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एक मुलाक़ात: जावेद अख़्तर के साथ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इसी श्रृंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं सुपरिचित गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख़्तर से. पेश हैं इस मुलाक़ात के कुछ ख़ास अंश. सबसे पहले ये बताएँ जावेद साहब कि आपका नाम ‘जादू’ था क्या कभी? जी हाँ, पहले तो ‘जादू’ ही था. असल में इसकी एक छोटी सी कहानी है. अब जब आपने पूछ ही लिया तो बता दूँ. मैं ग्वालियर में एक हॉस्पिटल में पैदा हुआ तो मेरे पिता अपने दोस्तों के साथ वहाँ थे. तभी किसी ने पूछा कि बच्चे का नाम क्या होगा तो किसी ने मेरे पिता को सुझाया कि जब तुम्हारी शादी हो रही थी तो तुमने अपनी होने वाली बीबी के लिए एक नज़्म लिखी थी ‘लम्हा-लम्हा किसी जादू का फसाना होगा’.तो इसका नाम जादू ही रख दो. फिर जब मुझे स्कूल भेजा जाने लगा तो इससे मिलता-जुलता नाम जावेद रखा गया. ये तो पता है कि आपकी सात पीढ़ियाँ उर्दू कवि और लेखकों की थी, लेकिन जावेद साहब आपको सबसे पहले कब लगा कि मैं भी लेखक बनूँगा? देखिए ये तो मुझे कहीं पता था कि मैं लिख सकता हूँ, लेकिन मुझे लिखने का बहुत शौक नहीं था या कहें हिम्मत नहीं थी. क्योंकि पढ़ता बहुत था, इसलिए मालूम था कि अच्छा लिखना किसे कहते हैं. गद्य का मेरा अनुभव ये था कि जब मैं कॉलेज में था तो वाद-विवाद में हिस्सा लिया करता था तब अक्सर अपने दोस्तों के छोटे भाई-बहनों के लिए भाषण लिख देता था. या फिर जिन दोस्तों के प्रेम-प्रसंग हुआ करते थे, उनके लिए खत लिख दिया करता था. जब मैं फ़िल्म इंडस्ट्री में आया तो इरादा निर्देशक बनने का था. स्क्रिप्ट राइटर बनूँगा ये तो सोचा भी नहीं था. लेकिन हुआ ये कि मैं जहाँ भी सहायक निर्देशक होता था वहाँ पर मैं कुछ लिखता था तो लोग काफ़ी प्रभावित होते थे. साल भर के बाद ही मैने अपनी पहली फ़िल्म के डायलॉग लिख दिए. जहाँ तक शायरी का ताल्लुक़ है, मुझे शुरू से ही इसमें दिलचस्पी थी. मुझे 16-17 साल की उम्र में ही हज़ारों शेर याद थे जिन्हें मैं घंटों तक लोगों को सुना सकता था. मुझे ये भी पता था कि मैं लिख सकता हूँ, लेकिन पता नहीं क्यों लिखने की हिम्मत नहीं हुई थी. मैने शायरी बहुत देर से शुरू की. मेरे ख़्याल से 32-33 साल की उम्र में. जावेद साहब आपका पसंदीदा गाना? देखिए जब बात बचपन की हो रही है तो मैं आपको बता दूँ कि मैने अपने होश में पहली फ़िल्म ‘आन’ देखी थी. उसी फ़िल्म का गाना ‘दिल में छुपा के प्यार का अरमान ले चले.’ इसके अलावा ‘वो सुबह कभी तो आएगी’. फ़िल्म ‘अंदाज’ का ‘जिंदगी एक सफ़र है सुहाना, यहाँ कल क्या हो किसने जाना’ और शैलेन्द्र का गाना ‘दिल का हाल सुने दिलवाला, छोटी सी बात न मिर्च मसाला.’ रोमांटिक गीतों में साहिर का , ‘ये रात, ये चाँदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्तां’ और ‘जिंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मुकाम..’ भी मुझे बहुत पसंद है. तो फिर आप मुंबई कब पहुँचे. मलतब फ़िल्म इंडस्ट्री से रूबरू कैसे हुए? जब मैं कॉलेज में था तो ये साफ़ था कि मैं ग्रेजुएशन के बाद मुंबई जाऊँगा और निर्देशक बनना चाहूँगा. उन्नीस बरस की उम्र में मैं मुंबई गया. पहले कमाल अमरोही और फिर ब्रिज साहब का सहायक बना. इसी दौरान धीरे-धीरे मुझे दूसरे काम मिलते गए. आपने बहुत संघर्ष के दिन गुजारे? हाँ मैने दो-दो, तीन-तीन दिन बगैर खाने के गुजारे हैं. भूख का बड़ा भयानक रूप देखा है. मतलब ये समझिए कि अक्टूबर 1964 से दिसंबर 1969 तक यानी पाँच साल से अधिक, ये दिन कैसे गुजरे ये मैं ही जानता हूँ. इस दौरान मैने तमाम मुश्किलें झेलीं. महीनों मैने ऐसे गुजारे कि मुझे पता ही नहीं होता था कि सोऊँगा कहाँ. फिर कहाँ सोते थे? कहीँ भी. कभी दोस्तों के घर. किसी की छत पर. रेलवे स्टेशन पर भी सोया हूँ. पार्क में भी सोया हूँ. लेकिन कभी ख़्याल नहीं आया कि कुछ नहीं होगा. हालाँकि अब सोचता हूँ तो ये बेवकूफ़ी की बात लगती है. आदमी को ये भी सोचना चाहिए कि अगर वो कामयाब न हुआ तो, आगे क्या होगा. तो क्या आप मानते हैं कि अगर व्यक्ति संघर्ष के दौर को ये मानकर चले कि वो संघर्ष नहीं कर रहा है तो बाधाओं को आसानी से पार कर लेता है? हाँ. मैं आपको एक दिलचस्प घटना सुनाता हूँ. मैं एक वक्त दादर में था और रहता था बान्द्रा में. मेरे पास बीस पैसे थे. मैने सुबह से खाना भी नहीं खाया था. तो या तो मैं कुछ खा सकता था या फिर बस का टिकट ले सकता था. काफ़ी सोचने-विचारने के बाद मैने चने ख़रीद लिए और पैदल चलना शुरु किया. चलते-चलते कोहिनूर मिल के सामने के शोरूम से गुज़र रहा था तो मैने सोचा कि दुनिया कितनी भी बदल जाए कम से कम ये जगह तो बनी रहेगी. तब मेरे मन में ख़्याल आया कि एक दिन जब मैं अपनी कार से यहाँ गुजरूँगा तो याद करुँगा कि किसी दिन मैने यहाँ 20 पैसे के चने खाए थे. जावेद साहब 1969 में ऐसा क्या हो गया कि अचानक आपकी किस्मत जगी और तस्वीर बदल गई? मैने 1965 में पहली फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी ‘सरहदी लुटेरा’. इसमें एक रोल कर रहे थे सलीम साहब. मैं उस फ़िल्म का सहायक निर्देशक भी था और साथ ही 100 रुपए महीने में डायलॉग लिख रहा था. वहाँ सलीम साहब से मुलाक़ात हुई और फिर दोस्ती हो गई. हम दोनो परेशानियों में थे. अक्सर कहानियों पर चर्चा होती थी. ‘सरहदी लुटेरा’ के निर्देशक एसएम सागर ने हम दोनों से कहा कि मेरे पास एक कहानी है और अगर तुम उसका स्क्रीनप्ले लिख दो तो मैं तुम्हें ढाई-ढाई हज़ार रुपए दूँगा. हमने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया. बाद में उनके सहायक सुधीर वाही ने हमें सिप्पी फ़िल्म जाने की सलाह