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एक मुलाक़ात: गायत्री देवी के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं शायद अपने समय की भारत की सबसे ख़ूबसूरत महिला महारानी गायत्री देवी से. पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश. गायत्री देवीजी, सबसे पहले ये बताएँ कि अपनी ख़ूबसूरती के लिए मिलने वाली प्रशंसा सुन-सुन कर आज भी आपको पहले जितना अच्छा लगता है या फिर ‘बोर’ हो गई हैं? ऐसी प्रशंसा से तो कोई भी ‘बोर’ नहीं हो सकता. मैं अपने आपको ख़ूबसूरत नहीं समझती हूँ. शायद पहले थी, लेकिन अब तो नहीं हूँ. लेकिन यकीन जानिए आज भी आप उतनी ही हसीन और ख़ूबसूरत लग रही हैं, जितनी कि रामबाग पैलेस में लगी पेंटिग्स में या फिर सोफिया लॉरेन के साथ तस्वीर में. यूँ भी 1960 के दशक में तो एक पत्रिका ने आपको मार्लिन मुनरो, जैकलिन कैनेडी के साथ दुनिया की दस सबसे ख़ूबसूरत महिलाओं में शुमार किया था? नहीं...नहीं ऐसा नहीं है. मैं खुद को इतना ख़ूबसूरत नहीं समझती हूँ और न ही कभी मुझे ऐसा महसूस हुआ. अच्छा जब आप कूच बिहार की राजकुमारी थीं और जब बड़ी हो रही थी तो आपके दिन कैसे थे? बहुत शानदार. कूच बिहार में मेरा बचपन बहुत अच्छा रहा. वहाँ घोड़े थे, हाथी थे. हम पाँच भाई-बहन थे, खूब खेलते थे. हाथी और घोड़े की सवारी करते थे. खासकर घुड़सवारी करने में खूब मज़ा आता था. सुबह-सुबह हम घोड़े पर गाँव की तरफ निकल जाते थे और एक-डेढ़ घंटा बाहर रहते थे. लोगों से बातें करते थे. आप इतनी ख़ूबसूरत थी और राजकुमारी भी थी तो क्या कभी गाँव के किसी लड़के ने छेड़ने की हिम्मत की? नहीं.नहीं...ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर सिर्फ़ 19 साल की उम्र में आपकी शादी हो गई. उसकी भी न जाने कितनी कहानियाँ हैं. कोई कहता है महाराजा मानसिंह ने आपको पोलो में जीता, या फिर आप उनकी पोलो खेलने की स्टाइल पर फ़िदा हो गईं. असली कहानी क्या थी? बचपन से ही मैं पोलो देखने के लिए कोलकाता जाती थी. स्टैंड में दर्शकों के बीच नहीं बैठती थी, गाड़ी में अपनी बहनों के साथ बैठकर पोलो देखती थी. जयपुर की टीम भी वहाँ खेलने आती थी और राजस्थान से तमाम लोग वहाँ आते थे. मैं जयपुर टीम की बड़ी प्रशंसक थी. लेकिन जयपुर की टीम ही क्यों? क्योंकि दरबार यानी महाराजा मानसिंह उसमें थे. तो आप कब से महाराजा मानसिंह की प्रशंसक थी? बारह साल की उम्र से. दरअसल पोलो के बेहतरीन खिलाड़ी होने के कारण वो मेरे हीरो थे. हालाँकि तब उनसे शादी की कोई इच्छा या हसरत नहीं थी. महाराजा सवाई मानसिंह से पहली बार बात कब हुई? मुझे ठीक-ठीक तो याद नहीं है, लेकिन शायद तब मैं पाँच-छह बरस की रही हूँगी. हम लोग ऊटी जाते थे और महाराजा भी वहाँ आते थे. तब मैं उनसे मिलती थी और बातें होती थी