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'पानी के लिए विश्व बैंक से ऋण नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है कि दिल्ली सरकार ने राज्य में पानी के वितरण की व्यवस्था को सुधारने के लिए विश्व बैंक से ऋण लेने के प्रस्ताव को फ़िलहाल वापस ले लिया है यानी ऋण लेने से फिलहाल मना कर दिया है. ग़ौरतलब है कि दिल्ली सरकार ने राज्य में पानी के वितरण की व्यवस्था को सुधारने के लिए अपनी 'चौबीस बटा सात' नाम की महात्वाकांक्षी जल प्रबंधन योजना बनाई थी. इस योजना के तहत क़रीब 1100 करोड़ रुपए की राशि ख़र्च की जानी थी जिसमें से क़रीब साढ़े छह सौ करोड़ रुपए की राशि विश्व बैंक से मिलने वाली थी. मगर अब दिल्ली सरकार ने इस बाबत निर्णय लिया है कि वो विश्व बैंक से यह ऋण नहीं लेगी. हालाँकि दिल्ली सरकार के हवाले से इस सवाल का कोई साफ़ जवाब नहीं मिला कि जब विश्व बैंक से पैसा लेने की ज़रूरत ही नहीं थी तो फिर इसके लिए आवेदन ही क्यों किया गया. विरोध इस योजना के लिए जो पैसा मिलने वाला था उसका इस्तेमाल दिल्ली में एक ऐसी व्यवस्था को अमलीजामा पहनाने के लिए किया जाना था जिसके तहत दिल्ली में पानी के वितरण का प्रबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया जाता. मगर दिल्ली के कुछ समाजसेवी संगठनों ने इसे ग़लत बताते हुए इसका विरोध किया और आख़िर सरकार को अपने क़दम पीछे हटाने पड़े. इस बाबत पूछने पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बताया, "राज्य सरकार को इस बारे में इसी महीने केंद्र सरकार को अपना मत बताना था. इसके लिए सरकार तैयार भी थी पर कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों के विरोध के बाद इस फ़ैसले पर और स्पष्ट राय के लिए फ़िलहाल इसे टाल दिया गया है." दिल्ली के कुछ समाजसेवी संगठनों ने सूचना का अधिकार कानून के तहत राज्य सरकार की इस योजना से संबंधित कागज़ात निकलवाए और यदि इन संगठनों की बात मानें तो इस योजना के लागू होने के बाद पानी का वितरण और भी बदतर स्थिति में पहुँचने वाला था. सूचना का अधिकार कानून के तहत यह जानकारी निकलवाने वाली मधु भादुड़ी, जो कि पुर्तगाल में भारत की राजदूत रह चुकी हैं, इस योजना के वापस होने का श्रेय सूचना अधिकार कानून को देती हैं. उन्होंने बताया, "अगर यह कानून न होता तो हमें क्या, पूरी दुनिया में किसी को पता ही न चलता कि सरकार क्या करने जा रही है." संशय राज्य सरकार की आगे की नीतियों को लेकर अभी भी संशय की स्थिति बनी हुई है. पानी के प्रबंधन के निजीकरण का विरोध कर रही एक संस्था, 'परिवर्तन' के अरविंद केजरीवाल ने बताया कि केंद्र सरकार ने इस बाबत विश्व बैंक को अभी तक कोई पत्र नहीं लिखा है जिसकी वजह समझ से बाहर है. नियम के मुताबिक राज्य सरकारें विश्व बैंक से सीधे ऋण नहीं ले सकती हैं और इसके लिए एकमात्र रास्ता केंद्र की मार्फ़त पैसा मांगना होता है. इसीलिए दिल्ली सरकार ने केंद्र से फिलहाल इस ऋण की मंज़ूरी न देने की बात कही है. दिल्ली में पानी के निजीकरण को रोकने के लिए कुछ संगठनों ने जो लड़ाई छेड़ी, इस योजना के फिलहाल निरस्त होने को उसी लड़ाई की जीत के तौर पर देखा जा रहा है. अहम सवाल यह है कि क्या इससे पानी के समान वितरण का सवाल हल हो गया है और क्या इसके बाद राज्य सरकार आगामी योजनाओं में ऐसी कथित ग़लती नहीं दोहराएगी? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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