दी. मैंने पहले अकेले ही रमेश सिप्पी से मुलाक़ात की. उन्होंने दो दिन बाद हम दोनो को बुलाया. सिप्पी साहब ने मुझे और सलीम को साढ़े सात सौ महीने पर नौकरी पर रख लिया. मैं बहुत खुश था. बाद में वहाँ राजेश खन्ना से मुलाक़ात हुई. इसके बाद फ़िल्म ‘हाथी मेरे साथी’, ‘सीता और गीता’ फिर ‘जंजीर’ और इस तरह सिलसिला शुरू हो गया. ये सही है क्या जिस तरह शोले में अमिताभ धर्मेन्द्र की शादी का प्रस्ताव ले जाते हैं, कुछ उसी अंदाज में सलीम साहब भी आपके लिए गए थे? हाँ, कुछ ऐसे वाकयात हमारी जिंदगी में हुए हैं, जिन्हें बाद में हमने फ़िल्मों में इस्तेमाल किया. सलीम साहब और मैने 11 साल साथ काम किया और 18 फ़िल्मों की कहानियाँ लिखीं. काम कम किया, लेकिन कई फ़िल्मों की कहानियाँ ज़बर्दस्त साबित हुईं. सलीम-जावेद ने एक से बढ़कर एक फ़िल्में लिखी हैं, लेकिन अपनी फ़िल्मों में आपकी पसंदीदा फ़िल्म कौन सी है? कोई भी नहीं. देखिए, जब आप किसी फ़िल्म पर काम कर रहे होते हैं तो वो आपकी पसंदीदा होती है, लेकिन जब उससे आपका रिश्ता टूट जाता है और आप दूसरी स्क्रिप्ट पर काम करने लगते हैं तो पहली स्क्रिप्ट फेवरिट नहीं रहती. और अगर कोई एक ही फेवरिट रहे तो इसका मतलब है कि आप पीछे की बात ज़्यादा सोच रहे हैं. और दूसरे गीतकारों में आपके पसंदीदा? देखिए, जैसे गीतकार उस ज़माने में थे आज तो हम सोच भी नहीं सकते. साहिर, शैलेन्द्र, मज़रूह, कैफ़ी, एसएच बिहारी. राजा मेंहदी अली, प्रदीप, भरत व्यास....इन सबमें मुझे साहिर बहुत पसंद थे. उन्होंने सिर्फ़ कमाई के लिए गाने नहीं लिखे. उनकी किसी भी फ़िल्म का गीत सुनिए, एक-एक लाइन ढली हुई है. दूसरे जीनियस थे शैलेन्द्र. दरअसल, शैलेन्द्र का रिश्ता बनता है कबीर और मीरा से. बड़ी बात सादगी से कह देने का जो गुण शैलेन्द्र में था, वो किसी में नहीं था. यहाँ तक कि ‘गम दिए मुस्तकिल’ से लेकर ‘आज मैं ऊपर आसमाँ नीचे’ जैसे गाने लिखने वाले मज़रूह साहब ने एक बार खुद मुझसे कहा था कि सच पूछो तो सही मायनों में गीतकार शैलेन्द्र ही हैं. शैलेन्द्र का रिश्ता उत्तर भारत के लोक गीतों से था. लोक गीतों में जो सादगी और गहराई होती है वो शैलेन्द्र के गीतों में थी. ‘तूने तो सबको राह दिखाई, तू अपनी मंजिल क्यों भूला, औरों की उलझन सुलझा के राजा क्यों कच्चे धागों में झूला. क्यों नाचे सपेरा’. अगर क्यों नाचे सपेरा जैसी लाइन मैं लिख पाऊँ तो इत्मीनान से जीऊँगा. जावेद साहब कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप स्क्रीनप्ले लिखने से ज़्यादा गीतकार की भूमिका को ज़्यादा पसंद करते हैं? बिल्कुल नहीं. मैने अपना सफ़र स्क्रिप्ट लेखक की हैसियत से ही शुरू किया था. इन दिनों चूँकि नहीं लिख रहा हूँ, इसलिए शायद ऐसा लग रहा हो. लेकिन अब मेरा इरादा साल में कम से कम एक स्क्रिप्ट और गीत लिखने का है. अच्छा शबाना (आज़मी) से आपकी