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एक मुलाक़ात - शम्मी कपूर के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी की इस विशेष प्रस्तुति में हर सप्ताह आप भारत की जानी-मानी हस्तियों के जीवन के अनकहे पहलुओं के बारे में जानेंगे. इस बार गुजरे जमाने के फ़िल्म स्टार शम्मी कपूर के साथ- एक मुलाक़ात में हमने उनके निजी और सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की. यहाँ पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ खास अंश - आपको देखकर सबसे पहले ‘जंगली’, ‘जानवर’, ‘याहू’...ये सब शब्द याद आते हैं, आखिर ये सब नाम कैसे और किसने दिए? मैने याहू पहली बार ‘तुमसा नहीं देखा’ में इस्तेमाल किया था. फ़िल्म के एक दृश्य में जब भंगड़ा नृत्य होता है. हीरो, हीरोइन का पीछा करता है, फिसलता है, फिर भागता है और आखिरकार जब हीरोइन को पकड़ लेता है तो याहू-याहू चिल्लाकर अपनी खुशी का इज़हार करता है. मैने नासिर हुसैन निर्देशित ‘दिल दे के देखो’ में इसी तरह के दृश्य में ‘याहू’ को दोहराया था और फिर ‘जंगली’ में नृत्य के सीन में भी मैने यही किया और ये ख़ासा लोकप्रिय हुआ. तो ये जो याहू था, क्या ऐसा नहीं था कि जैसे कोई टारज़न लड़ाई के दौरान चिल्ला रहा हो? नहीं ऐसी बात नहीं है. ये सिर्फ़ खुशी का इज़हार भर था. दिलचस्प बात ये है कि जब याहू डॉट इंडिया शुरू करने के लिए जेरी यांग और डेविड मुंबई आए थे और उन्होंने इस मौके पर एक पार्टी आयोजित की थी. पार्टी में मुझे भी बुलाया गया था और पार्टी में एक बैंड भी बुलाया गया था और आपको सुनकर ताज़्जुब होगा कि उसने जो गाना बजाया था वो था ‘याहू...चाहे कोई मुझे जंगली कहे.’ तब मैने उनसे पूछा था कि यही क्यों और उन अमरीकियों ने मुझसे कहा कि मैने सभी को बता दिया है कि ‘इज़हार का’ ये अनोखा स्टाइल आपका है. लोग तो अब कह रहे हैं कि बॉलीवुड इंटरनेशनल हो रहा है, लेकिन आपने तो 1960 के दशक में ही बॉलीवुड को इतना हिट कर दिया था कि अब भी इंटरनेट में इसका इस्तेमाल हो रहा है? आपको ये सुनकर हैरानी होगी कि यहाँ मेरे परिवार वालों समेत कई लोग ऐसा मानते हैं कि याहू मेरी कंपनी है. यहाँ तक कि मेरे भतीजे रणधीर ने भी एक बार मुझसे पूछा कि अंकल आपने बताया नहीं कि याहू आपकी कंपनी है. तब मैने उलटा उससे सवाल किया कि अगर याहू मेरी कंपनी होती तो मैं यहाँ बैठा होता कि अमरीका में. चूँकि आप कपूर खानदान से हैं. आपका परिवार बॉलीवुड में पहले से ही जमा-जमाया था. पिता पृथ्वीराज कपूर और भाई राजकपूर काफ़ी लोकप्रिय थे. तो इससे फ़िल्मों में आने में सहूलियत हुई या आप पर बेहतर अभिनय का दबाव था? आप एक नाम और भूल गए. मैं पृथ्वीराज कपूर का बेटा और राजकपूर का भाई होने के साथ-साथ गीता बाली का पति भी था. फ़िल्म इंडस्ट्री में शुरू के पांच साल मैने इसी पहचान में गुजारे, मेरी अपनी कोई हैसियत नहीं थी. मैं नहीं समझता कि ये कोई एडवांटेज था. लेकिन ये ज़रूर है कि ये एक प्रोत्साहन था कि मुझे अपनी पहचान बनाने के लिए और मेहनत और कोशिश करनी है. मुझे ध्यान आ रहा है कि शुरू-शुरू में आप शायद फ़िल्मों में बारीक मूंछें रखते थे, बाद में आप क्लीन शेव हो गए. तो क्या