पहली बार इस अंदाज़ से आप महाराजा से आप कब मिली जब आपके मन में महाराजा के लिए प्यार जागा था? उन्हें पोलो खेलते देख मुझे बहुत अच्छा लगता था. वो बैंडेज़ पहनते थे और मैं उन्हें हमेशा संभाल कर रखती थी. हालाँकि तब भी शादी करने जैसी कोई बात नहीं थी. तो शादी का प्रस्ताव किसने दिया. क्या आपने? नहीं, मैने तो नहीं किया. महाराजा ने मेरी माँ से कहा कि बड़ा होने पर मैं गायत्री से शादी करूँगा. फिर मेरी माँ ने मुझे इस बारे में बताया. शादी के बाद क्या आप पहली बार जयपुर आई थीं? नहीं पहले भी मैं कई दफा जयपुर आई थी. मेरा भाई अजमेर के मेयो कॉलेज में पढ़ता था और उससे मिलने के लिए हम लोग आते रहते थे. शादी के बाद जयपुर आने पर कैसा लगा? मुझे लगा कि मैं कहाँ आ गई हूँ. मुझे लगा कि पर्दे में रहना पड़ेगा, क्योंकि उस वक्त जयपुर में महिलाओं के पर्दे में रहने का चलन था. हालाँकि बाद में यहाँ भी मैं महाराजा के साथ रोज सुबह घुड़सवारी करने जाती थी. हम मोतीडूँगरी भी जाते थे. आपकी शिक्षा स्विट्ज़रलैंड और शांति निकेतन में हुई. कौन-सी जगह आपको ज़्यादा अच्छी लगी? शांति निकेतन. हालाँकि मेरे जीवन पर इसका ख़ास असर नहीं हुआ. रवीन्द्रनाथ टैगोर से मैं मिलने जाती थी. एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि आपने नृत्य सीखना क्यों छोड़ दिया तो मैने कहा कि चूँकि नृत्य सीखने और टेनिस खेलने का मेरा टाइम एक ही है, इसलिए मैने नृत्य छोड़ दिया. हालाँकि उन्होंने मुझसे कहा कि हर युवा महिला को नाचना आना चाहिए, बाद में मुझे भी कभी-कभी लगता था कि शायद वो सही थे और मुझे नृत्य सीखना चाहिए था. रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ कोई और यादगार पल? जब कभी स्कूल में मेरा मन नहीं लगता था तो मैं उनसे मिलने चली जाती थी. हम स्कूल में ही बंद रहते थे और मैं सोचती थी कि चूँकि वो दुनिया घूम चुके थे, इसलिए उनसे मिलना चाहिए. हर सुबह उनकी नई कलाकृति स्कूल में लगी रहती थी, हम लोग उसे ज़रूर देखते थे. जैसा कि आपने बताया कि आप बचपन से ही महाराजा सवाई मान सिंह को बतौर हीरो मानती थी. तो क्या यही आपका पहला 'क्रश' था? मैं ही नहीं, मेरा पूरा परिवार उन्हें बहुत चाहता था. वो बहुत अच्छे खिलाड़ी थे और उतने ही हैंडसम. वो हमसे हमेशा बात करते रहते थे. हमारे बीच उम्र में आठ साल का अंतर था. महाराजा के साथ और पहले भी आपने लगभग पूरी दुनिया घूमी हैं. आपकी पसंदीदा जगह कौन-सी है? लंदन मुझे बहुत पसंद है. इसके अलावा स्विट्ज़रलैंड भी पसंद है. बर्फ़ पर स्कीईंग करना अच्छा लगता है. क्या यहाँ कुछ बंदिशें थीं जिसकी वजह से उस ज़माने में आपका मन करता रहा हो कि विलायत जाते तो ये करतीं, वो करतीं? नहीं. यहाँ इस तरह की कोई बंदिश नहीं थी. शादी के बाद से मैं कुछ वक्त पढ़ने