मुलाक़ात कब हुई? शबाना से मेरी मुलाक़ात कब हुई, ये मैं आपको बता नहीं पाऊँगा. क्योंकि जब होश संभाला हम एक-दूसरे को जानते थे. हमारे परिवार भी एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे. लेकिन ये ज़रूर है कि मेरे ख़्याल से 1980 दशक की शुरुआत में हमारी मुलाक़ातें ज़्यादा होने लगीं और हमारी दोस्ती बढ़ी. और फिर दोस्ती मुहब्बत में कब तब्दील हुई? ये सवाल तो ऐसे ही है कि जैसे मैं आपसे पूछूँ कि आपका बच्चा बड़ा कब हुआ. वैसे ही जब दोस्तियां मुहब्बत में तब्दील होती हैं तो ऐसा नहीं होता कि एक दिन रुमाल ज़मीन पर गिर गया और उठाते वक़्त प्यार का अहसास हो गया. ये इतना आहिस्ता-आहिस्ता होता है कि आपको पता ही नहीं चलता और रिश्ते का मिज़ाज़ बदल जाता है. फरहान और ज़ोया बहुत प्रतिभावान हैं, आप उन्हें किस तरह की टिप्स देते हैं? देखिए आजकल बाप का दिल क्या करता है ये काफ़ी नहीं है. सवाल ये है कि बच्चों का दिल क्या कर रहा है. फरहान और जोया मुझसे कभी-कभी राय लेते हैं और मैं उन्हें राय देता भी हूँ. लेकिन ऐसा नहीं है कि वो मेरी सभी बात मान लेते हैं. उनकी अपनी सोच है. मुझे लगता है कि नई पीढ़ी ज़माने को पुराने लोगों से बेहतर समझती है. सच बात ये है कि मैं जब अपने बच्चों से बात करता हूँ तो मैं भी उनसे बहुत सीखता हूँ. आजकल मैं ज़्यादातर अपने बच्चों और अपने दोस्तों के बच्चों के साथ काम कर रहा हूँ. मैं इनके साथ काम इसलिए कर पाता हूँ क्योंकि मेरे दिल में सचमुच उनके लिए इज्ज़त है. मैं ये नहीं समझता कि ये मुझसे सीखें. उनकी मर्जी वो मुझसे कुछ सीखना चाहते हैं कि नहीं, लेकिन मैं हर बार फ़ायदा उठाता हूँ और इन बच्चों से कुछ न कुछ ज़रूर सीखता हूँ. लगातार सीखते रहना, कुछ नया करने का जुनून. ये सब आप कैसे कायम रख पाएं हैं? ये सोचना कि हमने सब कुछ देख लिया इसके लिए थोड़ी सी बेवकूफ़ी जरूरी है और ये मुझमें नहीं है. जिंदगी बड़ी रोचक है, इसमें नई-नई बातें होती रहती हैं. हर पल नया होता रहता है और इसे हैरत से देखते रहिए यही जिंदगी है. राजेश खन्ना पसंद थे आपको? हाँ हाँ. सच पूछिए तो राजेश खन्ना साहब का सलीम-जावेद के कैरियर में बहुत बड़ा योगदान है. एक तो वो सुपर स्टार थे और जब हमने उनकी सिफ़ारिश पर ‘हाथी मेरे साथी’ लिखी तो और लोगों का ध्यान भी हम पर गया कि अगर इतना बड़ा स्टार इन नौजवान लेखकों की सिफ़ारिश कर रहा है तो इनमें कुछ तो बात होगी. किसी वक़्त राजेश खन्ना सुपर स्टार थे, लेकिन अचानक अमिताभ ने उनकी जगह ले ली, आप बता सकते हैं कि क्या वजह थी कि राजेश खन्ना का ग्राफ़ तेजी से गिरा? ये तो बहुत मुश्किल सवाल है. बहुत से फैक्टर होते हैं, लेकिन अहम बात ये है कि राजेश खन्ना जितनी देर उस मुकाम पर रहे वो मुकाम कोई और हासिल नहीं कर पाया. मैं अपने पसंदीदा शायर का हवाला देकर इसका ज़वाब देना चाहूँगा, ''न मुँह