मूंछें हटाने से आपकी किस्मत बदली? आप यकीन कीजिए कि शुरू में मेरी ठीक से मूंछें भी नहीं उगती थी. जब मैं थिएटर में काम करता था तो मूंछे उगाने के लिए मलाई लगाया करता था. और तो और माचिस की तीली जलाकर उसकी कालिख से बारीक मूंछें बनाया करता था. जब मैं मधुबाला के साथ फ़िल्म ‘रेल का डिब्बा’ कर रहा था तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम इतने दुबले हो कि मैं तुम्हारी हीरोइन नहीं लगती, तुम्हें अपना वजन बढ़ाना चाहिए. इसके बाद से ही मैने बीयर पीनी शुरू की थी. रही बात किस्मत बदलने की तो ये मूंछ काटने से हुआ या नहीं, ये तो पता नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है कि मैं इस कदर निराश था कि जब मैने ‘तुम सा नहीं देखा’ साइन की तो समझ लिया था कि फ़िल्मी कैरियर में ये मेरा आख़िरी मौका है. अगर किस्मत ने साथ दिया तो ठीक, नहीं तो असम के चाय बागानों में नौकरी करने चल पड़ूंगा. लेकिन जब मैं छोटे बालों और कटी मूँछों के नए लुक के साथ पर्दे पर आया तो सब कुछ बदल गया. आपका अंदाज़ वाकई बहुत सेक्सी था, आपका कोई पसंदीदा गीत? ‘यूँ तो हमने लाख हंसीं देखे हैं, तुमसा नहीं देखा.’ ये गाना मेरी फ़िल्म में आने से पहले ही रिकार्ड हुआ था और मुझे बहुत पसंद है. पहले ये फ़िल्म देवानंद को ऑफर की गई थी. साहिर लुधियानवी के साथ ये गाना देवानंद के लिए ओपी नैयर ने रिकार्ड किया था. लेकिन देवानंद ने ये फ़िल्म नहीं की और मेरे हिस्से में आई. इसके बाद एक बार फिर ऐसा वाकया हुआ कि देवानंद की वजह से फ़िल्म मुझे मिली. हुआ ये कि मैं नासिर हुसैन के साथ दो सुपर हिट फ़िल्में कर चुका था. उसके बाद नासिर ने अपनी अगली फ़िल्म ‘जब प्यार किसी से होता’ है में देवानंद को हीरो लिया, लेकिन इससे हुआ ये कि देवानंद के साथ मुनीमजी, पेइंग गेस्ट, लव मैरीज़ जैसी कई हिट फ़िल्में देने वाले निर्देशक सुबोध मुखर्ज़ी नाराज हो गए और उन्होंने अपनी फ़िल्म ‘जंगली’ में बतौर हीरो मुझे ले लिया. ‘जंगली’ का मूल नाम मिस्टर हिटलर था और इसकी शूटिंग कश्मीर और शिमला में हुई. ये रोमांस, म्यूजिकल और कॉमेडी से भरपूर शायद पहली रंगीन फ़िल्म थी और सुपरहिट साबित हुई. आपका अलग तरह से डांस करना, डायलॉग डिलीवरी का अंदाज़. अलग तरह से चलना. आपने किसे मॉडल बनाया था. क्या एल्विस प्रेस्ले या कोई और? ये ध्यान रखना चाहिए कि इससे पहले मैने जितनी भी फ़िल्में की थी उनमें मुझे ऐसा मौका ही नहीं मिला कि अपना स्टाइल बना सकूँ या ज़्यादा हाथ-पैर फैला सकूँ. ये पहली बार था जब ‘तुम सा नहीं देखा’ में मुझे इस किस्म का संगीत मिला. इसके बाद ‘दिल दे के देखो’ और फिर ‘जंगली’. ये ज़रूर है कि लोग मेरी तुलना एल्विस से करते हैं. मैने एल्विस की ज़्यादा फ़िल्में तो नहीं देखी हैं, लेकिन उनका संगीत खूब सुना है और उनके संगीत का असर मुझ पर रहा है. लेकिन आपके शरीर में गजब की लचक और थिरकन थी. आपने अपने शरीर में ये ख़ास थिरकन कैसे पैदा की? इसमें भी राज की बात है. वो ये है कि मुझे डांस करना नहीं आता था. मुझे अच्छी तरह याद है कि मटूंगा में जहाँ हम रहा करते थे, वहाँ दादर में एक महिला 20 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से