में बिताती थी. सुबह घुड़सवारी करती थी और शाम को टेनिस. ड्राइविंग का शौक था, लिहाज़ा खुद गाड़ी चलाती थी. जब आप जयपुर आईं उस वक़्त राजस्थान को पारंपरिक रूप से बहुत पिछड़ा माना जाता था, इसे आधुनिक बनाने में आपने भी योगदान किया क्या? मैं नहीं मानती कि परंपरा निभाना गलत है. मैं नहीं चाहूँगी कि राजस्थान अपनी परंपरा भूले. आधुनिकता का ये मतलब नहीं कि अपनी परंपरा ही भुला दो. आपने राजाओं के दौर से लेकर आज़ादी तक का बदलाव देखा है. सबसे अच्छा और सबसे खराब पल कौन सा रहा? राजशाही के दिन सबसे अच्छे थे. तब हम जनता का ख़याल रख सकते थे. उनकी मदद कर सकते थे. आजादी के बाद लोग हमारे पास आते थे और शिकायत करते थे कि अब तो हर बात पर टैक्स लगता है, लेकिन हम क्या कर सकते थे. लेकिन जयपुर में राजपरिवार को आज़ादी के बाद भी लंबे अरसे तक पूरा आदर सम्मान दिया गया और ‘माई बाप’ की तरह माना गया, आपकी नज़र में इसकी ख़ास वजह क्या थी? मैं समझती हूँ कि राजा प्रजा को बच्चों की तरह रखते थे, संभालते थे. यही वजह थी कि लोग राजपरिवार का सम्मान करते हैं. शुरू-शुरू में जब आप चुनाव लड़ीं तो आप रिकॉर्ड मतों से जीतती थी? वो भी दरबार की वजह से. उन्हें मुझ पर विश्वास था. वो जानते थे कि मैं पैसा नहीं खाऊँगी. चुनाव के दौरान जब आप लोगों के बीच जाती थी तो हज़ारों-हज़ार लोग आपको देखना चाहते थे, राजमाता होने के नाते लोग आपको छूना चाहते थे, आपको कैसा लगता था? मैंने इस माहौल का लुत्फ़ तो नहीं उठाया, लेकिन ये तो स्वाभाविक था. उनके बीच रहना और काम करना मेरी ज़िम्मेदारी थी. फिर भी मानती हूँ कि जनता का जितना प्यार और सम्मान मुझे मिला वो दरबार की वजह से मिला. और यहाँ जयपुर में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने के पीछे क्या सोच थी? एक दिन महाराजा ने मुझसे कहा था कि मैं चाहता हूँ कि कोई महिला पर्दा प्रथा को समाप्त करे. मैंने कहा कि आप मुझे स्कूल दे दीजिए, धीरे-धीरे ये प्रथा चली जाएगी. इस तरह से महारानी गायत्री देवी स्कूल शुरू हुआ. मैं आज भी स्कूल में जाती हूँ. सालाना बैठक में समस्याओं पर चर्चा होती है, लेकिन स्कूल को मैं कोई ख़ास दिशा-निर्देश नहीं देती हूँ. क्रिकेट में भी दिलचस्पी है क्या? हाँ, बिल्कुल. क्योंकि मैं कूच बिहार से हूँ. किसी जमाने में कूच बिहार की क्रिकेट टीम बहुत मशहूर थी. बच्चों के लिए कूच बिहार ट्रॉफी का आयोजन आज भी होता है. मेरा भाई महाराजा जगदीपन नारायण भी अच्छे क्रिकेटर थे. महाराजा सवाई मान सिंह भी क्रिकेट पसंद करते थे, क्रिकेट देखने जाते थे, लेकिन कभी-कभार ही क्रिकेट खेलते थे. क्या ब्रिटिश रॉयल्टी से नजदीकी महसूस करते थे? नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी. अब जब वो भारत आते हैं और हमारे मेहमान होते