छिपा के जिए हम, न सर झुका के जिए, सितमगरों की नज़र से नज़र मिला के जिए. अब एक रात अगर कम जिए तो हैरत क्यों, कि जब तलक भी जिए मशालें जला के जिए.'' अब आपके पसंदीदा अभिनेता कौन हैं? कोई भी नहीं है. कभी किसी का अभिनय पसंद आता है, कभी किसी का. वो उम्र गुजर गई जब कोई पसंदीदा अभिनेता होता था. जब स्कूल-कॉलेज में था तो दिलीप कुमार, राजेश खन्ना अच्छे लगते थे. अमिताभ तो मुझे आज भी पसंद हैं. नए लोगों में शाहरुख, आमिर और ऋतिक रोशन का काम भी अच्छा लगता है. सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में क्या आप अधिक सक्रिय होंगे? कह नहीं सकता. मुझे तो ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे हिंदुस्तान का आम नागरिक सक्रिय होता जा रहा है. इसलिए कि लोगों को ये महसूस हुआ है कि जो अधिकार संविधान ने उसे दिए हैं, उसे अभी मिल नहीं पाए हैं. आम नागरिक बहुत वर्षों से ये बर्दाश्त कर रहा है, लेकिन अब उसकी बर्दाश्त की हद हो गई है. आपको सच में लगता है कि ‘रंग दे बसंती’ की हकीक़त की दुनिया में कोई जगह है या हो सकती है? हो सकती नहीं, होनी ही पड़ेगी. ये इच्छा की बात नहीं है, ऐसा तो करना ही पड़ेगा. ‘रंग दे बसंती’ से मेरा मतलब ये नहीं है कि आप जाकर किसी को गोली मार दें. ये इलाज़ नहीं है. इसलिए कि एक आदमी के रहने न रहने से बहुत फ़र्क नहीं पड़ता. सवाल व्यवस्था का है और लोग इससे काफ़ी नाखुश हैं. ये सही है कि इतने वर्षों में 20-30 फ़ीसदी लोगों का भला हुआ है और मुझे मानना होगा कि मैं भी इन्हीं लोगों में शामिल हूँ. लेकिन सच का एक पहलू ये भी है कि आज भी 60-70 फ़ीसदी लोग तकलीफ में हैं. हम 20-30 फ़ीसदी लोगों की कामयाबी और उनके आराम और सुख का जश्न आखिर कब तक मनाते रहेंगे. अगर भारत उदय होना है कि गाँव-गाँव में खुशहाली ज़रूरी है. आप बहुत संवेदनशील व्यक्ति हैं. आप भारत को कैसे परिभाषित करेंगे? मैं तो ये कहूँगा को भारत को परिभाषित करना मुमकिन ही नहीं है. हम एक ऐसे देश में हैं जिसकी तारीफ़ में कुछ कहें तो उसका ठीक उलटा भी सच है. इसकी बुराई में जो भी बात कहें उसका उलटा भी सही है. हमारा देश एक ही समय में कई (19वीं, 20वीं और 21वीं) सदियों में जी रहा है. यहाँ आपको ऐसा इंसाफ मिलेगा जिसकी दुनिया में मिसाल नहीं होगी, वहीं ऐसा ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी भी मिल जाएगी जिसकी मिसाल और कहीं मिलना मुश्किल है. ये समाज बहुत जटिल है. इसे समझना आसान नहीं है. लेकिन इस देश की यही खासियत है कि हम बर्बादी की कगार से वापस लौट आते हैं. मुझे उम्मीद है हिंदुस्तान की साझी आत्मीयता और मजबूत होगी. जो राजनीतिक बुराइयाँ हमारे संस्कार और संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं, उनका इलाज़ करना ज़रूरी होगा. |
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