संगीत और डांस सिखाती थी. हमनें वहाँ टेंगो सीखने की कोशिश की. क्योंकि बात जवानी के दिनों की थी और सिखाने वाली महिला काफ़ी खूबसूरत थी, इसलिए हमने तय कर लिया कि टेंगो तो सीखना नहीं है और मैं इसे सीख भी नहीं पाया. और जब छतों पर चाँद को देखते हुए संगीत के साथ प्रयोग करते थे तो क्या किसी लड़की का ख्याल भी आता था? मैं समझता हूं कि मैने आज तक मधुबाला जितनी हसीन लड़की नहीं देखी. मैने पहली फ़िल्म ‘रेल का डिब्बा’ भी उन्हीं के साथ शुरू की थी. वो उस वक्त सुपर स्टार थी. आप यकीन कीजिए कि मैं डायलॉग भूल जाता था और उन्हें देखता ही रह जाता था. वो तिरछी मुस्कान के साथ हँसते हुए मानो मुझसे कहतीं, मुझे पता है कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है. बाद में हम अच्छे दोस्त बन गए. वह मेरे लिए बड़ी प्रेरणास्रोत थी. खैर जिस वक्त आप फ़िल्म इंडस्ट्री में आए तो मधुबाला स्थापित कलाकार थी, लेकिन कई लोगों को आपने स्थापित कलाकार बनाया, क्या लोग भी आपसे बहुत प्रभावित रहते थे? नहीं ऐसा नहीं था. मैने जब अपनी पहचान बना ली. तो तब तक मैं तमाम बड़ी हीरोइनों के साथ काम कर चुका था और मुझे इसका खास लाभ नहीं हुआ. इसके बाद मैने नई लड़कियों के साथ फ़िल्में की. आशा पारेख (दिल दे के देखो), कल्पना (प्रोफेसर), शायरा बानो (जंगली), शर्मीला टैगोर (कश्मीर की कली). मैं इन लोगों के साथ काम कर खुश था. और ये सब आप पर फिदा रही होंगी? नहीं, ऐसी बात नहीं है. सबको अपना कैरियर बनाने का मौका मिल रहा था और मैं अपनी भूमिका बगैर किसी दखंलदाजी के साथ कर सकता था. मैं हल्की-फुल्की रोमांटिक फ़िल्में बनाता था. इसके लिए ज़रूरी था कि मैं तनाव में न रहूँ. आप शायद उन चुनिंदा स्टारों में से थे, जो अपनी खास रोमांटिक छवि रखते थे? मैं समझता हूँ कि हमारे समय में खास बात ये थी कि कहानी जिस ख़ास किरदार के लिए लिखी जाती थी, उसमें वही काम करते थे. अगर कोई कहानी दारा सिंह के लिए लिखी गई होती थी तो वही करेंगे. आजकल तो मामला ही अलग है. लोग अमिताभ से शुरू करते हैं और शाहरुख, सलमान, आमिर से होते हुए किसी और कलाकार तक पहुँच जाते हैं. आप किसी कलाकार के लिए कहानी नहीं लिख रहे हैं, बल्कि एक प्रोजेक्ट बना रहे हैं, जिसमें कोई भी फिट हो जाए. क्या आप मानते हैं कि फ़िल्मी दुनिया में ऐसे किस्से हैं कि जिनमें किसी कलाकार ने फ़िल्म छोड़ दी हो और बाद में वो बड़ी हिट साबित हुई? इसमें बहुत सचाई है. देवानंद के साथ मैने खुद से जुड़ी दो घटनाएं सुनाई. लीजिए तीसरी सुनिए. नासिर हुसैन मेरे अच्छे दोस्त थे. एक बार मुझे उनका फ़ोन आया कि ‘तीसरी मंजिल’ मे मैं बतौर हीरो काम करूँ. मैने उनसे पूछा कि मुझे तो बताया गया है कि ये फ़िल्म कोई और (देवानंद) कर रहा है. नासिर ने मुझे बताया कि देवानंद के साथ उनका झगड़ा हो गया है और इस तरह से ये फ़िल्म मुझे मिल गई. आरडी बर्मन के साथ अनुभव? ‘तीसरी मंजिल’ के लिए नासिर कुछ अलग हटकर करना चाहते थे. उन्होंने आरडी बर्मन का संगीत सुनाने के लिए मुझे बुलाया. पंचम दा कुछ नर्वस थे. उन्होंने अपनी पहली धुन शुरू की और उसे समाप्त मैने किया. ये एक नेपाली धुन थी जो ‘प्रोफेसर’ की शूटिंग के दौरान मैने