हैं तो मेजबान की भूमिका तो हमें निभानी ही होती है. आप फ़िल्मों की शौकीन हैं? मैं फ़िल्म देखती हूँ, लेकिन मुझे ख़ास शौक नहीं है. मतलब मैं आम तौर पर शाम को फ़िल्म नहीं देखती. किसी से मिलना-जुलना है तो वो शाम को ही होता है. सत्तर के दशक में ये चर्चा जोरों पर थी कि इंदिरा गाँधी आपसे ईर्ष्या रखती थी. आपातकाल के दौरान भी आपको काफ़ी तंग किया गया. इन सब चीजों से आप परेशान तो हुई होंगी? नहीं ख़ास परेशान नहीं हुई. चूँकि मैं विपक्ष में थी इसलिए आपातकाल में तो मुझे जेल जाना ही था. इंदिराजी अच्छी नहीं थीं और अगर स्वतंत्र पार्टी आज अस्तित्व में होती तो भारत दुनिया में शीर्ष पर होता. मुझे नहीं लगता कि इंदिराजी का मेरे ख़िलाफ़ कोई निजी एजेंडा रहा होगा. हिंदी फ़िल्म जो आपको पसंद हो? शाहरुख ख़ान की फ़िल्म ‘कल हो न हो’ मुझे पसंद है. अमिताभ का अभिनय भी मुझे अच्छे लगता है. वो हमारे स्कूल में भी आए हैं और इस दौरान मैने उनसे मुलाक़ात की है. इसके अलावा रानी मुखर्जी की एक्टिंग भी बहुत अच्छी है. आपके हिसाब से सुंदरता क्या है. मतलब आपकी नज़र में ख़ूबसूरत महिला कौन है? मेरे हिसाब से सुंदरता का मतलब शारीरिक नहीं, आत्मीय और चारित्रिक सुंदरता है. ऐश्वर्या राय बहुत सुंदर है, हालाँकि मैने उनकी कोई फ़िल्म नहीं देखी है. इन दिनों आपकी दिनचर्या क्या है? दिन भर कुछ न कुछ काम लगा ही रहता है. तीन स्कूल हैं. महारानी गायत्री देवी स्कूल, महाराजा सवाई मानसिंह विद्यालय, ग़रीब बच्चों के लिए बाल निकेतन. इसके अलावा ग़रीबों के लिए एक ट्रस्ट है, इनमें दिलचस्पी लेती हूँ और इस तरह दिन गुजर जाता है. आपका पसंदीदा शहर? मेरा पसंदीदा शहर जयपुर ही है. लेकिन लोग इसकी शक्ल बिगाड़ने पर तुले पड़े हैं. शहर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स और ऊँची-ऊँची इमारतें बन रही हैं, वो भी बगैर किसी वास्तुशिल्प से. कभी जयपुर की पहचान योजनाबद्ध शहर के रूप में होती थी, लेकिन अब तो हाल बुरा है. जेडीए यानी जयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी को मैं जयपुर डिस्ट्रक्शन अथॉरिटी कहती हूँ. अगर कोई मुझे शहर की ज़िम्मेदारी दे तो मैं कहूँगी कि कोई विज्ञापन होर्डिंग्स नहीं और ऊँची इमारतें भी नहीं. आप महाराजा मानसिंह की तीसरी रानी थीं. तो क्या आपको उनके साथ तालमेल बिठाने में कोई परेशानी हुई? जब मैं शादी कर जयपुर आई तो दूसरी महारानी यहाँ नहीं थीं. वो बच्चों के साथ बंगलौर में थीं. वो जब आई थीं तो मेरा व्यवहार उनके साथ छोटी बहन की तरह था और वह मेरे साथ बड़ी बहन की तरह पेश आती थीं. बड़ी महारानी जोधपुर में रहती थीं और जब वह यहाँ आती थीं तो मैं उनका आदर करती थी और हमारे बीच संबंध बहुत अच्छे थे. |
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