे बजा रहे हैं तो मैं इसे छोड़कर कुछ नया करने की कोशिशों में जुट जाता हूँ.

आपको शायद याद हो न हो, लेकिन मैं आपको बताना चाहूँगा कि मैने अपने कैरियर की शुरुआत आपके इंटरव्यू से की थी. जब मैं सुबह-सुबह आपके पास पहुँचा था तो आप पपीता खा रहे थे, तो क्या आज भी दिन की शुरुआत पपीते से होती है?

बिल्कुल आज भी मैं पपीता खाकर आया हूँ. दरअसल पपीते की ताक़त इतनी होती है, कि मांसाहार गलने में अगर देर लगती है, तो उसमें थोड़ा कच्चा पपीता डाल दिया जाता है. इसके अलावा पपीते के कई गुण हैं.

मेरा शरीर भी साज की तरह है और इसकी ट्यूनिंग ज़रूरी है. अगर ये स्वस्थ रहेगा तो सरोद भी लय और ताल में बजेगा.

आपका पसंदीदा गायक?

नुसरत फ़तेह अली ख़ान और गज़ल गायक बेग़म अख़्तर मुझे काफी पसंद हैं.

हम लोग अपने पिता हाफ़िज अली की स्मृति में कलाकारों का सम्मान करते हैं. हमने उन्हें ग्वालियर में सम्मानित करने के लिए बुलाया था. वह बहुत विनम्र इंसान थे. हमारी परंपरा रही है कि जिसका सम्मान किया उससे कार्यक्रम पेश करने का आग्रह नहीं किया.

लेकिन ख़ान साहब ने खुद ही गाने का प्रस्ताव किया और राग कौशिक गाना शुरू कर दिया. लेकिन लोग तो उन्हें ‘मेरा पिया घर आया’ की वजह से जानते थे. लोग बेचैन होने लगे. मैने उन्हें मंच पर एक नोट भिजवाया, लेकिन उन्होंने कहा कि क्योंकि ये तानसेन की धरती है इसलिए मैं यहाँ कोई फ़िल्मी गाना नहीं गाऊँगा.

दूसरी ओर, बेग़म अख़्तर साहिबा बचपन से ही मुझे बहुत प्यार करती थीं. उनका आखिरी कार्यक्रम मेरे साथ ही कश्मीर में हुआ था. मैने हमेशा उनके कार्यक्रमों को ‘हाउस फुल’ देखा. मैं अक्सर उनके गाने ‘दूर है मंजिल, राह है मुश्किल’, ‘ऐ मुहब्बत तेरे अंज़ाम पे रोना आया’ गुनगुनाता रहता हूँ.

प्रियरंजन दासमुंशीदासमुंशी से मुलाक़ात
भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी से एक मुलाक़ात.
गायत्री देवीगायत्री देवी से मुलाक़ात
जयपुर की पूर्व महारानी गायत्री देवी से एक ख़ास मुलाक़ात.
इससे जुड़ी ख़बरें
एक मुलाक़ात: लालू प्रसाद के साथ
20 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात: बाबा रामदेव के साथ
06 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात - शम्मी कपूर के साथ
24 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात- इरफ़ान पठान के साथ
16 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
एक मुलाक़ात- शीला दीक्षित के साथ
03 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>