दार्जीलिंग में सुनी थी और मुझे याद थी. बाद में ये गाना ‘दीवाना मुझसा नहीं इस अंबर के नीचे’ के रूप में लोकप्रिय हुआ. आपकी पसंदीदा सह अभिनेत्री? ये सवाल पूछकर आप तो इस उम्र में मुझे पिटवा देंगे. मेरे साथ काम करने वाली सभी हीरोइने अच्छी थी. मेरा रिश्ता सभी के साथ अच्छा रहा. चाहे वह शायरा हो, शर्मीला हो या फ़िर आशा पारेख. लेकिन मधुबाला जैसी खूबसूरत दूसरी हीरोइन और कोई नहीं. हेलेन के साथ आपने कई डांस किए, कैसा अनुभव रहा? मैने उनके साथ कई फ़िल्में की हैं. मैं समझता हूं कि वो नए-नए प्रयोगों में यकीन करती थी. लेकिन आपको यकीन नहीं होगा कि हेलेन पर्दे पर जितने कम कपड़े पहने नज़र आती हैं, वैसा असल में था नहीं. वो हमेशा बॉडीवेयर और महीन ड्रेस पहने रहतीं थीं. उन्होंने अपना अलग स्टाइल बनाया था और वह बेहतरीन डांसर थी. जब इतनी सुंदर लड़कियों के साथ काम करते थे तो कभी मन भी मचलता था? जिसकी पान की दुकान होती है, वो पान नहीं खाता. जिसकी शराब की दुकान होती है, आपका ख्याल है वो हर वक्त शराब ही पीता रहता है? हमें इनके साथ काम करने की आदत हो गई थी. वे किसी न किसी रूप में हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत थी. मसलन हेलेन शानदार डांसर थी, लेकिन मैं नहीं. जीवन का पहला इश्क? जवानी में यूँ तो आदमी हर तीसरी लड़की से इश्क करता है, लेकिन मेरा असल और जो मैं समझता हूं मेरा पहला और आखिरी इश्क था वो गीता से था. मैं गीता से 1954 में फ़िल्म ‘काफी हाऊस’ की शूटिंग के दौरान मिला था. फिर 1954 में रंगीन रातें की शूटिंग के दौरान हम शूटिंग के लिए रानीखेत और नैनीताल गए. हालाँकि गीता मुख्य किरदार में नहीं थी, लेकिन वो भी साथ गई थी. इस दौरान जो हमने 20-21 दिन साथ गुजारे और जब हम वापस मुंबई आए तो पता चला कि मुझे प्यार हो गया है. कैसे पता चला कि आपको प्यार हो गया है? उसे नहीं देख पाने पर मैं रोता था. मैं ये सब भुलाने के लिए अपनी बहन के पास नागपुर चला गया था. लेकिन वहां भी जब रेडियो पर गीता के गाने आते थे तो मैं रोता था. मैने अपनी मां को बताया और फिर मैं गीता के पीछे पड़ गया. वक्त-बेवक्त प्यार का इज़हार करना, शादी की इच्छा जताना मेरी दिनचर्या बन गया था. इसका असर भी हुआ और 23 अगस्त 1955 को गीता राजी हो गई, लेकिन उसने एक शर्त भी रखी कि शादी आज ही होगी. मेरे माता-पिता शहर में नहीं थे. फिर भी मैने कहा ठीक है. जानी वॉकर मेरे अच्छे दोस्त थे. उन्होंने मंदिर में शादी का सुझाव दिया. मालाबार हिल में बाणगंगा मंदिर आए. बारिश हो रही थी. हम रात को साढे़ 11 बजे वहाँ पहुंचे, लेकिन पुजारी ने कहा कि मंदिर बंद हो चुका है. पुजारी ने सुबह चार बजे बुलाया और फिर शादी हो गई. गीता बाली के यादगार गीत? फ़िल्म ‘सुहागरात’ का गाना ‘रूमझूम मतवाले बादल छा गए’. इसके अलावा फ़िल्म ‘बावरे नैन’ के गाने भी मुझे बहुत पसंद हैं. जब गीता जी नहीं रहीं तो जो अब आपकी पत्नी हैं, उनसे कैसे मुलाकात हुई और बात कैसे आगे बढ़ी? मैं नीला के परिवार को अरसे से जानता था. उनके बड़े भाई रघुवीरजी मेरे दोस्त हैं. ये लोग भावनगर के हैं. राजजी के सुझाव पर भाभीजी ने मुझे नीला की तस्वीर दिखाई और कहा कि मैं इस लड़की से