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एक मुलाक़ात: शीला दीक्षित से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं को पाठकों तक पहुंचाने के लिए उनसे अंतरंग मुलाक़ात पर ख़ास कार्यक्रम - 'एक मुलाक़ात' - लेकर आया है. इसी कार्यक्रम में एक ऐसी महिला से मुलाकात करते हैं जो भारतीय राजनीति के खिलाड़ियों से काफ़ी अलग हैं. वो सीधी-साधी, स्पष्टवादी और शिक्षित हैं. बात करने में वो बहुत ही सहज़ और सरल हैं और अपनी राजनीतिक बिरादरी के और लोगों की तरह वो कुटिल, भ्रष्ट और मतलबी नहीं हैं. राजधानी दिल्ली का एक बड़ा तबका उन्हें सकारात्मक परिवर्तनों का अग्रदूत मानता है. पिछले कुछ ही वर्षों में दिल्ली को काफी हद तक प्रदूषण मुक्त और रहने लायक एक बेहतर शहर बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की जिनकी लोकप्रियता दिल्ली की आम जनता और प्रबुद्ध वर्ग में बराबर है. मैं यहाँ स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं शीला दीक्षित के व्यक्तित्व को लेकर हमेशा पशोपेश में था. मैं सोचता था कि कैसे कोई आदमी राजनीति में रहते हुए भी अपनी ऐसी पहचान बनाकर रहता है कि उसे तो हुकूमत में कोई दिलचस्पी ही नहीं है. कैसे कोई अपनी प्रतिष्ठा और नाम को इस दूषित राजनीति के पचड़े से बचाकर रखता है. वो भी ऐसी राजनीति से जहाँ लोकप्रियता के साथ ही पैसे और बाहुबल का भी वर्चस्व है. मैं शीला दीक्षित को हमेशा बहुत ही बनावटी समझता था. मैं समझता था कि और भारतीय राजनीतिज्ञों की तरह सत्ता में बने रहने के लिए और अपने राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए शीला दीक्षित भी वो सब करती हैं जो सत्ता में बने रहने के लिए एक भारतीय राजनेता आमतौर पर करना ज़रूरी समझता है. मैं समझता था कि साथ ही 'राजनीति से ऊपर' उठने वाली अपनी ये पहचान शीला दीक्षित अपने बेहतर जनसंपर्कों की वजह से बना लेती हैं. (शीला दीक्षित के साथ 'एक मुलाक़ात' सुनिए बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर हर रविवार - भारतीय समयानुसार रात आठ बजे. दिल्ली और मुंबई में वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार दोपहर 12 बजे भी इसे सुन सकते हैं) इसीलिए शीला दीक्षित से साक्षात्कार के दौरान हल्के-फुल्के विषयों पर बातचीत करने के साथ-साथ मैंने उनसे मिलने पर ये जानने की भी कोशिश की कि क्या शीला सच में वैसी ही सदाचारी हैं जैसा कि उनकी छवि का तानाबाना बुनने वाले उन्हें हमारे बीच में प्रचारित करते हैं. तेज़ कार चलाने की इच्छा शीला दीक्षित से मिलने और साक्षात्कार के दौरान मुझे अपने सवालों का एकदम ठीक-ठीक जवाब तो नहीं मिल पाया. हाँ, मैं और ज़्यादा पशोपेश में ज़रूर पड़ गया. हाँ, मगर एक बात तो है कि शीला दीक्षित से अपनी बातचीत के बाद मैं यह ज़रूर कह सकता हूँ कि वो भारतीय राजनीति के सबसे सरल और सच्चे लोगों में से एक हैं. उन्होंने ज़िंदगी में अपनी पसंद-नापसंद, संगीत से प्रेम, फ़िल्म और परिवार के प्रति अपने लगाव और सार्वजनिक जीवन के लिए अपने जज़्बे पर खुलकर बातचीत की. शीला दीक्षित के अलावा कौन ऐसा कह सकता है कि उनके जीवन की सबसे बड़ी इच्छा यह है कि वो कार के ड्राइवर की सीट पर बैठकर 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दिल्ली में कार चलाएँ. "ऐसा लगे कि मैं हवाईजहाज़ में हूँ न कि सड़क पर." ज़्यादातर भारतीय राजनीतिज्ञ तो यह सोचेंगे कि तेज़ गति से कार चलाने में इस तरह रुचि दिखाना राजनीतिक रूप से ग़लत हो सकता है. वो तो इसके बजाय किसानों और ग़रीबों की ख़राब स्थिति के बारे में बात करेंगे. 'मुझमें है वो बात' चापलूसों से भरी पार्टी में जहाँ सोनिया गाँधी के प्रति हर समय अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करते रहना एक अलिखित नियम है, दिल्ली की यह मुख्यमंत्री अपना आत्मसम्मान भी बचा कर रखती हैं. कुछ लोगों के यह मानने पर कि शीला दीक्षित को यह पद सोनिया गाँधी के कृपा से मिला है, वो कहती हैं कि कुछ श्रेय उन्हें और सरकार चलाने की उनकी क्षमता को भी दिया जाना चाहिए.