शादी कर लूँ. उस वक्त तो मैने यह कहते हुए शादी से इंकार कर दिया कि मेरा मन नहीं हैं. लेकिन मुझे याद है कि प्रिंस की शूटिंग के बाद एक बार जब मैं घर आया तो काफी परेशान सा था और अपनी जिंदगी के बारे में सोच रहा था. नीलू ने कहा कि मैं अपने माता-पिता से तो बात कर लूँ. उसने माता-पिता और भाई से बात करने के बाद मुझे बताया कि वह कल आ रही है. फिर मैने अपनी मां, बहन, भाभी और नजदीकी दोस्तों को फोन किया और कहा कि मैं शादी कर रहा हूँ. सभी लोग आए और हमने शादी कर ली. राजकपूर के साथ आपके रिश्ते कैसे थे? मैं राजजी का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ राजजी ने थिएटर में जो भी रोल किए थे, मैं उनसे काफ़ी प्रभावित था. मेरी फ़िल्म ‘रेल का डिब्बा’ जब रिलीज हुई. जब अगले दिन इसकी समीक्षा छपी तो इसमें कहा गया था कि मैने राजकपूर की नकल की है. मैं इसे कभी नहीं भुला सकता. मैने सफाई में कहा, मैने वैसे ही रोल किया जैसा उन्होंने किया. मेरा स्टाइल वैसा ही है, जैसा उनका. राजकपूर और मेरे बीच में दो भाई (बिंदी और देवी) थे जिनकी मेरे जन्म से पहले से ही मृत्यु हो चुकी थी. राजजी को उनकी मौत का काफ़ी गम था. वो मुझसे कहते भी थे कि अगर आज वो जिंदा होते तो मेरे दोस्त होते. चाहे राजकपूर हों, शम्मी हों या शशि. कपूर खानदान से जुड़े लोगों का एक खास रोमांटिक स्टाइल रहा और महिलाओं के बीच वे काफी लोकप्रिय रहे. कोई ख़ास वजह? हम रोमांटिक दिखते ज़्यादा हैं, बातें ज़्यादा करते हैं. लेकिन ऐसी बात नहीं है. हम हैंडसम तो नहीं हैं, लेकिन गुड लुकिंग हैं. राजकपूर और रणधीर की नीली आँखें. शशिकपूर मुझसे सात साल छोटे हैं पर आज भी उन पर लड़कियाँ मरती हैं. अब रणधीर की बेटियों करीना और करिश्मा को देखिए, कितनी खूबसूरत हैं. आपने अभिनय अचानक क्यों छोड़ दिया? दरअसल फ़िल्मों में ज़्यादा उछलकूद में मेरी बहुत सी हड्डियां टूट चुकी थी. मैं वह सब नहीं कर पा रहा था जो मैं करता था और करना चाहता था. इसलिए मैने अभिनय छोड़ दिया. लेकिन मुझे इंटरनेट का शौक है. इससे मुझे दुनिया भर की गतिविधियों की जानकारी मिलती है और मैं लोगों के संपर्क में रहता हूँ. लेकिन आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि मेरी भतीजी रितु नंदा ने मुझे पहली बार कंप्यूटर के दर्शन कराए थे. मैं ‘अजूबा’ की शूटिंग के लिए मॉस्को जा रहा था. लंदन में ठहराव के दौरान मैने एपेल कंप्यूटर की जानकारी ली. आप यकीन नहीं करेंगे कि तब मेरे पास कंप्यूटर नहीं था, लेकिन मैंने एपेल से सॉफ्टवेयर खरीद लिया था. फिर मैने भारत पहुँचकर कंप्यूटर खरीदा. जिंदगी से कुछ अफसोस या शिकवा? मैं नहीं समझता कि मुझे जिंदगी से कुछ शिकवा-शिकायत है. दुनिया घूम ली है, बहुत कुछ देख लिया है. खा-पी लिया है. जिंदगी के तमाम रंग देख लिए हैं. मुझे कोई शिकवा नहीं है. (‘एक मुलाक़ात’ सुनिए हर रविवार बीबीसी हिंदी पर – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19,25,41 और 49 मीटर बैंड पर भारतीय समयानुसार रात आठ बजे. दिल्ली और मुंबई के श्रोता रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.) |
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