जो यह समझते हैं कि काँग्रेस पार्टी कैसे चलती है वे यह ज़रूर समझ जाएंगे कि यह कितना साहस भरा वक्तव्य है. यह अकेला बयान शीला दीक्षित के लिए बहुत परेशानियाँ खड़ी कर सकता है और उन्हें उनके विरोधियों की ओर से 'बागी' साबित करने के लिए काफ़ी है. फ़िल्म और संगीत में उनकी रुचि में बहुत विविधता है. शास्त्रीय संगीत से लेकर पॉप संगीत तक और भारतीय से लेकर पश्चिमी तक सब में वो बराबर रुचि रखती हैं. "जब मैं युवा थी तो मैं गाया करती थी लेकिन अब मैंने अपने आप को संगीत सुनने तक सीमित कर लिया है. सारी रात मेरे बेडरूम में संगीत (एफ़एम) चलता रहता है ताकि जब भी मैं उठूँ, मैं संगीत के साथ जागूँ." इससे पता चलता है कि वो कितनी रोमांटिक भी हैं. और इसे वो स्वीकार भी करती हैं. झट से कहती हैं, "हाँ, मैं हूँ." 'अब किसी पर फ़िदा होने की उम्र कहाँ...' शीला दीक्षित को फ़िल्में देखने का भी शौक है और अगर कोई फ़िल्म उन्हें भा गई तो फिर उसे वो कई बार देख लेती हैं. उनकी हाल की पसंदीदा फ़िल्मों में 'रंग दे बसंती', 'लगे रहो मुन्ना भाई', 'परिणीता' और 'ओंकारा' के नाम शामिल हैं. "मैं देव आनंद की बहुत बड़ी प्रशंसक थी जिन्हें भारत का ग्रेगरी पेक भी कहा जाता था. उनकी कुछ फ़िल्में जैसे 'गाइड' और 'ज़्वैल थीफ़' तो मैंने 10-10 बार देखी हैं. उस समय कॉलेज़ की बहुत सी लड़कियों की तरह मुझे भी देव आनंद से क्रश था." तो वो आज-कल किस पर फ़िदा हैं. "मैं किसी पर उस तरह से फ़िदा हो जाऊँ ऐसी मेरी उम्र नहीं रही. लेकिन इन दिनों मैं शाहरुख़ और सैफ़ अली ख़ान को पसंद करती हूँ. ये दोनों बहुत अच्छे अभिनेता हैं." शीला ने अपने कॉलेज़ के दिनों और कपड़ों के बारे में हमें विस्तार से बताया. शीला ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मशहूर कॉलेज़ मिरांडा हाउस में भी पढ़ाई की थीं. उन्होंने अपने प्रेम-संबंध और उसमें आई कठिनाइयों के बारे में भी खुलकर बातचीत की. कॉलेज की कैंटीन में... "हम लाँगड्राइव पर जाया करते थे. साथ में फ़िल्में देखते थे और कॉलेज़ की कैंटीन में घंटों बिता दिया करते थे. अपनी क्लास में भी हमारा ज़्यादातर समय नॉट्स और क्रॉसेज़ का खेल खेलते बीता करता था." लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं था. "मेरी सास हमारी शादी के खिलाफ़ थीं क्योंकि मैं उनकी तरह ब्राह्मण परिवार से नहीं थी. वो इस बात को लेकर भी चिंतित थीं कि मिरांडा हाउस में पढ़ी एक आधुनिक ख़यालों वाली लड़की के लिए एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में सामंजस्य बैठाना काफ़ी कठिन होगा. फिर कई लोग ऐसा मानते थे कि मिरांडा की लड़कियाँ कुछ ज़्यादा ही आधुनिक और बिगड़ैल होती हैं. "इन वजहों के चलते हमें शादी के लिए चार बरस तक इंतजार करना पडा. मैं आज भी याद करती हूँ कि शादी के तुरंत बाद अपने पिता को लिखे पत्र मे कहा था कि यहाँ जिस तरह से मुझपर पाबंदियाँ लगा दी गई हैं और जिस तरह के कपड़े मैं पहन रही हूँ उससे ऐसा लगता है जैसे मैं किसी जेल में आ गई हूँ." "लेकिन बाद में सब अच्छा हो गया. मेरी शादी को दो-तीन साल बाद तक तो मेरे सास-ससुर हमसे दूर ही रहे लेकिन बाद में एक बार जो वो आए तो हमेशा हमारे साथ ही रहे." शीला दीक्षित के ससुर उमाशंकर दीक्षित काँग्रेस पार्टी के बड़े नेता थे और एक बार वो पार्टी अध्यक्ष भी रहे थे. राजनीति में भी, राजनीति से बाहर भी 1980 के दशक की शुरूआत में अपने पति की मृत्यु के बाद शीला दीक्षित ने राजनीति में प्रवेश किया. "इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी के कहने पर मैं राजनीति में आई. मैं चुनाव और भाषणों के बारे में बहुत ही कम जानती थी." "जिस दिन मैंने अपना पहला भाषण दिया था उस वक्त मेरे हाथ-पैर काँप रहे थे. मैं बहुत नर्वस महसूस कर रही थी. मैं चुनाव तो जीत गई लेकिन यह बिल्कुल नहीं जानती थी कि आगे क्या करना है. आज राजनीति में होने के बावज़ूद मैं इसकी चालों को नहीं समझ पाती और न ही समझना चाहती हूँ." तो क्या हम उनकी इन सारी बातों को मान लें? क्या शीला दीक्षित वाकई इतनी सरल और निष्कपट राजनीतिज्ञ हैं जितना वो हमें दिखाना चाहती हैं? मेरा उत्तर होगा, शायद नहीं. भारतीय राजनीति में ऐसी सरलता और निष्कपटता रखते हुए बचे रहना बहुत ही कठिन है. चालाकी, कपट, विरोधियों को हाशिए पर रखने वाले इस खेल में वो भी निपुण हैं. हाँ मगर, अच्छी बात यह है कि उनमें आज भी जीवंतता और मासूमियत बाकी है और यही वे बातें हैं जो शीला दीक्षित को कुछ हटकर, कुछ अलग साबित करती हैं. |
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